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भगवान रामचंद्र के जीवन में पशु-पक्षियों की भूमिका

भगवान रामचंद्र के जीवन में पशु-पक्षियों की भूमिका

भगवान रामचंद्र जी के व्यक्तित्व का वर्णन मानवीय अनुभीतियों, आदर्शों और सर्वगुण संपन्न व्यक्ति के रूप में किया गया है। भगवान राम अवतार में उनके शक्ति और पराक्रम के अलावा उनके आदर्श जीवन से बहुत बड़ी सीख ही सीख  मिलती है। उनमें दया और करुणा की जो गहराई मिलती है वह अद्भुत और वंदनीय है। यही कारण है कि राम कथा में पशु पक्षियों की भूमिका सर्वश्रेष्ठ है। उनके  वनवासी जीवन में  पशु-पक्षी सबसे बड़े मित्र रहे हैं। पशु पक्षियों से वह बात करते थे उन्हें वही सम्मान देते थे जो सबको देते थे।

मानवीय अनुभूतियों और चेतना के प्रतीक

धर्म मानवता का विस्तार करता है, मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी भी उसकी करुणा में आश्रय पाते हैं। भारतीय संस्कृति में पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम, सह-अस्तित्व और वहां तक कि उनकी पूजा की भी परंपरा रही है। इस बात का वर्णन  राम कथा में खूब मिलेगा। भगवान राम ने मानवता और जीवन मूल्यों का इतिहास रचा। राम कथा में पशु-पक्षियों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। वनवास के दौरान अनेक पशु पक्षियों को भगवान राम की मित्रवत अनुकंपा मिली थी जैसे जटायु, सुग्रीव, हनुमान, हिरणआदि  रामायण में व्यापक उल्लेख  हैं।

श्रीराम के आदर्शों पर पावन रामनवमी के प्रति अटूट श्रद्धा और प्रेम

यह पर्व भारत में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। रामनवमी के दिन ही चैत्र नवरात्रि  की समाप्ति भी हो जाती है। हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान श्रीराम जी का जन्म हुआ था। अत: इस शुभ तिथि को भक्त लोग रामनवमी के रूप में मनाते हैं एवं पवित्र नदियों में स्नान करके पुण्य के भागीदार होते है। रामनवमी का त्यौहार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाया जाता है। ग्रंथों में श्रीरामचन्द्र जी का जन्म चैत्र शुक्ल की नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र तथा शास्त्रों के अनुसार त्रेतायुग में रावण के अत्याचारों को समाप्त करने तथा धर्म की पुन: स्थापना के लिये भगवान विष्णु ने मृत्यु लोक में श्री राम के रूप में अवतार लिया।

रामकथा में गिद्धराज जटायु की प्रेरक भूमिका

भगवान राम सीता के कहने पर कपट-मृग मारीच को मारने के लिये गये और लक्ष्मण भी सीता केadhyatma3 विशेष आज्ञा से प्रभावित होकर राम को खोजने के लिये निकल पड़े। दोनों भाइयों के चले जाने के बाद आश्रम को सूना देखकर लंका के राजा रावण ने सीता का हरण कर लिया और बलपूर्वक उन्हें रथ में बैठाकर आकाश मार्ग से लंका की ओर चल दिया। सीताजी ने रावण की पकड़ से छूटने का पूरा प्रयत्न किया, किंतु असफल रहने पर करुण विलाप करने लगीं। उनके विलाप को सुनकर जटायु ने रावण को ललकारा। ग़ृद्धराज जटायु का रावण से भयंकर संग्राम हुआ, लेकिन अन्त में रावण ने तलवार से उनके पंख काट डाले। जटायु मरणासन्न होकर भूमि पर गिर पड़े और रावण सीता जी को लेकर लंका की ओर चला गया। भगवान श्रीराम ने जटायु के शरीर को अपनी गोद में रख लिया। उन्होंने पक्षीराज  के शरीर की धूल को अपनी जटाओं से साफ किया। जटायु ने उनके मुख-कमल का दर्शन करते हुए उनकी गोद में अपना शरीर छोड़ दिया। यह हृदय विदारक घटना मनुष्य और पशु प्रेम के गहराई को इंगित करती है जहां पर एक पक्षी की मानवीय चेतना ने अपने प्राण गवा कर दूसरे की रक्षा करने के लिए अंतिम क्षण तक संघर्ष किया। मानव और पशु के संबंधों की इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है।

लंका पर विजय पाने में गिलहरी की भूमिका

यह प्रेरक प्रसंग उस समय का है जब पूरी सेना रामसेतु बनाने के कार्य व्यस्त थी, उसी समय लक्ष्मण ने भगवान राम को काफी देर तक एक ही दिशा में निहारते हुए देख पूछा भैया आप क्या देख रहें इतनी देर से? भगवान राम ने इशारा करते हुए बताया कि वो देखो लक्ष्मण एक गिलहरी बार-बार समुद्र के किनारे जाती है और रेत पर लोट-पोट करके रेत को अपने शरीर पर चिपका लेती है। जब रेत उसके शरीर पर चिपक जाता है फिर वह सेतु पर जाकर अपना सारा रेत सेतु पर झाड़ आती है। वह काफी देर से यही कार्य कर रही है। लक्ष्मण जी बोले प्रभु वह समुन्द्र में क्रीड़ा का आनंद ले रही है और कुछ नहीं। लेकिन भगवान रामने कहा इसकी श्रद्धा और सहयोग सेतु बनाने के लिए है जिसमें प्रेम और मानवता है जो महान है। उन्होंने गिलहरी के इस सहयोग के लिए उसकी सराहना की और  गिलहरी को पास बुलाया। भगवान राम ने उसके पीठ पर हाथ फेरा और उससे पांच धारियां बन गई। तभी से गिलहरी का भगवान का साथ देने के कारण वह दुनिया भर के लिए आदर्श और उदाहरण बन गयी। भगवान राम का स्पर्श पाते ही गिलहरी का जीवन धन्य हो गया।

लंका पर चढ़ाई में पशु-पक्षियों का योगदान

भगवान राम ने वानर सेना की मदद से लंका पर चढ़ाई कर रावण की सेना से भीषण युद्ध  कर विजय प्राप्त की थी। दस दिनों तक चले इस युद्ध  में वानर सेना ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया था। श्रीराम के प्रमुख सहयोगी थे  सुग्रीव, हनुमान, अंगद, जामवंत, नल और नील जिनसे  सभी परचित हैं लेकिन वानर सेना में इनके अलावा भी एक से एक महान योद्धा थे जिन्होंने रावण की शक्तिशाली सेना दस दिनों के अंदर ही धूल चटा दी थी। नल-नील वानर सेना में सेनापति और इंजीनियरभी थे। जिन्होंने सागर पर सेतु निर्माण में प्रमुख योगदान दिया। नल और नील को ऋषियों ने श्राप दिया था कि वे जिस चीज को छुएंगे वह पानी में नहीं डूबेगी। वानर सेना के इंजीनियर जैसे नल-नील की देख रेख में समुद्र पर सेतु का निर्माण हुआ। जामवंत जी  रीछ सेना के सेनापति एवं प्रमुख सलाहकार थे। वह कुशल योद्धा के साथ ही मचान बांधने और सेना के लिए रहने की कुटिया बनने में भी कुशल थे। इस प्रकार अंगद, नल, नील, विविध, केसरीसुत, बाली, हनुमान सुग्रीव, सभी लोग वानर सेना के महान सैनिक थे।

अश्वमेघ यज्ञ में घोड़े का सम्मान

adhyatma2श्रीराम  ने जो अश्वमेघ यज्ञ किया था, और उसमे जो यज्ञ का घोड़ा छोड़ा गया था, उसके पूर्वजन्म का वर्णन तब आता है, जब प्रभु श्रीराम अश्वमेघ यज्ञ का समापन कर रहे होते हैं। तभी महर्षि वशिष्ठ को अभिमंत्रित करते है और श्री रामचंद्र तथा माता सीता को भी उसे अभिमंत्रित कराते हैं, ताकि यज्ञ अश्व (घोड़ा) को पवित्र किया जा सके। लेकिन तभी विचित्र घटना घटती हैं। प्रभु श्रीराम यज्ञ के लिए चयनित  घोड़े से कहते हैं, हे श्रेष्ठ आत्मा, इस यज्ञ मंडप मे उपस्थित सभी श्रेष्ठजनों के सामने तुम मुझे पवित्र करो, और ऐसा कहकर प्रभु श्रीराम जी माता सीता सहित उस घोड़े को स्पर्श करते हैं। इस घटना को देखकर वहां उपस्थित सभी लोग कहने लगते है कि जिस प्रभु श्रीराम का मात्र नाम लेने भर से समस्त पाप नष्ट हो जाते है, वें प्रभु रामचंद्र जी ये क्या कह रहे हैं। अब यह तुच्छ पशु घोड़ा प्रभु श्रीराम को पवित्र करेगा। प्रभु श्रीराम यह सारी बातें समझ गए थे और उन्होंने इसका समाधान कर दिया। प्रभु श्रीराम ने घोड़े को स्पर्श किया। श्रीराम का स्पर्श पाते ही वह घोड़ा पशुरूप का परित्याग करके तुरंत दिव्यरूप धारण कर लिया। जिसे देखकर वहां उपस्थित सभी देवगण एवं नगरवासी आश्चर्यचकित हो गए।

राम के जीवन में पशु-पक्षियों की भूमिका

सीता हरण के बाद भगवान श्रीराम को भटकते जंगलों में खोजते फिरते हुए वन के पशु-पक्षियों से वह पूछते थे कि ‘हे खग मृग हे मधुकर श्रेनि, तुम देखि सीता मृग नैनी’। आगे जाने पर रास्ते में गिद्धराज जटायु रावण द्वारा मारे जाने पर अधमरा होकर जमीन पर तड़प रहे थे। गिद्ध राज रावण द्वारा सीता हरण से संबंधित बातों को बताकर श्रीराम के गोद में वह अपनी मानवीय भूमिका निभाते-निभाते शरीर त्याग दिए जो पशु-पक्षी प्रेम का इतिहास बन गयी।

 

गिरीश जयंतीलाल शाह

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