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खेला होये गाछे खेला हो गया

खेला होये गाछे खेला हो गया

कहते हैं कि किसी जंग में हार जीत से इतर भी कुछ मायने हो सकते हैं। आम तौर पर हार और जीत सिक्के के दो पहलू कहे जा सकते हैं, लेकिन चुनाव में हार जीत मिल कर भी सिक्के का एक ही पहलू प्रदर्शित कर पाते हैं — दूसरा पहलू कुछ और भी हो सकता है जिसकी अक्सर लोग चर्चा नहीं करते। जमीनी हकीकत एक ऐसा ही जोरदार पहलु है जिसे लोग अक्सर नजरअंदाज करते हैं।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आने के साथ ही सबसे ज्यादा लोगों की उत्सुकता जिस राज्य पर थी, वह था पश्चिम बंगाल। यहां भाजपा ने अबकी बार दो सौ पार का नारा देकर जिस धुंआधार तरीके से अपनी पूरी ताकत झोंककर चुनाव लड़ा था, जो हाइप बनाई थी, उससे बहुत से लोग ये मानने लगे थे कि तीसरी बार ममता दीदी आऊट हो जायेगी। ममता बनर्जी ने खेला हौबे के अपने स्लोगन के साथ बंगाली अस्मिता, स्थानीयता और भाजपा द्वारा आजमाए जा रहे धार्मिक दावों का चंडी पाठ करके जवाब दिया, उससे मुकाबला बहुत रोचक बन गया था। चुनाव में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी लगातार कोरोना संक्रमण की अनदेखी करके पश्चिम बंगाल में बिना मास्क के दीदी ओ दीदी कह रहे थे, यह उपहासात्मक तरीके से बंगाल की महिलाओं को अपना अपमान लगा। यही वजह है कि यहां की महिलाओं ने पूरी तरह से भाजपा को नरेन्द्र मोदी, अमित शाह को खारिज किया। 294 सीटों वाली विधानसभा में ममता बनर्जी ने 216 सीटों के साथ नंदीग्राम से हार के जो जीत दर्ज की है, उसके अपने मायने हैं। पश्चिम बंगाल के लोगों ने बता दिया है कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। पश्चिम बंगाल के साथ जिन तीन राज्यों के चुनाव हुए उनमें तीन राज्यों में अमूमन यथास्थिति कायम रही। तमिलनाडु और पुडुचेरी में सत्ता परिवर्तन हुआ। सबसे दिलचस्प नतीजा केरल में देखने में आया जहां पिछले कई दशकों से चला आ रहा सत्ता में बदलाव का सिलसिला टूटा और पहली बार कोई दल दुबारा उस पर काबिज हुआ। 55इस दृष्टि से केरल में माकपा की यह कामयाबी ऐतिहासिक और अभूतपूर्व है लेकिन माकपा या यह प्रदर्शन अप्रत्याशित नहीं है। दरअसल, माकपा सरकार ने जिस प्रतिबद्धता, दूरदर्शिता और जन सरोकारों के जुड़ाव के साथ दो महामारी और बाढ़ से जूझने में कामयाबी हासिल की, उससे जनता के भीतर उसके प्रति विश्वास कायम हुआ। माकपा की चुनावी विजय को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए लेकिन पश्चिम बंगाल के चुनाव की ओर देश  ज्यादा एकाग्र था। दरअसल, पिछले सात वर्षों से केंद्रीय सत्ता पर काबिज नॅशनलिस्टिक विचारधारा की राजनीतिक विजय उन इलाकों में भी मुमकिन हुई जहां उसका प्रभाव बिल्कुल नहीं था। असम और त्रिपुरा सहित उत्तर-पूर्व के राज्यों में पैर फैलाने के बाद भाजपा की नजऱ पश्चिम बंगाल पर थी, जहां 2019 के लोकसभा चुनाव में उसे अप्रत्याशित सफलता मिली। उससे आगे बढ़कर इस बार वह हिंदुत्व की विचारधारा और अकूत चुनावी संसाधनों के साथ प्रदेश की सत्ता हासिल करने के लिए कूद पड़ी थी। राष्ट्रीय अस्मिता के जिस हथियार से असम और त्रिपुरा में उसे विजय मिली थी, उसका पश्चिम बंगाल में भी उसने इस्तेमाल किया। बहुत हद तक उसे इसमें सफलता भी मिली। नतीजा यह है कि वह कम-से-कम तृणमूल के विपक्ष की 80ca0d9948825e8542d273d201a39833भूमिका तो वाममोर्चे से छीन ली लेकिन हिंदुत्व की आक्रामक राजनीति का सामना यहां बंगाली अस्मिता से हुआ। ममता बनर्जी ने दरअसल बंगाली अस्मिता को और ज्यादा राजनीतिक धार दी। यूं कहें कि आक्रामक हिंदुत्व का मुकाबला आक्रामक क्षेत्रीय अस्मिता से था। दोनों पक्षों को एक-दूसरे की ताकत का भी अनुमान था। इसलिए दोनों ने एक-दूसरे के वैचारिक इलाके में दखल देने की कोशिश भी की। ममता बनर्जी जहां नन्दीग्राम में चंडीपाठ कर अपने हिन्दू और ब्राह्मण होने का इशारा करती दिखाई दीं, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रवींद्रनाथ टैगोर की विरासत से अपनी विचारधारा को जोडऩे के लिये उनकी छबि में अपने को ढालने के नाट्य से भी परहेज नहीं किया। ये दोनों वोटरों को लुभाने की तरकीबें थीं। इसलिए एक-दूसरे के इलाके में घुसकर प्रतिपक्षी को ललकारने के इस खेल के बाद दोनों अपने इलाकों में लौट गए। इसके बाद घमासान प्रचार का आक्रामक दौर शुरू हुआ, जहां अति नाटकीयता ही आखिरी हथियार रह गयी थी जिसका भरपूर इस्तेमाल दोनों पक्षों ने किया।

चुनाव नतीजे अर्थात जनता का फैसला आ चूका हैं, ममता बनर्जी फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुकीं है। अब अगले पांच साल तक वो फिर सूबे की सर्वेसर्वा हैं। लेकिन भाजपा ने जिस पैमाने पर इन चुनावों में अपने संसाधन झोंके थे, उसके पीछे बंगाल विजय की महत्वाकांक्षा सक्रिय थी। वह भले पूरी न हुई हो, लेकिन बंगाल से उसने अस्तित्व के संकट से जूझ रहे और आफत के दिनों में एकजुट हो चुके दो पुराने प्रतिद्वंद्वियों यानी वामपंथियों और कांग्रेस को नेस्तनाबूद करने में कामयाबी जरूर हासिल की है। इस बार कांग्रेस और वामपंथ दोनों अपने पारम्परिक गढ़ में अगर जमीन खो चुके हैं तो इसलिए कि उसे भाजपा ने हथिया लिया है। तृणमूल कांग्रेस को मिली कामयाबी और कांग्रेस-वामपंथ गठबंधन की नाकामी के पीछे मुस्लिम एकजुटता भी एक कारक है। जो हिंदुत्ववादी पार्टी के भय से कांग्रेस या वामदलों को छोड़कर ममता बनर्जी के साथ हो लिया। इसमें भी भाजपा की कामयाबी को ढूंढा जा सकता है।

बंगाल में यह चुनाव दरअसल धर्मनिरपेक्ष राजनीति के अवसान और क्षेत्रीय अस्मिता तथा साम्प्रदायिक अस्मिता के उभार की ओर संकेत करता है।

हिंसा और बंगाल

बंगाल और हिंसा का बहुत पुराना नाता रहा है।  सरकार चाहे वाम मोर्चा की रही हो या फिर अब तृणमूल की, हिंसा वहां की नैसर्गिक व्यवस्था है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की भारी जीत के बाद राजनीतिक हिंसा के साथ खूनी खेल शुरू हो गया है। राज्य में कई जगहों पर हिंसक घटनाएं हुई हैं। नतीजों के बाद कई लोगों की जान चुनावी हिंसा ने ले ली है। चुनाव परिणाम आने के 24 घंटे के भीतर भाजपा के कई कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई। कई कार्यकर्ता गंभीर रूप से घायल हैं। पार्टी के कई कार्यकर्ताओं के घर और दुकान तक जला दिए गए। इन सब का आरोप सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस पर लग रहा है।

सवाल यहां यह नहीं है की हिंसा हो रही है,  सवाल यह है की पिछले सात सालो से केंद्र की सत्ता पर काबिज भाजपा अपने कार्यकर्ताओं को सुरक्षा क्यों नहीं कर पा रही है? ममता बनर्जी ने लगातार अपने चुनावी भाषणों में यह धमकी दी थी की सेंट्रल फोर्सेज के चले जाने के बाद उनकी पार्टी सब को देख लेगी, इसके बावजूद  भाजपा नेतृत्व ने इसपर ध्यान नहीं दिया।  नतीजा – बंगाल के भाजपा कार्यकर्ताओं को परिवार सहित शरण लेनी पद रही है। इससे शर्मनाक बात इस देश में क्या होगी की लोगों को अपने ही देश के अन्य राज्यों से शरण मांगनी पड़ रही है। शरणार्थी का जीवन गुजरना पड़ रहा है। केंद्र राज्यपाल से रपट मांग रही है तो पार्टी सांकेतिक धरने के केजरीवाल सरीखे उपाय का प्रयोग कर रही है। भाजपा आई टी सेल लगातार लोगों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करने  में लगी है की मोदी-शाह की जोड़ी यह सिचुएशन संभल लेगी लेकिन यह धरातल पर दीखता नहीं है। लोग बंगाल में राष्ट्रपति शासन की बात कर रहे हैं ताकि लोगों की जान बचाई जा सके लेकिन केंद्र में तत्काल यह कदम उठाने की हिम्मत दिखती नहीं है।

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क्षेत्रीय क्षत्रपों के आगे धराशायी भाजपा

पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी विधानसभा चुनाव के नतीजों ने देश के क्षेत्रीय क्षत्रपों में एक नई उम्मीदें जगाई हैं। राष्ट्रीय राजनीति को देखते हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे गैर बीजेपी और गैर कांग्रेस गठबंधन के लिए नई उम्मीदें ले कर आया है। पिछले सात वर्षों में देश के अंदर इस तरह का राजनीतिक माहौल पहले कभी नहीं देखा गया, जितना बंगाल चुनाव में टीएमसी  की जीत के बाद अब देखी जा रही है।

बंगाल जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विरोध की राजनीति करने वाले राजनीतिक पार्टियां काफी खुश नजर आ रही हैं। हालांकि, बीजेपी नेताओं का कहना है कि उन्होंने बंगाल में बीजेपी को 3 से 77 सीट तक पहुंचाया है। इसके बावजूद सवाल उठना लाजिमी है कि जो बीजेपी राज्य में सरकार बनाने का ही नहीं, 200 पार का दावा कर रही थी, उससे कहां चूक हुई? ऐसे में यह भी सवाल उठेंगे कि जिस बीजेपी का स्ट्राइक रेट राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक और नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में तो बढयि़ा रहता है, वही बीजेपी जब अकेले हरियाणा, बिहार, तमिलानाडु, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम में लड़ती है तो स्थितियां क्यों बदल जाती है? जानकार बताते हैं कि बीजेपी का इतिहास रहा है कि जहां मुख्य मुकाबला क्षेत्रीय पार्टियों से होता है (यूपी को छोड़ दें) वहां कमजोर साबित होती है। हालांकि, कई राज्यों में बीजेपी क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर कांग्रेस या दूसरी रीजनल पार्टियों को हराती भी रही है। महाराष्ट्र, बिहार, असम, हरियाणा, नार्थ-ईस्ट के कई राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों में बीजेपी रीजनल पार्टियों के साथ गठबंधन कर जीत दर्ज करती आ रही है। ताजा उदाहरण महाराष्ट्र का है जहां पर बीजेपी और शिवसेना साथ-साथ चुनाव लड़ी, लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद शिवसेना ने बीजेपी को झटका दे कर कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन कर लिया। ऐसे में जानकार मान रहे हैं कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव और 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम का असर कमोबेश दिखेगा। ऐसे बीजेपी के पास क्या विकल्प होंगे? साल 2014 में मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की प्रचंड जीत के बाद अगले ही साल लालू-नीतीश की जोड़ी ने बिहार में बीजेपी को धूल चटा दी थी। साल 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ हुए ओडिशा विधानसभा चुनाव में बीजेडी के नवीन पटनायक ने भी यही कारनामा किया था।

हालांकि, बीते सात सालों से केंद्र में सत्ता में रही बीजेपी दोबारा से असम में और पहली बार पुडुचेरी में सरकार बनाने जा रही है। बीजेपी के लिए ये राहत की बात है कि इस बार असम में उसका वोट प्रतिशत 3.7 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि पुडुचेरी में बीजेपी का वोट प्रतिशत 11.2 प्रतिशत बढ़ा है। पश्चिम बंगाल में बीजेपी इससे पहले कभी पैर नहीं जमा सकी थी, लेकिन इस बार के विधानसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन बेहतर हुआ है।

राजनीतिक विश्लेषक संजीव पांडेय न्यूज 18 से बात करते हुए कहते हैं, ‘बीजेपी के लिए असम में सत्ता में वापसी और पश्चिम बंगाल में उसके वोट प्रतिशत के बढऩे का असर साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में कमोबेश पड़ सकता है। देश में रीजनल पार्टियां भी अब ताकतवर होगी इससे इनकार नहीं किया जा सकता। ममता बनर्जी की जीत से क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा बढ़ेगा, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसका कोई खास असर नहीं दिखेगा। इसका कारण है कि इन दलों में एकजुटता का अभाव है। अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, स्टालिन, विजयन की अपनी-अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं। टीएमसी, डीएमके, सपा, शिवसेना, राजद, अकाली दल जैसे दलों का एक साथ आना मुश्किल है। इन क्षेत्रीय दलों के नेताओं का प्रभाव अपने-अपने राज्यों तक ही सीमित है।Ó पांडेय आगे कहते हैं, देश का नेतृत्व करने के लिए कार्यकर्ताओं की एक मजबूत टीम का होना जरूरी है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि ममता बनर्जी बंगाल में मजबूत हैं, लेकिन बगल से सटे राज्य झारखंड और बिहार में ममता की कोई लोकप्रियता नहीं है। इसके बावजूद मोदी विरोधी गुट में राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में ममता बनर्जी का कद बढ़ जाएगा। ममता बनर्जी की राजनीति शिखर पर जरूर है और वह राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव भी डालेंगी, लेकिन उनको यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उन्हीं के किले नंदीग्राम में बीजेपी ने धूल चटाई है। यह बीजेपी के लिए एक शुभ संकेत है। कुल मिलाकर बंगाल के चुनाव परिणामों का राष्ट्रीय स्तर पर खास प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि राज्य स्तरीय चुनाव में जनता राष्ट्रीय मुद्दों पर नहीं बल्कि राज्य स्तरीय मुद्दों पर वोट करती है।

2024 -मोदी बनाम ममता

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम बता रहे हैं कि पैर में फ्रैक्चर और ट्राईसायकल पर बैठकर फुटबॉल फेंकते हुए ममता बनर्जी ने जैसा कहा था की खेला होबे, वैसा खेला हो गया। ममता बनर्जी तीसरी बार आसानी से सत्ता पर काबिज हो गई हैं। भाजपा ने यह चुनाव बिना मुख्यमंत्री के चेहरे यानी एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर लड़ा था। वहीं, टीएमसी का चेहरा ममता बनर्जी थीं। ऐसे में सवाल उठने लगा है कि क्या 2024 के लिए ममता विपक्ष का चेहरा बन सकती है। अपनी इस हैट्रिक के साथ ही ममता बनर्जी विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा बन गई हैं।

विपक्ष में फिलहाल ममता बनर्जी जैसा कोई जुझारू और लड़ाका नेता नहीं है जो भाजपा को उसी की रणनीति और औजारों से मात दे सके। ममता बनर्जी ने ये कर दिखाया है। विपक्ष के नेतृत्व में चेहरे की तलाश करें राष्ट्रीय स्तर पर नजर डालें तो बहुत ही निराशाजनक माहौल है। पहला नाम राहुल गांधी का आता है। राहुल गांधी के नाम कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है। वे दो कदम आगे जाते हैं, तो चार कदम पीछे। राहुल गांधी के अलावा सपा प्रमुख अखिलेश यादव, बीएसपी प्रमुख मायावती, जेडीएस के अगुवा एचडी कुमारस्वामी, वामदल के सीताराम येचुरी समेत तमाम नेताओं में से कोई भी क्षत्रप नहीं है, जो बीजेपी के सामने अपनी ताकत दिखा पाया हो। केवल ममता बनर्जी ही हैं। पीएम मोदी की ललकार का मुस्तैदी से जबाब देती रही हैं। ममता बनर्जी ने धारा 370 से लेकर एनआरसी, सीबीआई की राज्यों में कार्रवाई, मां दुर्गा मूर्ति विसर्जन, जयश्री राम का नारा आदि तमाम मुद्दों में बीजेपी को खुलकर जवाब दिया है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में खेला कर दिया है।

 

नीलाभ कृष्ण

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