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वो प्रधानमंत्री कौन हैं?

वो प्रधानमंत्री कौन हैं?

इन दिनों माफिया डॉन दाउद इब्राहिम फिर चर्चा में है। इस चर्चा के साथ फिर यह सवाल उठ रहा है कि इतने साल गुजर जाने के बाद भी भारत अब तक दाउद को क्यों गिरफ्तार नहीं कर पाया और न ही उसके खिलाफ कोई कार्रवाई कर पाया। भारत पर एक के बाद एक पाकिस्तान के आतंकी हमले होते रहे, मगर भारत कभी उसका जवाब नहीं दे पाया। हम केवल पाकिस्तान को धमकियां देकर चुप हो जाते हैं। कारण यह है कि हमने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारी है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने इस देश में न जाने कितने आतंकी हमले करवाए। न जाने कितने आतंकवादी भारत में आतंकवादी करतूते करके पाकिस्तान में शरण लेते हैं। मुंबई बमकांड का सूत्रधार दाऊद इब्राहिम और 26 नंवबर के हमले का मास्टरमाइंड हाफिज सईद पाकिस्तान में है, लेकिन भारत जैसा महाशक्ति बनने का सपना देखने वाला देश उनका बाल भी बांका नहीं कर पाता। उन्हें सही-सही पता तक नहीं होता कि दाऊद है कहां। क्यों पाकिस्तान के मामले में भारत की सारे खुफिया ऑपरेशन फेल हो जाते हैं? मोसाद जैसा ऑपरेशन कर दाऊद जैसे आतंकी को पकड़ लाने वाले ऑपरेशन की बात तो छोड़ ही दीजिए, कभी-कभी तो लगता है कि सीआईए, मोसाद या एमआई 16 जैसे एजेंसियों की तरह दुस्साहसी अभियान चलाना भारत के बस की बात नहीं।

यह भले ही आज की हकीकत हो, लेकिन बहुत से जानकारों का कहना है कि कभी हमारे देश में रॉ जैसी खुफिया एजेंसी थी जो ऐसे अभियान करने में सक्षम थी। वह भारतीय खुफिया एजंसियों का स्वर्णयुग था। कई दशकों की मेहनत से इंदिरा गांधी ने रॉ को खड़ा किया था जिसने कभी काहूटा, सिक्किम, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे कोवर्ट ऑपरेशनों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया था। लेकिन, कई दशकों की इस मेहनत को बाद के कुछ प्रधानमंत्रियों ने चौपट कर दिया। उर्दू का एक शेर है, ‘लम्हों ने खता की तो सदियों ने सजा पाई’। इन प्रधानमंत्रियों के गलत फैसलों का फल हमारा देश आज तक भुगत रहा है। हाल ही में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने एक बार फिर इस पुराने घाव को कुरेद दिया है। एक बार फिर पुरानी बहस को छेड़ दिया कि कैसे हमारे राजनेताओं ने हमारी रॉ जैसी खुफिया एजेंसी को बधिया  बना दिया।

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रक्षा मंत्री पर्रिकर ने कहा कि पाकिस्तान में खुफिया नेटवर्क यानी डीप एसेट तैयार करने में 20 से 30 साल लग जाते हैं। कुछ ऐसे प्रधानमंत्री हुए हैं, जिन्होंने इस तरह के डीप एसेट को खतरे में डाल दिया था। उनके इस बयान ने राजनीति में बवाल पैदा कर दिया। यह बयान बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब तक खुफिया हलकों में दबी जुबान से हमारे कुछ प्रधानमंत्रियों द्वारा हमारी दुस्साहसी खुफिया एजेंसी के बारे में लिए गये आत्मघाती फैसलों पर चर्चा होती थी, लेकिन किसी रक्षा मंत्री ने इस तरह पूर्व प्रधानमंत्री के फैसलों पर सवाल नहीं उठाया। विपक्षी कांग्रेस ने तो उन्हें इस प्रधानमंत्री का नाम बताने या फिर माफी मांगने को कहा, लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों को लगता है कि कांग्रेस बिना वजह ही परेशान हो रही है। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने भले ही पाकिस्तान में भारतीय खुफिया तंत्र को कमजोर करने के लिए जिम्मेदार पूर्व प्रधानमंत्रियों का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया, लेकिन खुफिया एजेंसियों के अनुसार, उनका इशारा पूर्व प्रधानमंत्री आई.के. गुजराल और मोरारजी देसाई की तरफ है।

यूं तो पूर्व कॅामरेड रहे गुजराल कांग्रेसी मंत्री भी रहे, लेकिन वे जब प्रधानमंत्री बने तब कांग्रेस समर्थित जनता दल सरकार के प्रधानमंत्री थे। वर्ष 1997-98 में हुए एक फैसले से खुफिया एजेंसी रॉ और आईबी के अधिकारियों में आज भी नाराजगी है। खुफिया अधिकारी पर्रिकर के बयान को तर्कसंगत करार दे रहे हैं। खुफिया विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि पाकिस्तान के साथ दोस्ती बढ़ाने के पक्षधर गुजराल ने कई ऐसे फैसले लिए जो देश के लिए घातक साबित हुए। उनमें सबसे प्रमुख था रॉ के पाकिस्तान में कोवर्ट ऑपरेशन बंद कराना। गुजराल सिद्धांत (डॉक्ट्रिन) का सबसे बड़ा खामियाजा पाकिस्तान में मजबूत रॉ के नेटवर्क को भुगतना पड़ा, जिसे कूटनीतिज्ञ आज भी बहुत बड़ी गलती मानते हैं। भारत ने पाकिस्तान में जो खुफिया तंत्र का जाल बिछाया वह एक झटके में खत्म हो गया। वैसे कुछ खुफिया अफसर मानते हैं कि रॉ की दो बार हत्या हुई, एक मोरारजी देसाई के समय और दूसरा गुजराल के समय।

कई खुफिया अफसरों ने अपनी पुस्तकों और इंटरव्यू में गुजराल के फैसले को गलत ठहराते हुए कहा है कि गुजराल के फैसला के कारण पाकिस्तान में रॉ की गतविधियों को बहुत नुकसान पहुंचा। भारतीय खुफिया एजेंसी के पूर्व अधिकारी आर.के. यादव ने एक इंटरव्यू में कहा था, ”गुजराल पाकिस्तान से आए हुए शरणार्थी थे। जब वो यहां के प्रधानमंत्री बने तो उनका भी पाकिस्तान प्रेम कुछ ज्यादा ही उमड़ रहा था, क्योंकि पुरानी धरती से उनका लगाव था। इसी बैकग्राउंड को मैं देखता हूं कि रॉ के जो ऑपरेशन उस वक्त चल रहे थे पाकिस्तान में, उन्होंने सब बंद करवा दिए। इससे देश को बहुत बड़ा धक्का लगा। उनकी भूमिका को मैं शक के दायरे में लाता हूं कि उनको ऐसा नहीं करना चाहिए था।’’ किताब में यह भी लिखा है कि गुजराल की जान रॉ ने ही बचाई थी। उन पर भी आतंकवादियों का हमला होना था। गुजराल ने अपने ग्यारह महीने के कार्यकाल में रॉ के पाकिस्तान स्पेशल ऑपरेशन डेस्क को निष्क्रिय कर दिया था। इसकी वजह से वहां से खुफिया इनपुट आने लगभग बंद हो गए। इतना ही नहीं वहां चल रहे रॉ और आईबी के कई ऑपरेशन अचानक दिशाहीन हो गए। सूत्रों के मुताबिक इस गफलत में अपने कई एजेंट पहचान में आ गए और उनकी हत्या कर दी गई।

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भारत सरकार में अतिरिक्त सचिव रहे वी. रमन ने अपनी किताब ‘द काउ बॉयज ऑफ आर ऐंड डब्ल्यू : डाउन मेमोरी लेन’ में टिप्पणी की है, ”इंद्र कुमार गुजराल ने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर कुछ विवादास्पद कदम उठाए। पाकिस्तान से दोस्ती के चक्कर में उन्होंने ‘रॉ’ के पाकिस्तान संबंधी काम समेट लिए।’’ रमन लिखते हैं कि गुजराल से पूर्व सभी प्रधानमंत्रियों की राय यह रही कि पाकिस्तान शुरूआत से ही एक खास तरह की मानसिकता  से ग्रस्त है और भारत के प्रति उसका नजरिया उसी से तय होता है। इन प्रधानमंत्रियों का मानना था कि जब तक पाकिस्तान की यह मानसिकता नहीं बदलती, भारत को ईंट का जवाब पत्थर से देने की नीति पर चलना चाहिए। इस नीति के तहत अफगानिस्तान के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए गए और जब जरूरी हुआ, भारत हिट करने से नहीं चूका। राजीव गांधी ने इस नीति पर अमल किया और पंजाब में आईएसआई की दिलचस्पी कम हो गई, लेकिन 1989 से उसने कश्मीर में दखल बढ़ा दिया। गुजराल ने प्रधानमंत्री बनने के बाद ‘रॉ’ की पाकिस्तान यूनिट बंद करवा दी।

पाकिस्तान में रॉ के अप्रत्यक्ष ऑपरेशन बंद कराने के फैसले पर खुफिया हलकों में काफी बहस होती रही। कई अफसरों ने गुजराल को समझाने की भी कोशिश की कि कोवर्ट ऑपरेशन का आधार और क्षमता तैयार होने में लंबा समय लगता है, कई बार बीस-तीस साल लग जाते हैं। अभी यदि कोवर्ट ऑपरेशन रोक दिए गए तो यदि भविष्य में कभी सरकार ने कोवर्ट ऑपरेशन फिर चलाने का फैसला किया तो हमारे पास प्रशिक्षित और अनुभवी लोग नहीं होंगे। इसलिए यदि वे कोवर्ट ऑपरेशन्स के इतने खिलाफ हैं तो इन अभियानों को निलंबित करें न कि पूरी तरह से खत्म करें। लेकिन गुजराल किसी की बात को मानने को तैयार नहीं थे।

गौरतलब है कि कुछ महीनों बाद इसी रॉ ने जालंधर में गुजराल के काफिले पर पाकिस्तान संचालित हत्या के अभियान से  गुजराल की जान बचाई। लंदन के अति उच्च अधिकारी ने सूचना दी थी कि प्रधानमंत्री के काफिले पर हमला करने के लिए पांच आतंकवादियों का एक दस्ता आ रहा है। इसके बाद चौकसी बढ़ गई और उनकी उड़ान के दिल्ली पहुंचते ही उनका पीछा किया गया। जब उन्होंने पंजाब जाकर पहले से तय ठिकाने से अपने हथियार लिए तभी उन्हें पकड़ लिया गया।

वैसे आर. के. यादव ने गुजराल के साथ-साथ मोरारजी को भी कसूरवार ठहराया है। वे कहते हैं,  ”जब मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सत्ता में आई तो रॉ पर आरोप था कि रॉ ने देश के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप किया है। मोरारजी देसाई कुछ अडिय़ल किस्म के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने आर. एन. काव को कहा कि आप घर जाइए। नंबर टू के अधिकारी को उन्होंने कहा कि आप पाकिस्तान में जितने ऑपरेशन हो रहे हैं उनको खत्म कीजिए, बांग्लादेश में जो ऑपरेशन हो रहे हैं वह सब खत्म करिए। अधिकारी ने ऐसा करने से मना कर दिया तो उन्हें भी देसाई ने कहा कि आप भी घर जाइए। तीसरे को उन्होंने कहा कि स्ट्रेंथ को आप वन थर्ड खत्म कर दीजिए।’’

इसके अलावा 1977-79 के बीच मोरारजी देसाई ने रॉ के एक ऑपरेशन काहुटा को रोक कर ऐतिहासिक गलती की थी। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के एटमी कार्यक्रम के खिलाफ इस ऑपरेशन की इजाजत दी थी। हमारे एजेंटों ने काहुटा के खान रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों के बालों की वैज्ञानिक जांच से पता किया था कि वहां एटमी काम चल रहा है। इसकी कहानी बहुत दिलचस्प और रोमांचक है। ‘रॉ’ के एजेंटों में उस सैलून से कुछ बाल हासिल किए थे जहां वह पाक वैज्ञानिक बाल कटवाने जाता था। अधिकारी ने यह खुलासा भी किया कि देसाई ने पाक के पूर्व राष्ट्रपति जिया-उल-हक से कह दिया था कि भारत को उनके एटमी कार्यक्रम के बारे में पता चल गया है। अधिकारी के मुताबिक उसकी प्रतिक्रिया में पाक एजेंसी ने हमारे करीब छह एजेंटों को खोजकर कर मार दिया।

इंदिरा गांधी सरकार ने 1968 में रॉ का गठन किया था। जाने-माने खुफिया अधिकारी आर. एन. काव को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई। काव के जामने में रॉ ने कई उल्लेखनीय काम किए। दुनिया में इसकी तुलना केजीबी, सीआईए और मोसाद जैसे खुफिया संगठनों में की जाने लगी, लेकिन 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने रॉ को लगभग ठप कर दिया। विदेशों में इसके दफ्तर बंद कर दिए गये, बजट भी बहुत कम कर दिया गया। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि देसाई रॉ को इंदिरा गांधी का वफादार संगठन मानते थे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के कार्यकाल में भी रॉ को खासी तवज्जो दी गई, लेकिन बाद की सरकारों ने इसे अपनी प्राथमिकता से निकाल दिया। जयपुर बम धमाकों के वक्त राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार एम.के. नारायण ने भी यह स्वीकारोक्ति की थी कि पूरा खुफिया तंत्र विफल हो गया है। नारायण के बयान को लेकर काफी हो-हल्ला हुआ था। खुफिया तंत्र को मजबूत करने की बातें भी हुर्इं थीं, मगर हकीकत सामने है।

तब ‘रॉ’ का इतना असर था और काम करने की इतनी छूट थी कि बांग्लादेश युद्ध शुरू होने से पहले उसके बहुत ही भरोसेमंद एजेंट प्रेसिडेंट याहिया खान के दफ्तर में घुसपैठ कर चुके थे। इसका श्रेय शंकरन नायर को है, जो रामेश्वरनाथ काव के बाद ‘रॉ’ के चीफ बने। वह आईबी में अपनी सेवा के दौरान ही पाकिस्तान के खिलाफ बहुत महत्वपूर्ण काम कर चुके थे। उन्होंने पाकिस्तान में विभिन्न स्तरों पर अपने संपर्क सूत्र बना लिए थे। पाकिस्तान की वायु सेना ने 3 दिसंबर 1971 को सुबह आगरा, जोधपुर और कुछ अन्य हवाई अड्डों पर अचानक हमले किए। जिस तरह 1967 के युद्ध में इस्रायल ने मिस्र की वायु सेना को उठने तक का मौका नहीं दिया था, उसी तरह पाकिस्तानी वायु सेना भी कमाल करना चाहती थी, लेकिन वह नाकाम रही। आगरा हवाई अड्डे पर कुछ गड्ढे ही बन पाए। भारत का एक विमान भी नष्ट नहीं हो पाया। ऐसा क्यों हुआ, इसलिए कि नायर के एजेंट ने अग्रिम जानकारी दे दी थी।

गुजराल के बाद जब भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तब रॉ के अधिकारियों को उम्मीद थी कि कम से कम वे तो गुजराल के कोवर्ट ऑपरेशन न करने के फैसले को बदलेंगे, लेकिन तब उनके अचरज का ठिकाना नहीं रहा, जब वाजपेयी ने ऐसा नहीं किया। तब रॉ में कार्यरत कुछ अफसर वाजपेयी के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्र से मिले। उन्होंने बात ध्यान से सुनी फिर कहा कि मैं तो आपकी बात समझता हूं। आपको मुझे समझाने की जरूरत नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री कुछ और सोचते हैं। हमें प्रधानमंत्री की इच्छाओं का पालन करना पड़़ेगा।

इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि रॉ ने कई महत्वपूर्ण ऑपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया। एक ऑपरेशन बांग्लादेश का था। दूसरा सबसे बड़ा ऑपरेशन जो आर.एन. काव ने किया, वह था सिक्किम का विलय। तीन हजार वर्ग मील के क्षेत्र को बिना किसी दिक्कत के भारत में मिलाया था आर.एन. काव ने। यह एक रक्तहीन कूप था वह भी चीन की नाक के नीचे। चीनी फौजें उस वक्त सिक्किम की सीमा पर तैनात थीं। यह काम रॉ के सिर्फ चार ऑफिसर ने किया था। पांचवें को मालूम नहीं था। काव साहब के डिप्टी हुआ करते थे के. शंकरन नायर। उन्होंने बताया कि उन्हें इस बारे में मालूम नहीं कि काव साहब ने कैसे प्लान किया और किस तरह किया, लेकिन उन चार ऑफिसर ने दो-ढ़ाई साल के अंदर इस ऑपरेशन को पूरा किया, जिसमें बहुत कम जूनियर ऑफिसर शामिल थे। ये क्लोजली गाइडेड ऑपरेशन था, जिसमें चीन से बहुत बड़ा खतरा भी मोल लिया गया था।

जब पाकिस्तानी हमले हुए तब यह महसूस किया गया कि रॉ जैसी मजबूत खुफिया एजेंसी की सख्त जरूरत है जो पाकिस्तान को उसकी भाषा में जवाब दे सके, लेकिन मोरारजी और गुजराल जैसे प्रधानमंत्रियों के रॉ के बारे में लिए गलत फैसलों के कारण पाकिस्तान में रॉ का बिछाया हुआ जाल नेस्तनाबूद हो गया। उससे भी दुर्भाग्य की बात यह है कि हम पाकिस्तान के आतंकी हमले सहते रहे, लेकिन किसी प्रधानमंत्री को रॉ के कोवर्ट आपरेशनों को पाकिस्तान में मजबूत करने की जरूरत महसूस नहीं हुई। नतीजा सामने है। हमारे पास अब हमले झेलते रहने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारना शायद इसे ही कहते हैं।


1977 से ही रॉकी सारी क्षमतायें खत्म कर दी गईं –अजय साहनी


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रक्षा विशेषज्ञ अजय सहानी ने सतीश पेडणेकर को दिए इंटरव्यू में कही गई बातों के मुख्य अंश:-

पाकिस्तान के इस रवैये के बाद भारत विरोधी आतंकवादी संगठन पर किस तरह लगाम लगाई जा सकती है, या ये ऐसे ही चलता रहेगा?

देखिये जब आप कहीं लगाम लेकर आयेंगे, तब लगा पायेंगे ना, आपके हाथ में कोई औजार तो है ही नहीं लगाम लगाने के लिए। ये चीखते रहना कि हम उनके ऊपर बमबारी कर देंगे, हम जंग कर देंगे, ये सब तो होने वाला नहीं हैं, वो भी परमाणु देश है, आपका देश भी परमाणु देश है, इतनी तो हिम्मत हमारी है नहीं। हिम्मत तो छोडिय़े, क्षमता भी नहीं हैं। क्षमता की बात पहले आती है, हिम्मत बाद में आती हैं, क्योंकि क्षमता के बगैर हिम्मत बेवकूफी होती है। अब एक ही रास्ता बचता है गुप्त राजनीतिक और असैनिक लड़ाई का। वो इन नेताओं ने दशकों पहले ही खत्म करके रखा है, एजेंसियों को बिल्कुल कह दिया है कि आप कुछ नहीं करें, यह आपका काम नहीं हैं, आप यहां बैठ कर केवल सूचनाएं इकट्ठा करिए।

कोवर्ट ऑपरेशन क्या होता है?

देखिये, कोवर्ट में एक पूरी श्रृंखला आती है, कोवर्ट का ये मतलब नही हैं, कि हम वहां पर आतंकवाद शुरू करा दें। आतंकवाद शुरू कराना हमारे देश के लिए संभव है ही नहीं, क्योंकि हम पाकिस्तान के स्तर पर नहीं गिरना चाहते। कोवर्ट ऑपरेशन में एक तो टार्गेटेड ऑपरेशन होता है, जो खास आतंकवादी हैं उनको लक्ष्य बना कर खत्म किया जाये, या उनके जो समर्थक हैं उनको खत्म किया जाये। एक तो ये कोवर्ट ऑपरेशन का तरीका होता है। दूसरा जो संस्थायें हैं उनको देखिये कि उनसे कौन-कौन सी संस्थायें आतंकवाद को समर्थन देती हैं और उनके खिलाफ आप एक मुहिम चलाइये, ये राजनीतिक हो सकती है, ये कूटनीतिक भी हो सकती है, ये आर्थिक भी हो सकती है। उद्देश्य ये है कि उनकी शक्ति खत्म की जाये, यह कोई हफ्ते-दो-हफ्ते का काम नहीं है।

कहा जाता है, कि 1977 में रॉ के पास इतनी क्षमता थी कि जुल्फिकार अली भुट्टो को जेल से निकालकर भारत तक  पहुंचाने का प्लान रॉ ने ही सरकार को  दिया था। आज वहीं पर दाऊद रह रहा है, भारत के खिलाफ  कदम उठा रहा है और हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं?

आप जानते हैं, कि 1977 से ही रॉ की सारी क्षमतायें खत्म कर दी गईं थीं। मोरारजी देसाई के जमाने में रॉ की क्षमता को नेस्तनाबूत कर दिया गया। ये सिलसिला तभी से शुरू हुआ और किसी सरकार ने इस सिलसिले को उल्टा मोडऩे की कोशिश नहीं की। किसी सरकार ने नहीं कहा कि भाई बहुत हो गया, अब वापिस अपनी क्षमता बनाइये। बिना राजनीतिक अनुमति के कोई भी एजेंसी कुछ नहीं कर सकती।

लेकिन राजनीतिक अनुमति क्यों नहीं मिलती, जबकि हर आतंकवादी हमले के बाद राजनेता पाकिस्तान को सबक सिखाने की धमकी देते रहे हैं।

वो सिर्फ हमारे नेता आपको बता सकते हैं। वो राजनीतिक अनुमति इसलिए नहीं है ,क्योंकि हमारे नेताओं में सुरक्षा की कोई समझ ही नहीं है। कोई दूरगामी सोच ही नहीं है, जो अपने देश में ऑपरेशन करने की क्षमता नहीं रखते वो किसी और देश में ऑपरेशन करने का क्या गुमान रखेंगे। उनको समझ ही नहीं है।

तो आपको क्या लगता है, वाकई हमारे  नेताओं में क्षमता नहीं है, रक्षा संस्थानों में क्षमता है, लेकिन क्षमता को बनाया नहीं गया?

आप संसाधन नहीं देंगे और आदेश नही देंगे तो सुरक्षा एजेंसियां कुछ नहीं कर पायेंगी।

तो आपको क्या लगता है, आतंकवाद का हमला जिस ढंग से मुंबई में हुआ और पहले भी इस तरह के हमले होते रहे हैं ये आगे भी लगातार यूं ही चलते रहेंगे?

जब तक इसका आप कुछ हल नहीं निकालेंगे तब तक ये सब चलता रहेगा, जहां तक भारत के सुरक्षा तंत्र की बात है, उसमें इनको रोकने की कोई खास चिन्ता नहीं है। अगर रोज ऐसे ही हादसे हों तब भी कुछ नहीं हो पायेगा। तो ये ही बात हुई ना, कि वो हम पर हमला नहीं करवा पा रहे हैं। उनमें इतनी क्षमता नहीं है, वरना यहां तो आये दिन हमले होते हैं, आप किस जगह रोक लेंगे, आप बताइये, आप मुंबई में रोक नहीं सकते, आप दिल्ली में रोक नहीं सकते, हर जगह ही ये सब हो रहा है।


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