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राजस्थान उपचुनाव : उम्मीदवारों को सहानुभूति वोटों का मिला सहारा

राजस्थान उपचुनाव : उम्मीदवारों को सहानुभूति वोटों का मिला सहारा

देश के चार राज्यों और एक केन्द्र शासित प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव परिणाम तथा देश में कोरोना महामारी के कारण मचे हाहाकार के मध्य राजस्थान की तीन विधानसभाओं सीटों राजसमंद, सहाड़ा और सुजानगढ़ के लिए भी रविवार को मतगणना हुई।

राजस्थान में हुए उपचुनावों के परिणाम आशा अनुरूप रहें है। प्रदेश की सहाड़ा और सुजानगढ़ में कांग्रेस और राजसमंद में बीजेपी ने अपनी सीटों को बरकरार रखा हैं। संयोग से तीनों सीटों पर निवर्तमान विधायकों के परिवारजन सहाडा से दिवंगत कैलाश त्रिवेदी की धर्म पत्नी गायत्री देवी, सुजानगढ़ से स्वर्गीय मास्टर भंवर लाल मेघवाल के पुत्र मनोज मेघवाल और राजसमन्द से मरहूम किरण माहेश्वरी की पुत्री दीप्ति माहेश्वरी उप चुनाव जीत गई है। इन चुनावों में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को प्रदेश की जनता ने जन्म दिन और कोरोना प्रबन्धन का तोहफा दिया है वहीं बीजेपी द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे को नजरअन्दाज करना पार्टी को भारी पड़ा है।

कांग्रेस सहाडा सीट से  42 हजार के भारी अंतर और सुजानगढ़ में 35,500 मतों से विजयी रही है। इसी प्रकार भाजपा का गढ़ माने जाने वाले राजसमन्द में भी उसने जीत के अन्तर को बहुत कम (5300 वोटों) करने में सफलता हासिल की है।

इस बार उप चुनावों में भाजपा के मुकाबले कांग्रेस अधिक अनुशासित और संगठित दिखी और पिछलें वर्ष गहलोत सरकार से बगावत करने वाले सचिन पायलट मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ एक ही हेलिकोप्टर में बैठ चुनाव प्रचार किया और एकजुटता प्रदर्शित की। साथ ही गहलोत के नेतृत्व में सीनियर मंत्री डॉ रघु शर्मा और विश्वस्त धर्मेन्द्र राठौड़ और टीम के अन्य सदस्यों द्वारा प्रदेश प्रभारी और राष्ट्रीय महामंत्री अजय माकन और प्रदेश अध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा के मार्ग दर्शन में बनाई गई रणनीति ने पार्टी को आशातीत सफलता दिलाई है। वहीं भाजपा में इस बार एकजुटता और रणनीति की नितान्त कमी दिखी। पहलें वसुन्धरा राजे का फोटो  चुनाव पोस्टरों में नदारद रहा। वहीं स्टार प्रचारकों की सूची भी विवादों में रहीं।

सहाड़ा में कैलाश त्रिवेदी और सुजानगढ़ में मास्टर भंवर लाल मेघवाल के रूप में पहलें ही कांग्रेस के विधायक थे और तीसरी सीट राजसमन्द में बीजेपी की किरण माहेश्वरी विधायक थी। इस बार चुनावों में सहानुभूति लहर हावी रही और तीनों निवर्तमान विधायकों के परिवारजन चुनाव जीत गए।

राजसमन्द जहां पिछलें बीस सालों से भाजपा का कब्जा रहा है। इस बार भी वह अपनी परम्परागत सीट को जीतने में कामयाब रही। किरण माहेश्वरी की लोकप्रियता क्षेत्र में किए कार्यों और दीप्ति की सक्रियता के साथ ही महिलाओं के उत्साह के साथ मतदान में बढ़ चढ़ कर भाग लेना उनके पक्ष में गया। सांसद दिया कुमारी ने भी चुनाव में बहुत परिश्रम किया और सघन दौरें कर पार्टी के पक्ष में वातावरण बनाया। भाजपा में चल रहें अंतर्कलह के बीच प्रतिपक्ष के नेता गुलाब चन्द कटारिया के महाराणा प्रताप पर विवादित बयान एवं विधानसभा अध्यक्ष सी पी जोशी के अप्रत्यक्ष समर्थन से सत्ताधारी दल कांग्रेस के मंत्रियों द्वारा विधानसभा क्षेत्र में की गई किले बंदी के कारण इस बार यह सीट भाजपा के हाथ से निकल जाने का अन्देशा था लेकिन अंततोगत्वा बीजेपी सीट बरकरार रखने में कामयाब रहीं।

तीनों सीटों पर कांग्रेस और भाजपा के मध्य सीधा मुकाबला रहा हालांकि सांसद हनुमान बेनीवाल की पार्टी रालोपा ने इसे त्रिकोणीय बना भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने का काम जरूर किया।

वैसे भी उप चुनावों के परिणामों में हार-जीत से प्रदेश की सत्ताधारी कांग्रेस सरकार की सेहत और प्रतिपक्ष भाजपा को भी विधानसभा में नम्बर के हिसाब से कोई फायदा नहीं हुआ लेकिन दो सीटों पर विजय से राजनैतिक रूप से कांग्रेस विशेष रूप से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का ग्राफ और रुतबा और अधिक बढ़ा है। अब उन्हें पार्टी में असन्तुष्ट गतिविधियों पर और अधिक लगाम लगाने में कामयाबी मिलेगी और मंत्रीमंडल विस्तार और राजनैतिक नियुक्तियों के लिए भी मन माफिक आगे बढऩे की हाई कमान से छूट मिलेगी।

इन उप चुनावों में जिसे वर्ष 2023 के दिसम्बर में होने वाले विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा था में, बीजेपी की दो  सीटों पर पराजय से प्रदेश की राजनीति में वसुन्धरा राजे की हैसियत और महत्व का पता लगता है। अब उनकी पार्टी हाई कमान के समक्ष साफ तौर पर यह सन्देश गया है  कि प्रदेश में वसुन्धरा राजे के कद का कोई नेता नहीं है और उनका विकल्प पैदा करने की बात तो दूर की ही कौड़ी है। बीजेपी को इन चुनावों में मिली असफलता से प्रदेश अध्यक्ष डॉ सतीश पूनिया, प्रतिपक्ष नेता गुलाब चंद कटारिया, उप नेता राजेन्द्र राठौड़ और केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, अर्जुन राम मेघवाल और कैलाश चौधरी का को धक्का लगा है। अब पार्टी हाई कमान को अगले विधानसभा चुनाव वसुन्धरा राजे के नेतृत्व में लड़े जाने पर पुनर्विचार करना होगा। राजनैतिक जानकारों का मानना है कि प्रदेश में पार्टी के पास वसुन्धरा राजे जैसी लोकप्रिय और कद्दावर नेता और कोई नहीं है। यदि आने वाले समय में पार्टी हाई कमान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और वसुन्धरा राजे के मध्य बेहतर सम्बन्ध विकसीत होते है तों मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की तरह वसुन्धरा राजे को एक अवसर और देने में कोई दिक्कत नहीं होगी। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का यह भी मानना है कि यदि राजस्थान में अगले चुनाव वसुन्धरा राजे के नेतृत्व में नही होते है तों इस  बार प्रदेश में हर पांच वर्ष में सरकार बदलने की परम्परा भी टूट सकती है और एक बार फिर अशोक गहलोत की अगुवाई में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन सकती है। वैसे भी कोरोना महामारी प्रबंधन और अपनी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से गहलोत की लोकप्रियता का ग्राफ दिनों दिन बढ़ रहा है।

अब निकट भविष्य में उदयपुर जिले के वल्लभ नगर  विधानसभा के लिए होने वाले उप चुनाव पर भी सभी की नजरें टिकी रहेंगीं। चूंकि वहां भी भाजपा के हाथ कुछ लगने वाला नहीं है। वल्लभ नगर  में वसुन्धरा राजे के प्रबल समर्थक और गुलाब चन्द कटारिया के घोर विरोधी जनता सेना के नेता रणधीर सिंह भीण्डर के चुनाव मैदान में उतरने से कांग्रेस भाजपा और जनता सेना में मुकाबला होने पर इसका कांग्रेस या जनता सेना को लाभ मिल सकता है।

 

नीति गोपेंद्र भट्ट

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