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दूरदर्शी पुरोधा

दूरदर्शी पुरोधा

दत्तात्रेय जी के साथ मैंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) में लम्बा समय तक काम किया। जितना मुझे याद है वे एबीवीपी में 1977 में आए। मैं एबीवीपी में पुराना था। जब से वे एबीवीपी में आये, तब से हमारा उनके साथ  सम्बन्ध हुआ। शुरू में वे कर्नाटक के संगठन मंत्री बने। बाद में दक्षिण भारत के संगठन मंत्री बने। और बाद में वो 1992 में राष्ट्रीय संगठन मंत्री बने। दत्ता जी माननीय मदन जी के बाद विद्यार्थी परिषद् के संगठन मंत्री बने। विद्यार्थी  परिषद् को इसका सौभाग्य रहा की प्राध्यापक यशवंत राव केलकर जैसे गाइड तथा हर तरीके से विद्यार्थी परिषद् को खड़ा करने वाले जो एक बड़े दूरद्रष्टा थे उनका सानिध्य मिला। पहले मदन दास जी संगठन मंत्री बने। बाद में दत्ता जी बने। बाद में सुनील अम्बेकर बने। तो ये जो एक परम्परा रही, मदन दास जी तो 22 वर्षों तक संगठन मंत्री रहे। और दत्तात्रेय जी 1992 में बने। मुझे पक्का वर्ष याद नहीं है। शायद करीब 12-14 साल वो विद्यार्थी परिषद् के  संगठन मंत्री रहे। यशवंत राव केलकर जी के कारण संगठन चलाने की विधि और संगठन चलाने की कला इसका भरपूर ज्ञान मदन दास जी को था।

मैं कहूंगा की वही कला और ज्ञान मदन दास जी के बाद दत्ता जी को प्राप्त हुआ। यशवंत राव केलकर जी का निधन 1987 में हुआ। दत्तात्रेय जी को भी 10 या उससे अधिक विद्यार्थी परिषद् में हो गए थे। तो उनको भी यशवंत राव केलकर सानिध्य मिला था। ये भी बताना जरूरी है कि दत्ता जी मूलत: संघ के ही स्वयंसेवक थे। लेकिन जिनको विद्यार्र्थी  परिषद् में ज्यादा काम करने का अवसर मिला, मैं कहूंगा की एक संगठक वाली जो भूमिका निभाने का काम उनको विद्यार्थी परिषद् में मिला। हो सकता है कि उनको वही भूमिका संघ में भी भूमिका निभाने में बड़ी सहायक सिद्ध हुई होगी। संघ में उनको पहले उनको सह-बौद्धिक प्रमुख का दायित्व मिला। और बाद में वे सह-कार्यवाह भी बने। और अब वो सर-कार्यवाह भी बने है। तो यह तो निश्चित कहा जा सकता है कि उनकी क्षमता को देखते हुए ही उनको वो सर-कार्यवाह बनाया गया है। विद्यार्थी परिषद् में काफी लम्बा समय रहने के बावजूद भी उनको भी इस चीज का पूरा ध्यान था की वे मूलत: संघ के स्वयंसेवक है। जिसने पहले विद्यार्थी परिषद् में काम किया फिर संघ में जिम्मेदारी मिल गयी। जहां उन्होंने जिम्मेदारी बखूबी निभायी। मैं संगठन में कार्य करते हुए दो चीजों का ध्यान रखा जाता है। और इसमें दत्तात्रेय जी पूरी तरह खरे उतरते है। वह है किसी भी व्यक्ति से ठीक से आदरपूर्वक मिलना। व्यक्ति की कमी की तरफ न देखते हुए, उसके गुणों का उचित सम्मान करना। और व्यक्ति को कितना महत्व देना है इसका एक ठीक से विवेक करना, दत्ता जी की संगठन कुशलता रही है। और जिसके कारण उनको आज संघ में भी बड़ा आदर मिला है।

मैंने एक बार उनके बारे में कहा था कि वो थ्री-रोल्ड-इन-वन व्यक्ति है। थ्री रोल्ड का मतलब है कि वो विचारक भी हैं, वो संगठक भी है। और वो नेता भी है। नेता  का जो भी एक गहरा अर्थ होता है, उस मायने में नेतृत्व क्षमता भी हैं। संगठक कुशलता भी है। और वे विचारक भी है। ये तीनों चीजे एक ही व्यक्ति में मिलना आसान नहीं होता। लेकिन दत्ता जी में ये तीनो गुण रहे है। जिसके कारण संघ में भी उनको जो दायित्व मिले है। उन दायित्वों को उन्होंने अच्छी तरीके से निभाया है। ये विषय भी थोड़ा जरूर समझने का है कि संघ में सर-कार्यवाह एक तरह की एक्सिक्यूटिव पोस्ट होती है। डे-टू-डे संघ के कार्य में सर-कार्यवाह की बड़ी भूमिका होती है। सरसंघचालक गाइड और फिलोस्पर होते है उनका संघ में सम्मान होता है। संघ में सर-संघचालक केवल फिगर हेड नहीं होते। लेकिन फिर भी डे-टू-डे संघ का संचालन ये सर-कार्यवाह करते है। इसलिए जिनको भी सरकार्यवाह की जिम्मेदारी मिलती है उनसे ये एक अपेक्षा रहती है कि वो संगठन का कार्य सुचारू रूप से करेंगे। और इसलिए दत्ता जी को इसके लिए उपयुक्त माना गया। और यह निर्णय उनकी क्षमता का मूल्यांकन  करके ही लिया गया है। मेरा उनका विद्यार्थी परिषद् के समय खूब साथ रहा। और मैं यह सकता हूं कि एक ही संगठन में रहने के नाते जो साथी रहने वाला सम्बन्ध रहता है वह रहा। विद्यार्थी    परिषद् में यह भी एक खासियत है कि विद्यार्थी परिषद् में जो भी लोग प्रमुख जिम्मेदारी निभाते हंै, उनके आपस में किसी विषय पर मतभेद हो सकते है, लेकिन संबंधों की मधुरता में कही कमी नहीं आती हैं।  सम्बन्ध मधुर बने रहते है। खुलकर बात करने के लिए सबको एक वातावरण मिलता है। खुली बात-चीत होती है। यज्ञ मतभेद है तो उसके बारे में भी बड़ी समझदारी से वो मतभेद भी व्यक्त हो जाते है। और इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि विद्यार्थी परिषद् में  लोगो के पर्सनल क्लेश बिल्कुल नहीं होते। और इसलिए जितने भी विद्यार्थी परिषद् में प्रमुख लोग होते है, उनमे आपस में बहुत ही अच्छे सम्बन्ध रहते हैं और जिसके कारण  विद्यार्थी परिषद् में सशक्त टीम का सभी लोग आदर करते है।

समय-समय पर कुछ लोग पुराने एवं रिटायर्ड हो जाते है और नये लोग आते है। यह क्रम लगातार चलता रहता है। मुझे भी आज  विद्यार्थी परिषद्  से रिटायर्ड हुए 12 वर्ष हो गए है। और मेरा जो विद्यार्थी परिषद् में दत्ता जी का साथ रहा। उस समय मैंने भी उनकी प्रतिभा और क्षमता का अनुभव लिया।

 

राज कुमार भाटिया

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