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देश के राजनीतिक दल संघ से सीखें!

देश के राजनीतिक दल संघ से सीखें!

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक अधिकारी को जब मैंने इस हफ्ते उनकी ‘पदोन्नति’ पर बधाई दी तो उन्होंने पूछा कि आप किस बात की बधाई दे रहे हैं? उन्होंने फिर समझाया कि संघ में बधाई नहीं दी जाती क्योंकि संघ में किसी को ‘पद’ नहीं बल्कि दायित्व मिलता है। दायित्व के लिए बधाई नहीं, बल्कि आपकी शुभकामनाओं की आवश्यकता है। जिस देश में एक छोटा सा महत्वहीन पद पाने के लिए लोग न जाने कितनी तिकड़में लगाते हैं और गणेश परिक्रमायें करते हैं।  देश के किसी भी शहर, गांव या मोहल्ले में देख लीजिये आपको स्वयंसिद्ध लोगों के बधाई संदेशों से रंगी अनगिनत दीवारें, पोस्टर और बैनर मिल जायेंगे। छोटा सा पद मिलने के बाद लोग  अधिकांशत: अपने पैसे के बल पर  अपनी ही बधाइयों के संदेशों से शहर को पाट देते हैं। आरडब्लूए के पद से लेकर स्थानीय निकायों की सदस्यता के लिए जहां लोग सर फुटब्बल करते हों, वहां ये बात अजूबे जैसी ही लगती है।

वहीं विश्व के सबसे बड़े और संभवत सबसे शक्तिशाली सामाजिक संगठन में बड़े से बड़ा ‘पद’ मिलने के बाद भी सिर्फ दायित्व बोध का अहसास! जैसे चावल का एक दाना पूरी बोरी के चावल के गुणों को जानने के पर्याप्त होता है, उसी तरह संघ की मूल वृत्ति को रेखांकित करने के लिए यह एक भाव ही काफी है। 1925 में संघ की स्थापना हुई थी। 2025 यानि 4 साल बाद संघ 100 बरस का हो जायेगा। संघ ने ये आयु इसी मूल भाव के बल पर पूरी की है। स्वत:स्फूर्त, स्वत:संचालित और लेने का नहीं बल्कि देने का भाव यही संभवत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मर्म है।

संघ के उन बड़े अधिकारी ने जब दायित्व की बात की (उनका नाम बताना मर्यादा का उल्लंघन होगा) तो उनका भाव किसी बोझ का नहीं बल्कि कर्तव्य पथ पर चलने में मिलने वाले उल्लसित विश्वास का था। समाज, राष्ट्र और इस धरा के लिए यह दायित्व बोध ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बाकी राजनीतिक-सामाजिक संगठनों से अलग करता है। इस बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिनिधि सभा में शीर्ष नेतृत्व में जो परिवर्तन हुए वे एक अनोखी प्रक्रिया का हिस्सा है। यह प्रक्रिया जो नितांत लोकतांत्रिक है। लोकतंत्र का वह भाव जो एक की जीत को दूसरे की हार में नहीं, वरन सबको साथ लेकर चलने में अपनी सार्थकता देखता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिनिधि सभा हर 3 साल बाद मिलती है और अपने संगठन के लिए वरिष्ठ नेतृत्व का चयन करती है। पिछली दो प्रतिनिधि सभाओं से मीडिया में खूब चर्चा थी कि संघ के सरकार्यवाह श्री भैया जी जोशी अपना पद छोड़ेंगे और श्री दत्तात्रेय होसबोले ये पद संभालेंगे। उन दिनों मीडिया में लगातार अटकलबाजियो का दौर चलता रहा कि अब भैया जी ‘जाएंगे’ और दत्ता जी ‘आएंगे’। पर क्या सचमुच में ऐसा हुआ था? अंदर की जानकारी रखने वाले बताते हैं कि भैया जी जोशी स्वयं कई वर्ष से निवेदन कर रहे थे कि उन्हें अब मुक्त किया जाए और दत्ता जी से आग्रह था कि वह उनका स्थान ले।

लेकिन देखिए कैसी विशुद्ध भारतीय परंपरा है कि दुनिया के सबसे बड़े संगठन के दूसरे सबसे बड़े ताकतवर पद को भैया जी छोडऩे को तत्पर थे पर दत्ता जी लेने को तैयार नहीं थे। क्योंकि जब पद होता है तो अभीप्सा होती है। लेकिन दायित्व होता है तो कर्तव्य बोध होता है। दायित्व लेने वाले लोग पद की अभीप्सा नहीं करते। असल में वे तो पद को पद के रूप में देखते ही नहीं। वे देखते हैं कि संगठन में उन्हें जो भी जिम्मेदारी दे उसका सम्यक रूप से निर्वहन कैसे हो। यही भाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भारत ही नहीं वरन दुनिया के अन्य संगठनों से अलग करता है।

कई वर्ष पहले की बात है। जब मैंने बतौर पत्रकार संघ के बारे में कुछ प्रश्न किए थे तब मुझसे कहा गया था संघ को जानना चाहते हैं तो संघ में आइए। किनारे बैठकर संघ को नहीं जाना जा सकता। ‘जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैंठ।’ दुनिया की कुछ चीजें ऐसी हैं जिनमें बिना डूबे हुए उनको जानना संभव नहीं है।  यही संघ के बारे में भी है। जो लोग बाहर से संघ को देखकर उस पर अपनी टीका टिप्पणी करते हैं अक्सर वे गलत सिद्ध होते हैं। क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी कार्यपद्धती, सांगठनिक ढांचे, या प्रणाली का नाम नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मूल रूप से एक भाव का नाम है।  वह भाव है – निष्ठा का, समर्पण का, सेवा का, त्याग का और बलिदान का।  स्वयं को आहूत कर राष्ट्र निष्ठा की तपस्या में एकाकार होने का यही भाव इस संगठन को विलक्षण नैतिक बल देता है। संघ के बड़े अधिकारियों में से कई को मुझे नजदीक से जानने का अवसर मिला है। ये जीवन की सामान्य लालसाओं को छोडक़र संघ के प्रचारक बने हैं।

यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं है कि राष्ट्रीय सेवक संघ की अपनी एक विशिष्ट ताकत है जो अक्सर राजसत्ता से भी अधिक प्रभाव रखती हैं। एक सामान्य भारतीय आज जो सुख सुविधाएं सहज मानता है, उनसे भी संघ के अधिकारी ऋषियों की भांति दूर ही रहते हैं। संघ के नव निर्वाचित सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले मूलत: कर्नाटक के हैं। आप उनसे मिलेंगे तो आपको लगेगा ही नहीं कि आप इतने विलक्षण व्यक्ति से मिल रहे हैं। आप उनके साथ कुछ पल बैठेंगे तो आपको लगेगा नहीं है कि आप इतने विलक्षण व्यक्ति से मिल रहे हैं। ऐसा लगेगा जैसे आप सहज रूप से अपने एक बड़े भाई से मिल रहे हैं। यह विलक्षणता ही दत्तात्रेय होसबोले को ‘दत्ताजी’ बनाती हैं। यह विलक्षणता उन्हें उन संस्कारों की अनवरत बहती हुई नदी से मिलती है जिसका उद्गम संघ रुपी गोमुख से होता है। सिर्फ दत्ता जी ही नहीं, संघ के अन्य प्रचारकों के साथ भी आपको इस आत्मीयता का अहसास होता है।

परिवारवाद, जातिवाद,  क्षेत्रवाद,  भाषावाद, एकाधिकारवाद से ग्रसित भारत के राजनीतिक दल तथा अन्य सामाजिक संगठन संघ से बहुत कुछ सीख सकते हैं। लोकतांत्रिक भारतीय परंपराएं क्या होती है? सबको साथ लेकर चलने का मतलब क्या होता है? टीम में काम करने का मतलब क्या होता है? आंतरिक लोकतंत्र क्या होता है?  ये सब अत्यंत सहज भाव से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने कार्यकर्ताओं को देता है। अन्यथा बिना राजसत्ता, बिना राजकृपा और बिना राजवित्त के इतना बड़ा संगठन इतने वर्षों तक जिन्दा नहीं रह सकता।

संघ की नई टीम को बहुत-बहुत शुभकामनाएं!

 

उमेश उपाध्याय

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