ब्रेकिंग न्यूज़ 

भारतीयता को बढ़ाओ

भारतीयता को बढ़ाओ

हे ईश्वर! पैकेटबंद खाद्य पदार्थ मैगी पर एक बार फिर नया विवाद उभर आया है जिसे हर आयुवर्ग के करोड़ों भारतीय चाव से खाते हैं। यह हर शहरी घर, फौजी कंटीन, सड़क किनारे ढाबों, स्कूल कंटीन हर जगह आपको मिल जाती है। हमारे वैदिक ऋषियों ने कहा है कि किसी की भोजन की आदतें जान लें तो यह जाना जा सकता है कि उसका आचार-विचार कैसा होगा। यानी कथित तौर पर नुकसानदेह पैकेटबंद मैगी खाने से भारतीयों पर घातक असर हुआ है, जिसके नमूनों में मोनो सोडियम ग्लूटामेट (एमएसजी) और शीशे की अतिरिक्त घातक मात्रा पाई गई है। शुक्र है कि नरेंद्र मोदी ने यह बात नहीं कही, वरना मैगी पर सेकुलर होने का ठप्पा लगा दिया जाता। उदय इंडिया उत्तर प्रदेश के खाद्य सुरक्षा और दवा प्रशासिनक अधिकारी वी.के. पांडेय को सलाम करती है, जिनकी कोशिशों से हुए परीक्षणों में मैगी में शीशे की मात्रा ”घातक स्तर से काफी अधिक’’ पाई गई। इस साहसिक अधिकारी को ताकतवर बहुराष्ट्रीय कंपनी नेस्ले का कच्चा चिट्ठा खोलने में करीब साल भर लग गए। पांडेय ने 10 मार्च 2014 को बाराबंकी की एक दुकान से मैगी के नमूने इकट्ठे किए थे। फिर, गोरखपुर और कोलकाता की प्रयोगशालाओं में परीक्षण के आधार पर हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में हरोली में नेस्ले की नागल कानन औद्योगिक इकाई, दिल्ली स्थित नेस्ले इंडिया लिमिटेड और कंपनी के एफएमसीजी मैनेजरों के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई। एक रिपोर्ट भारतीय खाद्य सुरक्षा व मानक प्राधिकरण में भी सौंपी गई, जो मैगी के बारे में फैसला करेगी कि उस पर पूरी पाबंदी लगानी चाहिए  या नहीं।

गौरतलब है कि कोलकाता की प्रयोगशाला में स्वाद बढ़ाने वाले एमएसजी की अतिरिक्त मात्रा की पुष्टि हुई है। यही नहीं, मैगी के नमूनों में प्रति दस लाख में 17 शीशे की मात्रा पाई गई है, जबकि इसकी मान्य सीमा प्रति दस लाख में 0.01 है। निश्चित रूप से खाद्य प्रसंस्करण विभाग और मंत्रालय को दोषी ठहराया जाना चाहिए, जो आज तक इसका पता लगाने और कार्रवाई करने में नाकाम रहा है। क्या इस मंत्रालय और विभाग के मोदी सरकार के मंत्री रामविलास पासवान इसे लेकर सचेत हैं? हां, पासवान ने अभी हाल में कहा है कि वे भोज्य पदार्थों में जहरीले तत्वों की रोकथाम के लिए अधिक कड़े कानून लाएंगे। बेशक, यही वक्त है जब हमारी सरकार देश में खाद्य सुरक्षा के मानकों पर कड़ा रुख अपनाए और सचेत रहे। संबंधित विभागों की लापरवाही के कारण ही देश में मिलावटी खाद्य और पेय पदार्थों से अनेक मौतें होती रही हैं। मेरी दलील है कि हम कभी इतिहास से सबक नहीं लेते और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई राजनीति से प्रेरित होती है। उम्मीद है कि मैगी के मामले के बाद पैकेटबंद भोज्य पदार्थों के साथ तमाम तरह के घातक पदार्थों से परदा उठेगा।

पिछले सौ साल में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जब आक्रांताओं ने हमारी समृद्ध संस्कृति, परंपरा और रीति-रिवाजों पर हमला बोला है। विदेशी एनजीओ, बहुराष्ट्रीय कंपनियां और राजनैतिक संगठनों की गहरी साजिश का हिस्सा रहा है कि हमारी विचारधारा, भोजन की आदतें, इतिहास को पूरी तरह बदल दिया जाए। वे हमारी कृषि व्यवस्था, औषधीय प्रणाली सब कुछ नष्ट करके आधुनिक व्यवस्था कायम करने की कोशिश करते रहे हैं जिससे उनको लाभ हो। हमारे मन से भारतीयता पर गर्व करने की भावना मिटाने में सौ साल लगे। लेकिन इस प्रक्रिया में हम भारतीयों ने भी अपनी व्यवस्थाओं को नष्ट करने में अहम भूमिका निभाई है। सबसे पहले हमारा संयुक्त परिवार टूटा। फिर एकल परिवारों में भी पति और पत्नी दोनों कामकाजी हो गए तो पैकेटबंद या फास्ट फूड पर जोर बढ़ गया। लेकिन पैकेटबंद भोज्य पदार्थों की पैकेजिंग के मामले में भारतीय कंपनियां बहुराष्ट्रीय कंपनियों से मुकाबला नहीं कर सकीं। जब ब्रांड बिकने लगे तो मां-बाप उसे ऑनलाइन ऑर्डर देने लगे क्योंकि घरों में खाना बनाने की फुर्सत ही नहीं है। मां-बाप के पास बच्चों के लिए वक्त नहीं है तो ताजा भोजन की कौन चिंता करे।

आधुनिक दौर में ताजगी तो महज स्प्रे छिड़कने का नाम ही होकर रह गई है, जो बाजार से खरीदी जा सकती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब हमारी मां और दादी हमें गरम-गरम दाल-भात, रोटी, राजमा, कढ़ी, इडली, डोसा, सब्जियां, खीर, गुलाब जामुन वगैरह परोसती थीं तो कैसी ताजगी का एहसास होता था! हमारे देश में हर मौसम के अलग-अलग व्यंजन होते हैं और हर उत्सव के सुस्वाद प्रसाद अलग होते हैं। हमारे परिवारों में रसोई की पवित्रता पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाता है। आज भी गांवों में कोई स्त्री बिना नहाए रसोई में नहीं जाती। रसोई की साफ-सफाई और पवित्रता का विशेष ख्याल रखा जाता है। भोजन पकाने के पहले हमारी माताएं रसोई में पहले दीपक जलाती हैं और फिर भोजन पकने पर पहले उसे थोड़ा-सा अग्नि देव को समर्पित किया जाता है। हर भारतीय घर में भोजन प्रसाद के रूप में परोसा जाता है और पके भोजन को कोई थोड़ा भी फेंकता नहीं है। भोजन को बरबाद करना अपवित्र माना जाता है।

हमारी दादी हमेशा भोजन पहले गोमाता, पक्षियों और दूसरे पशुओं के लिए निकाल दिया करती थीं। हमारे वैदिक मूल्यों में इसका खास महत्व है। लेकिन इन दिनों हमारे बच्चे  इतने सौभाग्यशाली नहीं हैं कि अपनी मां के हाथ का ही हमेशा खाना खाएं। लंबे समय में इसका बुरा असर पडऩा तय है। अगर चाऊमिन, बर्गर, पिज्जा, सैंडवीच भारत में लोकप्रिय हो सकते हैं तो उसका भारी मुनाफा भारतीय बाजार से विदेशों को जा रहा है। ऐसे भारतीय व्यंजनों को बाजार में क्यों नहीं उपलब्ध कराया जा सकता। हमारी आवभगत उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को इस बारे में अधिक अनुसंधान की दरकार है। देश के राजमार्गों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के रेस्तरां की शृंखलाएं हजारों की तादाद में दिख सकती हैं तो हमारे रेस्तरां उनसे होड़ क्यों नहीं कर सकते? भारत में खाद्य और पेय पदार्थों का बड़ा भारी बाजार है इसलिए उदार अर्थव्यवस्था में बहुराष्ट्रीय कंपनियां तो उसका लाभ उठाएंगी ही।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

 

Малий ВладиславЦСКА ПЕСЧАНКА

Leave a Reply

Your email address will not be published.