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कर्मठ योद्धा

कर्मठ योद्धा

माननीय दत्तात्रेय होसबले जी का अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् को एक राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ा संगठन, सबसे वैचारिक संगठन, एक विशिष्ट कार्यपद्धति वाला संगठन बनाने में एक महत्वपूर्ण योगदान रहा है। लगभग ढाई दशकों तक दत्ता जी ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का मार्गदर्शन किया, नेतृत्व किया। दत्ता जी छात्र जीवन से ही विद्यार्थी परिषद् से जुड़े। पूर्ण-कालिक प्रचारक के रूप में उन्होंने कर्नाटक, दक्षिण भारत और सम्पूर्ण भारत के संगठन विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। मूलत: कन्नड़़ भाषी दत्ता जी विद्यार्थी जीवन से ही प्रतिभा संपन्न विद्यार्थी थे। उनका कन्नड़, अंग्रेजी और हिंदी में बराबर पकड़ थी। कन्नड़, अंग्रेजी और हिंदी साहित्य का उन्होंने काफी अध्ययन किया। विद्यार्थी परिषद्, शैक्षिक मुद्दों के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर छात्रों को गोलबंद करना, और राष्ट्रीय स्तर  पर एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो इसका भी उन्होंने प्रयास किया। उस समय उनके नेतृत्व में ढाई दशकों तक देश भर में आंदोलन भी हुआ। एक बार राष्ट्रीय महामंत्री के रूप में भी उन्होंने क्षेत्रीय आंदोलन का नेतृत्व किया। और बाद के दिनों में राष्ट्रीय संगठन मंत्री भी बने। जहां एक ओर विद्यार्थी परिषद् ने समाज परिवर्तन के मुद्दों को आगे उठाया वहीं व्यक्ति निर्माण, यानी छात्रों के बीच में देशभक्ति, परिश्रमशीलता,  विभिन्न्न प्रकार के एक नागरिक के सतगुणों का विकास हो इसका भी उनके मार्गदर्शन में  प्रयास हुआ। और आज हम यह कह सकते है कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् एक विशिष्ट कार्य पद्धत्ति वाला संगठन है। और  विद्यार्थी परिषद् में काम करते हुए, जो कार्यकर्ता है जब समाज जीवन में वापस जाते है तो समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उनकी एक महत्व भूमिका रहती है। और मातृभूमि की सेवा करने का काम करते है। दत्ता जी एक अच्छे संगठक है। आज बहुत ही प्रसन्नता का विषय है कि संघ के सर-कार्यवाह के रूप में  हमारा मार्गदर्शन करेंगे। विद्यार्थी परिषद् के बाद वे संघ के प्रत्यक्ष दायित्व पर आये। उन्होंने सघ के विदेश विभाग के कार्यों के लिए उन्होंने विदेश का भी प्रवास किया। देश के विभिन्न भागों में प्रयास करते रहे और इतनी व्यस्तता और इतने बड़े अधिकारी होने के बावजूद कार्यकर्ताओं के लिए सहज उपलब्ध होते है। और कार्यकर्ता भी उनको अपना मित्र, अपना अभिभावक समझते है और अपने मन की बात भी उनसे सरलता पूर्वक कहते है। माननीय दत्ता जी विलक्षण प्रतिभा के धनि है। और विभिन्न विषयों पर भी उनका उद्द्बोधन होता रहा है। मैं यह कह सकता हूं कि कार्यकर्ता माननीय दत्ता जी से प्रेरणा लेते रहे है। मुझे भी उनके साथ अस्सी के दशक से काम करने का अवसर मिला है। और जब मैं 1997 में राष्ट्रीय अध्यक्ष बना, उस समय वे विद्यार्थी परिषद् के अखिल भारतीय संगठन मंत्री थे।

उनके साथ कार्यक्रमों में भाग लेना, बैठना, साथ रहना इत्यादि कुछ ऐसे पल रहे जिससे काफी कुछ उनसे सिखने को मिला हैं। इसलिए आज हमें प्रसन्नता हैं कि संघ के सर-कार्यवाह के रूप में आने वाले समय में उनका मार्गदर्शन मिलेगा और सच पूछिए तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का जो कार्य विस्तार हुआ हैं। और कार्यकर्ताओं में जो वैचारिक प्रतिबद्धता उत्पन्न हुईं हैं, उसमें माननीय दत्ता जी जैसे महानुभावों का एक अहम रोल हैं। 1985 में जब पूरा विश्व अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष मना रहा था, तब भारत में स्वामी विवेकानंद की जयंती 12 जनवरी को युवा दिवस के रूप में घोषित किया तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की योजना के अनुसार माननीय दत्ता जी के नेतृत्व में वल्र्ड आगे्रनाइजेशन आफ स्टूडेंट एंड यूथ का गठन हुआ, जिसमें विभिन्न देशों के विद्यार्थी, जो लोकतंत्र के प्रति आस्था रखते हैं, उनका मार्गदर्शन भी दत्ता जी ने किया। बाद में युवा सहकारिता के माध्यम से युवा को कैसे रोजगार से जोड़ा जाए इसके लिए भी देशभर में कई काम चले वहां भी माननीय दत्ता जी की प्रमुख भूमिका रही। चाहे कश्मीर का मुद्दा हों, या चाहे एशिया के देशों के मुद्दे हों माननीय दत्ता जी की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने दक्षिण एशिया यानी सार्क देशों के युवाओं को गोलबंद कर अपने-अपने देश की समस्याओं को उठाने के लिए भी प्रेरित किया। आज उनके मार्गदर्शन में कार्य कर चुके युवा देशभर में मातृभूमि की सेवा करने में लगे हैं। अत: माननीय दत्ता जी के साथ रहना और उनसे कुछ सीखना हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात हैं।

 

दिनेशानंद गोस्वामी

 

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