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दिनकर का सम्मान

दिनकर का सम्मान

साहित्य और कला, समाज और देश की एक पहचान होती है। सोवियत संघ के महाशक्ति बनने में टॉलस्टॉय का भी योगदान बहुत माना जाता है। शेक्सपियर को न सिर्फ इंग्लैंड बल्कि पूरे विश्व में महान माना जाता है। भारत का साहित्य तो शुरू से दमदार और असरकारी रहा है। वैदिक साहित्य से लेकर आधुनिक साहित्य तक ने अपनी छाप पूरी दुनिया पर छोड़ी है। भक्तिकालीन साहित्य से गोस्वामी तुलसीदास की रामचरित्र मानस का न जाने कितनी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। रामायण का मंचन न जाने कितने देशों में हुआ है। कुछ हफ्तों पहले जब पूर्व केंद्रीय मंत्री और बिहार से राज्यसभा सांसद सी. पी. ठाकुर ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की दो कृतियों ‘संस्कृति के चार अध्याय’ और ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ के 50 वर्ष पूरे होने के सम्मान समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मुख्य अतिथि बनने का आमंत्रण दिया गया तो प्रधानमंत्री ने उसे सहर्ष स्वीकार किया। ये समारोह, 22 मई को विज्ञान भवन में सम्पन्न हुआ, जिसमें सी.पी ठाकुर ने राष्ट्रकवि दिनकर को मरणोपरांत भारत रत्न देने की अपनी मांग को फिर दोहराया। हालांकि, इसके पीछे राजनीति साफ दिखाई देती है, लेकिन साहित्यकारों के सम्मान की बात याद आई यही बहुत है। भारतीय राजनीति में हमेशा से नेताओं के सम्मान की प्रथा रही है। कितने ही नेताओं के नाम पर योजनायें और कार्यक्रम बनाये गए। सार्वजानिक अवकाश घोषित किये गए, मूर्तियों का लोकार्पण हुआ। यहां तक जीते जी भी नेताओं ने अपनी मुर्तियां लगवायी हैं। इन सब से जनता का कभी कोई जुड़ाव नहीं होता। लेकिन साहित्यकारों का सम्मान करने से जनता भी जुड़ती है और उसमें वह खुशी से भागीदार भी बनती है।

बिहार में चुनाव होने वाले हैं। चुनाव आयोग ने संकेत दे दिया है, कि सितम्बर या अक्टूबर में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। इसलिए राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गयी हैं। बिहार शिक्षा और साहित्य का केंद्र रहा है और वहीं के कवि थे रामधारी सिंह दिनकर, जिनकी रचनाओं ने लोगों में आत्मगौरव का भाव भरा। उनको राष्ट्रकवि की उपाधि भी दी गयी। इन्हीं रामधारी सिंह दिनकर की उपरोक्त वर्णित रचनाओं की ‘गोल्डन जुबली’ के अवसर पर सी. पी. ठाकुर ने यह कार्यक्रम करवाया, लेकिन आसन्न बिहार चुनावों को देखते हुए इस कार्यक्रम के अपने ही निहितार्थ निकलते हैं। दिनकर जो की भूमिहार थे, बिहार की राजनीतिक पार्टियां हर चुनाव से पहले उनके नाम को भुनाने की कोशिश करती रही हैं। इस कार्यक्रम में भाषण देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामधारी सिंह दिनकर की मार्च 1961 को लिखी चिट्ठी का जिक्र किया, जो उन्होंने एक वरिष्ठ नेता को लिखी थी। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘दिनकर जी ने चिट्ठी में लिखा- एक या दो जातियों के समर्थन से राज नहीं चलता।’

यदि जातिवाद से हम ऊपर नहीं उठे तो बिहार का सार्वजनिक जीवन गल जाएगा।’ प्रधानमंत्री ने आगे बढ़ते हुए कहा, ‘दिनकर का सपना था, कि बिहार आगे बढ़े अगर एक बार अवसर मिला तो बिहार औरों को पीछे छोड़कर आगे निकल जाएगा।’

प्रधानमंत्री के पैगाम को कार्यक्रम में मौजूद दूसरे नेताओं ने आगे बढ़ाने में देरी नहीं की। पार्टी के वरिष्ठ सांसद और पूर्व केन्द्रीय मंत्री सी.पी. ठाकुर ने कहा, ‘जाति का प्रभाव कम होगा तो लोग सोचेंगे कि विकास होना चाहिये। तब सब बीजेपी को वोट देंगे।’ जबकि, केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने दावा किया ‘इतिहास साक्षी है, जब-जब जाति के बंधन टूटे हैं, परिवर्तन हुआ है। चाहे 1977 हो या 2014 का चुनाव हो।’

गौरतलब ये है कि दिनकर पर होने वाले इस कार्यक्रम में बिहार भाजपा के सभी बड़े नेता मौजूद थे। बिहार में इस साल सितंबर-अक्टूबर में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले प्रधानमंत्री ने बिहार की राजनीति में जातिवाद का सवाल उठा कर इस मसले पर एक नई बहस छेड़ दी है।

दिलचस्प बात यह है कि, दिनकर को राज्यसभा का सदस्य जवाहर लाल नेहरू ने बनाया था और उनकी कृती  ‘संस्कृति के चार अध्याय’ को नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ का हिंदी संस्करण माना जाता रहा है। तो अब ऐसे समय में जब मोदी सरकार देश के राजनीतिक जीवन से नेहरू की प्रासंगिकता को खत्म करने में जुटी है, तब प्रधानमंत्री का दिनकर को सम्मानित करने के कार्यक्रम में भाग लेने का निर्णय अपने-आप में एक निराली बात है। वैसे कुछ लोगों का यह भी मानना  है कि, मोदी ने यह कदम हिंदी को प्रतिष्ठित करने के अपने एजेंडे और साथ ही संघ के सांस्कृतिकवाद के नारे को बुलंद करने के लिए उठाया है।

दिनकर एक बड़े कवि हैं। उनकी विरासत के राजनीतिक इस्तेमाल से बचने की कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि ये सवाल उठ रहा है कि ठीक चुनाव से पहले भाजपा  को दिनकर क्यों याद आ गए? जनता दल (यु ) ने इस कार्यक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि प्रधानमंत्री इस मुददे पर दोहरा रुख अख्तियार कर रहे हैं और दिनकर को बिहार की जाति-व्यवस्था के साथ जोड़कर देखना सही नहीं होगा। जनता दल (यु) का आरोप है कि बिहार में चुनावों से पहले बीजेपी दिनकर का इस्तेमाल कर रही है और एक खास जाति को खुश करने की कोशिश कर रही है।

जेडीयू के वरिष्ठ महासचिव के.सी. त्यागी ने एनडीटीवी से कहा, ‘पीएम हमेशा इलेक्शन मोड में रहते हैं, वो इसे चुनावों में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।’ जबकि राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू यादव ने कहा, ‘नरेन्द्र मोदी की पार्टी सभी जातियों का बिहार में सम्मेलन कर रही है चुनाव आते ही…मोदी जी ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया जिसकी मांग नितिश कुमार और हम लंबे समय से करते रहे हैं।’

सी.पी. ठाकुर से जब उदय इंडिया के संवाददाता ने इस बाबत पूछा तो उन्होंने साफ तौर पर इंकार करते हुए कहा कि, यह कार्यक्रम दिनकर को उनकी सही पहचान दिलाने की कवायद है न कि, उनकी भूमिहार पहचान को भुनाने की। उन्होंने कहा कि दिनकर खुद जाती व्यवस्था के खिलाफ थे। सी.पी. ठाकुर के इस आयोजन के पीछे निश्चित रूप से राजनीति है लेकिन, इसकी सराहना की जानी चाहिए। इस बहाने कम-से-कम उन भूले-बिसरे साहित्यकारों को याद तो किया जा रहा है, जिन्होंने समाज को जगाने का काम किया है। बिहार में विभिन्न जातियों के सम्मलेन हुआ करते है, और उसी समीकरण के अनुसार चुनाव लड़े जाते हैं। पिछड़ों और मुस्लिमों की राजनीति कर लालू प्रसाद ने लगभग दशक भर बिहार पर राज किया और फिर उसी वोटबैंक की बदौलत नितिश राज कर रहे है। अब जबकि भाजपा को वहां एक अलग ताकत के तौर पर देखा जा रहा है, तो राजनीतिक तलवारे अपने-अपने मायने से बाहर निकल रही हैं।

रामधारी सिंह दिनकर का चेहरा भाजपा के खांचे में बिलकुल सही ढल रहा है। राष्ट्रप्रेम को शब्दों में पिरोने वाले राष्ट्रकवि दिनकर बिहार के सभी वर्गों के हीरो हैं।

सी.पी. ठाकुर द्वारा उठाया गया यह कदम दिनकर को उनकी सही पहचान दिला पाता है, या यह सिर्फ एक राष्ट्रकवि की जाति पहचान को चुनाव में भुनाने की कवायद है, यह तो समय बताएगा पर इतना तो तय है कि दोनों स्थितियों में भाजपा फायदे की स्थिति में रहेगी।


राष्ट्रकवि दिनकर को मरणोपरांत भारत रत्न मिलना चाहिए: सी. पी. ठाकुर


cp

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की दो कृतियों ‘संस्कृति के चार अध्याय’ एवं ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ के प्रकाशन के 50 वर्ष पूरे होने पर किये गए समारोह के बारे में इस कार्यक्रम के कर्ताधर्ता भाजपा के वरिष्ठ सदस्य एवं राज्यसभा सांसद सीपी ठाकुर से उदय इंडिया संवाददाता नीलाभ कृष्ण और कुन्दन कुमार सिंह ने लंबी बातचीत की।  प्रस्तुत है मुख्य अंश :

राष्ट्रकवि दिनकर के साथ अपने संबन्धों पर कुछ रोशनी डालें।

हम जिस स्कूल में पढ़ते थे पूसा हाई स्कूल, जो अभी समस्तीपुर में पड़ता है, दिनकर जी उस स्कूल के एक शिक्षक थे, डॉ. कलेक्टर सिंह केसी दिनकर जी के सहपाठी थे, तो कभी-कभी स्कूल में जब कवि सम्मलेन होता था तो दिनकर जी आते थे। फिर हम पटना साइंस कॉलेज चले गए। पटना में लगभग सभी बड़े कवियों का कवि सम्मलेन होता रहता था, जैसे की निराला जी, सुमित्रानंदन पंत, कभी-कभी दिनकर जी भी आते थे तो हम उनको सुनने जाया करते थे। यह तो हुई दूर से संपर्क की बात। जब हम एम. बी. बी. एस. कर के मेडिसिन से पहले सर्जरी में गए। वहां के हेड ऑफ डिपार्टमेंट थे डॉ. विजय नारायण सिंह,  जिनके पास दिनकर जी अपनी डायबिटीज का इलाज करवाने आते थे। डॉ विजय हमें भेज देते थे दिनकर जी के साथ उनका शुगर जांच करने के लिए। सर्जरी डिपार्टमेंट से पैथोलॉजी डिपार्टमेंट के बीच दूरी बहुत थी, इसी दौरान दिनकर जी के साथ हमारे नजदीकी संबंध प्रारम्भ हुए। फिर इंग्लैंड से आने के बाद पटना में ईश्वर की मर्जी से डॉक्टरी भी ठीक-ठाक चलने लगी। उस समय फिर दिनकर जी से बीमारी के बहाने ही सही हमारा संपर्क बना जो उनके जीवनपर्यन्त रहा।

कुछ लोगों का मानना है कि यह कार्यक्रम आसन्न बिहार चुनावों का आगाज है?

नहीं नहीं, रामधारी सिंह दिनकर जी की याद में हम बहुत पहले से कार्यक्रम कर रहे हैं, इस बार बस इतना ही अंतर आया है कि यह कार्यक्रम थोड़ा बड़े स्तर पर हो गया। हमने इस बार हिंदी की दुर्गति पर फोकस किया है। हम भारत में बोली जाने वाली सभी भाषाओं का सम्मान करते हैं लेकिन, हम हिंदी की होती दुर्गति से भी परेशान हैं। हिंदी तो अब ज्ञान अर्जन की भी भाषा नहीं रह गयी।  देश में ऐसी अनेक जगह हैं जहां आप हिंदी का प्रयोग ही नहीं कर सकते। इस कार्यक्रम के माध्यम से हमने हिंदी का उत्थान कैसे हो, इस पर विचार किया। इस कार्यक्रम के माध्यम से हमारी यह मांग भी रही कि, दिनकर जी के नाम पर एक संस्थान बने दिल्ली में, जो हिंदी के उत्थान के लिए हो। साथ ही दिनकर को मरणोपरांत भारत रत्न मिलना चाहिए। देखा जाए तो आजादी की भाषा हिंदी थी न की अंग्रेजी। फिर भी हिंदी की इतनी दुर्दशा देख हमें कोफ्त होता है। इसीलिए हम इस कार्यक्रम के माध्यम से हिंदी के उत्थान के लिए एक शुरुआत कर रहे हैं।

हरिवंश राय बच्चन ने एक बार कहा था कि दिनकर को एक नहीं चार ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने चाहिए थे। क्या आपको भी ऐसा लगता है?

बच्चन जी और दिनकर जी के बीच हमेशा पत्रों का आदान-प्रदान होता रहता था। अपनी पोती की शादी के लिए दहेज की मांग से व्यथित दिनकर जी ने एक बार बच्चन को लिखा था कि, एक ज्ञानपीठ पुरस्कार राशि से तो एक पोती की शादी हो गयी, अब बाकि का कैसे करूं। तो उसी संदर्भ में बच्चन जी ने ऐसा कहा हो सकता है। बिहार में दहेज की समस्या बहुत गंभीर है। हमारा मानना है कि बिहार में उच्च जातियों में दहेज और अनुसूचित जातियों में शराब बंद हो जाए तो बिहार अपने आप तरक्की की राह पर चल पड़ेगा।

नीलाभ कृष्ण


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