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स्कील इंडिया पर निर्भर है मेक इन इंडिया

स्कील इंडिया पर निर्भर है मेक इन इंडिया

एशिया की आर्थिक महाशक्ति दक्षिण कोरिया की अदभूत सफलता का सबसे बड़ा राज है – कौशल विकास। उसके चौंधिया देने वाले आर्थिक चमत्कार के पीछे कौशल विकास (स्किल डेवलपमेंट) का महत्वपूर्ण योगदान है। इस मामले में उसने जर्मनी को भी पीछे छोड़ दिया है। 1950 में दक्षिण कोरिया की विकास दर भारत से बेहतर नहीं थी, लेकिन इसके बाद उसने कौशल विकास में निवेश करना शुरू किया। यही वजह है कि 1980 तक वह भारी उद्योगों का हब बन गया। उसके 95 प्रतिशत मजदूर स्किल्ड हैं या वोकेशनली ट्रेंड हैं, जबकि भारत में यह आंकड़ा 3 प्रतिशत है। ऐसी हालत में भारत कैसे आर्थिक महाशक्ति बनने के सपने देख सकता है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकास में स्किल के अत्यधिक महत्व को बखूबी समझा है और भारत को स्किल के मामले में अव्वल बनाने के लिए युद्धस्तर पर कोशिशें शुरू कर दी हैं। आज के प्रतियोगी विश्व में सफल विकास की रणनीति होती है जिसमें उद्योग अपने क्षेत्र की श्रमशक्ति की स्किल को बेहतर बनाकर व्यवसाय की लागत को घटाते हैं और इस तरह से अपने उत्पादों को विश्व अर्थव्यवस्था में प्रतियोगी बनाकर मुनाफा कमाते हैं। मशीनीकरण के इस दौर में करोड़ों हाथों को काम तभी दिया जा सकता है, जब उन हाथों के पास हुनर हो। तभी वे उत्पादकता बढ़ा सकते हैं।

भारत को मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाकर करोड़ों लोगों को रोजगार देने के लिए मोदी सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ जैसी महत्वाकांक्षी योजना शुरू की है। इसकी चर्चा देश-विदेश तक में है, लेकिन इसे सफल बनाने के लिए देशी-विदेशी पूंजी निवेश और आर्थिक सुधार जितने जरूरी हैं उतनी ही जरूरी है कौशल या हुनरमंद श्रमशक्ति। यदि देश के पास हुनरमंद लोग नहीं होंगे तो पूंजी निवेश और आर्थिक सुधार जैसे कारक भी मेक इन इंडिया को सफल बनाने में बेअसर साबित होंगे। न केवल श्रम शक्ति हुनरमंद होनी चाहिए, बल्कि वैश्विक स्तर पर प्रतियोगी भी होनी चाहिए। इसलिए ‘मेक इन इंडिया’ को सफल बनाने के लिए सरकार ने एक और महत्वाकांक्षी  योजना  ‘स्कील इंडिया’ की शुरूआत की है।

भारत सवा सौ करोड़ की विशाल जनशक्ति वाला देश है और इससे भी महत्पूर्ण बात यह है यह युवाक्ति का देश है। भारत की 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम उम्र की है। इसमें शिक्षित युवाशक्ति की तादाद भी अच्छी-खासी है, लेकिन भारत की यह खूबी तब कमजोरी में बदल जाती है जब स्कील या हुनर की बात आती है। इन शिक्षित लोगों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो शिक्षित हैं, पर कोई रोजगार लायक नहीं हैं, क्योंकि उनके पास कोई स्किल या हुनर नहीं है। हमारी शिक्षा व्यवस्था ने हमारे युवाओं को शिक्षा तो दी, मगर कोई स्किल नहीं दिया, जिससे वे किसी उद्योग या व्यवसाय में नौकरी पा सकें या अपना व्यवसाय खुद शुरू कर सकें। दरअसल हुनर भी ऐसा होना चाहिए जिसकी बाजार में मांग हो। हमारी शिक्षा व्यवस्था का आधुनिक उद्योगों की जरूरतों के साथ कोई तालमेल नहीं है। इसलिए हमारी शिक्षा व्यवस्था और उद्योगों की जरूरतों  के बीच बहुत चौड़ी खाई है। हमारे स्कूलों और कालेजों से पढ़कर निकले छात्र उद्योगों की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाते, इसलिए वे उद्योगों में भर्ती करने लायक नहीं होते। हमारी शिक्षा की विडंबना यह है कि हमने शिक्षा को किताबी बना दिया, उसे रोजगार से जोडऩे की कोशिश नहीं की।

दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति दिनेश सिंह कहते हैं, ”हमने 2011 में मुंबई की एक बड़ी फाइनेंशियल कॉरपोरेशन को इस बात के लिए आमंत्रित किया था कि वह छात्रों को अपनी कंपनी में नौकरी के लिए नियुक्त कर सके। इसके लिए स्नातक स्तर के अभ्यार्थियों से कंपनी बुनियादी जानकारी की अपेक्षा कर रही थी, लेकिन 1200 अभ्यार्थियों में कुल तीन अभ्यार्थियों को कंपनी ने चुना। यह हमारे लिए चौंकाने वाली बात थी।’’ एक दूसरा उदाहरण है। सन् 2010 में मैंने गणित में एम.ए. कर रहे लगभग सौ छात्रों से पूछा कि क्या उन्होंने ‘फ्लूइड हाइड्रोनिक्स’ विषय पढ़ा है? सभी ने ‘हां’ में जवाब दिया। जब मैंने कहा कि क्या वे एक जेट प्लेन के विंग स्पैन को डिजाइन करने में मेरी मदद कर सकते हैं, तो छात्रों ने इसके बारे में अनभिज्ञता जताई। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद समय-दर-समय शिक्षा के क्षेत्र में बहुत-सी गलतियां हुर्इं हैं, जो राष्ट्र के विकास में अवरोध पैदा करती रही हैं। यदि 1200 छात्रों में केवल तीन छात्र चुने जाते हैं तो इसका मतलब यही है कि हम छात्रों को हुनरमंद नहीं बना पा रहे हैं।

कानफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री की नवीनतम रिपोर्ट, ‘इंडिया स्कील रिपोर्ट 2015’ के मुताबिक हर साल सवा करोड़ युवा रोजगार के बाजार में आते हैं, लेकिन ये तभी हमारे लिए एसेट्स बन सकते हंै जब वे आधुनिक उद्योगों की जरूरतों के मुताबिक सही तरीके से प्रशिक्षित हों, नहीं तो वे बेरोजगारों की फौज ही बढ़ाएंगे। रिपोर्ट के मुताबिक, अभी रोजगार के लिए आने वाले युवाओं में 37 प्रतिशत ही रोजगार के काबिल होते हैं। यह आंकड़ा कम होने के बावजूद पिछले साल के 33 प्रतिशत के आंकड़े से ज्यादा है और इस बात का संकेत देता है कि युवाओं को स्किल देने की दिशा में धीमी गति से ही सही, काम हो रहा है। सरकार हमारी शिक्षा व्यवस्था की इस मूलभूत कमी को पूरा करने की कोशिश कर रही है। नरेंद्र मोदी इस बारे में बहुत ज्यादा सचेत हैं और इस दिशा में निरंतर कोशिश कर रहे हैं।

पिछले साल पांच सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षक दिवस पर देश के छात्रों को गुरूज्ञान देते हुए स्किल की आवश्यकता पर बहुत जोर दिया था। ऐसा नहीं है कि ऐसा उन्होंने पहली बार किया था। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कहा था कि भारत की छवि स्कैम इंडिया कि बन गई है, उसे स्किल्ड इंडिया की बनानी है। इसके पीछे का उनका तर्क किसी को भी समझ में आने वाला है कि देश के करोड़ों लोगों को रोजगार तभी दिया जा सकता है, जब उनके पास कोई कौशल हो। ऐसा नहीं होने के कारण ही आज देश की हालत यह है कि एक तरफ करोड़ों लोग बेरोजगार हैं, दूसरी तरफ लोगों को जरूरत के समय प्लंबर, कारपेंटर आदि सामान्य तकनीशियन तक नहीं मिल पाते। उद्योगों को भी कई तरह के तकनीशियन चाहिए होते हैं, मगर उन्हें कुशल और हुनरमंद लोग मिल नहीं पाते। हुनर की मांग और आपूर्ति में इस खाई की वजह यह है कि हमारे देश में कौशल निर्माण पर ध्यान ही नहीं दिया गया। भारत में जितनी बड़ी तादाद में युवा शक्ति है, यदि उसके कौशल विकास पर ध्यान दिया जाए तो हमारा देश निश्चित ही विकास के मामले में सफलता के झंड़े गाड़ सकता है। आज के जमाने में विकास के लिए संसाधन, पूंजी आदि जितना ही जरूरी है, उतना ही कुशल मानव संसाधन भी। इसके लिए जरूरी है कि देश भर में कौशल विकास के केंद्रों का जाल हो, साथ ही साथ इन केंन्द्रों को उद्योगों के साथ जोड़ा जाए। देश में तीव्र गति से इस तरह के केंद्रों का जाल बिछाने के लिए प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों एक योजना को प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा, ”हमारे देश में हजारों रेलवे स्टेशन हैं, जहां दिन भर में एक या दो ट्रेनें रुकती हैं। काफी लागत से इन स्टेशनों के लिए तैयार की गई इन सुविधाओं का बाकी दिन भर कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा। ये स्टेशन आसपास के गांवों के लिए विकास के प्वाइंट बन सकते हैं। उनका स्किल विकास के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।’’

स्किल विकास पर जोर देकर मोदी ने  विकास और रोजगार के मर्म पर उंगली रख दी। यह सही है कि विकास के लिए सही नीतियों का चुनाव जरूरी है, लेकिन विकास और स्किल का भी चोली-दामन का संबंध रहा है। यदि देश में स्किल का विकास न हो तो विकास बहुत लंबी दूरी तक नहीं जा पाता, उसे लोगों में स्किल विकसित होने तक का इंतजार करना ही पड़ता है। इसलिए इन दिनों विकास के लिए मानव संसाधन के विकास की आवश्यकता पर भी बल दिया जाने लगा है। इसका मतलब है देश के नागरिक पढ़े -लिखे हों और उनके पास इस तरह का हुनर हो जिसके जरिये वो विकास में अहम योगदान दे सकें। स्किल भी ऐसी होनी चाहिए, जिसकी जरूरत उद्योग और व्यापार-धंधों को हो और जिसे नवीनतम टेक्नोलॉजी के अनुसार ढाला जा सके। अगर लोगों के पास स्किल हो और बाजार की मांग के अनुसार न हो तो स्किल और बाजार के बीच में संतुलन स्थापित नहीं हो सकता है। ऐसी स्थिति में लोगों के पास स्किल होने के बावजूद लोगों को रोजगार नहीं मिल पाएगा। यही कारण है कि 44 प्रतिशत कंप्यूटर ट्रेनिंग लेने वाले और 60 प्रतिशत टेक्सटाइल से जुड़े स्किल की ट्रेनिंग लेने वाले खाली बैठे हैं।

यह समस्या केवल हमारे देश की ही नहीं बाकी देशों की भी है और उन्होंने इसे अपने तरीके से सुलझाया है। जर्मनी में चैंबर ऑफ कॉमर्स इस तरह के हुनरों के ऊपर नजर रखता है, जिनकी उद्योगों को आवश्यकता है और उसके लिए पाठ्यक्रम बनाने और उसे लागू करने में मदद करता है। हमारी औद्योगिक संस्थाओं, फिक्की और सीआईआई को इससे सबक लेना चाहिए और कुशल मानव संसाधन के लिए उसे इस दिशा में कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि देश में वोकेशनल संस्थाएं बहुत कम हैं। अभी जो वोकेशनल संस्थाएं हैं वह अपनी पूरी क्षमता से काम करें तो भी हर साल स्कूल छोडऩे वालों में से केवल 3 प्रतिशत को ही वोकेशनल ट्रेनिंग दे सकती हैं।

दरअसल पश्चिमी देश पिछले वर्षों के ट्रायल एंड एरर के बाद इस नतीजे पर पहुंचे कि देश को अकादमिक शिक्षा की तरह ही बाजार की मांगों के मुताबिक उच्च गुणवत्ता वाले स्किल की शिक्षा दी जानी चाहिए। कौशल किस तरह कर्मचारियों के विकास में भी मदद कर सकता है यह एक बच्चे के इस संस्मरण से पता चलता है – ‘मेरी मां मॅक्डोनाल्ड में काम करती है। उसने तय किया कि उसे और ज्यादा पैसे कमाने हैं, तो उसने मॅक्डोनाल्ड का मैनेजमेंट प्रोग्राम किया और बड़ा पद पा लिया।’ इस तरह स्किल सीखकर कर्मचारी भी जिंदगी को बेहतर बना सकते हैं। इस तरह स्किल का विकास मालिक और कर्मचारी दोनों के लिए फायदेमंद हो सकता है।

स्किल इंडिया बनाने के अपने इरादे के तहत मोदी सरकार ने कौशल विकास के लिए  अलग मंत्रालय बनाया है। कौशल विकास से जुड़े सभी कार्यक्रमों को स्किल डेवलपमेंट मंत्रालय के तहत रखा गया है। असम भाजपा के नेता सर्वंदानंद सोनोवाल पहले इस मंत्रालय के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) थे, अब राजीव प्रताप रूडी को इसका कार्यभार दिया गया है। कौशल विकास मंत्रालय का काम इतना आसान नहीं है। 20 मंत्रालय 6,000 करोड़ रूपये लागत की 73 कौशल विकास कार्यक्रमों को चलाते हैं। इन मंत्रालयों का संयोजन करना है। 20 मंत्रालयों के बीच समन्वय कोई हंसी खेल नहीं है। हमारे देश में कौशल विकास का कार्यक्रम नया नहीं है, लेकिन स्वतंत्र मंत्रालय जरूर नया है। इसलिए नई सोच की जरूरत है। वैसे यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि केंद्र सरकार पहले की तरह हर योजना को स्वतंत्र रूप से पैसे देगी या रूडी के मंत्रालय को आखिरकार सभी स्किल विकास के कार्यक्रमों  के संचालन की जिम्मेदारी दी जाएगी, यह भविष्य के गर्भ में है। यह भले ही निकट भविष्य में न हो, लेकिन आखिर में ऐसा ही होना है।

इसके अलावा सरकार का एक महत्वपूर्ण फैसले के तहत अप्रेंटिसशिप ऐक्ट 1961 में संशोधन किया गया है। इस कानून का पालन न करने वाली कंपनी के निदेशकों को पहले जेल की सजा का प्रावधान था, जिसे बदलकर  आर्थिक दंड का प्रावधान कर दिया गया है। इस तरह कंपनियों को अप्रेंटिसशिप की अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के बारे में लचीला बनाया गया है। स्किल विकास के मामले में सरकार ने स्किल, स्पीड और स्केल का नारा दिया है।

एन.एस.डी.सी. की टीम देश में रोजगार और रोजगार पाने की क्षमता पर सेक्टर स्किल काउंसिलों के जरिये अध्ययन कर रही है। इसका काम शिक्षा और उद्योगों के बीच तालमेल बैठाना है। एनएसडीसी ने नेशनल स्किल क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क के 31 क्षेत्रों के 800 एंट्री लेवल जॉबरोल खोजे हैं। अब तक इसके आधार पर 30 लाख युवाओं का मूल्यांकन किया जा चुका है और दस लाख से ज्यादा लोगों को नौकरियां मिल चुकी हैं। इनमें से कुछ तो इतने कुशल हो चुके हैं कि अपना व्यवसाय चला सकते हैं।

चूंकि शिक्षा समवर्ती सूची में आती है। इसलिए अगर केंद्र सरकार शिक्षा को स्किल के साथ जोडऩा चाहती है तो उसे राज्य सरकारों को सक्रिय भागीदार बनाना पड़ेगा। क्योंकि, जमीनी स्तर पर तो असल काम राज्यों को ही करना है। इसलिए 6 जनवरी को केंद्र सरकार ने राज्यों से सलाह किया जिसका मकसद राज्यों को यह सुझाना था कि कॉलेज और विश्वविद्यालयों में ऐसे कोर्सेस को प्रोत्साहन दें जिनका मकसद छात्रों की रोजगार पाने की क्षमता बढ़ाना हो। वैसे मानव संसाधन मंत्रालय का इस साल का लक्ष्य है कि वोकेशनल कोर्सेस सीखाने वाले कॉलेजों की संख्या मौजूदा 127 से बढ़ाकर 1000 की जाए, जो काफी महत्वाकांक्षी लक्ष्य है। हालांक स्किल्ड इंडिया भी अपने आप में बहुत महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है। हमारा देश दुनिया का सबसे ज्यादा युवाशक्ति वाला देश है, मगर वह युवाशक्ति हमारे लिए ऐसेट तभी साबित होगी, जब हम उसे हुनरमंद बनाएंगे। वरना,  ये युवा के बेराजगारों की फौज ही बढ़ाएंगे और उससे असंतोष ही फैलेगा। अगर हम स्किल्ड युवाशक्ति पैदा कर सकें तो चीन, जर्मनी या दक्षिण कोरिया की तरह हम भी आर्थिक महाशक्ति बन सकते हैं।

सतीश पेडणेकर

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