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धर्म-निरपेक्षता बनाम धर्म-सापेक्षता

धर्म-निरपेक्षता बनाम धर्म-सापेक्षता

धर्म क्या है? यह प्रश्न सदैव महत्वपूर्ण रहा है। आज एक बार फिर इस पर चर्चा आवशक हो गयी है क्यूंकि हर कोई इसकी व्याख्या अपने-अपने ढंग से, अपनी सुविधा और स्वहित के अनुसार कर रहा है। धर्म का अर्थ अत्यंत यापक है। धर्म कर्तव्य है तो स्वभाव भी और प्रवृति भी। इसको (धर्म को) सम्प्रदाय के समान समझना एक सोची समझी साजिश है। हिन्दू जीवन पद्धति को एक धर्म के रूप में समझने और प्रचारित करने में कुछ गलत नहीं परन्तु इसे एक सम्प्रदाय के समान समझकर उसी रूप में प्रचारित करने के मूल में ही साजिश है। प्रकृति के सनातन सच से शिक्षा ले कर अपना जीवन यापन करने वाले समाज को हिन्दू कहा गया। पृथ्वी के उस भू-भाग को जहां इस प्रकार का जीवन जीने वाला समाज रहता है, उस भूखंड (निवास क्षेत्र) को हिन्दुस्थान कहा गया।

हिन्दुस्थान में हर प्रकार का समुदाय व सम्प्रदाय निवास करता रहा जिन्हें एक समाज के रूप में सभी को हिन्दू कहा गया। जिस प्रकार ब्रिटेन निवासी ब्रिटिशर, मंगोलिया निवासी मंगोलियन व अमरीकावासी अमेरिकन कहलाये ठीक उसी प्रकार हिंदुस्थान निवासी हिंदुस्थानी अर्थात हिन्दू कहलाया। प्रकृति से ज्ञान प्राप्त कर इस भूखंड के निवासी ऋषि एवं हमारे पूर्वजो ने जो जीवन जीने की कला सीखी व सिखाई, उस जीवनशैली को ही हिन्दु जीवन पद्धति कहा गया।

इस जीवनशैली में सभी पूजा पद्धतियों का सम्मान नीहित है। सर्वशक्तिमान एक है जो इस सृष्टि का संचालन करता है और उस तक पहुंचने02 के रास्ते अनेक है। उसकी किसी भी रूप मे पूजा/इबादत की जा सकती है। यही सनातन सत्य है। यह ही हिन्दू जीवन दर्शन या जीवन शैली है जिसमे धर्म के मूल तत्व है- कर्तव्य बोद्ध जैसे कि माता-पिता के प्रति संतान का, पति-पत्नी का, संतान के प्रति माता-पिता का, गुरु-शिष्य का, आदि इसी प्रकार अहिंसा, न्याय, सदाचरण, सद्गुण आदि सब धर्म में समाहित है। अत: इस जीवन शैली को कहा गया। हिन्दू जीवन पद्धति में अनेक सम्प्रदाय सम्मलित है। इसकी तुलना किसी भी सम्प्रदाय के समान करना ही गलत है।

एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति, अर्थात, सत्य एक है जिसे बुद्धिमान विभिन्न नामों से बुलाते हैं।

सर्वशक्तिमान, सृष्टि के संचालक, एक मात्र अंतिम सत्य है जिस तक पहुंचने के रास्तो अर्थात पूजा/इबादत के अलग-अलग तरीकों ने ही इन सम्प्रदायों को जन्म दिया। यह मानना उचित नहीं है कि सर्वशक्तिमान तक पहुंचने का मेरा रास्ता/पूजा का माध्यम ही सबसे अच्छा है, मेरा तरीका ज्यादा अच्छा है, मेरी शिक्षा ही सर्वोत्तम है। इन मुद्दों को लेकर झगड़ा इन अलग-अलग रास्तो के ठेकेदारो ने शुरू किया। इसी उद्देश्य से इन ठेकेदारों ने समाज को अलग-अलग वर्गों में बांट कर अपना प्रभुत्व स्थापित करना प्रारभ किया। इस प्रक्रिया में न/सत्ता पर काबिज होने की भी होड़ लगी और वर्ग विशेष को खुश करने की दोड़ में यह सब जुट गए।

किसी के जीवन में पूजा अर्चना/इबादत महत्वपूर्ण है परन्तु यह जीवन की दिनचर्या का एक अंश-मात्र ही है। जीवन के इस अंश को, जिससे सम्प्रदाय निर्धारित होता है, उसको धर्म (जो एक जीवन शैली है) के समानार्थक रूप में परिभाषित व प्रचारित किया जाना ही इस षडयंत्र का आधार है। पृथ्वी के इस भूभाग (हिन्दुस्थान) में रहने वालो की जीवन पद्धति जोकि प्रकृति से आलोकित ज्ञानवर्धक शिक्षा को समाहित कर संचालित है, उसको कमतर कर आंकने की कोशिश की गई।’

03हिन्दुस्थान की जीवनशैली अर्थात ‘हिन्दू धर्म में अनेक मतावलम्बी एवं सम्प्रदाय समाहित है और यह सभी यहां एकजुट होकर निवास करते रहे है। हिन्दुस्थान के प्राकृतिक सौंदर्य और सम्पन्नता ने पृथ्वी के अन्य भूभागो के निवासियो को अपनी और आकर्षित किया। इन्हीं लोगो ने अपने-अपने स्वार्थ, लालच तथा ईष्र्या के चलते यहां अक्रान्ता बन लूट की मंशा से शासन पर कब्जा करने की व्हु-रचना बनायी और अपना आधिपत्य स्थापित करने हेतु हिन्दुस्थान की जीवनशैली अर्थात धर्म को पूजा पद्धति के रूप में चिन्हित व प्रचारित कर सम्प्रदायो में बांटा। हिन्दू धर्म की विशाल और व्यापक पहचान पर ही आघात कर इसको एक सम्प्रदाय के समकक्ष रखा। इसके पश्चात यहां के समाज को जातिगत आधार पर बांटकर आपस में लङ़वाने की नीति बनायी। हिन्दू धर्म के अंतर्गत आने वाले बौद्ध, जैन, आर्य-समाजी, नामधारी आदि अनेक अन्य मतावलंबी एवं समुदाय क्या है? यह सभी मुस्लिम, क्रिश्चियन, सिख की तरह सम्प्रदाय है न कि एक अलग धर्म। अत: धर्म को संप्रदाय/रिलिजन/मजहब का समानार्थी समझना अनुचित है।

यह सब धर्म शब्द का अंग्रेजी भाषा में कोई समकक्ष शब्द न होने के कारण एक षडयंत्र के अन्तर्गत किया गया। लार्ड मैकॉले ने इसका बीजारोपण किया। उसके विचार जो उन्होंने ब्रिटिश संसद में व्यक्त किये थे वह 2 फरवरी 1835 में अखबार में छपे वक्तव्य में पढे जा सकते है। वास्तव में जो सच 1835 में ब्रिटिश संसद में लार्ड मकाउलय द्वारा बोला गया वो हमारी हिन्दू सांस्कृतिक पहचान की स्वीकृति है। उसका ब्रिटिश संसद में कहना था कि –

‘यहां कोई व्यक्ति भिखारी नहीं, चोर नहीं, इतनी सम्पन्नता जिसका मूल कारण यहां की जनता के उच्च नैतिक मूल्य है, यह इतने बुद्धिमान है कि मुझे नहीं लगता की हम कभी इन्हें (इस देश यानि हिन्दुस्थान को) जीत  पायेगे जब तक कि हम इस राष्ट्र की मूल ताकत को न तोड़े जो की इसकी आध्यात्मिक विरासत और संस्कृति में निहित है। इसलिये भारत की पुरानी और प्राचीन शिक्षा व्यवस्था और संस्कृति को बदलना चाहिए जिससे भारतीयों को लगे कि विदेश और अग्रेजी उनकी अपनी व्यवस्था से अच्छी है।’

हमारी शिक्षा में ‘धर्म ‘और’ सम्प्रदाय के भेद को बताया और समझाया गया है।

समस्या ‘धर्म’ शब्द के अर्थ को लेकर है। वास्तव में अंग्रेजी भाषा में ‘धर्म’ को ‘सम्प्रदाय’ के समान समझा या बताया गया है जिस कारण सभी भ्रान्तियां उत्पन्न हुई है। धर्म बहुत व्यापक है जिसके बिना सब अधूरा है। क्या सूर्य प्रकाश का, धरती उत्पादन एवं प्राकृतिक पोषणाहार का अपना धर्म छोड़ सकते है? बिल्कुल नहीं। वह अपने धर्म का पालन कर रहे है और सूर्य का प्रकाश व धरती का पोषणाहार सभी सम्प्रदायो वर्गो व समुदायो के लिए समान रूप से उपलब्ध होता है। यदि इन्होंने अपना-अपना धर्म त्यागा तो पृथ्वी पर प्रलय आ जाएगी। इसलिए ‘धर्म-निरपेक्ष’ शब्द ही गलत है। वास्तव में इसकी व्याख्या को समझकर ही इसका महत्व समझा जा सकता है।

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‘मैं धर्म सापेक्ष हूं, धर्म निरपेक्ष नहीं।’

दरअसल जब मैं बच्चा था, कोई गीत, भजन और प्रवचनों के दर्शन (फिलॉसफी) नहीं समझता था लेकिन धार्मिक सम्मेलन और प्रवचनों में किसी परिवारजन के साथ जाता था तो कथा के समापन पर समवेत स्वरों में यह प्रार्थना अवश्य सुनता था –

‘धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो।’

सीधी सरल भाषा में कही गई बात मेरी समझ में आ जाती थी और दोनों हाथ ऊपर उठाकर मैं भी वही दुहराता था। धीरे-धीरे मेरे अवचेतन मष्तिष्क में ये बात बैठती गई। किसी भी प्रवचन या हमारे पूजन के अनुष्ठानों में जाकर आप आज भी सुन सकते हैं कि कार्यक्रम के अंत में प्राणियों में सद्भावना और विश्व कल्याण की दुआ मांगी जाती है। यह दुआ सार्वभौम प्रकृति की होती है जिसमें ये नहीं कहा जाता कि जो सूर्य को अर्घ्य न देगा, या जो मूर्ति पूजा नहीं करेगा, उसका कल्याण न हो। उसमें ये नहीं कहा जाता कि जो नमाज पढ़ेगा या जीव की कुर्बानी देगा, उसका कल्याण न हो।

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यह दुआ मेरे जीवन की पहली धार्मिक सीख थी। अब आप ही बताइए ऐसे धर्म को छोड़कर मैं धर्म निरपेक्ष कैसे हो जाऊं? फिर और बड़ा हुआ। 10 साल की उम्र में मैंने संस्कृत में पढ़ा –

‘सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे संतु निरामया:। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मां कश्चित् दुख भागभवेत।।’

सबके कल्याण की कामना करता है यह श्लोक। कोई भेदभाव नहीं कि जो एक विशेष तरीके से उपासना करेगा, वही सुखी और निरोगी रहेगा।

ऐसा नहीं कि जो नमाज पढ़े या किसी निराकार ईश्वर को पूजे, वही स्वस्थ रहेगा, निरोगी रहेगा। निराकार ब्रह्म और मूर्तिपूजक में कोई भेद नहीं, सबके कल्याण की कामना इस प्रार्थना में की गई है।

मैं और बड़ा हुआ तो ये मंत्र पढ़ा – ‘अयं निज: परोवेति, गणनां लघु चेतसाम। उदार चारितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम।।’

(यह मेरा है, ये पराया है, छोटी बुद्धि वाले ऐसा सोचते हैं। उदार चित्त व्यक्ति के लिए सारी पृथ्वी ही एक कुटुंब है।)

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साधारण शब्दों में धर्म के बहुत से अर्थ हैं जिनमें से कुछ ये हैं- कर्तव्य, अहिंसा, न्याय, सदाचरण , सद्गुण आदि । धर्म का शाब्दिक अर्थ होता है, ‘धारण करने योग्य’ सबसे उचित धारणा अर्थात जिसे सबको धारण करना चाहिये। मुस्लिम, ईसाई, जैन या बौद्ध आदि धर्म न होकर सम्प्रदाय या समुदाय मात्र हैं।

आज समाज का हर वर्ग, फिर चाहे वो राजनेता हो, प्रशासक हो, अध्यापक हो आदि -आदि अधिकतर अपने-अपने धर्म से विमुख होकर ‘धर्म-निरपेक्ष’ होने का प्रयास कर रहे है। इसलिए ही आज अशांति, तनाव व समाज में हर का भ्रष्टाचार रहा है। इसलिए ही यह महत्वपूर्ण है कि ‘सम्प्रदाय-निरपेक्ष’ बने न की ‘धर्म-निरपेक्ष’। आप जहां भी है उस कार्य के अपने धर्म का ईमानदारी से पालन करेंगे तो ‘सम्प्रदाय-निरपेक्ष’ स्वत: ही हो जायेंगे।

अपनी सांस्कृतिक धरोहर को पहचानो, उस पर अपने पूर्वजो की भान्ति गर्व करो, स्वत: ही ‘सम्प्रदाय-निरपेक्ष’ बन जायोगे। अत:, ‘धर्म-निरपेक्ष’ नहीं ‘धर्म’ सापेक्ष बनो। इन्ही मूल्यों पर चलते हुए हम विश्व गुरु रहे है और हम पुन: विश्व गुरु की उसी प्रतिष्ठा को पा सकते है।

इससे भी बड़ी धर्मनिरपेक्षता कहीं हो तो दिग्दर्शन दिजीयेगा। मैं भी धर्म सापेक्ष रहने की बजाय धर्म निरपेक्ष होने की सोचूंगा।

 

भूपेन्द्र धर्माणी

(लेखक, पूर्व संपादक, हिंदुस्थान समाचार एवं हरियाणा के पूर्व राज्य सूचना आयुक्त हैं।)

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