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दीनदयाल उपाध्याय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचारक

दीनदयाल उपाध्याय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचारक

प्रज्ञा प्रवाह एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र एवं राजनीतिशास्त्र विभाग के संयुक्त तत्वाधान में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर में स्थित के.एन. उड़प्पा सभागार में ‘एकात्म मानव दर्शन सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ विषयक पर दो दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। इस सेमिनार के उद्घाटन अवसर पर मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सहसर कार्यवाह एवं प्रख्यात चिंतक डा. कृष्णगोपाल तथा मुख्य अतिथि पूर्व मानव संसाधन मंत्री एवं सांसद डॉ. मुरली मनोहर जोशी रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने की तथा अभ्यागतों का स्वागत कार्यक्रम संयोजक एवं अर्थशास्त्र विभाग, के प्रोफेसर आद्या प्रसाद पाण्डेय ने किया। धन्यवाद ज्ञापन राजनीतिशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. कौशल किशोर मिश्र ने किया। विषय की स्थापना प्रज्ञा प्रवाह के क्षेत्रीय संयोजक रामाशीष जी ने की तथा संचालन डा. अनिल कुमार सिंह ने किया।

इस अवसर पर मुख्य वक्ता डा. कृष्णगोपाल ने कहा, कि भारत की एक विशिष्ट दर्शन परंपरा है। इसे ध्यान में रखते हुए पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचारक के रूप में मार्गदर्शन किया। कुछ लोग संस्कृति को कल्चर एवं राष्ट्रवाद को नेशनलिज्म कहते हैं जो की उचित नहीं है।

पश्चिमी देशों के लोग भारत को नेशन कहकर अपनी परिभाषा को भारत पर थोपना चाहते हैं, जबकि भारत एक राष्ट्र है। नेशन शब्द की परिकल्पना 1789 में फ्रांस की क्रांति के साथ अवतरित हुई बाद में यह जर्मनी में शुरू हुई। इन देशों में एक वर्ग, एक देश, एक खून की अवधारणा पर समूह को नेशन का नाम दिया गया, जिसमे बाहर का कोई व्यक्ति शामिल नहीं हो सकता। इन देशों में आक्रमणकारी आये एवं कब्जा कर लिया, सत्ता बदल गयी तो देश का नाम भी बदल गया। मिश्र, घाना, रोम जैसे नेशन अपना अस्तित्व खो बैठे। वहीं भारत पांचवीं से अट्ठारवीं सदी तक लगातार हुए आक्रमणों के बाद भी एक राष्ट्र बना रहा। राजा भले ही पराजित हो गए, किन्तु राष्ट्र जीवित रहा। राष्ट्र का एक दर्शन- एक परंपरा तथा एक संकल्पना है जो कभी समाप्त नहीं होती। दिल्ली में भले ही मुगलों का शासन रहा हो किन्तु तुलसीदास के राजा ‘राम’ ही थे और उन्हें लेकर एक महाकाव्य की रचना कर डाली। सूरदास के लिए कृष्ण ही सर्वश्रेष्ठ रहे। इन लोगों ने राष्ट्र को जीवित रखा। पश्चिमी देशों के मूल में अलगाव की संकल्पना है। हमारे यहां राष्ट्र के मूल में एकात्मकता की संकल्पना है। यही कारण है, की जब देश आजाद हुआ तो सरदार वल्लभ भाई पटेल के आवाहन पर पांच सौ से ज्यादा रियासते बिना किसी रक्तपात के भारतीय संघ में शामिल हो गयीं। अंग्रेजों ने भारत में आने के बाद नेशन और राष्ट्र के मसले पर कई तरह के भ्रम फैलाये। खासकर पूर्वोत्तर के राज्यों में लोगों को दूसरे देश का बताकर भारत से तोडऩे का प्रयास किया पर राष्ट्रवाद की भावना वहां के लोगों पर हावी थी अत: विघटनकारी सफल नहीं हुए और न ही भविष्य में होंगे। पाश्चात्य देशों ने दुनिया के अनेक देशों को गुलाम बनाकर उनका शोषण किया- हत्या की। उन्होंने अपने नेशनलिज्म को स्थापित करने के लिए अनेक अनैतिक कार्य किए, किन्तु भारतीय भूमि पर पैदा राष्ट्रदर्शन वैश्विक रहा तथा एकात्म दृष्टि को जन्म देता रहा। शक्ति संपन्न रहते हुए भी भारत ने न तो कभी किसी को पराजित किया न गुलाम बनाया। इसमें सदैव लोकमंगलकारी दृष्टि एवं भद्र इच्छाएं बनी रही।

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बतौर मुख्य अतिथि डा. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि दुनिया में संस्कृति एवं सभ्यता के बीच संघर्ष अनिवार्य है। संघर्षवादी संस्कृति समाज को आगे ले जाती है। अमेरिका जैसे देशों में अभिभावक या माता-पिता जैसी कोई संस्कृति नहीं है। वहां लिव-इन-रिलेशनशिप को मान्यता दी जाती है, जो सांस्कृतिक आधार पर अमान्य है। हमें विचार करना होगा कि किसी भी राष्ट्र का आधार इस प्रकार की व्यवस्था या राष्ट्र का निर्माण राष्ट्रीयता एवं मानवीय मूल्यों को साथ लेकर किया जाय। राष्ट्र का निर्माण कर हमें सामाजिक व नैतिक व्यवस्था को कायम करना होगा, जो विश्व कल्याण की दृष्टि से प्रासंगिक है।

विशिष्ठ अथिति के रूप में अपना विचार व्यक्त करते हुए प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक डा. सदानंद सप्रे ने कहा, कि दीनदयाल जी के एकात्म मानव दर्शन में ही समाज की सभी समस्याओं का निदान है इसीलिए यह विचार विद्वत समाज में चर्चा हेतु लाया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने कहा, कि हमारे ऋषियों ने वैश्विक समावेशी अवधारणा दी। उन्होंने जगत को खंड-खंड देखने का प्रयास नहीं किया। हमें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को सोचने एवं समझने की अवश्यकता है। सेमिनार के संयोजक प्रो. आद्या प्रसाद पाण्डेय ने कहा कि महामना मंडित मदनमोहन मालवीय ने भारतीय दर्शन को ध्यान में रखकर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। इसका स्थान प्रयाग भी हो सकता था, किन्तु तपोभूमि काशी को चुनने के पीछे कुछ खास उद्देश्य है। प्रज्ञा प्रवाह इस दिशा में विद्वानों को खड़ा करेगी।

इस अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार में प्रख्यात विचारक डा. महेश दत्त शर्मा ने अपने विशेष व्याख्यान में कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ‘चिति और विराट’ अवधारणा के आधार पर एकात्ममानववाद की व्याख्या की थी। उनका कहना था कि राष्ट्र एक एकात्मक सोच है, विचार है और यही विचार सांस्कृतिक है। संस्कृति राष्ट्र की स्मिता है, ‘आत्मा और विराट’ उसका प्राण है। सेमिनार में पांच तकनीकी सत्र एवं तीन विशिष्ठ व्याख्यान हुए। तकनीकी सत्रों की अध्यक्षता डा. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’, प्रो. ओमप्रकाश सिंह, प्रो. संजीव कुमार शर्मा, बालमुकुन्द पाण्डेय (संगठन मंत्री इतिहास संकलन योजना),  अभय जी,  डा. शिवेश, प्रो. एस.पी. सिंह, प्रो. गुलाब जयसवाल (कुलपति अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद) ने की। इस अन्तरराष्ट्रीय सेमिनार में 88 शोध पत्रों का वाचन हुआ तथा 300 विद्वानों ने भागीदारी की। इस अवसर पर प्रख्यात विचारक एवं प्रज्ञा प्रवाह के मार्गदर्शक माननीय दत्तात्रेय होसबोले जी एवं शिवनारायण जी भी उपस्थित रहे।

बनारस से नीलेश पाण्डेय

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