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अच्छे दिन की अच्छी सोच

अच्छे दिन की अच्छी सोच

पिछले वर्ष 16 मई को भारत की प्रबुद्ध जनता ने एक नया इतिहास रचा। 30 वर्ष बाद उसने प्रथम बार किसी एक दल और वह भी एक गैर-कांग्रेसी दल को पूर्ण बहुमत दिया। पूर्ण बहुमत की सरकारों की अनुपस्थिति में पिछले 25 वर्षों से देश अनिश्चितता की स्थिति से गुजर रहा था। देश की आशाओं और आकांक्षाओं पर सरकार के पूरा न उतरने पर जब जनता उंगली उठाती तो सरकारें बहुमत के अभाव व गठबंधन की मजबूरी को दोषी बताकर अपने उत्तरदायित्व से अपना पल्ला  झाड़ लेती थीं। पूर्ववर्ती सरकारें कार्य-क्षमता व कर्तव्यपरायणता के अभाव से ग्रसित थीं। ऊपर से हालत यह थी कि सरकार का रिमोट कंट्रोल किसी और के हाथ था। सरकार तो बस किसी के हाथ की एक कठपुतली भर थी। अच्छे पर वाह-वाह कोई और लूटता और विफलता का ठीकरा सरकार पर फोड़ दिया जाता। प्रति माह पहले से बड़ा कोई न कोई नया घोटाला विस्फोटित होता रहता था। विश्व की नजरों में तो भ्रष्टाचार ही भारत का प्रमुख उद्योग-धंधा लगने लगा था।

चुनाव परिणामों ने अनिश्चितता के माहौल के अन्धेरे में नई सुबह की एक किरण बिखेर दी। एक नई व ताजा बयार चल पड़ी। तब गुजरात के मुख्यमंत्री  होते हुये भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय परिषद में भाषण देते हुये नरेन्द्र मोदी ने एक बार कहा था, ”माना कि अन्धेरा घना है, पर उसमें दीया जलाना कहां मना है।’’ नरेन्द्र  मोदी ने सारे देश में चुनाव अभियान द्वारा देश में व्याप्त घने अन्धेरे के बीच जनता के मन में आशा और विश्वास का एक दीया जलाकर रख दिया।

अपने शपथ ग्रहण समारोह में नरेन्द्र मोदी ने सार्क देशों के राज्याध्यक्षों को शामिल होने का न्यौता दिया। वह शामिल भी हुये। इस प्रकार भारत में चल पड़ी ताजगी की हवा की सुगन्ध सारे विश्व में फैल गई। फलत: विश्व के देशों में एक होड़-सी लग गई। या तो वह स्वयं भारत आकर नई सरकार से हाथ मिलाना चाहते थे या फिर आतुर थे भारत के नये प्रधानमंत्री का अपनी पवित्र धरती पर स्वागत करने के लिये। लेकिन, नरेन्द्र  मोदी ने अपना प्रथम विदेश प्रवास किया सबसे पहले अपने पड़ोसी भूटान व नेपाल का और उन्हें अपना निकटतम सहयोगी और मित्र होने का एहसास कराया। हाल ही में नेपाल में भयंकर भूकंप आया। हजारों की संख्या में लोग हताहत हुये और भीषण तबाही हुई। उस समय भारत ही था जो अपने भाई व पड़ोसी की सहायता के लिये सबसे पहले पहुंचा। कुछ घंटों में ही भारत के प्रधानमंत्री ने सुनिश्चित किया कि सहायता सामग्री अतिशीघ्र पहुंचे। वह इस अभियान की स्वयं निगरानी कर रहे थे।

अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, रूस, ऑस्ट्रेलिया, चीन आदि अनेक देशों का दौरा कर मोदी ने भारत की छाप सबके दिलों में छोड़ी। इतना प्यार, उत्साह व जनसमूह इससे पहले कभी किसी भारतीय प्रधानमंत्री के लिये नहीं उमड़ा था। नरेन्द्र मोदी ऐसे प्रधानमंत्री बने जो 28 वर्ष बाद ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर गये। वहां के प्रधानमंत्री ने तो सार्वजनिक रूप से कह डाला कि उनके देश में किसी प्रधानमंत्री का इतना बड़ा सम्मान व स्वागत इससे पहले कभी नहीं हुआ।

हाल ही में संपन्न हुये चीन के दौर के दौरान अनेक समझौते हुये। मोदी ने चीन के नेताओं से खुलकर बेबाक वार्तालाप किया और सीमा विवाद को शीघ्र निपटाने पर जोर दिया। चीन के साथ व्यापारिक व व्यावसायिक समझौतों ने जहां दोनों देशों के आर्थिक विकास को गति दी है, वहीं भारत-चीन सीमा विवाद को शीघ्र सुलझाने की ओर कदम भी बढ़े हैं। कूटनीतिज्ञ इस दौरे के सकारात्मक संकेत ही पढ़ रहे हैं।

‘पूर्व की ओर रूख’ नीति ने उस क्षेत्र के देशों में भारत के लिये सुखदायी वातावरण का प्रादुर्भाव किया। इस नीति ने भारत को उन देशों के करीब लाकर खड़ा कर दिया है। इन सारी प्रक्रिया में भारत के सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बनने की संभावनाये बढ़ी है।

यही नहीं, जब यमन में हिंसा भड़क उठी और वहां रह रहे हजारों भारतीयों की जान खतरे में पड़ गई तो भारत ने अपने युद्धपोत भेजकर सभी नागरिकों को वहां से सुरक्षित निकालकर स्वदेश पहुंचाया। इस ऑपरेशन की इतनी सराहना हुई कि अमरीका, फ्रांस समेत 24 देशों ने भी अपने नागरिकों को वहां से सुरक्षित निकालने के लिये भारत की सहायता मांगी। भारत ने युद्धग्रस्त ईराक से भी वहां फंसी सैंकड़ों नर्सों को सुरक्षित निकाल कर उन्हें  अपने घर पहुंचाया।

विश्वविख्यात पत्रिका टाईम ने अपने मुखपृष्ठ पर नरेन्द्र मोदी का चित्र छापकर उनके नेतृत्व की प्रशंसा की। वह पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्हें  अपने एक वर्ष से भी कम काल में यह स्थान मिला। यह भी पहला ही अवसर है जब किसी अमरीकी राष्ट्रपति ने भारत के प्रधानमंत्री पर स्वयं कोई लेख लिखा हो। बराक ओबामा ने नरेन्द्र मोदी को ‘परफॉर्मर-इन-चीफ’ बताकर उनकी प्रशंसा की।

विश्व भर में भारत की छवि निखारने और उसकी साख बढ़ाने के साथ-साथ मोदी सरकार ने वित्त तथा सामाजिक क्षेत्र में भी अनेक पग उठाये हैं, जिससे देश की सामाजिक व अर्थव्यवस्था पर कई सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं। मुद्रास्फीति की दर अप्रैल मास में अपने न्यूनतम स्तर -2.33 प्रतिशत पर पहुंच गई। महंगाई सूचकांक भी गिर कर (-) 2.06 पर पहुंच गया। खुदरा मुद्रास्फीति की दर भी लुढ़ककर 5.49 प्रतिशत पहुंच गई है। इसका मुख्य कारण खाद्यान्नों व तेल के मूल्यों में कमी है।

सरकार ने विदेशी बैंकों में जमा कालेधन को वापस भारत लाने के लिये भी कारगर कदम उठाये हैं। इसी कारण विदेशों में भारतीयों के जमा धन में कमी होने के समाचार आ रहे हैं। स्विस तथा अन्य  देशों से समझौते कर कालेधन का पता लगाने और उसे भारत लाने के लिये भी पग उठाये गये हैं। हाल ही में सरकार ने कालेधन को स्वयं घोषित कर उसमें कुछ रियायतें हासिल करने प्रस्ताव रखा, ताकि लोग स्वयं ही उसे उजागर करने के लिये प्रेरित हो सकें।

यह भी संतोष का विषय है कि पिछले एक वर्ष में भारत में भ्रष्टाचार में कमी आई है। 175 देशों की सूची में भारत पिछले वर्ष के 94वें स्थान से उठकर 85वें स्थान पर पहुंच गया है, जो देश में घटते भ्रष्टाचार का द्योतक है।

यह पहला मौका था जब किसी प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस पर लिखित भाषण न पढ़कर जुबानी भाषण दिया और समय की सीमा का भी सम्मान किया। प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को जन-धन योजना के लागू किये जाने की घोषणा की। इस योजना के अनुसार देश में हर व्यक्ति का बैंक में खाता खोलने का प्रावधान है। इसमें जमा किये जाने की न्यूनतम राशि शून्य रखी गई है। प्रत्येक खाताधारक का एक लाख रूपये का बीमा भी कर दिया गया और उसे एक एटीएम भी दिया गया। इस योजना के लक्ष्य को समय से पूर्व ही प्राप्त कर लिया गया। इस कारण भारत का नाम गिनीज बुक ऑफ रिकार्ड्स में दर्ज हो गया और पांच मास में ही ऐसा देश बन गया जहां सबका बैंक अकाऊंट है। अब तक इस योजना में 15 करोड़ 30 लाख बैंक खाते खुल चुके हैं। सरकार द्वारा विभिन्न वस्तुओं पर दी जाने वाली सब्सिडी अब सीधे धारकों के बैंक खातों में जा रही है। इस व्यवस्था में जो भ्रष्टाचार व्याप्त  था, वह भी अब लगभग समाप्त हो चुका है। भ्रष्टाचार उन्मूलन में यह एक बड़ा कदम है।

स्वच्छ भारत अभियान भी मोदी सरकार की एक अनूठी व कारगर योजना है, जिससे जन-जन में स्वच्छता के प्रति जागरूकता पैदा हो गई है। इसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती पर पिछले वर्ष शुरू किया गया था। देश में गंदगी के कारण फैलने वाली बीमारियों से बचने में इससे काफी सहायता मिलेगी। यह अभियान प्रतिदिन जोर पकड़ रहा है। जनता समझने लगी है कि यह कार्यक्रम सबके हित में है।

सांसद आदर्श ग्राम योजना भी मोदी सरकार की एक अभिनव योजना है, जो देश में प्रति वर्ष लगभग 800 आदर्श ग्रामों का निर्माण करेगी। इससे ग्रामवासियों को भी आदर्श सुविधायें प्राप्त हो पाएंगी। इसके फलस्वरूप अगले पांच वर्ष में देश में लगभग 4,000 गांव उत्कृष्ठ हो जाएंगे। दूसरी ओर सांसद निधि का भी सदुपयोग हो जायेगा। बहुत से सांसदों ने इस योजना के अन्तर्गत ग्रामों का चयन कर लिया है।

स्मार्ट शहर योजना वर्तमान सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना है। इससे वर्तमान बड़े शहरों पर आबादी का दबाव कम होगा। नागरिकों को ऐसे शहरों में अपना जीवन-यापन का अवसर मिलेगा, जिसमें विश्व स्तर की आधुनिकतम सुविधायें प्राप्त होंगी। सरकार इस पर भी बड़े जोर-शोर से काम कर रही है। दक्षिण कोरिया ने इन शहरों में 10 बिलियन डॉलर निवेश करने का निर्णय लिया है।

मेक इन इण्डिया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक अन्य महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है। इसकी सराहना विदेशों में भी हो रही है। इस कारण भारत में विदेशी निवेश भी बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री की हाल ही के दक्षिण कोरिया व अन्य देशों के प्रवास के दौरान इस योजना में काफी रूचि पैदा हुई है और इस ओर काफी सफलता भी मिली है।

सकल घरेलू उत्पाद

नई सरकार के भरसक प्रयत्नों के बावजूद वर्ष 2014-15 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) मात्र 5.6 प्रतिशत तक ही पहुंचा है, लेकिन चालू वर्ष के संकेतों, अनुमानों व विदेशी एजेंसियों के आंकलन के अनुसार वर्ष 2015-16 में इसके बढ़कर 8.1 प्रतिशत हो जाने की संभावना जताई गई है। इसका श्रेय भी मोदी सरकार को ही जाता है।

मोदी सरकार के आने के बाद विश्व के आर्थिक बाजार में भारत की साख बहुत ऊंची हुई है। एक वर्ष पूर्व आर्थिक स्थिति पर जो चिन्ताजनक समाचार सुनने को मिलते थे उसके विपरीत अब भारत की अर्थव्यवस्था को आशापूर्ण भाव से आंका जा रहा है। न्यूनतम समीक्षा के अनुसार, 2020 तक चीन अमरीका से आगे निकल जायेगा और विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। उन्हीं अनुमानों के अनुसार, 2050 तक भारत चीन को भी पछाड़ देगा और विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का स्थान प्राप्त कर लेगा।

गंगा हमारी मां है, पवित्र नदी है। यह हमारे जीवन की रेखा है। उस पर देश की आधे से अधिक आबादी और कृषि उपज निर्भर करती है। लेकिन, पिछली सरकारों की कोताही के कारण आज इसका पानी प्रदूषित हो चूका है। मोदी सरकार ने इसकी सफाई के लिये राष्ट्रव्यापी अभियान चालू किया है। गंगा के लिये एक अलग मंत्रालय का गठन कर उसकी कमान उमा भारती को सौंपी गई है। सरकार की कोशिश है कि गंगा स्वच्छता के अपने लक्ष्य को अगले सात सालों में प्राप्त कर ले।

यूपीए सरकार ने राष्ट्रीय उच्च मार्गों के निर्माण की गति को बहुत ढीला कर दिया था। तब देश में प्रतिदिन केवल 4-5 किलोमीटर ही नई सड़कों का निर्माण हो रहा था। नई सरकार बनते ही केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने इस कार्य को गति दे दी है। अब देश में प्रतिदिन औसतन 30 किलोमीटर उच्च राजमार्ग बनाए जा रहे हैं। नदी मार्गों को भी विकसित किया जा रहा है।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में 21 जून को अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाये जाने का प्रस्ताव रखा, जिसके सह-प्रस्तावक 193 में से 175 देश थे। यह एक रिकॉर्ड है। मोदी सरकार ने इसकी पहल की और यह प्रस्ताव सरकार के बनने के 90 दिन के अन्दर ही पास हो गया। यह दिवस इस बार भारत सहित सारे विश्व में 21 जून को मनाया जायेगा।

सरकार ने ऊर्जा क्षेत्र में भी बहुत कुछ किया है, जिसके कारण ऊर्जा की स्थिति में सुधार हुआ है। आन्तरिक सुरक्षा में भी इस सरकार की उपलब्धि उल्लेखनीय रही है। यह पहला अवसर था जब पाक सीमा पर तैनात सीमा सुरक्षा दल को पाकिस्तान द्वारा हर तीसरे दिन गोलाबारी और घुसपैठ की कोशिशों का पूरा जवाब देने की छूट दी गई। इसका सकारात्मक असर भी हुआ है।

‘घर वापसी’ व धर्मान्तरण पर भी काफी गर्मा-गर्मी रही। आश्चर्य की बात यह है कि तथाकथित पंथनिरपेक्ष महानुभाव ‘घर वापसी’ पर तो अपनी भौंहें चढ़ाते हैं, लेकिन धर्मान्तरण पर रोक लगाने के लिये कानून बनाने से कतराते हैं। यह केवल उनका एक पाखण्ड ही है। कई स्थानों पर पूजास्थलों पर हमले और उनमें तोड़-फोड़ के मामले भी सामने आये। उससे सांप्रदायिक तनाव बढऩे की आशंका भी बढ़ी, लेकिन सन्तोष इस बात का रहा कि इसके पीछे कोई सांप्रदायिक षडय़ंत्र नहीं निकला। सभी मामले आपराधिक चोरी, लूट-मार व निजी रंजिश के निकले।

यह सच है कि मोदी सरकार ने जनता को सपने बहुत दिखाये हैं, लेकिन सच यह भी है कि सरकार उन्हें साकार करने के लिये पूरे मनोयोग से प्रयत्न कर रही है। यह तो जीवन का यथार्थ है कि आंख खोलते ही सपने साकार नहीं हो उठते। उसके लिये समय लगता है। धैर्य रखना पड़ता है। परखने की बात तो यह है कि क्या सरकार इस ओर ईमानदारी से कार्य कर रही है या नहीं। इस परख पर तो सरकार खरी ही उतरी है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि अंधेरा छंटा है।

उगते सूरज की किरण खिली है। पूरे सूरज की धूप की तो हमें रोज प्रतीक्षा करनी पड़ती है। पांच वर्ष के लिये किये गये वादों को सच होने के लिये तो एक वर्ष का समय पर्याप्त नहीं हो सकता।

अम्बा चरण वशिष्ठ

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