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बीते विधानसभा चुनावों के निहितार्थ

बीते विधानसभा  चुनावों के निहितार्थ

अप्रैल में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में सिर्फ पश्चिम बंगाल की चर्चा होना स्वाभाविक है। 294 सीटों वाली पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनने की वजह रहा वहां झोंकी भारतीय जनता पार्टी की ताकत। भारतीय जनता पार्टी के पूर्ववर्ती संगठन भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वाले डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि में भाजपा अब तक कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं हासिल कर पाई थी। भाजपा का सपना रहा है कि वह अपने पुण्यपुरूष की जन्मभूमि में अपनी ताकत दिखाए। हालिया बीते चुनावों में भाजपा ने अपनी वही चाहत पूरी करने की कोशिश की। लेकिन वह पूरी नहीं हो पाई।

इतिहास विजेताओं का ही ना सिर्फ सम्मान करता है, उसे ही याद रखता है। लेकिन इतिहास के कुछ गवाह ऐसे भी होते हैं, जो विजेताओं और पराजितों की लड़ाई के पीछे की अंत:पुर की कहानियों को भी दर्ज करते हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की जीत को वामधारा का वर्चस्व वाला राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया सांप्रदायिकता और विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हार के तौर पर दिखा रहा है। इसके अलावा उससे उम्मीद ही नहीं की जा सकती। लेकिन उसे नहीं भूलना चाहिए कि इन्हीं चुनावों के ठीक पहले यानी 2016 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को पश्चिम बंगाल में महज दस फीसद वोट और तीन सीटें ही मिली थीं। 1967 में बांग्ला कांग्रेस की अगुआई में बने गठबंधन में सिर्फ एक विधायक से खाता खोलने वाली भाजपा या जनसंघ को राज्य में कभी बड़ी सफलता नहीं मिली। लेकिन इस बार उसके रिकॉर्ड 77 विधायक विधानसभा पहुंचने में कामयाब रहे। उसे लोकसभा 2019 की तुलना में बेशक करीब दो फीसद कम वोट मिले। वैसे यह अस्वाभाविक भी नहीं था। पश्चिम बंगाल के सत्ता शीर्ष पर 34 साल तक रहे वामपंथ और देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के साथ ही फुरफुराशरीफ के मौलाना वाला गठबंधन इस चुनाव में कोई कमाल नहीं दिखा पाया और इनका खाता तक नहीं खुल पाया। जबकि पिछली विधानसभा में दोनों को मिलाकर 76 विधायक थे। स्पष्ट है कि मामला दोतरफा हो गया और उसमें ममता बनर्जी को विजय मिली। लेकिन इसके लिए उन्हें चंडीपाठ करना पड़ा, व्हीलचेयर पर बैठकर नाटक करना पड़ा। जैसे ही दो मई को नतीजे आए, वे व्हीलचेयर से उठ खड़ी हुईं और सीधे राजभवन की सीढिय़ां नापते हुए शपथ लेने पहुंच गईं। यह दृश्य वामपंथी वर्चस्व वाले मीडिया को नजर नहीं आया होगा, लेकिन पश्चिम बंगाल की जनता देख ही रही होगी। इस पूरी कवायद में एक बात और उल्लेखनीय रही कि अपनी पार्टी को ममता जिताने में भले ही कामयाब रहीं, लेकिन वे खुद नंदीग्राम से हार गईं।

पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जातियों के लिए 68 और अनुसूचित जनजातियों के लिए 16 यानी 84 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं। भाजपा केलिए गर्व का विषय हो सकता है कि इनमें से 39 सीटों पर उसने जीत दर्ज की है। और तो और, भारत में अतिवादी वाम आंदोलन उभार वाली जगर नक्सलबाड़ी इलाके से भी भाजपा की जीत हुई है। भारतीय जनता पार्टी बेशक पश्चिम बंगाल में सरकार नहीं बना पाई है। लेकिन वह मुख्य विपक्षी दल होने के चलते ममता को कम-से-कम विधानसभा में आसानी से चलने नहीं

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पश्चिम बंगाल में चिंता की बात है, चुनाव बाद की हिंसा। जिस तरह यह हिंसा हो रही है, उससे ममता की छवि को दाग लग रहा है। चुनाव बाद भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है। एक स्वतंत्र पर्यवेक्षक प्रदीप गांधी के अनुसार इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पश्चिम बंगाल के तीन हजार से ज्यादा गांवों के करीब 4105 भाजपा कार्यकर्ताओं के घर और बाइक-गाड़ी आदि को तृणमूल कांग्रेस के लोगों ने नुकसान पहुंचाया है। प्रदीप गांधी के अध्ययन के मुताबिक, करीब 34 हजार भाजपा कार्यकर्ताओं या वोटरों पर हमला हो चुका है। उनमें से करीब 14 हजार से ज्यादा आरक्षित वर्ग के लोग हैं। राज्य की महिला मुख्यमंत्री होने के बावजूद यहां करीब 6621 महिलाओं के साथ बदसलूकी हुई है। जबकि 170 के साथ बलात्कार जैसे जघन्य कांड हो चुके हैं। राज्य में चुनाव बाद हुई हिंसा में 18 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें एक मुसलमान और तीन महिलाएं हैं। परेशान और डरे कार्यकर्ताओं को संघ परिवार के संगठनों ने शेल्टरहोम बनाकर शरण दी है। दिलचस्प यह है कि इन हमलों को ना तो ममता स्वीकार कर रही हैं और न ही वामवर्चस्व वाला मीडिया। मोदी विरोध के नाम पर अपनी हेडलाइन चमकाने वाले कोलकाता से प्रकाशित होने होने वाले अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ ने इस पर अब तक कोई बड़ी खबर तक प्रकाशित नहीं की है।

यह ठीक है कि भाजपा और संघ के कार्यकर्ता इस माहौल में सशंकित हैं। डरे हुए कार्यकर्ताओं ने एहतियातन अपने निकटवर्ती असम, झारखंड और उड़ीसा में शरण ली है। अभी तृणमूल कांग्रेस भले ही विजेता है। लेकिन आने वाले दिनों में ये अत्याचार ही उसके खिलाफ लोगों की आंख खोलेंगे और वह वाटरलू जैसी लड़ाई में फंस जाए तो हैरत नहीं होनी चाहिए।

अंग्रेजों से संपर्क में सबसे पहले आने के चलते कथित नवजागरण पश्चिम बंगाल में ही हुआ। इसके बाद यहां की भद्रलोक की अवधारणा मजबूत हुई। लेकिन हिंसा पर जिस तरह बंगाल के कथित भद्र समाज ने चुप्पी साध रखी है, इसलिए यह अवधारणा भी तार-तार होती नजर आ रही है। अवधारणा का यह तार-तार होना ही आने वाले दिनों में 213 सीटें जीतने वाली ममता बनर्जी की ताकत में दरार का सबब बनेगी।

पश्चिम बंगाल के पड़ोसी असम में हुए चुनाव में भाजपा की दोबारा जीत से किसी को आशंका नहीं थी। यहां भाजपा ना सिर्फ जीती है, बल्कि कांग्रेस की अगुआई वाले गठबंधन के बावजूद जीती है। इसका श्रेय हिमंत विस्वसर्मा को माना जाता रहा। कांग्रेसी पृष्ठभूमि वाले विस्वसर्मा को भाजपा ने मुख्यमंत्री बनाकर अपना दांव खेल दिया है। भाजपा की निगाह पूर्वोत्तर के राज्यों में अपना वर्चस्व स्थापित करना और यहां की 25 लोकसभा सीटों पर अजेय बढ़त बनाना है। हिमंत में वह काबलियत है कि वे इस कठिन लक्ष्य को हासिल कर सकें।

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दक्षिण के तीन राज्यों तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी के भी चुनाव काफी मायने भरे रहे। कांग्रेस ने असम के साथ ही केरल में जीत की उम्मीद लगा रखी थी। लेकिन दोनों ही जगहों पर उसे हार मिली है। केरल में चालीस साल से चल रहे बारी-बारी वाली परिपाटी को वामपंथी मोर्चे ने तोड़ दिया है। दिलचस्प यह है कि पिछले लोकसभा चुनाव में केरल में कांग्रेस ने भारी जीत दर्ज की थी। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी यहीं की वायनाड सीट से सांसद हैं। उन्होंने समंदर में कूदकर प्रचार किया। वे तैरकर बाहर तो आ गए, लेकिन देश की पुरानी पार्टी को डूबने से बचा नहीं सके। राहत की बात यह है कि डीएमके की अगुआई में तमिलनाडु में उनके 16 विधायक चुने गए हैं। हालांकि यहां भी भारतीय जनता पार्टी पहली बार 3 विधायकों को जीताने में कामयाब रही है। कोयंबटूर दक्षिण से भाजपा महिला मोर्चा की अध्यक्ष वनति श्रीनिवासन ने लोकप्रिय अभिनेता कमल हासन को शिकस्त दी है। पुदुचेरी में तो रंगासामी की अगुआई में भाजपा के पांच विधायक जीते हैं और वहां राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने सरकार बना ली है।

इन चुनावों के समूल नतीजों को देखें तो भाजपा भले ही पश्चिम बंगाल हार गई है, लेकिन वह सबसे ज्यादा फायदे में है। तमाम दुष्प्रचार के बावजूद दो राज्यों में सत्ता हासिल करना और एक राज्य में मुख्य विपक्षी दल बनना मामूली सफलता नहीं कही जाएगी। हां, केरल में उसका दांव नहीं चला। लेकिन इस पूरे खेल में वह कांग्रेस को फिसड्डी रखने में कामयाब रही।

दिलचस्प बात यह है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी को केरल और असम में मुख्य विपक्षी बनना ही उसे सफलता नजर आ रही है। वह इसी बात से खुश है कि वह पश्चिम बंगाल की सत्ता से भाजपा को दूर रखने में कामयाब हुई है।

इन नतीजों का तात्कालिक असर यह होगा कि भाजपा को अपनी दूसरी पंक्ति के नेतृत्व को उभारने की तरफ सोचना होगा। पश्चिम बंगाल में उसकी हार की एक बड़ी वजह यह भी रही कि उसके पास मजबूत दूसरी पंक्ति का चेहरा नहीं है। भाजपा को यह भी सोचना होगा कि वह अगर अगली पीढ़ी का नेतृत्व नहीं तैयार करेगी तो उसे कठिनाइयां होंगी। इन नतीजों का कांग्रेस पर असर यह होगा कि डेढ़ साल से खाली पड़े राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर राहुल की ताजपोशी शायद फिर ना हो सके। वैसे भी ग्रुप 23 उनके खिलाफ बगावत कर ही चुका है। वह बगावत भले ही कोरोना की दूसरी लहर के चलते अभी नेपथ्य में नजर आ रही हो। लेकिन राहुल की राह आसान नहीं होगी।

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भारत में जब भी केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ कोई राज्य स्तरीय क्षत्रप उभरता है तो उसे विपक्ष की धुरी बताया जाने लगता है। इसी तर्ज पर ममता को विपक्ष की धुरी कहा जा रहा है। लेकिन पश्चिम बंगाल में जिस तरह उन्होंने बंगाली बनाम बाहरी का नारा दिया, आज की हिंसा की एक वजह यह भी है- उससे स्पष्ट हुआ कि उनके पास ना तो राष्ट्रीय सोच है और न ही राष्ट्र को समझने वाला बड़ा दिल। इसलिए उन्हें विपक्ष शायद ही बड़ा नेता माने।

तमिलनाडु में बेशक भाजपा अन्नाद्रमुक के साथ है। लेकिन जैसी कि वहां की राजनीतिक फितरत रही है, आने वाले दिनों में द्रमुक नेता और नए मुख्यमंत्री स्टालिन केंद्र सरकार से गलबहियां करते दिख जाएं तो हैरत नहीं होनी चाहिए।

 

उमेश चतुर्वेदी

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