ब्रेकिंग न्यूज़ 

कोरोना काल में स्वास्थ्य ढांचा चरमराया

कोरोना काल में स्वास्थ्य ढांचा चरमराया

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की कमी की वजह से हुई मौतों ने ना सिर्फ देश के स्वास्थ्य ढांचे पर सवाल खड़ा कर दिया है, बल्कि आलोचनाओं के दायरे में केंद्र सरकार को ला दिया है। यह बात और है कि कोरोना की दूसरी लहर सबसे ज्यादा महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ में उठी। इसके बाद देखते ही देखते इसने मध्य प्रदेश और दिल्ली को चपेटे में ले लिया। इन पंक्तियों के लिखे जाते वक्त तक देश का शायद ही कोई राज्य ऐसा है, जिसके यहां कोविड के रोगी नहीं हैं और मौते नहीं हो रही हैं।

सोशल मीडिया पर केंद्र सरकार को सबसे ज्यादा निशाना बनाया जा रहा है। ठीक है कि कोरोना महामारी की वजह से शुरू से ही केंद्र सरकार ने अपने हाथों में कमान ले रखी थी। पिछले साल लॉकडाउन लगाने से लेकर दूसरे उपाय केंद्र सरकार ने 1887 के महामारी अधिनियम के साथ ही 2005 के आपदा प्रबंधन कानून के तहत किये थे। इसकी वजह से राज्यों को केंद्र सरकार को तत्कालन 11 हजार करोड़ से ज्यादा की रकम का भुगतान करना पड़ा था। हालांकि यह भी ध्यान रखने की बात है कि स्वास्थ्य भारतीय संविधान के हिसाब से राज्य सूची का विषय है। इस लिहाज से देखा जाए तो कोरोना जैसी महामारी के दौर में राज्यों की भी जिम्मेदारी बढ़ती है। लेकिन दुर्भाग्यवश अधिकांश राज्यों ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया।

प्रधानमंत्री केयर फंड पर बहुत सवाल उठते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने दिसंबर 2020 में ही राज्यों को ऑक्सीजन प्लांट लगाने के लिए करीब दो सौ एक करोड़ अट्ठावन लाख रूपए रूपए जारी किए थे। लेकिन राज्यों ने पैसे मिलने के बावजूद ऑक्सीजन प्लांट नहीं बनवाए। इनमें दिल्ली, पश्चिम बंगाल जैसी सरकारें आगे रहीं। बहरहाल जब कोविड से मौतों का मामला तूल पकडऩे लगा तो खुद प्रधानमंत्री कार्यालय ने कमान संभाली। सबसे पहले बोकारो स्टील प्लांट में बनने वाली आक्सीजन को अस्पतालों तक पहुंचाने के लिए रेलवे के लिए ग्रीन कारीडोर बनाया गया। सडक़ों पर भी ग्रीन कारीडोर बनाकर ऑक्सीजन अस्पतालों तक पहुंचाने के काम में तेजी लाई गई। अब प्रधानमंत्री कार्यालय ने तय किया है कि भारत के सभी करीब 551 जिला अस्पतालों में पीएम केयर फंड के पैसे से ऑक्सीजन प्लांट लगेंगे।

awarn-c

वैसे कोरोना की महामारी की मार ने निचले स्तर पर काम करने वाली नौकरशाही पर भी सवाल उठाया है। पीएम केयर फंड से राज्यों को वेंटीलेटर खरीद कर दे दिए गए। लेकिन बिहार जैसे कुछ राज्यों में ज्यादातर वेंटीलेटर खुलने का इंतजार करते रहे। दरअसल भारत में एक सोच है। नौकरशाही का एक बड़ा तबका अपनी जिम्मेदारी निभाने में दिलचस्पी नहीं लेता। भारतीय नौकरशाही सब चलता है की मानसिकता से ग्रस्त रहता है। यही वजह है कि कोरोना काल में छोटे शहरों के अस्पतालों में वेंटीलेटर होने के बावजूद काम नहीं कर पा रहे है।

कोरोना के वैक्सीन की खोज ने भारत की जो साख दुनिया में बनाई थी। वैक्सीन डिप्लोमेसी के जरिए कनाडा, ब्राजील, भूटान, नेपाल, मालदीव, श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान तक को वैक्सीन भेजकर भारत ने अपना जो लोहा मनवाया था, कोरोना की दूसरी लहर के चलते वह ध्वस्त हो गया। बहरहाल भारत को अब ऑक्सीजन देने के लिए जर्मनी, सिंगापुर जैसे देश सामने आए हैं। इससे उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में हम संकट पर काबू पा लेंगे।

भारत की जनसंख्या इन दिनों करीब 135 करोड़ है। इतनी बड़ी जनसंख्या को लोकतांत्रिक समाज में अनुशासित रख पाना और सबके लिए स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करा पाना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है। ऐसे में जनता की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह कोरोना जैसी खतरनाक महामारी से खुद को बचाने के लिए आगे आए। लेकिन दुर्भाग्यवश इस मोर्चे पर बहुत कमी दिखी। यह भी एक बड़ी वजह रही कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान देश के स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा चरमराता नजर आ रहा है।

वैसे जब कोरोना शुरू हुआ था तो देश में पीपीई किट तक नहीं बनते थे। वेंटिलेटर और मास्क आदि के निर्माण के क्षेत्र में भी हम फिसड्डी थे। लेकिन कोरोना काल में केंद्र सरकार ने इन क्षेत्रों पर ध्यान फोकस किया। संसद में दिए स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के एक बयान के मुताबिक, मार्च 2020 की तुलना में अब समर्पित आइसोलेशन बिस्तरों की संख्या में 36.3 गुना वृद्धि और समर्पित आईसीयू बिस्तरों की संख्या 24.6 गुना से अधिक हो चुकी है। उस समय अपेक्षित मानकों के पीपीई का कोई स्वदेशी विनिर्माता नहीं था, अब देश इसका बड़े पैमाने पर निर्माण करने और साथ ही निर्यात करने में भी सक्षम है।

awarn-d

सरकारी अमला मौतों को आंकड़े में देखता है। वह उसकी मजबूरी भी है। जब तक मौत आंकड़ा होती है, तब तक उसकी गंभीरता और भयावहता में कमी होती है। लेकिन हर अकेली मौत परिवार के संसार के उजड़ जाना होती है। यानी इकाई के रूप में हर मौत परिवार और समाज के लिए भयावह होती है। यही भयावहता ही है कि आज भारत सरकार को लोगों की जान बचाने के लिए लगातार आगे आना पड़ा है। इस काम में सशस्त्र सेनाओं और अर्धसैनिक बलों के अवकाशप्राप्त चिकित्साकर्मियों तक को भी मैदान में उतारने की तैयारी है। चूंकि उनके पास चिकित्सा कार्य की दक्षता है और वे एक खास अनुशासनिक दायरे के आदी रहे हैं। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि उनकी सहायता से देश के स्वास्थ्य का ढांचा कम से कम कोरोना काल के लिए मजबूत होगा और लोगों की सेवा करने में सक्षम होगा। वैसे भी जब से कोरोना की दूसरी लहर के मामलों में तेजी आई है, सेना को मैदान में उतारने की मांग हो रही है। वैसे एयरफोर्स के विमान और हेलीकॉप्टर ऑक्सीजन की ढुलाई कर ही रहे हैं। अब सेना के रिटायर्ड चिकित्साकर्मी और डॉक्टर अपने अनुशासन और सेवा कार्य से कोरोना काल में राहत देने की तैयारी में हैं।

 

उमेश चतुर्वेदी

Leave a Reply

Your email address will not be published.