ब्रेकिंग न्यूज़ 

भाजपा का मां-माटी-मानुष मंत्र अब भाजपा के पास

भाजपा का मां-माटी-मानुष मंत्र अब भाजपा के पास

एक समय बंगाल में मां माटी मानुष का नारा देकर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई थी, तब कम्युनिस्टों को 20 वर्ष से अधिक सरकार चलाते हुए हो गए थे। उनकी गुंडागर्दी चरम सीमा पर थी। उनसे जनता तंग आ चुकी थी। लेकिन उस समय सामने कारगर विपक्षी पार्टी कोई भी दिखाई नहीं दे रही थी। ममता ने अपनी तृणमूल पार्टी बना कर उस रिक्त स्थान का लाभ उठाया। जैसे ही जनता को सामने एक विकल्प दिखाई देने लगा, उसने कम्युनिस्टों को सत्ता से बाहर करके ममता की पार्टी को सत्ता सौंप दी। इसके पहले ममता बनर्जी ने कांग्रेस पार्टी छोडक़र जनता की दुखती रग पर हाथ रख दिया, तब बंगाली मानुष कम्युनिस्ट सरकार की गुंडागर्दी से बेहद तंग थे। बंगाल माटी पानी और विकास के लिए तरस रही थी, मां को कम्युनिस्ट वैसे भी नहीं मानते थे।

मां और मंदिरों की कोई परवाह नहीं थी, मंदिर के पुजारियों को हिकारत की दृष्टि से देखा जाता था। जनता को लूटा सो लूटा, उनकी भावनाओं को भी आहत किया जा रहा था, ऐसे माहौल में सिंगूर में टाटा द्वारा स्थापित किए जाने वाले उद्योग के लिए जमीन अधिग्रहित की गई। टाटा ने उस भूमि पर मोटर कार उद्योग लगाने का काम भी शुरू कर दिया था। ममता ने सिंगुर में एक आंदोलन सरकार के खिलाफ छेड़ा। उस आंदोलन का सारा दारोमदार उस क्षेत्र के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक परिवार एवं लोकप्रिय अधिकारी परिवार पर था! शुभेंदु अधिकारी आन्दोलन के हीरो बन कर उभरे। आंदोलन के आगे सरकार को जमीन के अधिग्रहण से पीछे हटना पड़ा और टाटा ने भी अपने हाथ पीछे खींच लिए। इसके बाद ममता ने कभी पीछे मुडक़र नहीं देखा ममता ने 10 साल सरकार चलाई क्योंकि कम्युनिस्टों के गुंडों  को ममता के गुंडों ने  निबटा दिया।

ममता के सत्ता में पुन: आने का मुख्य कारण उस समय किसी राजनीतिक दल के विकल्प का ना होना था। कांग्रेस पार्टी बंगाल में कम्युनिस्टों की विदाई के बाद विकल्प के तौर पर उभर सकती थी, कद्दावर कांग्रेसी नेता प्रणब मुखर्जी की लोकप्रियता भी बढ़ रही थी। उसी समय कांग्रेस ने 2012 में प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति बना कर भारी भूल की। यदि प्रणब दा राजनीति में बने रहते या प्रधानमंत्री बनाए गए होते तो शायद 2016 के विधानसभा चुनाव में ममता की पार्टी को सत्ता से हाथ धोना पड़ता। प्रणव मुखर्जी के राष्ट्रपति बनते ही ममता की पौ बारह हो गई। कांग्रेस के पास ममता के समकक्ष कोई नेता नहीं था और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कभी कोई प्रभावशाली नेता नहीं बन सके, नतीजा ममता बनर्जी दोबारा सत्ता में आ गई। कांग्रेस पार्टी को यह गलती बहुत भारी पड़ी कांग्रेस पार्टी बंगाल से धीरे-धीरे साफ हो गई।

मां माटी मानुष के लिए ममता ने यूं भी 5 साल सरकार में रहते हुए कुछ नहीं किया था। सत्ता के मद में उनका माथा खराब हो चला था, उनकी पार्टी में गुंडे भर गए  और वह भी घुस गए जो कम्यूनिस्ट सरकार में गुंडागर्दी कर रहे थे।

‘ममता विकास कार्यों में पिछड़ गई। माटी सूख गई, पानी के लिए तरसने लगी! मां मंदिर की जगह ममता के दिल में मुसलमान और मस्जिद घुस गए। मानुष को ममता के गुंडे लूटने लगे।’ भाजपा ने इसका लाभ उठाया और 2019 के लोकसभा चुनाव में अकेले दम पर बंगाल में लगभग आधी सीटें जीत ली। इसके बाद भाजपा का उत्साह बढ़ गया। निराश ममता ने जनता का बदलता स्वरूप देखकर अपने गुंडों को और शक्ति प्रदान कर दी। भाजपा कार्यकर्ताओं का उत्पीडऩ होने लगा। ममता ने मुस्लिम वोट बैंक साधने के लिए हिंदुओं के ऊपर मुसलमानों को तरजीह दी। कई घटनाएं ऐसे हुई जिसमें हिंदू समाज खून का घूंट पीकर रह गया। गरीब मध्यमवर्गीय अमीर सभी की भावनाएं आहत हो रही थी। इधर भाजपा के बढ़ते ग्राफ ने जनता को विकल्प दे दिया।  गांव गांव भाजपा को समर्थक मिलने लगे। ममता ने लोकतंत्र की सभी सीमाएं मर्यादाएं तोड़ते हुए बयान दिया कि वे नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री नहीं मानती खुद चुनी हुई मुख्यमंत्री तो है और जिसे देश ने चुना है उनकी नजर में वह प्रधानमंत्री नहीं है। उनकी संकीर्ण सोच सामने उभर कर आ गई। उन्होंने बंगाल को भारत से अलग रूप देने का प्रयास किया ताकि स्थानीय नारा बुलंद करके चुनाव जीता जा सके। यहां वे भूल गई कि भारत की आजादी दिलाने वाले बड़े-बड़े सपूत बंगाल की माटी में ही जन्मे हैं। ममता ने सत्ता के लिए  बंगाल को दांव पर लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। नागरिकता कानून का विरोध से लेकर घुसपैठियों तक की वकालत पर उतर आयीं। हो सकता है इस तरह उन्होंने कट्टर मुस्लिमों को अपना मजबूत वोट बैंक बनाया हो पर हिंदुओं के साथ यह ज्यादती उन्हें भारी पड़ रही है। ममता की तृणमूल पार्टी के बड़े नेता यह सब मन मसोसकर बर्दाश्त कर रहे थे। हिंदू मुस्लिम त्यौहार एक ही दिन पडऩे पर ममता सरकार ने मुसलमानों के जुलूस को इजाजत दी और हिंदुओं के साथ अन्याय किया। इस घटना के बाद तृणमूल नेताओं को अपने अपने क्षेत्र में खरी-खोटी सुनना पड़ी। विधानसभा चुनाव के नजदीक आते-आते तक हिंदू मुखर होने लगे, जनता की नब्ज़ समझ कर तृणमूल पार्टी के नेता पार्टी छोडऩे लगे। ममता का राजनीतिक गढ़ टूटने लगा यहां तक कि नंदीग्राम सिंदूर आंदोलन के प्रणेता शिवेंद्र अधिकारी ने भी पार्टी छोड़ी तो पार्टी छोडऩे वालों की लाइन लग गई। सभी भाजपा में जाने लगे। ममता की गुंडागर्दी धमकियां किसी काम नहीं आई।

उनका कहना कि भाजपा उनकी पार्टी को तोड़ रही है, सरासर झूठ था क्योंकि उनके नेताओं को हिंदुओं के ताने अपने-अपने क्षेत्रों में सुनने पड रहे थे। जब कुछ नेताओं ने ममता को समझाने का प्रयास किया तो वह उल्टा उन पर बरसी और अपने भतीजे अभिषेक को पार्टी का सर्वे सर्वा परोक्ष रूप से बना दिया। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस से बड़े-बड़े नेता पार्टी छोडक़र भाजपा में जाने लगे यहां तक कि सिंगूर आंदोलन में उनके सेनापति रहे कई बार के विधायक रविंद्र नाथ भट्टाचार्य ने भी पार्टी छोड़ दी और अब वो भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं।

राजनीति में बुरी तरह फेल होती ममता अब बात बात में अपना आपा खोने लगी हैं! एक मजे खिलाड़ी की तरह नई नई चाल चलती है। बंगाल को अलग थलग बताना, मंदिरों में घण्टे बजाना रोजाना मन्त्र पढने की कहना!

अपने को हिन्दू प्रमाणित करना, गोत्र बताना जैसी कोई तरकीब काम नहीं आई। यहां तक कि चोटिल होकर व्हील चेयर पर बैठ कर भाजपा पर आरोप मढ़ने की भी भी पोल खुल गयी जब जांच में उनके  सभी आरोप झूंठे निकले। इस घटना से उनकी बची खुची प्रतिष्ठा भी गयी! सहानभूति पाने के लिये बनाये चक्रब्यूह में खुद फंस गई। उन्हें याद रखना चाहिए था कि अबकी बार उनका पाला कांग्रेस नेताओं से नहीं है उनका मुकाबला नरेंद्र मोदी जैसे लोकप्रिय नेताओं से है। उन्हें राहुल गांधी के गिरते ग्राफ से सबक लेना चाहिए था जितनी राहुल गांधी ने मोदी जी को गालियां दी उतने ही वह लोकप्रिय होते चले गए और मजबूत हो गए। प्रतिदिन नरेंद्र मोदी को गालियां देना उन्हें शब्दों से बेइज्जत करना ममता की आदत हो गई। मोदी ने ममता को दीदी दीदी कहकर उनकी सारी पोल खोल दी। उनकी पार्टी के भ्रष्ट आचरण, शारदा चिटफंड में हेराफेरी, भतीजे अभिषेक द्वारा करोड़ों रुपयों की वसूली, पार्टी द्वारा चंदा इकट्ठा करना, सब कुछ जनता के सामने आ गया। उनकी गलतफहमी दूर हो गई कि उनकी पार्टी के गुंडे चुनाव जिता सकते हैं। भा.जा.पा के कार्यकर्ताओं की पिटाई हुई, कत्ल हुए और होते गए पर लोग इससे डरे नही और इसका असर उल्टा हुआ।

भाजपा का कारवां बढ़ता चला गया। आज भाजपा नेताओं की रैलिया भी भीड़ से भरी होती है। अमित शाह के रोड शो में अपार भीड़, संभाले नहीं संभल रही थी। मोदी जी को सुनने उसी तरह भीड़ उमड़ पड़ी है जो कभी अटल बिहारी वाजपेयी जी को सुनने आया  करती थी। स्पष्ट है कि बंगाल की जनता अब बदलाव चाह रही है। मां-मंदिर की प्रतिष्ठा सुरक्षा बंगाली हिंदुओं को केवल भाजपा के हाथों में दिखाई दे रही है। पूरे देश में तेजी से विकसित मार्ग सिंचाई के साधन को बंगालीजन भी देख रहे हैं। ममता बंगाल की माटी पर विदेशी नागरिक बसा कर माटी का कर्ज अदा नहीं कर रही है माटी पर कर्ज बढ़ा रही है। मानुष को तो लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। शिक्षित और समझदार मुसलमान दीदी के साथ नहीं है प्रगतिशील राष्ट्रवादी मुसलमान उनके साथ हो ही नहीं सकता क्योंकि वह जानता है कि धार्मिक खाई खोदने से उनका भला नहीं होने वाला है। बाहर का मुसलमान लाओ या ना लाओ, प्रदेश के मुसलमान को बराबर समझो! ना किसी से अधिक ना किसी से कम। मोदी जी ने गैस, आवास, शौचालय आवंटन में कभी भी धार्मिक आधार पर पक्षपात नहीं होने दिया, सभी को समान दृष्टि से समझा इसीलिए अभी कम ही सही पर मोदी पर मुसलमानों का विश्वास दिनों दिन बढ़ चला है।

जिस मां माटी मानुष के नारे पर ममता दस साल सत्ता पर रही, आज उसकी चाबी भाजपा के पास है। मां, माटी, मानुष की रक्षा लोगों को भाजपा में दिखाई दे रही है। मां सीधे हिंदू धर्म से जुड़ी हुई बात है और माटी की रक्षा देश की बंगाली सीमाओं की रक्षा से जुड़ी है, मानुष का भविष्य विकास और गुंडागर्दी बंद होगा। और ये तीनों बातें बंगाल भाजपा में सुरक्षित दिखाई दे रहे हैं। ममता की पार्टी को जनता से बाहर का रास्ता दिखाने वाली है, देखना ये है कि अमित शाह का 200 सीटों का सफर कहां तक पहुंचता है।

 

डॉ. विजय खैरा

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.