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मोदी मानसून बरकरार?

मोदी मानसून बरकरार?

”वक्त बदल चुका है दोस्तों’’, चीन की व्यावसायिक राजधानी शंघाई में ‘मोदी-मोदी’ का नारा लगाते बेहद उत्साहित भारतीय आप्रवासियों की सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वाक्य को बार-बार दोहराया।

मौका16 मई, 2015 का था। ठीक एक साल पहले इसी दिन देश के लोगों ने अनोखा जनादेश सुनाया था और नरेंद्र मोदी की अगुआई में भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत का तोहफा थमा दिया था। इस वजह से शंघाई से सीधे प्रसारित इस भाषण में मोदी समूचे देश को न सही, अपने वोट बैंक को भी संबोधित कर रहे थे। उनके पास आह्लादित होने या अपनी उपलब्धि पर गर्व करने की पर्याप्त वजहें हैं। यह महज संयोग या सोची-समझी रणनीति दोनों ही हो सकती है कि वे इस दिन अपने उस ताकतवर पड़ोसी देश में थे, जिसको लेकर भारत में हमेशा संदेह बना रहा है। लेकिन, वहां उनकी जैसी शानदार आगवानी हुई वह संकेत है कि इस बार भारत और भारतीय प्रधानमंत्री को वहां कुछ ज्यादा ही तवज्जो दी गई।

मोदी अब विश्व नेता बन चुके हैं। दुनिया भर के देश उनके बारे में जानने को उत्सुक हैं, तो वे भी दुनिया को भरपूर जान-समझ लेना चाहते हैं। विडंबना देखिए कि मोदी और उनकी पार्टी जिसे उपलब्धि बता रहे हैं, उनके राजनैतिक विरोधी और आलोचक उसका माखौल उड़ा रहे हैं। आलोचक कुछ ज्यादा ही कठोर हो सकते हैं, लेकिन मोदी के लिए चुनौती 125 करोड़ देशवासियों को यह यकीन दिलाना है कि वाकई पिछले साल भर में वक्त बदल गया है, जैसा कि वे कह रहे हैं। साल भर का वक्त भारत जैसे विविधताओं से भरे विशाल देश और उसके लोगों की दशा-दिशा बदलने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। विकास के बारे में सबके अपने-अपने नजरिए हैं, लेकिन कई लोगों का मानना है कि विकास के लिए मोदी का नेतृत्व ही एकमात्र विकल्प है।

साल भर पहले ‘अच्छे दिन….’ और ‘सबका साथ, सबका विकास’ का भाजपा का नारा लोगों की जुबान पर चढ़ गया था और ‘अबकी बार मोदी सरकार’ तो वाकई हकीकत में बदल गया। मोदी ने वह कर दिखाया जो पिछले 30 साल में कोई नेता नहीं कर पाया, यानी अपने दम पर लोकसभा में किसी पार्टी को इतने साल में पहली बार बहुमत मिला।

यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं थी, क्योंकि भाजपा मोटे तौर पर एक उत्तर भारतीय दल ही है। विंध्य के पार दक्षिण में सिर्फ कर्नाटक में भाजपा का ठीक-ठाक सांगठनिक ढांचा मौजूद है और लगभग पूरे पूर्वी भारत में भाजपा महज नाम के लिए ही चुनाव लड़ती रही है। लेकिन, इंदिरा गांधी के बाद शायद मोदी ही ऐसा नाम है जो देश के हर घर में पहुंच चुका है, चाहे उस इलाके में उनकी पार्टी का कोई आधार हो या न हो। जिन लोगों ने भाजपा को वोट नहीं दिया, वे भी मोदी की चर्चा से दूर नहीं रह सके। यह ऐसा चुनाव था जिसमें यूपीए के दस साल पर मोदी का इकलौता मुद्दा भारी पड़ा था। कहने का यह मतलब नहीं कि यूपीए के घोटालाराज से मोहभंग ने लोगों का मन बनाने में कोई काम नहीं किया। फिर भी, प्रभावशाली वाक्कला और गुजरात में कुशल प्रशासक की छवि ने मोदी को विकास का मसीहा बना दिया। उनके विरोधियों ने उन्हें जितना कट्टर सांप्रदायिक बताने की कोशिश की, उससे उनके प्रति उतनी ही ज्यादा सहानुभूति पैदा हुई। इसकी वजह से हुए ध्रुवीकरण के कारण भाजपा और उसके सहयोगी दलों का कुल मत प्रतिशत 40 तक पहुंच गया।

मोदी ने कई लंबे समय की मान्यताओं को भी धराशायी कर दिया और अनेक राजनैतिक पंडितों की भविष्यवाणियों को गलत साबित किया। शंघाई और दूसरी जगहों पर मोदी ने अपनी खास शैली में 16 मई 2014 की धारणाओं की चर्चा की। तब कई लोग कहा करते थे कि मोदी को गुजरात के बाहर कौन जानता है, अगर वे जीत जाते हैं तो विदेश नीति का क्या होगा, दुनिया उन्हें नेता के रूप में स्वीकार नहीं करेगी। लेकिन आज तो उनका हर जगह डंका बज रहा है। ऐसे वक्त में जब गठजोड़ को केंद्र की राजनीति का धर्म मान लिया गया था और कहा जाता था कि एक पार्टी की सरकार के दिन अब लद गए, मोदी निर्णायक जीत के साथ सत्ता में पहुंचे।

इसी वजह से पहले दिन से ही मोदी और उनकी पार्टी के नेताओं को मालूम है कि उनसे उम्मीदें बेपनाह हैं और उन्हें अपने पूर्ववर्तियों से ज्यादा कड़ी कसौटी पर तौला जाएगा। सो, मोदी की सत्ता की सालगिरह पर उनके कामकाज को तौलने का पैमाना पूर्व प्रधानमंत्रियों, मनमोहन सिंह या अटल बिहारी वाजपेयी या पी.वी. नरसिंह राव से अलग होगा। वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर, देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल से तो उनकी कोई तुलना ही नहीं है।

मोदी ने अप्रत्याशित रूप से सबसे पहले कूटनीति को अपना आधार बनाया और अपने शपथ ग्रहण समारोह में पड़ोसी देशों के शासनाध्यक्षों को बुलावा भेजकर सबको चौंका दिया। स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से अपने पहले ही संबोधन में करोड़ों लोगों का दिल छू लिया। हाल के दौर में पहली बार कोई प्रधानमंत्री ऐसे सामाजिक मुद्दों को भी छेड़ रहा था, जिससे देश के हर घर का वास्ता है, खासकर लड़कियों के प्रति उनके नजरिए, स्वास्थ्यकर स्थितियों और बुनियादी साफ-सफाई पर बल दे रहा था। वे ऐसी भाषा में बोल रहे थे, जो हर किसी के समझ आए। इस तरह शौचालय और स्वच्छ भारत नए मिशन बन गए।

पिछले साल भर मोदी खुद को महज केंद्र में सरकार के मुखिया की तरह ही नहीं पेश करते रहे, बल्कि वे सरकार के ऐसे प्रेरणादायक नेता की तरह उभरे, जो लगातार बड़े पैमाने पर लोगों में आत्मविश्वास और भरोस पैदा करता है। वे टीम इंडिया और सहयोगी संघवाद की बात करते हैं।

पिछले पखवाड़े उन्होंने आम आदमी के लिए अपनी एक महत्वाकांक्षी सामाजिक सुरक्षा योजना के उद्घाटन के लिए कोलकाता को चुना। वहां एक समय की अपनी धुर विरोधी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ मंच पर उन्होंने फिर अपने काम दिखाने का मसला उठाते हुए कहा, ”वे यह भी जानती हैं कि यह (शहरों तक सीमित बैंकिंग सुविधाएं) पिछले 60 साल की विरासत है और इसका विस्तार सिर्फ मैं ही कर सकता हूं।’’ वे वहां यह दावा इसलिए कर पाए, क्योंकि उन्होंने जन धन योजना पर सफलतापूर्वक अमल किया है और आम आदमी के लिए सामाजिक सुरक्षा की तीन योजनाएं शुरू की हैं। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि मोदी खुद से उम्मीदों को कभी नजरअंदाज करने की कोशिश नहीं करते, बल्कि हमेशा आकांक्षाओं को ऊंचा ही करते जाते हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि मोदी उत्साह के साथ दिन-रात काम में जुटे दिखते हैं, लेकिन चुनाव के दौरान हर सभा में किए गए ‘अच्छे दिन’ लाने के वादे के पूरा होने का एहसास आम आदमी तो कम से कम अपनी समझ के मुताबिक नहीं कर पा रहा है।

वे आम लोगों में निराशा के माहौल को बदलने में कामयाब रहे हैं। चारों तरफ उम्मीद का माहौल भी बना है, लेकिन यह माहौल दोधारी तलवार की तरह है। अगर लोगों के दैनिक जीवन में इसके नतीजे नहीं दिखे तो भारी उम्मीदें और आकांक्षाएं असंतोष का कारण भी बन सकती हैं। स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रमों में रोजगार सृजन की संभावना तो है, लेकिन ये दीर्घावधिक परियोजनाएं हैं। वाकई किसी को अभी भी यह अंदाजा नहीं है कि कौशल विकास मंत्रालय (जिसे मोदी ने खासतौर से बनाया है) ने काम करना शुरू किया या नहीं और वह अपने विचार को धरातल पर उतार भी पाएगा या नहीं। डिजिटल इंडिया के विचार को भी नेट निरपेक्षता (मुफ्त इंटरनेट की आजादी) के मामले में स्पष्टता जाहिर करने की जरूरत है। मेक इन इंडिया के लिए कारोबार की सहूलियत की खातिर प्रक्रिया को आसान करने, तर्कसंगत कर ढांचे और भूमि अधिग्रहण पर सफाई की दरकार है।

सरकार की सालगिरह पर मोदी की सरकार और पार्टी में सहयोगी उत्साहित हैं। भाजपा नेताओं की दलील है कि सबसे बड़ी उपलब्धि तो यही है कि सरकार हमेशा तत्पर दिख रही है। हर आपात स्थिति में सरकार हमेशा हरकत में दिखाई पड़ रही है, चाहे जम्मू-कश्मीर की बाढ़ हो या नेपाल तथा बिहार में भूकंप या फिर यमन-ईराक का संकट हो।

लेकिन, जैसे ही सवाल मोदी सरकार के उम्मीदों पर खरा उतरने का आता है, भाजपा नेता फौरन ‘विरासत’ में मिली दिक्कतों पर उतर आते हैं। उनकी दलील होती है कि केंद्र में यूपीए सरकार अपने दस साल के घोटालों से भरे राज में नीतिगत लकवाग्रस्तता और खस्ताहाल अर्थव्यवस्था छोड़ गई है। उसके बाद वे 2004 में वाजपेयी की एनडीए सरकार के ‘ठोस आधार’ की दुहाई देते हैं जो यूपीए को तब विरासत में मिली थी।

संसदीय लोकतंत्र के केंद्र में संसद होती है। मोदी सरकार संसद को सुचारू रूप से चलाने में कामयाब हुई है और पिछले साल भर में 47 विधेयक पारित हुए हैं, लेकिन भूमि अधिग्रहण अध्यादेश संसद की मंजूरी नहीं पा सका है। यह विधेयक अब संसद के दोनों सदनों की संयुक्त समिति के पास लंबित है। कराधान सुधार संबंधी संविधान संशोधन जीएसटी विधेयक लोकसभा से पास हो गया है, लेकिन राज्यसभा ने इसे प्रवर समिति के हवाले कर दिया है।

मोदी सरकार से कुछ ऐसे मसलों पर बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी, जिससे उनके खास जनाधार और आम लोगों में असंतोष पैदा हो रहा है। सरकार को पिछले समय से कर (एमएटी) के नोटिस भेजने से परहेज कर सकती थी, जिसे कई लोग इसे टैक्स टेररिज्म भी कहते हैं। इसी तरह वार्षिक आयकर रिटर्न भरने के विस्तृत फॉर्म का भी मामला है, जिसे हर करदाता के लिए भरना अनिवार्य है। इस पर लोगों का गुस्सा भड़का तो सरकार को इसे फौरन वापस लेना पड़ा। अभी नया ‘सरल’ फॉर्म आना बाकी है, लेकिन इसको लेकर आशंकाएं बनी हुई हैं। पेट्रोल-डीजल के दाम फिर चढऩे शुरू हो गए हैं और रुपए की कीमत डॉलर के मुकाबले फिर घटने लगी है।

संघ परिवार और पार्टी के हाशिए पर चले गए तत्वों को सुर्खियां चुराने की छूट देने के लिए भाजपा ही दोषी है। ये तत्व गलत वजहों से सुर्खियां बटोरते रहे हैं और मोदी सरकार के ‘विकास के एजेंडे’ को पटरी से उतारते रहे हैं। इनके बयानों से ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारे पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। उन पर फिलहाल तो काबू पा लिया गया है, मगर फिर कब इनके मुंह खुल जाएं, कहना मुश्किल है। यानी यह खतरा हमेशा बना हुआ है।

मोदी सरकार इससे भी असहज हो गई है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को नकार चुकी मीडिया फिर उनमें दिलचस्पी दिखाने लगी है। भाजपा को शुक्र मनाना चाहिए कि राहुल ने अमेठी फूड पार्क का मसला उठाकर गलती कर दी है।

16 मई 2014 के जनादेश का महत्व गिनाते हुए मोदी ने कहा, ”दुख भरे दिन बीते रे भैया।’’ बेशक, यह उनमें भरोसे का प्रतीक है, लेकिन आम लोगों को दैनिक जीवन में जब नतीजे दिखने लगेंगे, तभी इस मशहूर गीत की अगली पंक्ति ‘सुख भरे दिन आयो रे’ सार्थक होगी।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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