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संघ की चाल क्या सचमुच बदल जाएगी!

संघ की चाल क्या सचमुच बदल जाएगी!

बेंगलुरु में 19-20 मार्च, 2021 को आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में श्री दत्तात्रेय होसबले को संघ का नया सरकार्यवाह यानी महासचिव निर्वाचित किए जाने को संघ में एक युग परिवर्तन की संज्ञा दी जा रही है। यह बात वही लोग कर रहे हैं जिन्हें संघ की कार्यपद्धति के बारे में ठीक से जानकारी नहीं है। संघ में यह सामान्य प्रक्रिया है। चूंकि वहां कोई भी कार्यकर्ता नेतागीरी के लिए नहीं आता, इसलिए वहां बड़े से बड़े दायित्व परिवर्तन बहुत आसानी से हो जाते हैं। जिस कार्यकर्ता को जो जिम्मेदारी दे दी जाती है वह उसका निर्वहन करने के लिए सदैव तत्पर रहता है। श्री दत्तात्रेय होसबले को संघ का मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाने की घटना को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

चेहरा कोई भी हो, एजेंडा वही

अधिक आयु और स्वस्थ्य कारणों से भैयाजी जोशी का जाना और उनकी तुलना में अधिक युवा कार्यकर्ता दत्ताजी का आना एक कार्यकर्ता का दूसरे कार्यकर्ता को महज जिम्मेदारी सौंपना है। ऐसा नहीं है कि दत्ताजी कोई नया एजेंडा लेकर संघ में सरकार्यवाह बने हैं। जिस एजेंडे यानी ध्येय को लेकर संघ 1925 में चला था, आज भी वह उसी एजेंडे को लेकर काम कर रहा है। चेहरा कोई भी हो, एजेंडा वही है। इसे संघ कार्यपद्धति की सफलता ही कहना चाहिए कि वह आज भी अपने लक्ष्य से भटका नहीं है और निरंतर समाज जीवन में अपनी पैठ को मजबूत कर रहा है। वरना भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना भी 1925 में ही हुई थी, लेकिन जिस प्रकार पूरा भारत इस विचारधारा और इसकी कार्यपद्धति को आज नकार चुका है, उसे देखकर तो यही लगता है कि 100 वर्ष पूरे होने से पहले ही इस विचारधारा का हिन्द महासागर में तर्पण हो जाए। हिंसा, घृणा, सामाजिक विद्वेष फैलाने और समाज को अपनी ही जड़ों से काट देने का कुत्सित प्रयास करने वाले किसी भी विचार को भारतीय समाज स्वीकार नहीं करता। संघ का विचार, कार्यपद्धति और ध्येय विश्व कल्याण के लिए है, इसीलिए भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में इसे स्वीकार्यता मिल रही है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि भारत से बाहर 50 से अधिक देशों में संघ की प्रेरणा से समाज की सज्जन शक्ति को एकजुट करने काम आज चल रहा है।

सतत साधना है संघ कार्य

संघ कार्य एक साधना है। जो व्यक्ति यहां अपना कोई निजी एजेंडा लेकर आता है वह ज्यादा समय टिक नहीं पाता, लेकिन जो साधनारत रहता है वह नेतृत्व की भूमिका में स्वाभाविक रूप से आता ही है। कर्नाटक के शिमोगा जिले में स्थित सोरबा तालुका के गांव ‘होसबले’ में 1 दिसंबर, 1955 को जन्मे श्री दत्तात्रेय महज 13 वर्ष की आयु में वर्ष 1968 में संघ के स्वयंसेवक बने। 1972 में वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े। बाद में 1978 में वे इसी परिषद् में पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए। उन्होंने 15 वर्ष तक लगातार अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रहकर इस छात्र संगठन को मजबूत किया। छात्रों की कई पीढिय़ां आज भी उन्हें अपने संरक्षक के रूप में याद करती हैं। विद्यार्थियों पर उनका व्यापक प्रभाव रहा। श्री मदन दास जी के बाद दत्ताजी ने विद्यार्थियों में बहुत अधिक प्रसिद्धि प्राप्त की है। विद्यार्थी परिषद् प्रतिभाशाली और बुद्धिजीवी छात्रों के एक अद्भुत संगम वाला मंच है, जहां उनमें भारतीयता के भाव को पुष्ट किया जाता है। यह विश्व में छात्रों का सबसे बड़ा संगठन है।

दत्ताजी ऐसे संगठक और संघ प्रचारक हैं, जो कन्नड़, तमिल, हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत में धाराप्रवाह संवाद कर लेते हैं। उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई उनके गांव में हुई। कॉलेज की पढ़ाई उन्होंने बेंगलुरु के नेशनल कॉलेज से की। बाद में मैसूर यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में स्नातकोत्तर की डिग्री ली। रचनात्मक अभिरुचि के चलते वे फिल्म निर्माण में सक्रिय होना चाहते थे। एक स्क्रीनप्ले पर काम भी कर रहे थे, लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। उसी दौरान वर्ष 1975 में जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया तो एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर दत्तात्रेय होसबले उसका विरोध करने के कारण 1975 से 1977 के बीच 16 महीने तक आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम (मीसा) के तहत जेल में बंद रहे। जेल से रिहा होने के बाद में उन्होंने अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम में रह रहे भारतीयों को एकजुट करने के लिए बने हिंदू स्वयंसेवक संघ के मेंटर की भी भूमिका निभाई। इस दौरान उन्होंने विश्व के अनेक देशों की यात्रा की।

कार्यकर्ताओं में ‘दत्ताजी’ के रूप में प्रसिद्ध श्री दत्तात्रेय होसबले युवाओं की ऊर्जा का रचनात्मक उपयोग करने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने असम के गुवाहाटी में यूथ डेवलपमेंट सेंटर स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। वल्र्ड ऑर्गनाइजेशन ऑफ स्टूडेंट एंड यूथ को खड़ा कर पूरे विश्व में उसे लोकप्रिय बनाया। बौद्धिक रूप से बहुत प्रखर हैं,इसीलिए 2004 में संघ के सहबौद्धिक प्रमुख भी  बने। वर्ष 2009 में जब डॉ. मोहन भागवत जी संघ के सरसंघचालक बने तो दत्तात्रेय होसबले को सहसरकार्यवाह की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने लगातार 12 वर्ष तक इस जिम्मेदारी को निभाया। 20 मार्च 2021 को उन्हें संघ के सरकार्यवाह का दायित्व सौंपा गया। इससे पूर्व यह दायित्व श्री सुरेश भैयाजी जोशी निभा रहे थे। उन्हें वर्ष 2009 से यह दायित्व मिला था। अपने विद्यार्थी जीवन में श्री दत्तात्रेय विभिन्न अकादमिक और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। इसी कारण श्री वाई. एन. कृष्णमूर्ति और गोपाल कृष्ण अदिगा जैसे नामचीन साहित्यकारों से उनका निकट संपर्क रहा। बाद में वे कन्नड़ मासिक पत्रिका ‘असीमा’ के संस्थापक संपादक भी बने। साहित्य में रुचि के बावजूद उन्हें खेल में भी रुचि है। फुटबाल उनका प्रिय खेल है और इसे वे पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरोने का एक माध्यम मानते हैं।

मिल-बैठकर चर्चा कर निर्णय लेने की परंपरा

संघ में प्रारम्भ से ही मिल-बैठकर चर्चा करके निर्णय लेने की परंपरा रही है। पहले सभी पदाधिकारियों का चयन सर्वसम्मति से हो जाता था, परन्तु फरवरी 1949 में संघ पर लगे प्रतिबंध के बाद सरकार्यवाह के चुनाव की शुरुआत हुई। उस समय संघ पर प्रतिबंध लगाने के जो कारण गिनाए गए थे, वे सभी न्यायालय में टिक नहीं पाए। जब संघ स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह किया और 77,000 से अधिक स्वयंसेवक महीनों जेल में पड़े रहे तो इस स्व-निर्मित समस्या से बाहर निकलने के लिए तर्क दिया गया कि संघ के पास लिखित संविधान नहीं है, वह तैयार करे तो प्रतिबंध हट जाएगा। हालांकि जिस कांग्रेस के नेताओं ने यह कहा, उस कांग्रेस का संविधान भी 14 वर्ष बाद ही लिखा गया था और उसमें आज भी संगठन के चुनाव लोकतान्त्रिक ढंग से कभी समय पर नहीं होते। संघ ने व्यर्थ की तनातनी में न पडऩे के बजाए उस समय एक लिखित संविधान प्रस्तुत कर दिया और संघ से प्रतिबंध हट गया। उस संविधान के अंतर्गत अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा को लिखित स्वरूप मिला और स्थानीय स्तर पर कुछ प्रतिनिधियों और अखिल भारतीय स्तर पर सरकार्यवाह को चुनने की पद्धति बनी, जो अभी भी जारी है। संघ की सामान्य पद्धति में शाखा स्तर से ही तब तक कोई निर्णय नहीं लिया जाता जब तक उस पर आम राय न बन जाए। इसलिए हर निर्णय सभी को स्वीकार्य होता है। इस कार्य पद्धति में सबको सौहार्द्र और समन्वय के साथ लेकर चलने वाला कार्यकर्ता ही आगे बढ़ पाता है। इसीलिए सब कार्यकर्ता बिना किसी भेदभाव अथवा जाति-पंथ और भाषा के विचार से आगे बढ़ते हैं। सरकार्यवाह भी इसी कार्य पद्धति से निखरता हुआ शीर्ष पर पहुंचता है। इसलिए जो लोग दत्ताजी के इस पद चयन को राजनीतिक दलों में होने वाले चुनाव से जोड़ते हैं, वे अज्ञानतावश ही ऐसा करते हैं।

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नवीन प्रयोगों को शीर्ष नेतृत्व का संरक्षण

संघ कार्यपद्धति की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह हमेशा नए प्रयोग करता रहा है और नवीन प्रयोगों को संघ के शीर्ष नेतृत्व का भी संरक्षण रहता है। करीब एक दशक पूर्व संघ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया कि 65 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी व्यक्ति दायित्व में नहीं रहेगा। इस निर्णय के परिणामस्वरूप आज लगभग सभी प्रांत प्रचारक 40 वर्ष की आयु के आसपास हैं। यदि अन्य राष्ट्रीय संगठनों की बात करें तो सबसे अधिक तरुण नेतृत्व संघ में ही मिलेगा। आज आयु और स्वास्थ्य के कारण स्वयं को पदमुक्त करने की परंपरा संघ में ही है। संघ में अनुशासन और सम्मान का मापदंड आम स्वयंसेवक से लेकर सरसंघचालक तक सभी के लिए एक समान है। संघ कार्यपद्धति में सरसंघचालक की दिनचर्या भी संगठन द्वारा ही निर्धारित की जाती है। संगठन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की भूमिका में यदि सरकार्यवाह सरसंघचालक की उपस्थिति कहीं और चाहते हैं तो उन्हें वहां जाना पड़ेगा। विनम्रता एवं अनुशासन का ऐसा स्तर संघ की परंपरा को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करता है, इसलिए नए सरकार्यवाह का चुनाव संगठन के रूप में संघ की निरंतरता का प्रतीक भी है।

संघ में हुए इस दायित्व परिवर्तन पर, खासतौर से टेलीविजन न्यूज चैनलों पर, यह चर्चा सुनने को मिली कि नए सरकार्यवाह के नेतृत्व में संघ अब कैसे बदल जाएगा। यह भी दावा किया गया कि अब दत्तात्रेय होसबले जी संगठन विस्तार और संघ के शताब्दी समारोह की तैयारियों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, क्योंकि चार साल बाद 2025 में संघ की स्थापना के सौ वर्ष पूरे हो जाएंगे। जिन्हें संघ के बारे में कुछ नहीं मालूम वे ज्ञान बांट रहे हैं कि संघ अब कैसे बदलने वाला है। यह संघ को लेकर उनकी सतही सोच को ही दर्शाता है। संघ में जिस प्रकार सरकार्यवाह का चुनाव आम सहमति से होता है, उसी प्रकार संगठन के सभी निर्णय और उसे दी जाने वाली दिशा भी सर्वानुमति से ही तय होती है। ऐसे में संघ को लेकर ‘परिवर्तन’ और ‘नई दिशा’ जैसे जुमलों को सुनकर सिर्फ हंसी आती है।

जो कहा, वह किया 

संघ ने जो एजेंडा अपने हाथ में लिया उसे पूरा किया है। फिर भले ही उसे पूरा करने के लिए उसे सालोंसाल प्रतीक्षा क्यों न करनी पड़ी हो। अयोध्या में श्री राम मंदिर का निर्माण और जम्मू-कश्मीर से धारा 370 की समाप्ति दो ऐसे काम हैं, जिन्हें लेकर कहा जा रहा था कि ये संभव नहीं हैं, परन्तु संघ के कार्यकर्ताओं ने जिस प्रकार पूरे देश में इन मुद्दों पर जनमत निर्माण किया उसी का परिणाम है कि आज ये दोनों असंभव माने जाने वाले काम सुगमता से संपन्न हो गए हैं। बहरहाल किसी को यह नहीं भूलना चाहिए संघ कि का एजेंडा सिर्फ मंदिर निर्माण नहीं हैं, संघ का असली एजेंडा भारत को पुन: विश्व शक्ति बनाना है और उस दिशा में भारत अब आगे बढऩे लगा है। संघ का सटीक विश्लेषण करने के लिए संघ को समझना आवश्यक है। जो संगठन-शास्त्री अथवा विचारक संघ की इस विशेषता को नहीं समझ पाता वह संघ के निर्णयों और कार्य का सही विश्लेषण नहीं कर पाता। जिनकी सोच राजनीति से ऊपर नहीं उठ पाती, उनका विश्लेषण संघ के सन्दर्भ में सटीक हो ही नहीं सकता। संघ की स्पष्ट सोच रही है कि राजनीति राष्ट्र और समाज की प्रगति का मात्र एक अंग है, सब कुछ नहीं है। इसी हिसाब से संघ के स्वयंसेवक समाज के हर आयाम पर काम कर रहे हैं। संघ को समझने के लिए इसके विश्लेषकों को भी अपने स्वनिर्मित राजनीतिक चश्मे से बाहर आना होगा।

 

प्रो. (डॉ.) प्रमोद कुमार

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं एवं  भारतीय जन संचार संस्थान,नई दिल्ली, में आचार्य हैं।)

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