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अफगानिस्तान: भारत के लिए उभरता एक और खतरा

अफगानिस्तान: भारत के लिए उभरता एक और खतरा

अफगानिस्तान में जारी गतिविधियां भारत के लिए चिंता का कारण बन रही हैं। वह स्थिति समाप्त हो गई है, जब वहां के तत्कालीन राष्ट्रपति हामिद करजई ने भारत को सबसे मित्रवत देश के रूप में ज्ञापित किया था। अफगानिस्तान के नए राष्ट्रपति अशरफ घनी पहले ही करजई की विरासत से मुक्त होने का संदेश देते हुए सऊदी अरब, पाकिस्तान और चीन की ओर कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। अपने देश की सुरक्षा और हितों की रक्षा के लिए घनी को हर कदम उठाने का अधिकार है, लेकिन शासनकला की समाप्ति के परिणामों को देखकर शंका उत्पन्न होता है।

अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के बढ़ते प्रभाव से राष्ट्रपति घनी डरे हुए हैं। उन्होंने पूर्वी नंगरहर प्रांत की राजधानी जलालाबाद में हुए हमले के लिए, जिसमें 35 लोगों की मौत हो गई थी, इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों को जिम्मेदार ठहराया था। इस घटना के बाद अशरफ घनी ने कहा – ”नंगरहर की वीभत्स घटना की जिम्मेदारी किसने ली? तालिबान ने कोई जिम्मेदारी नहीं ली। इसकी जिम्मेदारी डायेश (इस्लामिक स्टेट) ने ली।’’

कुछ मुजाहिदीन सरदारों, जिन्होंने सोवियत संघ के खिलाफ और बाद में पश्तून के प्रभाव वाले तालिबान के साथ कठिन लड़ाई में अमिट छाप छोड़ी, की सोच इससे अलग है। उत्तरी अफगानिस्तान पर अभी भी अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले पूर्व सरदार इस्माईल खान इसका कारण राष्ट्रपति अशरफ गनी और केन्द्रीय सरकार के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह के बीच फूट को मानते हैं, जो पूरी तरह अलग-अलग रास्ते पर चल रहे हैं। खान का मानना है कि अशरफ घनी का गुटबाजी वाला रवैया इस्लामिक स्टेट के लिए रास्ता साफ कर रहा है, जो पहले ही अफगानिस्तान की भूमि पर उसका आधार मजबूत कर चुका है।

20-06-2015

खतरा वास्तविक है। पाकिस्तान-तालिबान के संबंधों की पहेली के कारण भारत के सुरक्षा परिदृश्य के लिए दीर्घकालीन खतरा उत्पन्न हो गया है। फिर भी, इस्लामिक स्टेट के पादुर्भाव के बावजूद भारत उसी ढर्रे पर चलता जा रहा है। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ घनी की हाल ही में हुई भारत यात्रा के दौरान भारत ने अफगान प्रतिनिधिमंडल से कहा कि उन्हें अपनी सुरक्षा जरूरतों को खुलकर सामने रखनी चाहिए।

यह दहशत का एक संकेत है, क्योंकि इसके पहले अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई के लाईट माउंटेन आर्टिलरी, एयर सपोर्ट सिस्टम, पुल बनाने के उपकरण और 2.5 से 7 टन की वहन क्षमता वाले मध्यम श्रेणी के ट्रकों की आपूर्ति की मांग को भारत ने नकार दिया था। बाद में अपने हितों की रक्षा की जरूरत को महसूस करने के बाद भारत ने उस अनुरोध पर दुबारा विचार करने का निर्णय लिया। लेकिन, फरवरी में राष्ट्रपति अशरफ घनी ने उस अनुरोध को स्थगित कर दिया। अफगान सरकार ने साफ संकेत दिया कि यही सारे उपकरण वह अन्य स्रोतों से हासिल करेगी। उसी समय घनी पाकिस्तान के साथ रिश्तों में गर्मजोशी ला रहे थे और सार्वजनिक रूप से इसका संकेत भी दे रहे थे। पाकिस्तान के पेशावर के स्कूल पर हमले के दोषियों में से छह की गिरफ्तारी अफगानिस्तान में हुई। प्रारंभ में अफगानिस्तान में उनसे सिर्फ पूछताछ की गई, लेकिन अफगान अधिकारियों ने पाकिस्तान के साथ बेहद नजदीकी संबंध बनाए रखा। यह बेहद महत्वपूर्ण है कि बाद में पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज ने ‘बाहरी तत्वों’ के लिए अफगानिस्तान में हस्तक्षेप नहीं करने की नीति की सिफारिश की और वहां किसी भी तरह के छद्मयुद्ध छेडऩे के प्रयास के खिलाफ चेतावनी दी।

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पूर्व मुजाहिदीन वर्तमान घनी सरकार की व्यवस्था में अपने आप को तैयार कर रहे हैं और अपनी पूर्व स्थिति की बहाली की मांग कर रहे हैं। इस्लामिक स्टेट के किसी भी भावी आक्रमण के खिलाफ वे स्वयं को बेहतर विकल्प मान रहे हैं। अफगानिस्तान के प्रथम उपराष्ट्रपति अब्दुल रशीद दोस्तम खुद को धीरे-धीरे हाशिए पर धकेले जाने के लिए घनी को जिम्मेवार मानते हैं। नूर उल हक उलुमी को आंतरिक मामलों के मंत्री बनाए जाने पर उन्होंने अपनी अस्वीकृति सार्वजनिक रूप से जाहिर की। ये सरदार उदुमी को पूर्व सोवियत संघ समर्थित सरकार के समर्थक मानते हैं।

अफगान के नए राष्ट्रपति को मुख्य कार्यकारी अधिकारी अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह के साथ भी रिश्ते को सावधानीपूर्वक संतुलित रखना है, जो कि अभी तनावपूर्ण है। न सिर्फ दोस्तम और इस्माईल खान, बल्कि दो अन्य प्रमुख एवं शक्तिशाली लोगों ने भी सार्वजनिक रूप से घनी का विरोध किया है। उनमें एक अत्ता मोहम्मद नूर बल्ख प्रांत के राज्यपाल हैं और दूसरे, मोहम्मद मोहाकिक करजई सरकार में मंत्री रह चुके हैं। बहरहाल, इसके लिए भी जिम्मेवार अशरफ घनी ही हैं। सत्ता संभालते ही घनी ने राज्यपालों और अफगान नेशनल आर्मी के कमांडरों एवं अफगान नेशनल पुलिस के अधिकारियों का बड़े पैमाने पर फेरबदल किया। घनी ने बहुत से लोगों को हटाया और बड़ी संख्या में अपने करीबियों की नियुक्ति की। ऐसा करके उन्होंने सुरक्षा तंत्र में लंबे समय से प्रचलित जातीय/नस्लीय संतुलन को बिगाड़ दिया।

इस जटिल परिदृश्य में भारत कहां खड़ा है? न ही अमेरिका और न ही पाकिस्तान एवं चीन चाहेंगे कि भारत को अफगानिस्तान में सामरिक बढ़त हासिल हो। लगभग दो साल पहले काबुल में नियुक्त अमेरिकी सेना प्रमुख जनरल मैक्क्रीस्टल ने अफगानिस्तान में भारत के बढ़ते राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव पर चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि इससे सिर्फ क्षेत्रीय तनाव ही बढ़ेगा।

अब भारत की नीतियों की हर तरफ आलोचना हो रही है। यहां तक कि भारत के सामरिक चिंतकों का प्रभावी वर्ग भी इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि सैन्य परिदृश्य में आने से बचने के कारण अफगानिस्तान में भारत का किया हुआ अब तक निवेश (2 बिलियन अमेरिकी डॉलर से भी अधिक) भी बेकार गया। दूसरी तरफ, अशरफ घनी ने अफगानिस्तान में जारी छद्मयुद्ध में भारत की भूमिका को एक संघर्षरत पक्ष के रूप में संकेत किया है। लेकिन, सच्चाई यह है कि भारत युद्ध से तबाह हुए अफगानिस्तान को अपने पैरों पर खड़ा होते देखना चाहता है। इसके लिए वह अफगानिस्तान में शिक्षा, कृषि, बिजली, सड़क और संस्थागत निर्माण के क्षेत्रों को मजबूत करने के लिए लगातार वित्तीय सहायता उपलब्ध करा रहा है। यद्यपि अंतर्राष्ट्रीय दाता देश के रूप में ज्ञात नहीं होने के बावजूद अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और जर्मन के बाद भारत अफगानिस्तान को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने वाला पांचवां सबसे बड़ा दानदाता देश है। भारत ने अफगानिस्तान के छात्रों की छात्रवृत्ति में भारी बढ़ोत्तरी के अलावा वहां के प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशिक्षण देने का बेड़ा उठाया है। भारत के एक सार्वजनिक-निजी संघ ने वहां के हाजीगक लौह-अयस्क खादान के विकास और पश्चिमी अफगानिस्तान में जलविद्युत बांध के निर्माण के लिए 200 मिलियन अमेरिकी डॉलर का भारी निवेश किया है।

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जो भी हो, अफगानिस्तान का भविष्य अफगान नेशनल सिक्युरिटी फोर्स के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा, क्योंकि भारत ने इसे बहुत शिद्दत के साथ प्रशिक्षित किया है। अभी तक घनी ने तालिबान के साथ किसी शांति वार्ता की पहल नहीं की है, लेकिन पश्तूनों के माध्यम से उस तक पहुंच बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। इसके विपरीत, अफगानिस्तान के कुंडुज के उत्तरी अफगानिस्तान प्रांत में तालिबान कड़ी टक्कर दे रहा है और कुछ समय पहले इसे लगभग घेर लिया था। यहां तालिबान को इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान नाम के चरमपंथी लड़ाकों का सहयोग हासिल है। अभी तक अफगान नेशनल सिक्युरिटी फोर्स इन लड़ाकों को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में नहीं है और शंका इस बात की है कि अगर लड़ाई में अफगान प्रशासन तबाह हो जाता है तो इसकी कीमत वह लंबे समय तक चुकाना पड़ेगा।

इसके बावजूद अफगान नेशनल सिक्युरिटी फोर्स भविष्य में एक स्थिर और शांतिपूर्ण अफगानिस्तान के निर्माण की कुंजी है। यह त्रिस्तरीय सुरक्षा तंत्र है – अफगान नेशनल आर्मी, अफगान नेशनल पुलिस और अफगान लोकल पुलिस। इसके गठन में अमेरिका ने भारी धनराशि खर्च की है और इसके सैनिकों को प्रशिक्षण देने में भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि अफगान नेशनल सिक्युरिटी फोर्स के प्रदर्शन में सुधार हुआ है, लेकिन कहा जा रहा है कि तालिबान का सामना करने की क्षमता हासिल करने से यह अब भी कोसों दूर है।

नाटो के नेतृत्व वाली अंतर्राष्ट्रीय सेना की लगातार घटती संख्या के बाद अफगान नेशनल सिक्युरिटी फोर्स 95 प्रतिशत पारंपरिक ऑपरेशन और 98 प्रतिशत स्पेशल ऑपरेशन को संचालित कर रही है। हालांकि हताहतों की संख्या और पीछे हटने की मजबूरी अब भी इसके लिए अभिशाप बनी हुई है। 2013 से अब तक अफगान नेशनल सिक्युरिटी फोर्स में हताहतों की संख्या 9 हजार तक पहुंच चुकी है, जबकि पिछले दशक से लेकर अब तक नाटो के सैनिकों के हताहत होने की संख्या मात्र 2346 है। कुछ शीर्ष नाटो कमांडरों का मानना है कि पिछले साल हर महीने 50 से 100 अफगान सैनिक मारे गए। इस मृत्यु दर की तुलना वियतनाम युद्ध के दौरान हताहत होने वाले अमेरिकी सैनिकों की संख्या से की जा सकती है। अफगान नेशनल आर्मी की वर्तमान क्षमता 1,69,203 है और फरवरी 2014 से इसकी संख्या में 8.5 प्रतिशत की गिरावट आई है।

तालिबान इतना उस्ताद है कि वह अफगान नेशनल सिक्युरिटी फोर्स की कमजोरियों का फायदा उठा सकता है। यह भी सत्य है कि अफगान नेशनल सिक्युरिटी फोर्स कुछ बिंदुओं पर तालिबान को वापस खदेडऩे में सक्षम है। हालांकि अफगान नेशनल सिक्युरिटी फोर्स विभिन्न कारकों से पीडि़त है। सबसे पहला, उसका नेतृत्व कुछ हद तक जातीय अल्पसंख्यकों, खासकर ताजिक की ओर झुका हुआ है। कमांडरों में इनका प्रतिशत 40 है, जबकि बहुसंख्यक पश्तून सुरक्षा तंत्र में सबसे नीचले पायदान पर हैं। दूसरा, अफगान नेशनल सिक्युरिटी फोर्स के अधिकांश जवान अशिक्षित हैं। प्रेरणा की कमी के कारण वे सेना को छोड़ते रहते हैं।

अशरफ घनी को शायद इस बात का अंदाजा है कि अफगान नेशनल सिक्युरिटी फोर्स की ऐसी स्थिति के साथ तालिबान से नहीं लड़ा जा सकता है, इसलिए उन्होंने अपनी विदेश नीति में सऊदी अरब, पाकिस्तान और चीन को प्राथमिकता दी है। ध्यान देने वाली बात है कि कतर से जारी बयान में तालिबान ने वार्ता के जरिए शांतिपूर्ण समाधान तक पहुंचने की इच्छा जाहिर की है। जाहिर है वह दोहरा खेल खेल रहा है। अफगानिस्तान में शांति और सुलह अभी भी दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है। इस तरह भारत दक्षिण एशिया के इस बड़े रणनीतिक खेल को खेलने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है।

अमिताव मुखर्जी

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