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बगैर क्रांति बड़ा बदलाव

बगैर क्रांति बड़ा बदलाव

हर भारतीय की हार्दिक इच्छा है कि भारत वैश्विक स्तर पर सक्रिय एवं महत्वपूर्ण भूमिका अदा करे, जो उसके हित के लिए हो। एक बड़ी जनसंख्या वाले विशाल देश, जिसमें विशाल कुशल मानव संसाधन भी शामिल है, को विश्व में वह महत्व नहीं दिया गया, जिसका वह हकदार है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस धारणा को बदल दिया है। अमेरिका से लेकर चीन तक, जापान से लेकर यूरोपीय देशों तक भारत को आदर की नजरों से देखा जा रहा है। मोदी को उस व्यक्ति के रूप में देखा जा रहा है, जिसने भारत को बदलाव की दिशा में मोड़ दिया है। अपने महत्व को दर्शाने के लिए भारत द्वारा अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाने के दिए गए प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र संघ ने माना और 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया।

भारत विश्व के साथ बेहतर तारतम्य बैठा रहा है और विश्व के निवेशकों का ध्यान बेहतरीन निवेश स्थान के रूप में आकर्षित कर रहा है। मोदी आर्थिक कूटनीति के चमकते उदाहरण हैं, जिसे गुजरात में मुख्यमंत्री रहने के दौरान प्रदर्शित कर चुके हैं। जब उनके आलोचक गुजरात को नकारात्मक रूप से दिखाने की कोशिश कर रहे थे, उसी वक्त मोदी अपने मंत्रियों के साथ विश्व का भ्रमण कर गुजरात को बेहतरीन निवेश-स्थल बताते हुए निवेशकों को आमंत्रित कर रहे थे।

‘वाइब्रेंट गुजरात’ के नाम से 2003 में आयोजित पहले निवेशक शिखर सम्मेलन में 66,068 करोड़ रूपए के 76 अनुबंध हुए थे। 2013 के शिखर सम्मेलन में, जिसे मोदी के नेतृत्व में सबसे सफल शिखर सम्मेलन माना जाता है, गुजरात को 40 लाख करोड़ रूपए के 17,719 व्यवसायिक प्रस्ताव मिले। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से अब तक देश के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में 40 प्रशित की बढ़ोत्तरी हो चुकी है। जब से मोदी ने विदेशी दौरे प्रारंभ किए, भारत सफलता की नित नई कहानियां लिख रहा है।

मोदी जानते हैं कि सब कुछ आसान नहीं है। जो राज्य आधारभूत संरचना के निर्माण में असफल हैं, वह निवेशकों को लुभाने में भी असफल हैं। इससे पता चलता है कि मोदी की हालिया चीन यात्रा में महाराष्ट्र और गुजरात ने क्यों बाजी मारी। चीनी अधिकारियों ने निवेश में रूचि दिखाई, लेकिन भारत में संयोजकता की समस्याओं पर भी ध्यान दिलाया। अधिकांश निवेशकों की यही शिकायत थी। पारदर्शिता की कमी, व्यवसाय के अनुकूल माहौल में कमी और आधारभूत संरचना का अभाव राज्यों द्वारा निवेश आकर्षित करने में सबसे बड़ी बाधा है।

देश के पश्चिमी राज्यों ने तेज गति से विकास किया और विकास का इंजन बन गए। यदि डी.एम.आई.सी. (दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रीयल कॉरीडोर) के लिए एक बार भूमि अधिग्रहण आसान हो जाती है तो वह राष्ट्रीय राजमार्ग के समानांतर होगी और नई आर्थिक गतिविधियों को खोलेगी। पूर्वी राज्यों में इस तरह का कोई कॉरीडोर नहीं है। हालांकि ये राज्य स्वर्ण चतुर्भूज से जुड़े होंगे। आने वाले वर्षों में पूर्वी भारत का विकास एक बड़ी चुनौती होगी।

हालांकि मोदी सरकार का एक साल का प्रदर्शन बेहतर रहा है, लेकिन लोगों की आकांक्षाओं के कारण कि मोदी सरकार के आने के बाद चीजें रातों-रात बदल जाएंगी, लोगों में निराशा छा गई है। यदि किसी भी व्यक्ति से कहा जाए कि सरकार की असफलताओं के बारे में बताईए, तो उनके पास कोई जवाब नहीं है। सुशासन की सफलता सांकेतिक होती है।

सरकार की सबसे बड़ी आलोचना भूमि अधिग्रहण बिल पर हुई। पहले से ही निराशा से घिरे किसानों को विमुख करने की क्या आवश्यकता थी, जब सरकार पर पहले से ही अंबानी और आडाणी से नजदीकी के अरोप लग रहे हैं? कांग्रेस ने यह भूलते हुए इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया कि मुख्यमंत्रियों द्वारा भूमि अधिग्रहण में आने वाली अड़चनों की पूर्व में की गई शिकायतों के बाद ही पुराने बिल में संशोधन कर नए बिल में इस प्रावधान को लागू किया गया है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध संगठनों सहित विभिन्न हलकों के दबाव के बावजूद, सरकार इस बिल को पास कराने पर अटल है। भाजपा नेता गांवों में जाकर विधेयक से संबंधित तथ्यों को बताने शुरू कर दिए हैं। हाल ही में पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि सरकार के रूख से किसान आश्वस्त हैं। एक तरफ शाह ने जहां सलाह दिया कि भूमि अधिग्रहण बिल पर रक्षात्मक होने की जरूरत नहीं है, वहीं जोर देकर कहा कि हम इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि भूमि अधिग्रहण बिल विकास को एक नया आयाम देने जा रही है। उन्होंने कहा कि बिल में एक भी ऐसा प्रावधान नहीं है जो उद्योगपतियों के पक्ष में है। जिस किसान को अपनी जमीन के लिए क्षतिपूर्ति की बेहतरीन राशि मिलेगी, वह विभिन्न स्थानों पर जमीन खरीदने के बाद अपने लिए कुछ पैसे भी बचा सकता है। उन्होंने कहा कि भूमि अधिग्रहण में ऐसा पहली बार प्रावधान किया गया है कि जिन मजदूरों के पास जमीन नहीं होगी, उन्हें नौकरी उपलब्ध कराई जाएगी।

इसके अलावा सरकार ने कागजों पर राजपत्रित अधिकारी के हस्ताक्षर के बदले स्व-हस्ताक्षर की मंजूरी देकर लगभग हर चेहरे पर मुस्कान ला दी है। किसी राजपत्रित अधिकारी तक पहुंचना दुर्लभ काम हो चुका था। अब विद्यार्थियों को अपने कागजों पर स्वयं हस्ताक्षर करनी है। इसके अलावा सरकार ने बेकार पड़े कानूनों को हटाने की दिशा में भी काम करना शुरू कर दिया है।

पश्चिम का अनुकरण करते हुए सप्ताह में पांच दिन काम करने की अवधारणा को राजीव गांधी ने लागू किया था। इसके लागू करने के पीछे यह तर्क था कि सप्ताह के पांच दिन लोग पूरी तन्मयता के साथ काम करेंगे। इससे सिस्टम बेहतर बनने के बजाय यह अद्य:पतन का कारण बन गया, क्योंकि लोगों के सप्ताहांत की शुरूआत शुक्रवार से ही हो गई। यहां तक कि अधिकारी भी समय से नहीं आते। मोदी ने बॉयो-मेट्रिक सिस्टम के जरिए कार्यालयों में अनुशासन लाने का प्रयास किया। अब तो मंत्री भी समय पर ऑफिस आते हैं और समय से ऑफिस जाते हैं, जबकि इसके पहले मंत्री अपने आवास से ही कार्यालय चलाते थे।

मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि तकनीक के आधार पर पारदर्शी तरीके से कोल ब्लॉकों का आवंटन है। कांग्रेस द्वारा किए गए कोल ब्लॉकों के आवंटन से सरकार को 1.86 लाख करोड़ रूपए का नुकसान हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने इस आवंटन को अवैध घोषित करते हुए 204 कोल ब्लॉकों का आवंटन निरस्त कर दिया था। मोदी सरकार ने ई-बिडिंग के जरिए सिर्फ 33 कोल ब्लॉकों से 2.09 लाख करोड़ रूपए कमाए। इससे न सिर्फ केन्द्र सरकार को, बल्कि कोल ब्लॉक वाले राज्यों को भी बहुत फायदा होगा। मोदी ने इस दिशा में काम करना भी शुरू कर दिया है। शाह ने जोर देकर कहा कि एक साल में भ्रष्टाचार और घोटाले की अनुपस्थिति ही नरेन्द्र मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

अब सरकार का प्रयास बढ़ रहे मूल्यों पर नियंत्रण करना है। इस में सरकार को सफलता भी मिली है। मार्च 2014 में थोक मूल्य सूचकांक 6 प्रतिशत था, जो कि मार्च 2015 में घटकर 2.33 प्रतिशत रह गया। बाजार के वास्तविक मूल्य को दर्शाने वाले उपभोक्ता मूल्य सूचकांक इसी समयावधि में 8.25 प्रतिशत से घटकर 5.17 प्रतिशत पर आ गया। यहां तक कि फरवरी 2014 से 2 प्रतिशत रहा इंडस्ट्रियल आउटपुट बढ़कर फरवरी 2015 में 5 प्रतिशत हो गया।

पहली बार सरकार ने 15 करोड़ लोगों को जन धन योजना के माध्यम से उन्हें बैकों से जोड़ा। सरकार के अनुदानित सामाजिक सुरक्षा योजना – प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना और अटल बीमा योजना के माध्यम से समाज के नीचले तबके को जोडऩे का प्रयास किया गया। गरीबों के लिए सरकार का यह सबसे बेहतरीन प्रयास है।

इसके बावजूद, ओबामा के आगमन पर मोदी द्वारा पहने गए सूट को लेकर आलोचना हुई। जो भी हो, सरकार मीडिया से संवाद स्थापित करने में असमर्थ रही है। इसकी एक वजह मीडिया की अवहेलना है। मोदी और शाह दोनों ही गुजरात में मीडिया के पक्षपातपूर्ण रूख अपनाने के कारण मीडिया को भाव नहीं देते, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर रणनीति दूसरी होनी चाहिए।

सुदेश वर्मा

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