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कोरोना 2.0 हाल बेहाल

कोरोना 2.0 हाल बेहाल

देश में कोरोना की दूसरी लहर का कहर जारी है। भारत में कोरोना हर दिन अपना पुराना रिकॉर्ड तोड़ रहा है। कोरोना पर काबू पाने के लिए देश के कई राज्यों में लॉकडाउन समेत कड़ी पाबंदियां लागू हैं। इन सबके बावजूद हर दिन कोरोना के रिकॉर्ड मामले सामने आ रहे हैं। देश में  को कोरोना ने सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिया। बीते 24 घंटे में भारत में कोरोना के करीब 3 लाख नए केस सामने आए और इस दौरान 2000 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। ऐसा पहली बार हुआ है, जब कोरोना से एक दिन में इतने लोगों की मौत हुई है। स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक बीते 24 घंटे में कोरोना के 2,95,041 नए मामले सामने आए और इस दौरान 2,023 लोगों की मौत हो गई। इसके साथ ही देश में संक्रमितों का आंकड़ा बढक़र 1,56,16,130 पहुंच गया है और अब तक 1,82,553 लोग इस जानलेवा वायरस के शिकार हो चुके हैं। भारत में कोरोना के अभी 21,57,538 एक्टिव मरीज हैं और 1,32,76,039 मरीज इलाज के बाद ठीक हो चुके हैं।

यह दूसरी लहर बहुत तेजी से लोगों को चपेट में लेती जा रही है, इस बार कोरोना वायरस का प्रकोप पहले से अधिक घातक नजर होता आ रहा है। देश में अब संक्रमित लोगों की संख्या तीन लाख प्रतिदिन के पास पहुंच गयी है। कोरोना के संक्रमण का तेजी से होता प्रसार रोजाना पिछले दिन के रिकॉर्ड को लगातार तोड़़ रहा है, पहली लहर की तुलना में इस बार संक्रमण व मृत्यु दर बढ़ रही है। संक्रमित लोगों को समय रहते चिकित्सा सुविधा मुहैया करवाना परिजनों, केन्द्र व राज्य सरकारों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। जीवन की रक्षा करने वाले हॉस्पिटलों में संक्रमित व्यक्ति को भर्ती करवा कर समय से इलाज दिलवाना बहुत बड़ी गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।

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देश में जगह-जगह कोरोना उपचार में बेहद जरूरी एक तरह से जीवन रक्षक रेमडेसिविर इंजेक्शन की भारी किल्लत होने लगी है। भयावह आपदा में भी अवसर ढूंढऩे वाले कुछ लालची लोगों की वजह से जबरदस्त ढंग से इंजेक्शन की कालाबाजारी हो रही है। हॉस्पिटल में भर्ती मरीजों को भी समय रहते ऑक्सीजन व एंटी-वायरल दवा रेमडेसिविर का इंजेक्शन उपलब्ध करवाना हॉस्पिटल प्रबंधन व मरीज के परिजनों को लिए एक बहुत गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। हालात इतने खराब हो गये हैं कि हॉस्पिटलों में सामान्य बेड भी अब तो कम पडऩे लगे हैं, वहीं जरूरतमंद व्यक्ति को वेंटिलेटर वाला आईसीयू बेड को हासिल करना तो बहुत बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। देश के अधिकांश शहर व गांव में कोविड-19 के बढ़ते संक्रमण ने हमारे देश के पिछले कुछ वर्षों में बने बेहद चमकदार स्वस्थ्य सेवाओं की बुरी तरह कमर तोडक़र देश-दुनिया के सामने पोल खोल कर रख दी है। कोरोना संक्रमित मरीजों का दबाव झेलने में देश की राजधानी दिल्ली के बड़े-बड़े हॉस्पिटल बेहाल हैं, इन हॉस्पिटलों के भी आये दिन दिलोदिमाग को झकझोर देने वाले वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की व्यवस्था भी बेहद खस्ताहाल है, कोरोना संक्रमण के गंभीर रूप से चपेट में आये लोगों के परिजन समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर वो इस तरह के चिंताजनक हालात में करें तो क्या करें। वो बेचारे अपने स्तर पर ऑक्सीजन व रेमडेसिविर इंजेक्शन के लिए भागदौड़ करके अपने प्रियजनों को मौत के मुंह में जाने से बचाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं, देश में छोटे-बड़े हॉस्पिटलों के हालात देखकर लगता है कि समुचित चिकित्सा व्यवस्था शायद प्रबंधन करने वाले लोगों की जगह केवल और केवल सर्वशक्तिमान भगवान भरोसे निर्भर हो गयी है।

कोरोना की दूसरी लहर तेजी से लोगों को अपना शिकार बना रही है। इससे लोग हैरान परेशान हैं। इस साल फरवरी की शुरुआत में कोरोना की महामारी कमजोर पड़ती दिख रही थी। लोग राहत की सांस ले रहे थे। रोजाना नए मामलों की संख्या काफी घट गई थी। एक्टिव मामलों की संख्या बहुत कम रह गई थी। फिर, अचानक कोरोना की दूसरी लहर ने पांव पसारना शुरू कर दिया। आखिर इस दूसरी लहर की वजह क्या है? वैज्ञानिकों का मानना है कि कोरोना के नए वेरिएंट, चुनाव और इस तरह के दूसरे आयोजन और महामारी से बचाव के उपायों के प्रति लापरवाही दूसरी लहर के मुख्य कारण हैं। भारत में अब तक संक्रमित हो चुके लोगों की कुल संख्या 1।33 करोड़ के पार हो गई है। जानकारों का कहना है कि दूसरी लहर पहली के मुकाबले ज्यादा ताकतवर है। हालांकि, इस साल की शुरुआत में नए मामलों में अचानक आई कमी के उलट इस बार अचानक आई तेजी की वजह के बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।

अर्थव्यवस्था पर खतरा

देश में लगातार कोविड-19 संक्रमण के 2.5 लाख से अधिक मामले देश की आर्थिक रिकवरी के लिए चिंताजनक बन रहे हैं। नोमूरा का आर्थिक गतिविधियों के इंडेक्स नोमूरा इंडिया बिजनेस रिजर्वेशन इंडेक्स (NIBRI) के मुताबिक लगातार कोरोना के बढ़ रहे मामले देश की आर्थिक रिकवरी के चिंता का विषय बन सकता है।

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NIBRI को 100 के करीब पहुंचने में लगभग एक साल का समय लगा, जो गतिविधि के महामारी पूर्व स्तरों को पकड़ती है। यह 21 फरवरी को समाप्त सप्ताह में 99.3 पर पहुंची थी। तब से आठ सप्ताह में नवीनतम डेटा 18 अप्रैल को समाप्त सप्ताह के लिए उपलब्ध है। उसके बाद यह लगातार गिरकर 83.8 पर आ गया।

25 अक्टूबर 2020 को समाप्त सप्ताह में NIBRI 83.8 से कम था। यह उस सप्ताह 83.3 था। इन नंबरों से दूसरी लहर के दुष्प्रभाव को समझा जा सकता है। NIBRI को 83.3 से 99.3 तक पहुंचने में सत्रह सप्ताह लगे, लेकिन उन लाभों को पूर्ववत करने के लिए इसे केवल आठ सप्ताह लगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि अभी इससे और बुरा समय आना बाकी है क्योंकि ज्यादातर राज्य मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण संक्रमण में बढ़ोतरी रोकने के लिए लॉकडाउन का सहारा ले रहे हैं।

नोमूरा के अर्थशास्त्री सोनल वर्मा और अरूदीप नंदी ने medhajnews से बात करते हुए बताया की  पिछले सप्ताह से लॉकडाउन की कठोरता के साथ नहीं बढ़ाया गया है। यह अस्थायी हो सकता है क्योंकि राज्य अस्पताल के इंफ्रास्ट्रक्चर पर अधिक दबाव न पड़े इस कारण सख्त प्रतिबंध लगा रहे हैं। इससे पता चलता है कि दूसरी लहर का आर्थिक प्रभाव आने वाले हफ्तों में बढ़ सकता है।

कोरोना महामारी की दूसरी लहर आने व उसके हर क्षेत्र पर घातक बुरे प्रभाव होने का अंदाजा हमारे देश के सभी समझदार लोगों व ताकतवर नीति-निर्माताओं को काफी पहले से ही था, लेकिन अफसोस की बात यह है कि फिर भी ना जाने क्यों हमारे देश के ताकतवर कर्ताधर्ता केवल चुनाव करवाने और चुनावों में झूठ-प्रपंच व जुमलेबाजी करने में ही व्यस्त रहे। समय रहते किसी ने भी देश की चिकित्सा व्यवस्था को ठोस रूप से धरातल पर बेहतर करने के बारे में आखिर क्यों नहीं सोचा। आज उसका ही बहुत बड़ा खामियाजा हम देशवासियों को उठाना पड़ रहा है, जहां पर देश में नये हॉस्पिटलों का निर्माण व पुराने हॉस्पिटलों में सुविधाएं और बेड बढ़ाने का तेजी से इंतजाम होना चाहिए था, वहां आजकल  श्मशान में मृतकों के दाह-संस्कार समय पर करने के लिए इंतजाम बढ़ाने के लिए हमारे देश का सिस्टम संघर्ष कर रहा है, आखिर इस तरह का विकास तो कोई भी देश कभी नहीं चाहेगा।

ठीकरा फोडऩे की कवायद

कोरोना की दूसरी लहर तेज और खतरनाक है। परिस्थितियों को उन्हें देखकर कहा जा सकता है कि दूसरी लहर ने हमें जिस रफ्तार से हिट किया है, उसकी कल्पना अधिकतर भारतीयों ने नहीं की थी। लेकिन इस स्थिति में भी जिस तरह से महामारी का ठीकरा फोडऩे की  कवायद  जिस तरह से राज्यों और केंद्र के बीच हो रही है, वह भी कल्पना से परे ही है।  यह अलग बात है कि लगभग तीन महीने पूर्व केंद्र सरकार ने राज्यों को कोरोना पर काबू पाने के लिए अपने नियम खुद बनाने का अधिकार भी दिया है। महामारी के समय सूचना, वक्तव्य, निर्देश और राजनीति की भरमार है पर उससे इस महामारी को नियंत्रित करने में मदद नहीं मिल सकती। उद्धव ठाकरे की प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्रों को ही ले लीजिए। वे कोरोना पर प्रधानमंत्री के साथ मीटिंग करते हैं पर उन्हें ही दूसरे दिन पत्र भी लिख डालते हैं, कभी इस मांग के साथ कि स्टेट डिजैस्टर मैनज्मेंट फंड का इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार कोरोना को प्राकृतिक आपदा घोषित कर दे और कभी यह बताने के लिए कि उन्होंने प्रधानमंत्री को फोन किया था पर उनके कार्यालय से जवाब मिला कि प्रधानमंत्री बाहर हैं और अभी नहीं मिल सकते। शायद इसीलिए महाराष्ट्र का हाल यह है कि वहां तो पहली लहर ही खत्म नहीं हुई और जब देश के और राज्यों ने पहली लहर पर लगभग पूरी तरह से काबू पा लिया था, महाराष्ट्र सरकार अपने राज्य के नागरिकों को कभी विश्वास ही नहीं दिला पाई।

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इस मामले में दिल्ली का हाल भी कोई अलग नहीं रहा। दिल्ली के मुख्यमंत्री वीडियो बनाकर दावा करते रहे कि राज्य के अस्पतालों में पर्याप्त मात्रा में बेड उपलब्ध हैं और इधर जनता उनके इस दावे की पोल खोलती रही।

लगभग हर राज्य दवाई, ऑक्सीजन, इंजेक्शन की कमी से जूझ रहा है। अंतर बस इतना है कि उनमें से कुछ इस स्थिति से निकलने की कोशिश कर रहे हैं और कुछ इसी में बने रहने के लिए राजनीति करते जा रहे हैं।  इस बीच देश में ऑक्सीजन की कमी की खबरों के बीच केंद्र ने ने संवाददाता सम्मलेन में बताया की भारत में प्रतिदिन 7,500 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का उत्पादन किया जा रहा है और इसमें से आज की तारीख में 6,600 मीट्रिक टन चिकित्सीय उपयोग के लिए राज्यों को आवंटित की जा रही है। केंद्र ने भरोसा दिलाया कि आने वाले दिनों में आपूर्ति बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे हैं। नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ वी के पॉल ने संवाददाता सम्मेलन में राज्यों, अस्पतालों और कई नर्सिंग होम से अपील की कि ऑक्सीजन का समुचित उपयोग सुनिश्चित करें क्योंकि यह कोरोना वायरस संक्रमित रोगियों के लिए ‘जीवन रक्षक’ है। केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने कहा, ‘‘हम प्रतिदिन 7,500 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का उत्पादन कर रहे हैं जिसमें से 6,600 मीट्रिक टन चिकित्सीय मकसद से राज्यों को आवंटित की जा रही है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हमने फिलहाल निर्देश दिये हैं कि कुछ उद्योगों को छोडक़र बाकी उद्योगों को आपूर्ति प्रतिबंधित की जाएगी ताकि चिकित्सीय उपयोग के लिए अधिक से अधिक ऑक्सीजन उपलब्ध हो सके।’’ भूषण ने कहा कि 24 घंटे संचालित होने वाला एक नियंत्रण कक्ष बनाया गया है जहां राज्य सरकारें उनके सामने आ रहीं समस्याओं को उठा सकती हैं। मसलन उनका ट्रक कहीं फंस रहा है या आवाजाही बाधित हो रही है आदि।

जाहिर है की जब आप इतनी बड़ी चुनौती, इतनी बड़ी महामारी और कई पक्षों से निपटते हैं तो कई बार घबराहट और संशय का माहौल हो जाता है और ऐसे में जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकारों की मिलकर काम करने की है ताकि इन चुनौतियों पर फौरन ध्यान दिया जा सके। अब तक जो भी हुआ है उसे सुधारने का मौका सरकारों के पास फिर आएगा और वह मौका होगा एक मई से शुरू होने वाले वृहद् टीकाकरण को सुचारु रूप से चलाना और उसकी योजना को पूरा करते हुए नागरिकों में एक विश्वास पैदा करना। इस बार ठीकरा केंद्र सरकार पर फोडऩा आसान न होगा क्योंकि केंद्र ने राज्यों को पर्याप्त अधिकार देने की घोषणा पहले ही कर दी है।

आज के गंभीर आपदाकाल में किसी भी देशवासी को अपने मन में कौंध रहे तमाम बेहद गंभीर सवालों का संतोषजनक जवाब बहुत तलाशने के बाद भी मिल नहीं पा रहा होगा। इसलिए हम सभी देशवासियों के लिए यह जरूरी है कि वो स्वस्थ रहकर खोखली हो चुकी देश की लचर चिकित्सा सेवा पर बोझ बनने से बचें, आपदाकाल में एक दूसरे का सहयोग करके कष्टों के निवारण करने का प्रयास करें और सरकार के द्वारा बनाई गयी कोरोना गाइडलाइंस का अक्षरश: पालन करके अपना व अपनों का ध्यान रखें, किसी भी स्थान पर भीड़भाड़ इकट्ठा करने से हर हाल में बचें, लगातार हाथ अवश्य धोएं और जीवन को सुरक्षित रखने के लिए ‘दो गज की दूरी मास्क है जरूरी’ के नियम पर काम करें, तब ही भारत से जल्द से जल्द इस कोरोना महामारी का सफाया किया जा सकता है।

 

नीलाभ कृष्ण

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