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सेवा ही सतमार्ग

सेवा ही सतमार्ग

मनुष्य के अंदर रहने वाले सदगुणों में सेवा अति उत्तम है। सेवा एक ऐसा गुण हैं, जो मनुष्य को खुद से परिचित करवाता है। हम जितनी आसानी से सेवा शब्द का उच्चारण करते हैं या जितनी आसानी से समझ लेते हैं, वास्तव में सेवा उतनी आसान नहीं होती है। असली सेवा करने वाले इंसान को कई  कठिन  परिस्थतियों का सामना करना पड़ता है। सब कुछ सहकर दृढ़ मन से किसी के लिए कुछ करना वास्तविक रूप से बहुत कठिन है।

ज्यादातर ऐसा देखा जाता है कि व्यक्ति सिर्फ  अपनी वाह-वाही पाने के लिए सेवा करते हैं। निष्पक्ष भाव से कि गई सेवा का कोई मूल्य नहीं होता है। जब हम किसी के लिए कुछ करते हैं तो हमारे मन में पहला भाव ये आता है कि दुनिया वाले हमें देख रहे हैं या नहीं। हम जब भी किसी के लिए कुछ करते हैं, तो हमारी उससे अपेक्षा बढ़ जाती है। आजकल लोग सेवा के नाम पर नाम और पैसा कमाने में लगे हैं। धनी घर के लोग गरीब, निसहय लोगों की स्थिति का उपयोग करके अपना भविष्य उज्जवल बना लेते हैं। ऐसे लोगों की दुरवस्था उनकी अपनी स्वछावस्था बन जाती है। अपने स्वार्थ के लिए  जो सेवा की जाती है, वो सेवा नहीं होती उसे स्वार्थ माना जाता है।

दुनिया में ऐसे बहुत से लोग होते हैं, जिनको सचमुच सेवा की जरूरत है। ऐसे लोगों के लिए निस्वार्थ भाव से कुछ करने को सच्ची सेवा कहते हैं। ईश्वर सिर्फ सच्ची और स्वच्छ भावना में ही बसते हैं। सेवा एक स्वच्छ भाव है। सेवा करने के लिए समय, सुविधा, परिस्थतियों का इंतजार करना नहीं चाहिए। रास्ते में जाते समय या अपने कार्य स्थल या परिवार में अपनों के बीच रह कर भी यह किया जा सकता है। हर अच्छे संस्कार हम अपने परिवार से बचपन से ही सिखते हैं। इसी तरह सेवा करने का अभ्यास एक छोटा बच्चा अपने अनुसार करना सीख लेता है। धीरे-धीरे ये अभ्यास उसके आनन्द का कारण बन जाता है।

सेवा करने से मन कोमल बना रहता है। कोमल मन में परमात्मा वास करते हैं। निस्वार्थ सेवा अहंकार को पनपने नहीं देता। मन से कि गई सेवा अपने अन्दर धैर्य भी बढ़ाती है। ईश्वर प्राप्ति के अनेक मार्गों में ये भी एक मार्ग है। हर आत्मा में परमात्मा को देखने का प्रयास करना चाहिए। जब हम हर आत्मा को श्रेष्ठ मान लेते हैं, तब उनके लिए कुछ करने में हमें कोई परेशानी नहीं होती। समदृष्टि पनपने से ये आसान हो जाता है। हम अपनों के लिए कुछ करने में गर्व महसूस करते हैं। मां अपने बच्चे के लिए जितना भी करती है उसे उसका ध्यान भी नहीं रहता। लेकिन इतना कार्य और किसी के लिए करना या सोचना भी मंजूर नहीं करती। किसी के लिए अपने मन में बैर भाव रखने से हम सेवा में लीन नहीं हो पाते हैं। बैर हमें लोगों से दूर करता है और सेवा जैसे पवित्र मार्ग पर भी हमें चलने से रोकता है। अपना पराया न देखते हुए किसी के लिए कुछ भी करने के लिए हमेेें हमेशा तत्पर रहना चाहिए। सेवा भाव मन में रखने वाले व्यक्ति को ईश्वर किसी भी रूप में मिल जाते हैं और ऐसे व्यक्ति को परमान्नद प्राप्ति का सौभाग्य मिलता है।

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