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किसानों की हालत पर घडिय़ाली आंसू

किसानों की हालत पर घडिय़ाली आंसू

हाल ही में संपन्न हुए भारतीय संसद के सत्र में कृषि के मुद्दे का वर्चस्व रहा विशेष रूप से विवाद किसानों से भूमि अधिग्रहण कानून में मोदी सरकार द्वारा प्रस्तावित परिवर्तन मांग से घिरा रहा। मनमोहन सिंह के अधीन एक पूर्व कैबिनेट मंत्री ने कहा कि मोदी सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन की मांग कहीं-न-कहीं दम तोड़ती कांग्रेस पार्टी के लिए ‘संजीवनी’ की तरह साबित हो रही है। कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी (जिन्हें लगभग सभी विपक्षी दलों का समर्थन हासिल है) अपने वास्तिवक राजनीतिक युद्ध में किसानों के मुद्दे पर मोदी सरकार के खिलाफ देश में अग्रणी समाचार-निर्माता के रूप में उभरे हैं। वहीं दूसरी तरफ मोदी भी कह रहे हैं कि वह वही कर रहे हैं जो भारतीय किसानों के हित में है। इसके सिवाय उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया जो किसानों के हित में न हो।

लेकिन, कोई भी इस विवादित तथ्य कि ओर नजर नहीं दौड़ता कि भारत में लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या कृषि और उससे संबंधित गतिविधियों में लगी हुई है। जिनके पास एक हेक्टेयर भूमि है ऐसी 62 फीसदी आबादी है। वहीं 1-2 हेक्टेयर की भूमि रखने वालों की श्रृंखला में 19 फीसदी लोग आते हैं। इसका मतलब है कि किसान भूमिहीन हैं। दरअसल कड़वी हकीकत यह है कि प्राय: किसान कृषि पर निर्भर हैं और अकसर वे बेरोजगार रहते हैं। साल के बारह महीने तक कृषि करना आसान नहीं है, क्योंकि कृषि कई तरह के विकल्पों पर निर्भर करती है। किसानों के पास बड़े पैमाने पर कृषि करने के लिए पर्याप्त भूमि नहीं है। इनमें से अधिकांश किसान अभी भी कृषि के लिए अनिश्चित मानसूनी वर्षा पर निर्भर करते हैं। देश में फसलों की उपज अंतर्राष्ट्रीय स्तर की तुलना में कम है। सिंचाई और कृषि विकास की दोषपूर्ण रणनीति की वजह से भूमि संसाधनों में क्षारीय और लवण्यता की अधिकता होने के कारण बुरी तरह से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हो रही है।

एक मायने में, भारत में गरीबी आंतरिक रूप से कृषि पर भारतीयों के जरूरत से ज्यादा निर्भरता से जुड़ा हुआ है, लेकिन कृषि पर अधिक निर्भरता और गरीबी ये हकीकत हर देश की है। ये हकीकत उन देशों की भी है जो आज की तारीख में देश के सबसे अमीर और अत्याधिक औद्योगिक देशों में से एक हैं। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका का ही मामला लें। 1800 के दशक तक 74 प्रतिशत अमेरिकी कृषि पर निर्भर थे, जबकि आज सिर्फ 2.5 फीसदी अमेरिकी ही कृषि कार्यों में लगे हुए हैं। अगर हम भारत में ये मौलिक सिद्धांत लागू करते हैं तो हमारा देश लगातार गरीबी को छूता चला जाएगा, क्योंकि भारत में आज भी कृषि जीविका का बड़ा साधन है। भारत की आधे से ज्यादा आबादी अपने जीवनयापन के लिए कृषि पर निर्भर करती है। बावजूद इसके, बिडंबना ये है कि इतनी बड़ी आबादी का कृषि और संबंधित गतिविधियों में संलग्न होने के बाद भी भारतीय अर्थव्यवस्था के समग्र सकल घरेलू उत्पाद (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट) के लिए कृषि का आर्थिक योगदान पिछले वर्षों की तुलना में कम रहा है। ये योगदान 1951 में 42 फीसदी था, जो अब केवल 12 प्रतिशत रह गया है।

एक सार्वभौमिक कानून ये है कि एक राष्ट्र के सकल घरेलू उत्पादन में कृषि का योगदान कम है और देश अधिक उन्नत है, लेकिन भारत के मामले में देखा गया है कि हमारे सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का  योगदान कम होने के बावजूद भी भारत गरीब है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कृषि पर भारत की आधे से ज्यादा श्रम शक्ति लगी हुई है। इसलिए मेरे विचार से भारतीय कृषि व्यवस्था में वास्तविक समस्या हमारी लापरवाही नहीं है, बल्कि जरूरत से ज्यादा कृषि पर निर्भरता है। लेकिन, भारतीय राजनीतिज्ञ ऐसा नहीं सोचते। उनके लिए अधिक मायने ये रखता है कि वोट कैसे बढ़े और उन्हें खरीदा कैसे जाये। इसका परिणाम ये होता है कि गुजरते सालों के साथ, किसानों के लिए सब्सिडी की मांग बढ़ती जाती है। इस तरह किसानों के नाम पर भारत सरकार विश्व व्यापार संगठन (डबल्यूटीओ) के दायित्वों के रूप में अपने अंतर्राष्ट्रीय प्रतिब्धताओं को त्याग देती है।

मैं कोई कृषि अर्थशास्त्री नहीं हूं, लेकिन सब्सिडी की राजनीति के मेरे छोटे से ज्ञान ने मुझे सिखाया है कि भारत में कृषि आय पर कर नहीं लगाया जाता है। उर्वरक और बीज किसानों को अत्यधिक रियायती दरों पर दिया जाता है। इसी तरह पानी के पंप और ट्रैक्टरों के लिए डीजल की अपूर्ति भी किसानों को किफायती दरों पर की जाती है। कई राज्यों में बिजली भी लगभग किसानों को मुफ्त है। प्राकृतिक आपदाओं जैसे, बारिश, चक्रवात या सूखा के मामले में सरकार किसानों की मदद के नाम पर नि:शुल्क लाखों रूपये वितरित करती है। सरकारी निर्देशों के तहत बैंक किसानों के हितों के लिए कम या बिना ब्याज के ऋण प्रदान करती है, लेकिन न की तुलना में। इस तरह के ऋण केन्द्र या राज्य सरकार द्वारा माफ किए जाने चाहिए।

लेकिन, क्या ये मुफ्त-उपहार देने की राजनीति किसानों की मदद करती है? जैसा कि हमने ध्यान दिया है कि 80 फीसदी से अधिक ऋण किसानों के बीच वास्तविक जरूरतमंदों की मदद नहीं करता। ये केवल किसानों के समुदाय में बेहतर लोगों की ही मदद करता है। मैं दिसंबर 2014 के ब्लूमबर्ग के एक न्यूज आइटम को उद्घृत करता हूं। ”वट्टीकुट्टी प्रसाद दक्षिण भारत में 27 फुटबॉल मैदान के बराबर के एक भूखंड पर धान, केला, गन्ने की खेती करते हैं। यहां अधिकतर किसानों के पास इस आकार के उनके खुद के भूखंड हैं। उन्होंने बताया कि पास के एक शहर में 4 बेडरूम के घर सहित उनके पास दो और घर भी हैं। ‘‘

”इस साल प्रसाद ने भारतीय स्टेट बैंक से 1,20,000 रूपये का सस्ता किसान लोन लिया और कहा कि वह आंध्र प्रदेश के राज्य में खुद की कीटनाशक और बीज के कारोबार की तीसरी शाखा खोलना चाहेंगे, जिसके लिए वह इन पैसों का इस्तेमाल करेंगे। 2008 में दूसरी बार लिए गए पैसे का उन्होंने भुगतान भी नहीं किया।’’ ब्लूमबर्ग न्यूज रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने कृषि ऋण में 350 बिलियन रूपये माफ करने की विशेष पेशकश की है। ”37 वर्षीय प्रसाद अपनी दुकान के दराज में रखे 1,000 रूपये के नोटों की गड्डी को शोर करते छत के पंखे के नीचे बैठकर गिनते हुए कहते हैं कि ये ऋण आसानी से मिल जाता है इसलिए मैं इसे ले लेता हूं।’’ प्रसाद के शहर टनुकु, जो कि बांगाल की खाड़ी की ओर हैदराबाद से 400 किलोमीटर (250 मील) दूर है, वहां पर उनके 80 फीसदी साथी व्यापारी कृषि ऋण को विशेष रूप से भूमि खरीदने और दूसरी चीजों पर खर्च करने के लिए लेते हैं। प्रसाद पूरे आत्मविश्वास के साथ कहते हैं कि जब ये पैस मुफ्त में मिल रहा है तो हम इसे वापस क्यों चुकाएं?’’

”दोबारा चुनाव जीतने के लिए चुनावी वायदे करते हुए ऐसा कहा गया था कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के वो किसान जिन पर कृषि ऋण है, उसे माफ कर दिया जाएगा। आंध्र प्रदेश में प्रति किसान 1,50,000 रूपये, तेलंगाना में 1,00,000 रूपये माफ करने की पेशकश की है। केन्द्र सरकार ने आंशिक रूप से ऋणग्रस्त किसानों की आत्महत्या के मामलों को ध्यान में रखते हुए 40 मिलियन किसानों का 710 बिलियन का कर्ज माफ कर दिया।’’

मुद्दे की बात यह है कि सरकार के द्वारा दिए जा रहे लाभ का फायदा अमीर किसानों को मिला है, जिनके  राजनीतिक संबंध हैं। बाकी के किसान गरीब और स्थानीय उधारदाताओं के ऋणी ही रहते हैं, क्योंकि उनके पास बैंक से लोन प्राप्त करने के लिए कोई गारंटीदाता नहीं है। ये सुनने में थोड़ा अजीब लगेगा कि समय-समय पर हमारे राजनेता कहते रहते हैं कि किसान इस वजह से आत्महत्या नहीं कर रहे हैं। लेकिन देखा ये गया है कि अगर वह किसान आत्महत्या करते हैं जो फसलों की पैदावार के लिए अधिक निवेश करते हैं और बाद में नुकसान हो जाता है। अब तक किसानों की आत्महत्या पर इतने लेख छप चुके हैं कि दूसरे मामलों में होने वाली आत्महत्या और किसानों की आत्महत्या में कोई फर्क नहीं नजर आता।

यह भी एक तथ्य है कि अमीर और औद्योगिक देश में किसानों को भारी साब्सिडी मिलती है। भारतीय और बाहरी देश के किसानों के उत्पादन में फर्क है। संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देश समग्र कृषि उत्पादन में काफी आगे हैं। वे देश के निवासियों द्वारा जितना उपभोग किया जाता है, उसकी तुलना में अधिक उत्पादन करते हैं। इसमें आश्चर्य की बात नहीं है कि दुनिया में 10 शीर्ष कृषि निर्यातकों में संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस, नीदरलैंड, जर्मनी, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इटली, बेल्जियम और स्पेन हैं। ये सभी देश अत्यधिक औद्योगीकृत हैं। इसलिए ये नकारात्मक कल्पना है कि औद्योगिक विकास कृषि विकास का दुश्मन है। तथ्य यह भी है कि कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए किसानों की संख्या में किसी तरह का फेरबदल नहीं करना है, गुणवत्ता महत्वपूर्ण  है न कि मात्रा। भारत के पास चीन से अधिक कृषि योग्य भूमि है, फिर भी कृषि क्षेत्र में भारत निष्प्रभावी है, भले ही दोनों देशों के 25 साल पहले के मानकों पर सममूल्यों में कम या ज्यादा समानता रही होगी।

हमारे राजनेताओं ने कृषि क्षेत्र की गहराई तक पहुंचने के लिए कभी कोई चिंतन नहीं किया। उनके लिए इस समस्या का समाधान यही है कि किसानों को अधिक-से-अधिक सब्सिडी दी जाए और मुफ्त रूपये बांटे जाएं। लेकिन, समस्या का असली समाधान वैसे ही संभव है जैसे चीन ने निकाला है। कृषि अनुसंधान पर अधिक खर्च के माध्यम से, खेती के आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों को लागू करके, सिंचाई विकास की दर बढ़ाकर, जल प्रबंधन शैली में सुधार करके, चावल और गेहूं की खेती को बढ़ावा देकर, बागवानी, पशु और मत्स्य पालन पर जोर देकर कृषि विकास संभव है। हमें निजी क्षेत्रों को कृषि क्षेत्र में निवेश के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

अंत में, भारतीय किसानों के साथ वास्तविक समस्या यह है कि उनके पास पर्याप्त कृषि योग्य भूमि नहीं है, जबकि देश की आधे से अधिक जनसंख्या अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। भारत में भूमिहीन, बेरोजगार, अद्र्ध-बेरोजगार, गरीबी से त्रस्त किसानों की मदद करने का सबसे अच्छा तरीका है कि उन्हें कृषि क्षेत्र में बंदी बना कर न रखा जाए, बल्कि उन्हें सशक्त बनाया जाए ताकि वो गैर-कृषि क्षेत्र में अपना भविष्य बना सकें। मेरे पिता को भी ऐसा कुछ एहसास हुआ और उन्होंने मेरे और मेरे भाई के लिए ऐसा किया। कहानी की नैतिकता ये है कि अगर किसानों को गरीबी के बंधन से मुक्त करना है तो उन्हें पर्याप्त योग्यता और कौशल प्राप्त करने में मदद करनी होगी, ताकि वो कृषि क्षेत्र से बाहर व्यवसाय ढूंढ सकें। जिनके पास पर्याप्त कृषि भूमि है उनकी भी मदद करनी चाहिए। जिनके पास कृषि योग्य भूमि है वो नई तकनीक, शैली, बुनियादी सुविधाओं का विस्तार करें ताकि खेती लाभदायक साबित हो सके।

 

प्रकाश नंदा

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