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किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं?

किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं?

भारत की लगभग साठ प्रतिशत जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से कृषि पर निर्भर है। भारत में कृषि को जुआ कहा जाता है, क्योंकि यह अधिकांशत: मानसून पर निर्भर है जो अनिश्चित है। दूसरी ओर भूमंडलीकरण का भी किसानों पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।

वर्ष 2002 के बाद देश में प्रत्येक आधे घंटे में एक किसान आत्महत्या कर रहा है। इनमें से प्राय: दो तिहाई कृषक ही कृषि से सम्बन्धित कारणों से आत्महत्या करते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय कृषक समुदाय में भी आत्महत्या एक सामान्य व्यवहार है, लेकिन भारत जैसे धर्मपरायण देश में आत्महत्या सनसनी पैदा करती है। भारतीय किसानों में आत्महत्या की घटनाएं तब और तीव्र हो जाती हैं जब सूखा पड़ा हो, बाढ़ आई हो अथवा हाल जैसी बेमौसम बरसात या ओला वृष्टि हो।

विपरीत परिस्थितियों के कारण खेती से आमदनी कम हो जाती है और किसानों को नुकसान होने से उन पर कर्ज का बोझ बढ़ता जाता है। रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों के युग में किसान अपने संसाधनों से खेती नहीं कर सकता। उसे बीज, उर्वरक तथा कीटनाशक खरीदने के लिए पैसे उधार लेने पड़ते हैं। यह भी तथ्य है कि जिस अनुपात में बीज, उवर्रक, कीटनाशक तथा सिंचाई उपकरण के दाम बढ़ते हैं, उस अनुपात में खेती की उपज की कीमत नहीं बढ़ती। सरकारों द्वारा कई कृषि उत्पादों पर समर्थन-मूल्य घोषित करने पर भी खेती की उपज का मूल्य बाजार मूल्य से अधिक होता है।

जब किसान फसल के लिए गए ऋण को चुकाने में असमर्थ हो जाता है, तो अपनी प्रिय जमीनों को सरकारी बिक्री से बचाने के लिए बाजार से या साहूकारों से 36 प्रतिशत तक वार्षिक ब्याज दरों पर और ऋण लेता है। इस प्रकार वह ऋण के दुष्चक्र में फंसता चला जाता है। इसलिए विद्वान कहते हैं कि भारतीय किसान ऋण में पैदा होता है, ऋण में जीता है और ऋणग्रस्त होकर ही मर जाता है।

इसके अतिरिक्त उस पर बीमारियों तथा परिवार में शादी-विवाहों तथा अन्य सामाजिक दायित्वों को निभाने का आर्थिक बोझ पड़ता है। उसके पास बचत करने के लिए कुछ नहीं होता, इसलिए बुरे दिनों के लिए शायद ही वह कुछ जोड़ पाता है। यह तो अच्छा हुआ कि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सद्प्रयासों से किसानों के बैंकों में बचत खाते खुल गये हैं। इससे उनकी बचत करने की आदतें भी बदलने की आशा है। एक आंकलन के अनुसार सीमांत एवं छोटे किसान अपने यहां धार्मिक एवं सामाजिक अनुष्ठानों तथा अंधविश्वासों पर अपनी आय का बड़े किसानों या व्यक्तियों की आय के अंश से दस गुना खर्च करते हैं। शेष आमदनी वे शराब, जुए तथा सट्टे में लुटा देते हैं। फिर जब बुआई का समय आता है तो वे आसमान की ओर देखते हैं। इस सामाजिक बुराई का सामना केवल स्वंयसेवी संगठन तथा धार्मिक संगठनों के सहयोग द्वारा किया जा सकता है। टेलीविजन एवं वैश्वीकरण के प्रभाव में आधुनिक जीवन शैली की आकांक्षा भी किसानों के बीच  आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति का एक कारक है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, जिन किसानों ने आत्महत्याएं की उनमें से 86.5 प्रतिशत ऋणी थे। किसान का औसतन ऋण 50,000 था, जबकि 60 प्रतिशत ऋण 6600 रुपये से 33,000 रुपये के बीच में था। इसका अर्थ यह है कि आत्महत्या करने वालों में छोटे तथा मझोले किसान ही अधिक हैं। बड़े कृषक या जमींदार तो उद्योगपतियों की भांति बैंकों के ऋण डकार जाते हैं और ऋण चुकाने के बदले बैंक के अधिकारियों को या  तो पैसा या अन्य लालच देते हैं अथवा अपना राजनीतिक दवाब लगाकर निकल जाते हैं। जो सीमांत छोटे तथा मझोले कृषक हैं, वे बैंकों तथा साहूकारों के दवाब से नहीं उबर पाते। विशेषत: जब इस लेन-देन के चक्र में यदि उनकी कोई फसल बिगड़ जाय, तब वे साहूकारों के गुर्गों तथा गुन्डों के द्वारा अपमान नहीं झेल पाते और अपनी जमीनों को भविष्य की पीढिय़ों के लिए बचाने के लिए अपराधबोध से आत्महत्या कर बैठते हैं। वे भावनात्मक व्यक्ति हैं तथा सदैव प्रकृति के सम्पर्क में रहते हैं।

सच्चाई, स्वामिभक्ति तथा ईमानदारी कृषक के जातीय गुण हैं। उसके जीवन मूल्य आत्महत्या करने में उसकी हताशा की अग्नि में घी का काम करते हैं। लेकिन, वे भूल जाते हैं कि आत्महत्या करना भी ईश्वर के प्रति अपराध है। उनका अपने शरीर पर अधिकार नहीं है। कृषक-मजदूर समर्थक लेखक और प्रगतिवादी साहित्यकार कृषक के इन गुणों को आत्महत्या के पीछे मुख्य कारक मानते हैं जो सर्वेक्षण तथा पुलिस रिकॉर्ड से सत्यापित नहीं होता है। सरकार उद्योगपतियों को तो लाखों-करोड़ों के ऋण के ऊपर अनुदान देती चली जाती है, लेकिन क्या सरकार इन कृषकों के छोटे-मोटे ऋणों को माफ  नहीं कर सकती? सरकारी बैंकों को सामान्यत: भारत सरकार लाखों-करोड़ रुपये अनुदान प्रतिवर्ष बजट में देती है तथा राज्य सरकारें भी उद्योगों के प्रोत्साहन के लिए तथा निर्यात के लिए सहायता अनुदान प्रदान करती हैं।

महाराष्ट्र के विदर्भ में प्रत्येक दिन दो कृषक आत्महत्या कर रहे हैं। कपास के विदेशी बीज के आयात के पश्चात् वहां आत्महत्याओं की संख्या बढ़ गई, क्योंकि जिस मात्रा में इन विदेशी बहुदेशीय कंपनियों ने बीटी कॉटन जैसे उच्च उत्पादक बीजों के माध्यम से उत्पादन-वृद्धि का वायदा किया गया था, उसका सातवां भाग भी उत्पादन नहीं हुआ। फलत: भारत के कपड़ा उद्योग की रीढ़ विदर्भ के कृषक और दुखी एवं हताश हो गये। दूसरी ओर विदर्भ क्षेत्र में जो साहूकार हैं, उनके बड़े-बड़े गिरोह हैं और उन्हें मीडिया संचार माध्यमों तथा राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। अत: इनके लठैतों के सामने सीधे-साधे सच्चे सफेद गांधी टोपी पहनने वाले कृषकों ने आत्मसमर्पण कर दिया। बैंक भी इन साहूकारों के सामने कृषकों की सहायता के लिए आगे नहीं आये। बैंक के अधिकारियों को तो अपने परिवार तथा अपनी नौकरी की अधिक चिंता रहती है। इसके बाद उनकी प्राथमिकता में बैंक की सुडौल आर्थिक स्थिति है तथा कृषक-हित तो उनकी प्राथमिकता में आखिरी क्रमांक पर आता है। यही हाल कमोबेशी उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र के किसानों का है। यह क्षेत्र कम वर्षा वाला है तथा यहां सूखा नियम तथा औसत वर्षा अपवाद है। इन कृषकों की दयनीय अवस्था बुन्देलखण्ड क्षेत्र के प्रमुख रेलवे स्टेशनों जैसे-झांसी, जबलपुर, उरई पर दृष्टिगोचर होती है, जब सैंकड़ों, हजारों की संख्या में किसान अपनी पोटलियां बांधे इन स्टेशनों के प्लेटफॉर्मों पर पड़े-पड़े दिल्ली, पंजाब या हरियाणा जाने वाली रेलगाडिय़ों की प्रतीक्षा करते रहते हैं। धक्का-मुक्की खाते-खाते जैसे-तैसे वे पंजाब और हरियाणा पहुंचते हैं। वहां पर फसलों की कटाई-छटाई करते-करते उनके मन-मस्तिष्क में सदा यह चिंता बनी रहती है कि कहीं घर पर छूटे उनके वृद्ध माता-पिता तथा उनकी कन्याएं किसी अत्याचार का शिकार न हो जायें, कहीं उनकी लड़कियों की इज्जत-आबरु न लुट जाये। लेकिन, यह पेट की भूख तो मानती नहीं। स्थानीय राजनैतिक नेता तथा स्वंयसेवी संगठन इनके विस्थापन की दयनीय अवस्था पर घडिय़ाली आंसू तो बहाते हैं, पर उनके लिए कोई ठोस उपाय नहीं करते। यहां के किसान प्रतिवर्ष विस्थापन को अपनी नियति मान बैठे हैं। लौटते समय उनके लौटने की व्यवस्था करने वाले दलाल या मध्यस्थ उनके आरक्षित टिकट कराने में धोखाधड़ी करते हैं तथा उनके बचे-खुचे पैंसों को पंजाब के स्टेशनों पर जेबकतरे उड़ाकर चम्पत हो जाते हैं। बस उनके सिर पर रह जाती है गेहूं-धान से भरी पोटलियां जो वे अपने घर से आते समय खाने की सामाग्री भरकर लाये थे। शायद अब बैंक खाते खुल जाने के बाद वे पंजाब से ही बीच में अपने खातों में आमदनी जमा करते रहेंगे, जिससे वे दलालों तथा जेबकतरों से बचेंगे। मनरेगा के एक सौ या एक सौ पचास दिन की कार्य योजना से उनके विस्थापन में कुछ कमी आई है, पर वह भी इस अमानवीय विस्थापन को न रोक सकी। इस वर्ष तो बेमौसम वर्षा ने पंजाब एवं हरियाणा तथा इनके क्षेत्र बुन्देलखण्ड की फसलों को चौपट कर दिया है। अब देखना यह है कि इस वर्ष मई-जून से आरंभ करके उनके मध्यस्थ उन्हें काम पर कहां भेजते हैं।

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एक अंाकलन के अनुसार, वर्ष 1997 के बाद लगभग एक लाख किसानों ने अपने जीवन की बलि दी है। हाल ही में बेमौसम वर्षा के कारण अपनी नष्ट फसलों को देखकर मार्च और अप्रैल में औसतन पचास प्रतिदिन के हिसाब से 3000 कृषकों ने आत्महत्याएं की हैं। यह हमारी कल्याणकारी सरकारों के सामने वर्तमान नेपाल भूकम्प के समान ही चुनौती है कि क्या वे जिस प्रकार की तत्परता से नेपाल की सहायता की, उसी प्रकार अपने अन्न दाताओं को तुरन्त राहत या मदद देकर उनकी जान बचा सकेंगी। यदि ये किसान आत्महत्या न करके लोकप्रिय सरकारों के विरुद्ध खूनी क्रान्ति करने पर उतारु हो जायें, तो वातानुकूलित कमरों में बैठने वाले नौकरशाहों तथा उनके पृष्ठ-पोषक राजनीतिक आकाओं को उनका सामना करना मुश्किल होगा।

सर्वप्रथम आत्महत्या करने वाले सीमांत तथा छोटे कृषकों को निरन्तर सरकारी अनुदान की आवश्यकता है। उनकी जमीनों को सरकारी योजनाओं जैसे मनरेगा के माध्यम से कृषि योग्य बनाया जाये। उनकी जमीनों पर सिंचाई साधन उपलब्ध हों तथा उन्हें प्रतिवर्ष फसलों पर बैंक ऋण प्राप्त हो, जोकि कम से कम ब्याज दर पर प्राप्त हो तथा ब्याज भुगतान के लिए राज्य सरकारों की ओर से अनुदान भी उपलब्ध हो, क्योंकि फसलों का बाजार मूल्य या सरकारी खरीद मूल्य उनके उत्पादन मूल्य से कम होता है। उनकी बाजारु धोखाधड़ी तथा शोषण से सुरक्षा हो तथा उन्हें गुणवत्तापूर्ण बीज, रासायनिक उर्वरक तथा कीटनाशक प्राप्त हों। गुणवत्ता के लिए पुलिस एवं प्रशासन कई छापे मारते हैं पर दबी जुबान वाले किसानों के उपयोग में आने वाली वस्तुओं पर यह कार्यवाही नगण्य है। साहूकार अधिनिमय के अन्तर्गत तो कार्यवाही सुनी ही नहीं जाती है। यहां तक कि विदर्भ क्षेत्र में भी साहूकारों के विरुद्ध दायर मामलों की संख्या नगण्य ही है। ज्ञात होता है कि उनका माई-बाप राजस्व प्रशासन जिसका जिले में कलेक्टर या जिलाधीश प्रमुख होता है, उनके प्रति उदासीन और संवेदनहीन हो गया है।

आशा है कि उनकी अपनी पंचायतें उनके हित में चौबीस घंटे खड़ी होंगी तथा उनको समस्याओं के दलदल से निकालकर कम से कम उन्हें दो वक्त की रोटी उपलब्ध करायेंगी। यह खुशी की बात है कि वर्तमान लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आपदाकालीन परिस्थितियों में उन्हें प्राप्त सहायता या राहत के मानदंड सरल किये हैं, फिर भी उनके पास सहायता पुरानी कच्छप गति से पहुंच पाती है। यह आवश्यक है कि किसानों के हित में काम करने वाले तन्त्र में नियुक्त भ्रष्ट एवं उदासीन सरकारी कर्मियों, पंचायत कत्र्ताओं और बैंक अधिकारियों के विरुद्ध समुचित कार्यवाही हो। फसल नष्ट होने के पन्द्रह दिन के भीतर ही उन्हें कम से कम अन्तरिम राहत प्राप्त होनी चाहिए ताकि आत्महत्या की ओर प्रवणता रखने वाले कृषक ऐसा कदम न उठा पायें। सरकारों को फसल बीमा (इंश्योरेन्स) योजना को प्राथमिकता की श्रेणी में रखना चाहिए तथा यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह योजना बिना सरकारी घोषणा के ही कार्यान्वित हो तथा यह सरकार की मुखापेक्षी न हो। सामान्यत: बीमा के लिए सरकारें ही किश्तें भुगतान कर देती हैं पर इस योजना में बेमौसम वर्षा या बिगडै़ल मौसम जैसे असामान्य तापमान इत्यादि का भी प्रावधान होना चाहिए, ताकि कृषक को फसल के अंत तक खराब होने के लिए बीमा राशि प्राप्ति के लिए प्रतीक्षा न करनी पड़े।

सशक्त, सरल एवं तत्पर बीमा योजना ही किसानों की आत्महत्या रोकने का सबसे प्रभावशाली उपाय है। किसानों के उपज की खरीद के लिए मंडियों, हाटों तथा सरकारी खरीद केन्द्रों पर उचित व्यवस्था होनी चाहिए तथा उनकी पैदावार पर अनावश्यक कटाई नहीं होनी चाहिए जैसा कि पूर्ववत् जमींदार करते थे। इस दिशा में पंचायतों की भूमिका भी अहम है। वे स्थानीय बैंकों, साहूकरों तथा ऋणदाता किसानों के बीच मध्यस्थता करके इन मामलों को सहजतापूर्वक निबटा सकती हैं तथा आत्महत्या करने वाले किसानों में आत्मविश्वास का संचार कर सकती हैं, जिससे वे आत्महत्या न करें। कृषकों को भी चाहिए कि वे अपनी फसलों में उचित मिश्रण करें ताकि अचानक मौसम में परिवर्तन होने पर कम-से-कम कुछ फसलें तो बच जायें।

प्रमोद कुमार अग्रवाल

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