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यज्ञोपवीतं परमं…बलमस्तु तेज:

यज्ञोपवीतं परमं…बलमस्तु तेज:

हिन्दू धर्म में जनेऊ धारण करना महत्वपूर्ण संस्कारों में से एक है। जनेऊ धारण करने की परम्परा बहुत प्राचीन है। इसे ‘उपनयन संस्कार’ या ‘यज्ञोपवीत संस्कार’ भी कहते हैं। ‘उपनयन’ का अर्थ है, ‘ईश्वर और ज्ञान के सन्निकट ले जाना।’ हिन्दू धर्म के 24 संस्कार होते हैं। इन 24 संस्कारों में ही उपनयन संस्कार भी आता है, जिसके अंतर्गत ही जनेऊ पहना जाता है। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। अर्थात इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि, वह बाएं कंधे के ऊपर रहे। जनेऊ में मुख्यरूप से तीन धागे होते हैं। प्रथम यह तीन सूत्र त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं। द्वितीय यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं और तृतीय यह सत्व, रज और तम गुणों का प्रतीक है। चतुर्थ यह गायत्री मंत्र के तीन चरणों का प्रतीक है। पंचम यह तीन आश्रमों का प्रतीक है। धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि जनेऊ धारण करने से शरीर शुद्घ और पवित्र होता है। शास्त्रों के अनुसार आदित्य, वसु, रुद्र, वायु, अग्नि, धर्म, वेद, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में माना गया है। अत: उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। आचमन अर्थात मंदिर जाने से पूर्व या पूजा करने के पूर्व जल से पवित्र होने की क्रिया को आचमन कहते हैं।

यज्ञोपवीत धारण करने वाले व्यक्ति के लिए सभी नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। एक बार जनेऊ धारण करने के बाद मनुष्य इसे उतार नहीं सकता। मैला होने पर उतारने के बाद तुरंत ही दूसरा जनेऊ धारण करना पड़ता है। जनेऊ की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है, कि जनेऊ धारण करने वाले व्यक्ति को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, छ: अंग, छ: दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती है। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी, साहित्य कला, दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि। इन सभी विद्याओं में इंसान को महारथ हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए।

जनेऊ धारण करते वक्त बालक के हाथ में एक दंड होता है। वह बगैर सिला एक ही वस्त्र पहनता है। गले में पीले रंग का दुपट्टा होता है। मुंडन करके उसके सिर पर शिखा रखी जाती है। पैर में खड़ाऊ होते है। मेखला और कोपीन पहनाई जाती है। जनेऊ धारण करने के लिए एक यज्ञ किया जाता है, जिसमें जनेऊ धारण करने वाला बालक अपने संपूर्ण परिवार के साथ भाग लेता है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है।

जनेऊ के कुछ नियम होते हैं। जनेऊ धारण करने वालों के लिए इन नियमों का पालन अनिवार्य होता है। यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन से पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए। यदि यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या 6 माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए। खंडित जनेऊ शरीर पर नहीं रखना चाहिए। धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो बदल देना उचित है। जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है। यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धोना चाहिए। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है। देव प्रतिमा की मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि नहीं बांधने चाहिए। इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें। बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएं, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए।

जो लोग जनेऊ धारण करते हैं, वे सभी प्रकार नकारात्मक शक्तियों से बचे रहते हैं। ऐसे लोगों पर बुरी नजर का असर भी नहीं होता है। बुरे सपनों का भय नहीं सताता है। व्यक्ति साफ-सफाई से रहता है, तो सभी देवी-देवताओं की विशेष कृपा प्राप्त होती है। स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं तो व्यक्ति की उम्र भी बढ़ती है।

                प्रीति ठाकुर

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