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मेरी सरकार वन-रैंक वन-पेंशन के मसले का समाधान लाकर रहेगी: नरेन्द्र मोदी

मेरी सरकार वन-रैंक वन-पेंशन के मसले का समाधान लाकर रहेगी: नरेन्द्र मोदी

मेरे प्यारे देशवासियों, पिछली बार जब मैंने आपसे ‘मन की बात’ की थी, तब भूकंप की भयंकर घटना ने मुझे बहुत विचलित कर दिया था। मन बात करना नहीं चाहता था, फिर भी ‘मन की बात’ की थी। आज जब मैं ‘मन की बात’ कर रहा हूं, तो चारों तरफ भयंकर गर्म हवा, गर्मी, परेशानियां उसकी खबरें आ रही हैं। मेरी आप सब से प्रार्थना है कि इस गर्मी के समय हम अपना तो ख्याल रखें ही, साथ ही हमें हर कोई कहता होगा बहुत ज्यादा पानी पियें, शरीर को ढक कर रखें, लेकिन मैं आप से कहता हूं, हम अपने अगल-बगल में पशु-पक्षियों की भी परवाह करें। ये अवसर होता है परिवार में बच्चों को एक काम दिया जाये, कि वो घर के बाहर किसी बर्तन में पक्षियों को पीने के लिए पानी रखें, और ये भी देखें वो गर्म ना हो जाये। आप देखना परिवार में बच्चों के अच्छे संस्कार हो जायेंगे और इस भयंकर गर्मी में पशु-पक्षियों की भी रक्षा हो जाएगी।

ये मौसम एक तरफ गर्मी का भी है, तो कहीं खुशी, कहीं गम का भी है। एग्जाम देने के बाद जब तक नतीजे नहीं आते तब तक मन चैन से नहीं बैठता है। अब सी.बी.एस.ई., अलग-अलग बोर्ड एग्जाम और दूसरे एग्जाम पास करने वाले विद्यार्थी मित्रों को अपने नतीजे मिल गये हैं। मैं उन सब को बधाई देता हूं। बहुत-बहुत बधाई। मेरे ‘मन की बात’ की सार्थकता मुझे उस बात से लगी जब मुझे कई विद्यार्थियों ने नतीजे आने के बाद ये जानकारी दी, कि एग्जाम के पहले आपके ‘मन की बात’ में जो कुछ भी सुना था, एग्जाम के समय मैंने उसका पूरी तरह पालन किया और उससे मुझे लाभ भी मिला। खैर, दोस्तों आपने मुझे ये लिखा मुझे अच्छा लगा, लेकिन आपकी सफलता का कारण कोई मेरी एक ‘मन की बात’ नहीं है। आपकी सफलता का कारण आपने साल भर कड़ी मेहनत की है, पूरे परिवार ने आपके साथ जुड़ कर इस मेहनत में हिस्सेदारी की है। आपके स्कूल, आपके टीचर, हर किसी ने प्रयास किया है। लेकिन आपने अपने आप को हर किसी की अपेक्षा के अनुरूप ढाला है। परीक्षा में जाते-जाते समय जो टिप मिलते हैं न, वो कई प्रकार के होते हैं, लेकिन मुझे आनंद इस बात का आया कि आज ‘मन की बात’ का कैसे उपयोग हो रहा है, कितनी सार्थकता है इसमें ये जानकर मुझे खुशी हुई। मैं जब कह रहा हूं कहीं गम, कहीं खुशी, तो बहुत सारे मित्र हैं जो बहुत ही अच्छे माक्र्स से पास हुए होंगे। कुछ मेरे युवा मित्र पास तो हुए होंगे, लेकिन हो सकता है माक्र्स कम आये होंगे और कुछ ऐसे भी होंगे जो विफल हो गये होंगे। जो उत्तीर्ण हुए हैं उनके लिए मेरा इतना ही सुझाव है कि आप उस मोड़ पर हैं, जहां से आप अपने करियर का रास्ता चुन रहे हैं। अब आपको तय करना है, आगे का रास्ता कैसा होना चाहिए ये आप पर निर्भर करेगा। आम तौर पर ज्यादातर विद्यार्थियों को पता भी नहीं होता है क्या पढऩा है, क्यों पढऩा है, कहां जाना है, लक्ष्य क्या है। ज्यादातर अपने आस-पास जो बातें होती हैं, मित्रों में, परिवारों में, यार-दोस्तों में, या अपने मां-बाप की जो कामनायें रहती हैं, उसके आस-पास निर्णय होते हैं। अब दुनिया बहुत बड़ी हो चुकी है, विषयों की भी सीमायें नहीं हैं, अवसरों की भी सीमायें नहीं हैं। आप जरा साहस के साथ आपकी रूचि, प्रकृति, प्रवृत्ति के हिसाब से रास्ता चुनिए। प्रचलित मार्गों पर ही जाकर के अपने को खींचते क्यों हो? कोशिश कीजिये और आप खुद को जानिए। खुद को जानकर आपके भीतर जो उत्तम चीजें हैं, उनको संवारने की कोशिश करो, जहां अवसर मिले ऐसी पढ़ाई के क्षेत्र क्यों न चुनें? लेकिन कभी ये भी सोचना चाहिये, कि मैं जो कुछ भी बनूंगा, जो कुछ भी सीखूंगा, मेरे देश के लिए उसमें काम आये ऐसा क्या होगा?

बहुत सी जगहें ऐसी हैं, जिनके विषय में जानकर आपको हैरानी होगी, विश्व में जितने म्यूजियम बनते हैं, उसकी तुलना में भारत में बहुत कम बनते हैं, और कभी कभी इस म्यूजियम के लिए योग्य व्यक्तियों को ढूंढना भी बड़ा मुश्किल हो जाता है। क्योंकि ये परंपरागत रूप से बहुत पॉपुलर क्षेत्र नहीं है। खैर, मैं कोई एक बात पर आपको खींचना नहीं चाहता हूं। लेकिन, कहने का तात्पर्य है कि देश को उत्तम शिक्षकों की जरूरत है तो उत्तम सैनिकों की भी जरूरत है, उत्तम वैज्ञानिकों की जरूरत है तो उत्तम कलाकार और संगीतकारों की भी आवश्यकता है। खेल-कूद कितना बड़ा क्षेत्र है, और खिलाडिय़ों के सिवाय भी खेल कूद जगत के लिए कितने उत्तम ह्यूमन रिसोर्स की आवश्यकता होती है। यानि इतने सारे क्षेत्र हैं, इतनी विविधताओं से भरा हुआ विश्व है। हम जरूर प्रयास करें, साहस करें। आपकी शक्ति, आपका सामथ्र्य, आपके सपने देश के सपनों से भी मेलजोल वाले होने चाहिये। ये मौका है आपको अपनी राह चुनने का।

जो विफल हुए हैं, उनसे मैं यही कहूँगा कि जिन्दगी में सफलता-विफलता स्वाभाविक है। जो विफलता को एक अवसर मानते हैं, वो सफलता का शिलान्यास भी करते हैं। जो विफलता से खुद को विफल बना देते हैं, वो कभी जीवन में सफल नहीं होते हैं। हम विफलता से भी बहुत कुछ सीख सकते हैं। और हम ये क्यों न मानें, कि आज की आप की विफलता आपको पहचानने का एक अवसर भी बन सकती है, आपकी शक्तियों को जानने का अवसर बन सकती है? और हो सकता है, कि आप अपनी शक्तियों को जान करके, अपनी ऊर्जा को जान करके एक नया रास्ता भी चुन लें।

मुझे हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी की याद आती है। उन्होंने अपनी किताब ‘माई जर्नी – ट्रांस्फोर्मिंग ड्रीम्स इनटू एक्शन’, में अपने जीवन का एक प्रसंग लिखा है। जिसमें उन्होंने कहा है, कि मुझे पायलट बनने की इच्छा थी, बड़ा सपना था, कि मैं पायलट बनूं, लेकिन जब मैं पायलट बनने गया तो मैं फेल हो गया, मैं विफल हो गया, नापास हो गया। अब आप देखिये, उनका नापास होना, उनका विफल होना भी कितना बड़ा अवसर बन गया। वो देश के महान वैज्ञानिक बन गये। राष्ट्रपति बने और देश की आण्विक शक्ति के लिए उनका बहुत बड़ा योगदान रहा, इसलिये मैं कहता हूं दोस्तो, कि विफलता के बोझ में दबना मत। विफलता भी एक अवसर होती है। विफलता को ऐसे मत जाने दीजिये। विफलता को भी पकड़कर रखिये। ढूंढिए, विफलता के बीच भी आशा का अवसर समाहित होता है। मेरी आपसे खास आग्रहपूर्वक विनती है, मेरे इन नौजवान दोस्तों को और खास करके उनके परिवारजनों को, कि बेटा अगर विफल हो गया तो माहौल ऐसा मत बनाइये की वो जिन्दगी से सारी आशाएं खो दे। कभी-कभी संतान की विफलता मां-बाप के सपनों के साथ जुड़ जाती है और उसमें संकट पैदा हो जाते हैं ऐसा नहीं होना चाहिये। विफलता को पचाने की ताकत भी तो जिन्दगी जीने की ताकत देती है। मैं फिर एक बार सभी मेरे सफल युवा मित्रों को शुभकामनाएं देता हूं और विफल मित्रों को अवसर ढूंढने का मौका मिला है, इसलिए भी मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं। आगे बढऩे का, विश्वास जगाने का प्रयास कीजिये।3

पिछली ‘मन की बात’ और आज जब मैं आपके बीच बात कर रहा हूं, इस बीच बहुत सारी बातें हो गईं। मेरी सरकार का एक साल पूरा हुआ, पूरे देश ने उसका बारीकी से विश्लेषण किया, आलोचना की और बहुत सारे लोगों ने हमें डिस्टिंक्शन माक्र्स भी दे दिए। वैसे लोकतंत्र में ये मंथन बहुत आवश्यक होता है, पक्ष-विपक्ष आवश्यक होता है। क्या कमियां रहीं, उसको भी जानना बहुत जरूरी होता है। क्या अच्छाइयां रहीं, उसका भी अपना एक लाभ होता है।

लेकिन मेरे लिए इससे भी ज्यादा गत महीने की दो बातें मेरे मन को आनंद देती हैं। हमारे देश में गरीबों के लिए कुछ-न-कुछ करने की मेरे दिल में हमेशा एक तड़प रहती है। नई-नई चीजें सोचता हूं, सुझाव आये तो उसको स्वीकार करता हूं। हमने गत मास प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, अटल पेंशन योजना – सामाजिक सुरक्षा की तीन योजनाओं को लॉन्च किया। इन योजनाओं को अभी तो बीस दिन भी नहीं हुए हैं, लेकिन आज मैं गर्व के साथ कहता हूं, शायद ही हमारे देश में, सरकार पर भरोसा करके, सरकार की योजनाओं पर भरोसा करके, इतनी बड़ी मात्रा में सामान्य मानवी उससे जुड़ जाये। मुझे ये बताते हुए खुशी होती है, कि सिर्फ बीस दिन के अल्प समय में आठ करोड़, बावन लाख से अधिक लोगों ने इन योजनाओं में अपना नामांकन करवा दिया, योजनाओं में शामिल हो गये। सामाजिक सुरक्षा की दिशा में ये हमारा बहुत अहम कदम है और इसका बहुत लाभ आने वाले दिनों में मिलने वाला है।

जिनके पास अब तक ये बात न पहुंची हो उनसे मेरा आग्रह है, कि आप फायदा उठाइये। कोई सोच सकता है क्या, महीने का एक रुपया, बारह महीने के सिर्फ बारह रूपये, और आप को सुरक्षा बीमा योजना मिल जाये। जीवन ज्योति बीमा योजना-रोज का एक रूपये से भी कम, यानि साल के तीन सौ तीस रूपये। मैं इसीलिए कहता हूं कि गरीबों को औरों पर आश्रित न रहना पड़े। गरीब स्वयं सशक्त बने। उस दिशा में हम एक के बाद एक कदम उठा रहे हैं। मैं तो एक ऐसी फौज बनाना चाहता हूं, और फौज भी मैं गरीबों में से ही चुनना चाहता हूं। गरीबों में से बनी हुई मेरी ये फौज, गरीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ेगी, गरीबी को परास्त करेगी। देश में कई वर्षों से हमारे सर पर ये बोझ है, कि गरीबी से मुक्ति पाने का हम निरंतर प्रयास करते रहेंगे और सफलता पायेंगे।

दूसरी एक महत्वपूर्ण बात जिससे मुझे आनंद आ रहा है, वो है किसान टीवी चैनल। वैसे तो देश में टीवी चैनेलों की भरमार है, क्या नहीं है, कार्टून के भी चैनल चलते हैं, स्पोट्र्स के चैनल चलते हैं, न्यूज की चलती है, एंटरटेनमेंट की चलती हैं। बहुत सारी चलती हैं। लेकिन मेरे लिए किसान चैनल महत्वपूर्ण इसलिए है कि मैं इससे भविष्य को बहुत भली भांति देख पाता हूं।

मेरी दृष्टि में किसान चैनल एक खेत खलियान वाली ओपन यूनिवर्सिटी है। ये एक ऐसा चैनल है, जिसका विद्यार्थी भी किसान है, और जिसका शिक्षक भी किसान है। उत्तम अनुभवों से सीखना, परंपरागत कृषि से आधुनिक कृषि की तरफ आगे बढऩा, छोटे-छोटे जमीन के टुकड़े बचे हैं। परिवार बड़े होते गए, जमीन का हिस्सा छोटा होता गया, अब हमारी जमीन की उत्पादकता कैसे बढ़े, फसल में किस प्रकार से परिवर्तन लाया जाए – इन बातों को सीखना-समझना जरूरी है। अब तो मौसम को भी पहले से जाना जा सकता है। ये सारी बातें लेकर ये टी. वी. चैनल काम करने वाला है और मेरे किसान भाइयों-बहनों, इसमें हर जिले में किसान मोनिटरिंग की व्यवस्था की गयी है। आप यहां संपर्क जरूर करें।

मेरे मछुवारे भाई-बहनों को भी मैं कहना चाहूंगा, मछली पकडऩे के काम में जुड़े हुए लोग, उनके लिए भी इस किसान चैनल में बहुत कुछ है, पशुपालन भारत के ग्रामीण जीवन का परम्परागत काम है और कृषि में एक प्रकार से सहायक होने वाला क्षेत्र है, लेकिन दुनिया का अगर हिसाब देखें, तो दुनिया में पशुओं की संख्या की तुलना में जितना दूध उत्पादन होता है, भारत उसमें बहुत पीछे है। पशुओ की संख्या की तुलना में जितना दूध उत्पादन होना चाहिए, उतना हमारे देश में नहीं होता है। प्रति पशु अधिक दूध उत्पादन कैसे हो, पशु की देखभाल कैसे हो, उसका लालन-पालन कैसे हो, उसका खान -पान क्या हो – परंपरागत रूप से तो हम बहुत कुछ करते हैं, लेकिन वैज्ञानिक तौर तरीकों से आगे बढऩा बहुत जरूरी है। तभी कृषि के साथ पशुपालन भी आर्थिक रूप से हमें मजबूती दे सकता है, किसान को मजबूती दे सकता है, पशु पालक को मजबूती दे सकता है। हम किस प्रकार से इस क्षेत्र में आगे बढें, किस प्रकार से हम सफल हो, उस दिशा में वैज्ञानिक मार्गदर्शन आपको मिलेगा।

मेरे प्यारे देशवासियों याद है 21 जून? वैसे हमारे इस भू-भाग में 21 जून को इसलिए याद रखा जाता है कि ये सबसे लंबा दिवस होता है। लेकिन 21 जून अब विश्व के लिए एक नई पहचान बन गया है। गत सितम्बर महीने में यूनाइटेड नेशन्स में संबोधन करते हुए, मैंने एक विषय रखा था और एक प्रस्ताव रखा था कि 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग-दिवस के रूप में मनाना चाहिए। सारे विश्व को अचरज हो गया, आप को भी अचरज होगा, सौ दिन के भीतर-भीतर एक सौ सत्तर देशो के समर्थन से ये प्रस्ताव पारित हो गया। इस प्रकार के प्रस्ताव को यूनाइटेड नेशन्स के इतिहास में, सबसे ज्यादा देशों का समर्थन मिला, सबसे कम समय में प्रस्ताव पारित हुआ, और विश्व के सभी भू-भाग, इसमें शरीक हुए, किसी भी भारतीय के लिए, ये बहुत बड़ी गौरवपूर्ण घटना है।

लेकिन, अब जिम्मेवारी हमारी बनती है। क्या कभी सोचा था हमने कि योग विश्व को भी जोडऩे का एक माध्यम बन सकता है? ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की हमारे पूर्वजों ने जो कल्पना की थी, उसमें योग एक कैटलिटिक एजेंट के रूप में विश्व को जोडऩे का माध्यम बन रहा है। कितने बड़े गर्व की, खुशी की बात है। लेकिन, इसकी ताकत तो तब बनेगी जब हम सब बहुत बड़ी मात्रा में योग के सही स्वरुप को, योग की सही शक्ति को, विश्व के सामने प्रस्तुत करें। योग दिल और दिमाग को जोड़ता है, योग रोगमुक्ति का भी माध्यम है, तो योग भोगमुक्ति का भी माध्यम है और अब तो मैं देख रहा हूं, योग शरीर, मन, बुद्धि को जोडऩे का काम तो करता ही है, साथ-ही-साथ विश्व को भी जोडऩे का काम कर सकता है।

हम क्यों न इसके एम्बेसेडर बने! हम क्यों न इसे मानव कल्याण के लिए काम आने वाली, इस महत्वपूर्ण विद्या को सहज उपलब्ध कराएं। हिन्दुस्तान के हर कोने में 21 जून को योग दिवस मनाया जाए। आपके रिश्तेदार दुनिया के किसी भी हिस्से में रहते हों, आपके मित्र परिवार जन कहीं रहते हो, आप उनको भी टेलीफोन करके बताएं, कि वे भी वहां लोगो को इकट्ठा करके योग दिवस मनायें। अगर उनको योग का कोई ज्ञान नहीं है, तो किसी किताब के माध्यम से सबको समझाए कि योग क्या होता है। मैं मानता हूं कि हमने योग दिवस को सचमुच में विश्व कल्याण के लिए एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में, मानव जाति के कल्याण के रूप में और तनाव में  जिन्दगी गुजर रहा मानव समूह, कठिनाइयों के बीच हताश-निराश बैठे हुए मानव को, नई चेतना, ऊर्जा देने का सामर्थ योग में है।

मैं चाहूंगा कि विश्व ने जिसको स्वीकार किया है, विश्व ने जिसे सम्मानित किया है, भारत ने विश्व को जो दिया है, ये योग हम सबके लिए गर्व का विषय बनना चाहिए। अभी तीन सप्ताह बाकी है, आप जरूर प्रयास करें, जरूर जुड़ें और औरों को भी जोडें, ये मैं आपसे आग्रह करूंगा।

मैं एक बात और कहना चाहूंगा खास करके मेरे सेना के जवानों को, जो आज देश की सुरक्षा में जुटे हुए हैं,उनको भी और जो आज  निवृत्त हो करअपना जीवनयापन कर रहे हैं। देश के लिए त्याग-तपस्या करने वाले जवानों को और मैं ये बात एक प्रधानमंत्री के तौर पर नहीं कर रहा हूं। मेरे भीतर का इंसान, दिल की सच्चाई से, मन की गहराई से, मेरे देश के सैनिकों से मैं आज बात करना चाहता हूं।

वन-रैंक, वन-पेंशन, क्या ये सच्चाई नहीं है, कि चालीस साल से ये सवाल उलझा हुआ है? क्या ये सच्चाई नहीं हैं कि इसके पूर्व की सभी सरकारों ने इसकी बातें की, किया कुछ नहीं? मैं आपको विश्वास दिलाता हूं। मैंने निवृत्त सेना के जवानों के बीच में वादा किया है, कि मेरी सरकार वन-रैंक, वन-पेंशन लागू करेगी। हम जिम्मेवारी से हटते नहीं हैं और सरकार बनने के बाद, भिन्न-भिन्न विभाग इस पर काम भी कर रहे हैं। मैं जितना मानता था उतना सरल विषय नहीं हैं, पेचीदा है, चालीस साल से उसमें समस्याओं को जोड़ा गया है। मैंने इसको सरल बनाने की दिशा में, सर्वस्वीकृत बनाने की दिशा में, सरकार में बैठे हुए सबको रास्ते खोजने पर लगाया है। पल-पल की खबरें मीडिया में देना जरूरी नहीं होता है। इसकी कोई रनिंग कमेंट्री नहीं होती है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं यही सरकार, मैं फिर से कहता हूं – यही सरकार आपका वन-रैंक, वन-पेंशन का मसला, सोल्यूशन लाकर रहेगी – और जिस विचारधारा में पलकर हम आए हैं , जिन आदर्शों को लेकर हम आगे बढ़ें हैं, उसमें आपके जीवन का महत्व बहुत है।

मेरे लिए आपके जीवन के साथ जुडऩा आपकी चिंता करना ये सिर्फ सरकारी कार्यक्रम नहीं है, न ही कोई राजनीतिक कार्यक्रम है, मेरे राष्ट्रभक्ति का ही प्रकटीकरण है। मैं फिर एक बार मेरे देश के सभी सेना के जवानों से आग्रह करूंगा, कि राजनैतिक रोटी सेंकने वाले लोग चालीस साल तक आपके साथ खेल-खेलते रहे हैं। मुझे वो मार्ग मंजूर नहीं है, और न ही मैं कोई ऐसे कदम उठाना चाहता हूं, जो समस्याओं को जटिल बना दे। आप मुझ पर भरोसा रखिये, बाकी जिनको बातें उछालनी होंगी, विवाद करने होंगे, अपनी राजनीति करनी होगी, उनको मुबारक। मुझे देश के लिए जीने-मरने वालों के लिए जो कर सकता हूं करना है- ये ही मेरे इरादे हैं, और मुझे विश्वास है, कि मेरे मन की बात जिसमें सिवाय सच्चाई के कुछ नहीं है, आपके दिलों तक पहुंचेगी। चालीस साल तक आपने धैर्य रखा है- मुझे कुछ समय दीजिये, काम करने का अवसर दीजिये, हम मिल-बैठकर समस्याओं का समाधान करेंगे। ये मैं फिर से एक बार देशवासियों को विश्वास देता हूं।

छुट्टियों के दिनों में सब लोग कहीं-न-कहीं तो गए होंगे। भारत के अलग-अलग कोनों में गए होंगे। हो सकता है, कुछ लोग अब जाने का कार्यक्रम बना रहे होंगे। स्वाभाविक है ‘सीईंग इज बिलीविंग’ – जब हम भ्रमण करते हैं, कभी रिश्तेदारों के घर जाते हैं, कहीं पर्यटन स्थान पर पहुंचते हैं। दुनिया को समझने, देखने का अलग अवसर मिलता है। जिसने अपने गांव का तालाब देखा है और पहली बार जब वह समुन्द्र देखता है, तो पता नहीं वो मन के भाव कैसे होते हैं, वो वर्णन ही नहीं कर सकता है, अपने गांव वापस जाकर बता ही नहीं सकता है कि समुन्द्र कितना बड़ा होता है। देखने से एक अलग अनुभूति होती है।

आप छुट्टियों के दिनों में अपने यार-दोस्तों के साथ, परिवार के साथ कहीं-न-कहीं जरूर गए होंगे या जाने वाले होंगे। मुझे मालूम नहीं है आप जब भ्रमण करने जाते हैं, तब डायरी लिखने की आदत है कि नहीं, लेकिन अनुभवों को लिखना चाहिए, नए-नए लोगों से मिलतें हैं तो उनकी बातें सुनकर लिखनी चाहिए, जो चीजें देखी हैं, उसका वर्णन लिखना चाहिए। एक प्रकार से अपने भीतर उसको समावेश कर लेना चाहिए। ऐसी सरसरी नजर से देखकर  आगे चले जाएं ऐसा नहीं करना चाहिए। क्योंकि, ये भ्रमण अपने आप में एक शिक्षा है। हर किसी को हिमालय में जाने का अवसर नहीं मिलता है, लेकिन जिन लोगों ने हिमालय का भ्रमण किया है और किताबें लिखी हैं उनको पढ़ोगे तो पता चलेगा कि क्या आनन्ददायक यात्राओं का वर्णन उन्होंने किया है।

मैं ये तो नहीं कहता हूं कि आप लेखक बनें! लेकिन भ्रमण से कुछ सीखने का प्रयास करें, इस देश को समझने का प्रयास करें, देश को जानने का प्रयास करें, उसकी विविधताओं को समझें। वहां के खान-पान को, पहनावे, बोलचाल, रीति-रिवाज, उनके सपने, उनकी आकांक्षाएं, उनकी कठिनाइयां, इतना बड़ा विशाल देश है, पूरे देश को जानना समझना चाहिए। एक जनम कम पड़ जाता है, आप जरूर कहीं-न-कहीं गए होंगे, लेकिन मेरी एक इच्छा है, इस बार आप यात्रा में गए होंगे या जाने वाले होंगे। क्या आप अपने अनुभव को मेरे साथ शेयर कर सकते हैं? सचमुच में मुझे आनंद आएगा। मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप इन्क्रेडिबल इंडिया हैश टैग, इसके साथ मुझे अपनी फोटो, अपने अनुभव जरूर भेजिए और उसमें से कुछ चीजें जो मुझे पसंद आएंगी मैं उसे आगे औरों के साथ शेयर करूंगा।

आपके अनुभवों को मैं भी तो अनुभव करूं, आपने जो देखा है, मैं उसको दूर बैठकर देखूं। जिस प्रकार से आप समुद्र तट पर जा करटहल सकते हैं, मैं तो नहीं कर पाता अभी, लेकिन मैं आपके अनुभव जानकर और आपके उत्तम अनुभवों को मैं सबके साथ शेयर करूंगा।

अच्छा लगा आज एक बार फिर गर्मी की याद दिला देता हूं, मैं यही चाहूंगा कि आप अपने को संभालिए, बीमार मत होना, गर्मी से अपने आपको बचाने के रास्ते होते हैं, लेकिन अपने साथ-साथ पशु-पक्षियों का भी ख्याल करना। यही ‘मन की बात’ आज बहुत हो गयी, ऐसे मन में जो विचार आते गए, मैं बोलता गया। अगली बार फिर मिलूंगा, फिर बातें करूंगा, आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं, बहुत-बहुत धन्यवाद।

(प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा आकाशवाणी पर ‘मन की बात’ का मूल पाठ)

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