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चुनाव बिहार में, चर्चा संसार में

चुनाव बिहार में, चर्चा संसार में

गौरवशाली अतीत वाले बिहार का भविष्य किसके हाथों में सुरक्षित रहते हुए समृद्धि पाएगा, इस सवाल का उत्तर खोजने के लिए चुनाव आयोग ने 17 मई को घोषणा कर दी। बिहार में विधानसभा चुनाव कराना कितना कठिन और अनूठा है, इसकी चर्चा ना सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी शुरू हो गई है। बिहार में विधानसभा चुनाव सितंबर-अक्टूबर में किसी समय कराए जा सकते हैं। साथ ही गोपनीय व अनौपचारिक रूप चुनाव में संभावित उम्मीदवारों व पार्टियों द्वारा भी बाहुबल व धनबल के प्रयोग की रणनीति अपनाई जाने लगी है, जिसकी आशंका सदैव बनी रहती है। हालांकि चुनाव आयोग ने अपने परंपरागत बयान में कहा है कि धनबल-बाहुबल पर अंकुश लगाने के लिए राज्य में बड़े पैमाने पर केंद्रीय बल तैनात होंगे।

यह चुनाव देश के विभिन्न राज्यों में हुए चुनावों से भिन्न और रोचक होगा, क्योंकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से वैचारिक मतभेद को पूरा देश जानता है। स्वाभाविक है, चुनाव भाजपा और जदयू के लिए प्रतिष्ठा का मुद्दा बनेगा, यह तय है। वैसे इस चुनाव में बीजेपी का एकजुट जनता परिवार (जिसमें शरद यादव/नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले जदयू और लालू प्रसाद के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनता दल) से मुकाबला होने की उम्मीद है। यह चुनाव कितना अहम और राष्ट्रीय परिदृश्य पर छाप छोडऩे वाला होगा, इसका अंदाजा इसी से लग सकता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने बिहार के चुनाव को सभी चुनावों की ‘जननी’ करार दिया। हालांकि अभी चुनाव की तिथि घोषित नहीं हुई है, पर पटना से लेकर दिल्ली तक इस कदर हलचल है, जैसे लग रहा है कि हफ्ते-दो हफ्ते में ही चुनाव होने वाले हैं। यह सर्वविदित है कि बिहार में होने वाले किसी भी चुनाव (छोटा हो या बड़ा) में धनबल और बाहुबल का जबर्दस्त बोलबाला रहता है, जिसकी चर्चा देश में ही नहीं, बल्कि विदेश तक में रहती है। बिहार सरकार का मौजूदा कार्यकाल नवम्बर में खत्म हो जाएगा। बिल्कुल संक्षेप में बिहार के अतीत पर प्रकाश डालें तो समझ में आ जाएगा कि बिहार की गतिविधियां, चाहें सियासी हों अथवा सामाजिक या शैक्षणिक, कितनी अहम हैं। बिहार का इतिहास तमाम विविधताओं से भरा रहा है। प्राचीन बिहार, जो कि मगध के रूप में जाना जाता था, करीब 1000 वर्षों तक भारत में शिक्षा, संस्कृति, शक्ति और सत्ता का केंद्र था। भारत के पहले साम्राज्य, मौर्य साम्राज्य के साथ ही दुनिया की सबसे बड़ी शांतिवादी धर्म बौद्ध धर्म भी बिहार से पैदा हुआ। विशेषकर मौर्य और गुप्त राजवंशों के तहत मगध साम्राज्य, दक्षिण एशिया के एकीकृत बड़े हिस्से के नीचे एक केंद्रीय शासन थी जो कि पहले पाटलिपुत्र (अब पटना) के रूप में जाना जाता था।

PAGE 42-43धार्मिक महाकाव्यों के बाहर लिखा प्राचीन भारतीय पाठ में से कई प्राचीन बिहार में लिखा गया था, जिनमें ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ प्रमुख था। बिहार दुनिया में पहली ज्ञात गणराज्यों में से एक है जो कि लिच्छवी, महावीर (599 ई.पू.) के जन्म से पहले से अस्तित्व में है। गुप्तकालीन भारत के स्वर्ण युग के रूप में आज भी जाना जाता है। पाल साम्राज्य ने भी पाटलिपुत्र में अपनी राजधानी बनाया। बाद में बिहार 1540 में इस्लामी अवधि के दौरान सूरी वंश के उद्भव का केन्द्र रहा। 1556 में सूरी वंश के पतन के बाद, बिहार फिर से भारत में एक सीमांत खिलाड़ी बन गया।

बिहार ने 1857-58 के युद्ध में भी निर्णायक भूमिका निभाई। 1947 के बाद से बिहार भारतीय संघ में एक राज्य के रूप में विद्यमान है। समृद्धशाली अतीत वाले बिहार को इस चुनावी वर्ष में दिल्ली से मिलने वाली सहायता राशि में 42 प्रतिशत की कटौती और कर्ज के दुगने होने कि स्थिति में आर्थिक सदमें के दौर से गुजरना पड़ रहा है।

बीते लोकसभा चुनाव में शानदार कामयाबी हासिल करने वाली भाजपा के नेता इस गुमान में हैं कि यह चुनाव में पार्टी का बेहतर प्रदर्शन निश्चित है, लेकिन यह आसान नहीं है। इधर, विधान परिषद चुनाव में मतभेद और जनता परिवार का विलय टल जाने से राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार की पार्टियों के बीच गठबंधन को लेकर सवाल उभरने लगे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मतभेद के बावजूद नीतीश अपनी सियासी जमीन बचा पाएंगे? वहीं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए इस बार का चुनाव किसी सियासी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है, क्योंकि लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा से नीतीश ने गठबंधन तोड़ दिया था। हालांकि, आम चुनाव में करारी शिकस्त के बाद नीतीश ने जीतनराम मांझी को सीएम की कुर्सी सौंपी, लेकिन उनका ये दावं उल्टा पड़ गया। मांझी की महात्वाकांक्षा ने नीतीश को नुकसान पहुंचाया, ऐसे में नीतीश ने मांझी को हटाकर खुद सीएम की कुर्सी संभाली। बदली परिस्थितियों में चुनाव विश्लेषकों की नजर इस चुनाव पर है।

PAGffE 42-43हालांकि यह भाजपा के लिए भी आसान नहीं है, क्योंकि लोकसभा चुनाव के बाद जितने भी उपचुनाव हुए, उन सबमें भाजपा को मुंह की खानी पड़ी है। बिहार, राजस्थान, उत्तराखंड, यूपी, राजस्थान और मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गृह प्रदेश गुजरात में भी भाजपा का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा। जानकारों का कहना है कि बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा बेहतर प्रदर्शन के लिए केन्द्रीय सत्ता का दुरुपयोग भी कर रही है। उदाहरणस्वरूप बिहार ने वर्ष 2015-16 के लिए सरप्लस राजस्व बजट प्रस्तावित किया, लेकिन बदले में उसने राज्य को संचालित करने के लिए प्रस्तावित धन राशि में कटौती की।

बिहार ने सरप्लस बजट को प्रस्तुत करने की प्रक्रिया में सामाजिक सेवाओं में खर्च होने वाली धन राशि से कटौती कर पेश किया, जो कि 43,620  करोड़ रूपए  2014-15 में से 38,080 करोड़ रूपए आवंटित थी। बिहार वर्तमान वित्तीय वर्ष 2015-16 में 11,980.95 करोड़ रूपए का सरप्लस बजट प्रस्तुत करने के लिए उत्सुक है। पटना के रास्ते गंगा सागर तक का सफर तय करने वाली गंगा की अविरल धारा अपने साथ बहुतों गर्दो-गुबार को प्रवाहित करती रही है। इसने पाटलीपुत्र से पटना तक की स्मृतियों को सहेजा और प्रवाहित किया है। कई राजवंशों के उत्थान-पतन की गाथाओं को गर्भ में रखा है।

चाहे चंद्रगुप्त की स्मृतियां हो या फिर लालू प्रसाद की राजनीतिक उत्थान या फिर हासिये पर जाने की घटना, गंगा की यह धार सबकी गवाह है। जब अखबारों में ‘बिहार में विकास’ सुर्खियां बटोर रही है, तब राज्य के भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी द्वारा विधानसभा में पेश सालाना आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट कुछ अलग कहानी बयां करती है। इस रिपोर्ट में मोदी ने कहा था कि बिहार में प्रति व्यक्ति आय पूरे देश में सबसे कम है।

अब यदि रिपोर्ट के आंकड़ों पर गौर करें तो राज्य की प्रति व्यक्ति सालाना आय 17,590 रुपए है। यह राशि राष्ट्रीय औसत का केवल एक तिहाई है। बीते वित्तीय वर्ष 2009-10 में राज्य का सकल घरेलू उत्पाद 1,68,603 करोड़ रुपया था। जबकि हाल ही में प्रकाशित हुई राज्य आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट 2010-11 के अनुसार राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का योगदान कम हुआ है। फिर सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों? क्या गंगा द्वारा सिंचित जोत जमीन की उर्वरकता कम हुई है या फिर खेती के प्रति बिहार के लोगों में उदासीनता ने ऐसा किया? बहरहाल, अब वक्त बिल्कुल सामने आ चुका है। देखना है कि कौन, किस तरह से बिहार की जनता को अपनी ओर आकर्षित करता है।

पटना से राजीव रंजन तिवारी

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