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स्वनियमन से नहीं बन पाएगी बात!

स्वनियमन से नहीं बन पाएगी बात!

कोरोना काल के दौरान पूरी दुनिया के ठप पडऩे के बाद कारोबार और जिंदगी के हर क्षेत्र पर गंभीर असर पड़ा। इसका अपवाद रहा सेहत की देखभाल करने वाला दवा और अस्पताल उद्योग और मनोरंजन का कारोबार। संचार क्रांति के बावजूद जिस ओटीटी यानी ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म पर लोग भूले-भटके ही जाते थे, वहां मनोरंजन की चाहत में लोगों की बाढ़ आ गई। नेटफ्लिक्स, अमेजन वीडियो, मैक्सप्लेयर जैसे तमाम प्लेटफॉर्म ऐसी-ऐसी कहानियां लेकर सामने आए, जिनसे मनोरंजन खूब हुआ। लेकिन इन प्लेटफॉर्मों ने खासकर युवा भारतीय मानस को भारतीय जीवन और सामाजिक मूल्यों से दूर करने और उनके प्रति नई अवधारणा विकसित करने में परोक्ष योगदान दिया। इन प्लेटफॉर्मों ने सिर्फ सामाजिक और पारिवारिक विकृतियों को ग्लैमराइज ही नहीं किया, बल्कि कुछ खास जगहों के प्रति नई अवधारणा भी विकसित करने में मदद दी। हाल ही में चर्चित मिर्जापुर सीरीज देखकर दक्षिण भारत निवासी एक युवा अधिकारी यह मान बैठे कि मिर्जापुर में ऐसी ही गालियां दी जाती हैं, वहां माफिया और बंदूकों का ऐसा ही खेल चलता है। जबकि उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर की हकीकत कुछ और है। जब उन्हें बताया गया कि हिंदी की पहली कहानियों में शुमार दुलाईवाली की रचनाकार बंग महिला इसी मिर्जापुर की निवासी थी या चंद्रकांता संतति लिखने वाले देवकीनंदन खत्री भी इसी मिर्जापुर के थे और मिर्जापुर में इस तरह की गालियां नहीं दी जातीं तो वे चकित रह गए थे।

ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर जीवन मूल्यों को ध्वस्त करने वाली कहानियों को ग्लैमराइज अंदाज में इस तरह पेश किया गया, मानो हर भारतीय युवा या परिवार इसी तरह की जिंदगी जी रहा है। इसी तरह एक ओटीटी प्लेटफॉर्म पर मिस मैच नाम से महज सेक्सुअल आनंद के लिए पत्नियों की अदला-बदली को ग्लैमराइज करने वाली कहानी प्रस्तुत की गई। ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर उन्मुक्त सेक्स की कहानियां खूब परोसी गईं। कुछ कहानियों में तो हिंदू धर्म का अपमान तक किया गया। इसे लेकर सोशल मीडिया से लेकर सामान्य तौर पर सवाल उठने शुरू हुए थे। ओटीटी प्लेटफॉर्म के जरिए भारतीय जीवन मूल्यों का उपहास उड़ाने और विकृत करने का सवाल संसद में भी उठा। भारतीय जनता पार्टी के झारखंड से सांसद महेश पोद्दार ने राज्यसभा में बीते बजट सत्र के दौरान ही इस पर सरकार द्वारा ध्यान देने और ओटीटी प्लेटफॉर्मों को नियंत्रित करने की मांग की गई थी। नौ फरवरी को राज्यसभा में महेश पोद्दार ने कहा, ‘इंटरनेट की सुविधा और सुलभता के साथ-साथ नेटफ्लिक्स जैसे कई ओटीटी प्लेटफॉर्म सूचना और मनोरजंन के कई माध्यम बनकर उभरे हैं। महेश पोद्दार ने आगे कहा कि कोरोना महामारी की वजह से लगे लॉकडाउन में थिएटर बंद हो गए। मनोरजंन के साधन बंद होने से ओटीटी प्लेटफॉर्म की पहुंच काफी बढ़ गई है। ‘इसी के साथ-साथ एक खतरा भी बढ़ा है, विसंगति भी आई है, जिससे समाज और हमारी भावी पीढ़ी के ऊपर दूरगामी नकारात्मक और विकृत प्रभाव पडऩे की संभावना बलवति हो गई है। देश का बड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक वर्ग इसका विरोध कर रहा है। लेकिन मेरी चिंता ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री द्वारा भारतीय सामाजिक मूल्यों पर हो रहे आघात पर भी है।’

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महेश पोद्दार यहीं नहीं रूके, उन्होंने आगे कहा, ‘ओटीटी प्लेटफॉर्म की भाषा और कंटेन्ट में सेक्सुअल डिस्क्रिमिनेशन अथवा जेंडर डिस्क्रिमिनेशन भी साफ झलकता है। एक तरफ तो हम स्त्रियों की अस्मिता की रक्षा के लिए खुद को प्रतिबद्ध बताते हैं और दूसरी तरफ सार्वजनिक माध्यमों पर महिलाओं के बारे में अश्लील शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर तो अश्लील और फूहड़ भाषा का जमकर इस्तेमाल हो रहा है।’

संसद में इस सवाल के उठने के बाद स्पष्ट ही है कि सरकार को प्रतिक्रिया देनी पड़ी। यह संयोग ही कहा जाएगा कि फरवरी के आखिरी महीने में सरकार ने ओटीटी और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर परोसी जाने वाली सामग्री को लेकर दिशा-निर्देश जारी कर दिए। हालांकि इसकी शुरूआत सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश से हुई थी। सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए दिशा-निर्देश बनाने की जरूरत तब महसूस हुई, जब इन पर परोसे जाने वाले कंटेंट को लेकर सवाल उठने शुरू हुए। कुछ संस्थाओं ने तो हाईकोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे तक खटखटाने शुरू कर दिए। ऐसी ही एक याचिका पर सुनवाई के बाद 11 दिसंबर 2018 को देश की सबसे बड़ी अदालन ने सरकार से चाइल्ड पोर्नोग्राफी, दुष्कर्म, सामूहिक दुष्कर्म से संबंधित सामग्री डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटाने के लिए जरूरी दिशा-निर्देश बनाने को कहा था। इसके बाद सरकार ने 24 दिसंबर 2018 को इसका मसविदा तैयार किया था। हालांकि तब ओटीटी प्लेटफॉर्म चूंकि ज्यादा चलन में नहीं थे, लिहाजा उन पर परोसे जा रहे कंटेंट पर सवाल उतने नहीं उठे।

हाल के दिनों में कुछ लोमहर्षक घटनाएं जिस तरह सामने आई हैं, उसने इन प्लेटफॉर्मों पर परोसी जाने वाली सामग्री पर सवाल तेजी से उठे हैं। यह सामाजिक विकृति और इंटरनेट माध्यमों में सहज उपलब्ध विकृत मूल्य आधारित सामग्री का ही असर है कि सितंबर 2019 में हिमाचल के सोलन में तेरह साल के किशोर द्वारा पांच वर्षीय बच्ची के साथ रेप की घटना सामने आती है। साल 2020 में ग्रेटर नोएडा की जारचा कोतवाली क्षेत्र के एक गांव के 16 साल के किशोर ने अपने ही पड़ोसी की सात साल की बच्ची को हवस का शिकार बना डाला। वह बच्ची को टॉफी दिलाने का लालच देकर अपने खाली पड़े घेर में ले गया था जहां उसने बच्ची के साथ रेप किया। आए दिन अब ऐसी कहानियां अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। बहरहाल ऐसी ही घटनाओं और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद सरकार पर दबाव बना और वह फरवरी के तीसरे हफ्ते में ओटीटी और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के कंटेंट के लिए दिशा-निर्देश लेकर आई।

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इन दिशा-निर्देशों की एक सीमा है। जिस तरह भारत में मीडिया के लिए स्वनियमन की अवधारणा प्रचलित है, उसी तरह ओटीटी और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए भी स्वनियमन की ही अवधारणा को आगे बढ़ाया गया है। बेशक चाइल्ड पोर्नोग्राफी जैसे कुछ मामलों में पांच साल की सजा का प्रावधान किया गया है। लेकिन पूरा दिशा-निर्देश मीडिया प्लेटफॉर्म संचालकों पर छोड़ दिया गया है। वे अपने-अपने ढंग और अपनी नीतियों के हिसाब से इसे लागू करेंगे या कर रहे हैं। यह स्वनियमन ही है कि फेसबुक के वीडियो सेक्शन में ऐसी सामग्रियों की बाढ़ आ गई है, जिन्हें देखकर ऐसा लगता है, जैसे भारत सेक्स क्रांति के मुहाने पर है। जिनके शीर्षक भी अजीबोगरीब और अश्लील होते हैं। जिनमें ऐसे रिश्तों के बीच सेक्स संबंध दिखाए जाते हैं, जो भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में कहीं भी मान्य नहीं हैं। दरअसल इन कंटेंट का जो ट्रीटमेंट है, सवाल उस पर है। दुनिया के किसी भी समाज में ऐसा नहीं है कि ससुर-बहू, जेठ-देवरानी, चाची-भतीजा, मामी-भांजा के बीच सेक्स संबंध मंजूर हो। लेकिन इन वीडियो सेक्शनों में ऐसी सामग्रियों वाले वीडियो की भरमार है। जाहिर है कि स्वनियमन की अवधारणा के तहत बने दिशा-निर्देशों को कड़ाई से लागू करने में ना तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की रूचि है और ना ही ओटीटी प्लेटफॉर्मों की दिलचस्पी। वे दिलचस्पी लेंगे भी भला क्यों? बाजारवाद के दौर में इन्हीं कंटेंट के जरिए उनके पास दर्शकों की भारी संख्या आ रही है और उनके जरिए वे मोटी कमाई कर रहे हैं।

ऐसे में यह तर्क दिया जा सकता है कि लोगों को खुद ही ऐसी सामग्रियों से दूर रहना चाहिए। लेकिन इसे कुतर्क कहा जाएगा। खुद को व्यवस्थित करने और लगातार आगे बढ़ते रहने के लिए समाज ने सालों के अनुभव के बाद अपने कुछ मूल्य तय किए हैं। संस्कारवान तो इन मूल्यों को मानते हैं, लेकिन जो ऐसे नहीं होते, वे सहज ही ऐसी सामग्रियों की ओर ना सिर्फ आकर्षित हो जाते हैं, बल्कि उन्हें जिंदगी में भी सच करने की कोशिश करने लगते हैं। इनमें बच्चों और किशोरों की संख्या ज्यादा होती है। हर समाज अपने लिए अनुशासन के कुछ मूल्य तय करता है। लेकिन इसमें राज व्यवस्था का भी योगदान होता है। सब जानते हैं कि हत्या अपराध है। लेकिन हत्या ना हो, इसके लिए समाज स्वनियमन और स्वानुशासन की सीढ़ी को लगातार अपने सामने खड़ा रखता है, साथ ही राज व्यवस्था भी कठोर कानूनों के जरिए हत्या के खिलाफ कानूनी कोड़ा लटकाए रखती है। हत्या का अपराध तो सिर्फ एक या दो व्यक्तियों-परिवारों को प्रभावित करता है, लेकिन सामाजिक मूल्यों से इतर का कंटेंट पूरी पीढ़ी को मानसिक और सामाजिक रूप से विकृत और बर्बाद करता है। इसलिए इसे स्वनियमन के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि उस पर अनिवार्यता से लागू होने वाली व्यवस्था का चाबुक भी लहराया जाना चाहिए। जाहिर है कि यह कदम राज व्यवस्था ही उठा सकती है, उसके पास ही इसकी ताकत और इसका कानूनी अधिकार है। इसलिए जरूरी है कि भारतीय जीवन, समाज और संस्कृति के मूल्यों को चोट पहुंचाने वाली अश्लील, फूहड़ और आग्रही सामग्रियों को रोकने की कारगर कोशिश की जानी चाहिए। स्वनियमन की अवधारणा सिर्फ झुनझुना ही बनकर रह जाएगी, ठीक वैसे ही, जैसा टेलीविजन के खबरिया उद्योग में दिखता है।

 

उमेश चतुर्वेदी

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