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आ अब लौट चलें अपनी जड़ों की ओर

आ अब लौट चलें अपनी जड़ों की ओर

आधुनिकता से भरे जीवन एवं उससे जो जीवन को मिल रहीं सुविधाओं के पीछे की कठिनाइयों का हम आकलन नहीं कर पा रहे है। पर इसका दोष हम खुद को नहीं दे सकते हैं, क्योंकि बाजार में उपलब्ध सुविधाओं की व्यवस्था और वस्तुओं का आकर्षण व्यक्ति को अपनी संस्कृति से बहुत दूर ले गया है। मोटर बाईक और मोटर गाड़ी की चाहत ओर  शौक रखने वालों को आज पता चल गया है कि जीवन में असीमित सुविधा ही कठिनाइयों का कारण बनती है। इसको नजरअंदाज करना व्यावहारिक जीवन पर भारी पडऩे लगा है। अब लोग दिखावे की जिदगी को न अपनाकर पुन: अपनी संस्कृति की ओर लौट रहें है।

मोटर बाईक हो या मोटर गाड़ी मशीनरी का दुरूपयोग हम इतना करने लगे है कि पैदल चलना ही भूल गए ओर पैदल न चलना सबसे बड़ी समस्या भी बन गयी है। पर आज लोग अपने व्यवहारिक जीवन में बदलाव ला रहे है, वे कहीं भी हों, कितना भी किसी भी कार्य में व्यस्त हों पर पैदल चलने का, टहलने का पूरा समय निकालना और मोटर बाईक, मोटर गाड़ी की जगह साइकिल चलाने में अधिक समय देने लगे है। और इस तरह जीवन में आने वाली समस्या से बचने का तरीका ढूंढ रहें है ।

देखा जाए तो कुछ वर्ष पहले मिट्टी के चूल्हो की जगह एलपीजी गैस से जलने वाले चूल्हों ने ले ली है। शीघ्र खाना बनाने की यह सुविधा शारीरिक जीवन की समस्याओं से कितनी ओतप्रोत है यह लोगो को धीरे-धीरे समझ में आ रहा है।  मिट्टी से बने बर्तन और मिट्टी से बने चुल्हे पर बना खाना स्वास्थ्य के लिये कितना लाभदायक और जीवन में कितना प्रभावशाली है यह भी समझ में आने लगा है। जो शहरों में रहते है, सुविधा सम्पन्न है वे भी कोफेचिनो में न जाकर सडक़ों के किनारे बने छोटे-छोटे स्टॉल में मिट्टी से बने कुल्हड़ में चाय पीना पसंद करते हैं। लोग अपनी कामकाजी दिनचर्या में से समय निकालकर अपने परिवार के साथ शौक से खाना भी वहीं खाने जाते है, जहां खाना मिट्टी के बर्तनों में बना हो भले ही वहां पैसे रेस्तरां और फाइव स्टार से ज्यादा लगें।

इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसों, स्क्रीन वाली चीजों से धीरे-धीरे परहेज करना एवं उनके मोहजाल से दूर होकर साधारण जीवन जीने की इच्छा प्रकट करना सभी के लिए ध्यान देने वाली बात है। शहर में जीवन-यापन कर रहे लोगों को तो अब आभास होने लगा है कि सादा खाना ही सरल और सुखी जीवन जीने के लिए लाभदायक है। अगर आप जिदगी से जुड़ी हुई चीजों का अध्ययन करेंगे तो यही पता लगता है कि जीवन में असीमित सुविधाओं का लाभ लेना, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक समझौता है।

अगर बात गावों की करें तो उन पर भी शहरीकरण का काफी प्रभाव पड़ा है। अब गांव, गांव नहीं रहे हैं। उनकी भी जीवन-संस्कृति बदलती जा रहीं है- दिखावा अपनाना एवं खान-पान में बदलाव के तरीके इसके प्रमुख उदहारण हैं। आधुनिकता का प्रभाव ग्रामीण जीवन पर एवं उनकी बदलती कार्यशैली पर अधिक देखने को मिल रहा है। इसलिए पीठ दर्द, मोटापा, तनाव आदि बीमारियां तेजी से घर करती जा रही है। लगातर ऐसे युवाओं की तादाद बढ़ रही है जो इस तरह की बीमारियों से ग्रसित हो रहे है। इसके पीछे अगर कुछ है तो वह है कम काम करने और खाने-पीने का तरीका। जिस तरह आधुनिकता का असर मानव जीवन पर देखने को मिल रहा है उसमे कार्य-स्थलों पर मनुष्यों की संख्या कम और मशीनों की संख्या अधिक नजर आती जा रहीं हैं। जीवन में धीरे-धीरे हो रहे बदलावों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए क्योंकि यह बाद में आगे जाकर एक सफल जीवन जीने के रास्ते में रोड़ा बनकर खड़ा हो जाता है। देश का जो कुछ भाग हरियाली से भरा है वहां जाकर हम चैन की नींद ले सकते हैं और आरामदायक तरीके से सांस ले सकते है। जहां अभी आधुनिकता का प्रभाव कम है उससे हमें सम्भाल कर रखना होगा। बात अगर बच्चों की करें, जो देश का भविष्य है, तो जो बच्चे पहले समूह खेल खेलते थे, जिसके कारण उनके शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिकता को मजबूती मिलती थी, बच्चों के खेलने कूदने की जगह और खिलौने आज खत्म हो गये। आज के बच्चों का मुख्य खेल का स्त्रोत ऑनलाइन गेम्स हैं। इससे मानसिक तनाव एवंम चिड़चिड़ापन होता है, जो पहले देखने को नहीं मिलता था। सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसों और मोबाइलों पर आश्रित बच्चों की मानसिक शक्ति कमजोर होती जा रही है, छोटी छोटी बातों का बुरा मानना, लड़ाई-झगड़ा, अकेलापन आदि  प्रवृति दिखाई देने लगी है। इन सब में इनका कोई दोष नहीं है। यह हमे सोचना है कि कहीं दोष हमारा ही तो नहीं है। पालन-पोषण करने में कोई कमी तो नहीं रख रहे हैं।

सीधी सी बात है हम खुद कार्य करने में इतना व्यस्त रहते है कि अपने बच्चों के लिए थोड़ा भी समय नहीं निकाल पाते हैं। घर की चारदीवारी को सलाखों मे तब्दील होना ही बच्चों के व्यवहार में परिवर्तन की वजह बनती जा रही है। कहते हैं कि बच्चे तो मिट्टी के घड़े के समान होते है। हम जिस तरह उनको सिखाएगें या जो भी माहौल उनके लिए बना पायेंगे वो उसी के अनुसार अपने आप को ढाल लेगे। अपनी आने वाली पीढ़ी को एक अच्छा भविष्य देना है या मानसिक तनाव यह फैसला हमें करना है, क्योंकि बदलाव ही विकास की विचारधारा को मजबूती प्रदान करता है।

 

अंकुश मांझू

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