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वैक्सीन का राजनीतिकरण : भारत के विपक्ष का घिनौना रूप

वैक्सीन का राजनीतिकरण : भारत के विपक्ष का घिनौना रूप

एक ओर देश और विश्व में कोरोना कहर बरपा रहा है तो दूसरी ओर भारत में विपक्षी (पारिवारिक) दल राजनीतिक रोटियां सेंकने हेतु मोदी सरकार पर हमलावर हैं। जनता द्वारा बड़े पैमाने पर अस्वीकृत यह विपक्ष वैक्सीन पर राजनीतिक दांवपेंच में सतत जुटा हुआ है। जब भारतीय वैक्सीन ‘कोवेक्सिन’ तैयार होकर आयी तो कांग्रेस ने उसकी विश्वीसनीयता को ही प्रश्नां कित कर दिया। परिणामस्वरूप वैक्सीन (टीका) को लेकर जनता में बड़े पैमाने परविभ्रम उत्पन्न हुआ। एक समय ऐसा भी आया कि वैक्सीन को लेकर फैलाये गये नानाविध भ्रमों के कारण लोगों में भय का वातावरण उत्पन्न हुआ। परिणामत: चिकित्सा केंद्रों में वैक्सीन उपलब्ध होने के बावजूद लोगों ने वैक्सीन लगाना उचित नहीं समझा। कांग्रेस ने सरकार तथा वैक्सीन पर अविश्वामस करते हुए सर्वप्रथम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को वैक्सीन लगवाने की वकालत की। वहीं, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने तो वैक्सीन को ‘बीजेपी वैक्सीन’ कहकर उसे अविश्वनसनीय करार दे दिया। स्मरण रहे, जब संपूर्ण विश्व भारत की ओर आशान्वित होकर वैक्सीन के लिए देख रहा था, अखिलेश यादव ने कहा कि उन्हें ‘भाजपा की वैक्सीन’ पर भरोसा नहीं है। पारिवारिक दलों के ऐसे नेताओं के नानाविध भ्रामक बयानों के चलते भारत में वैक्सीन की मुहिम मंथर होती गयी। प्राय: पारिवारिक दलों के ऐसे नेता अपनी छवि चमकाने के लिए वैश्विचक पटल पर भारत की छवि को धूमिल करने का सतत उपक्रम करते हैं। उनके लिए देशहित और लोकहित नहीं, अपितु परिवारहित और दलहित ही सर्वोपरि है।

जब कोरोना के मामले बढऩे लगे, तब भी ऐसे ही पारिवारिक दलों के अनुयायियों ने यह भ्रम भी उत्पन्न किया कि चूंकि लोग वैक्सीन नहीं लगा रहे हैं, मोदी सरकार आंकड़ों का भय दिखाकर लोगों को असुरक्षित वैक्सीन लगाने का उपक्रम चलाना चाहती है। अपना राजनीतिक भविष्य चमकाने के लिए इन दलों ने भारतीय जनता को समय-असमय मृत्यु के अंधकूप में धकेला है। इनका एकमात्र एजेंड़ा है- येन-केन-प्रकारेण मोदी की छवि को मलीन करना और उन्हें सत्ता से दूर करना। इस कल्पना में वे अतिउत्साहित होकर भारत तथा भारतीय जनता को हानि पहुंचाते हैं। वास्तव में ऐसे राजनेता लोगों को दिग्भ्रमित कर मरने वालों के आंकड़ों में अपने उज्ज्वल भविष्य का स्वप्न देख रहे हैं। वैक्सीन के विरुद्ध की गयी इस कुटिल राजनीति को ‘मौत की राजनीति’ के रूप में देखना चाहिए।

जब ‘वैक्सीन मैत्री’ के अंतर्गत विदेशों को वैक्सीन दी गयी तो अचानक जगते हुए इन्हीं महानुभावों ने फिर ‘इंडिया फस्र्ट’ का राग अलापना आरंभ किया और जनता को मोदी सरकार के विरुद्ध भड़काने का सतत उपक्रम किया। इन पारिवारिक राजनीतिक दलों को लगता है कि भारत की जनता को जब-तब मूर्ख बनाया जा सकता है। परंतु मोदी के विरुद्ध राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय ‘लॉबिंग’ के बावजूद भारतीय जनमानस मोदी सरकार के साथ दिखायी दे रहा है। स्मरण रहे, ‘इंडिया फस्र्ट’ के रागालाप के परिणामस्वरूप ही अमेरीका ने भारत को वैक्सीन बनाने की सामग्री न देने की बात की थी। अब स्पष्ट है कि देश के लिए विपरीत परिस्थितियां उत्पन्न करना ही इनका उद्देश्य रहा है।

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वैक्सीन के निर्यात और ‘वैक्सीन मैत्री’ को समझने के लिए विदेश मंत्री एस. जयशंकर द्वारा राज्यसभा में दिये गये वक्तव्य को जानना-समझना होगा। उन्होंने अपने वक्तव्य में भारतीय संस्कार – ‘उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्’ का सोद्देश्य पुनर्पाठ किया है – ‘भारतीय होने के नाते, हम सभी अपनी संस्कृति, परंपराओं, विरासत और इतिहास के आधार पर स्वाभाविक रूप से अन्तर्राष्ट्रीयतावादी हैं। हमने इस अन्तर्राष्ट्रीयतावाद और राष्ट्रवाद के बीच कभी विरोधाभास नहीं रखा, जो हमारे स्वतंत्रता संग्राम और उसके बाद राष्ट्र-निर्माण के प्रयासों का आधार रहा है। अपनी विरासत से प्रेरणा लेकर हम अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और एकजुटता की बेहद मजबूत आवाज बन कर उभरे हैं।… कोविड-19 महामारी का जब प्रभाव काफी अधिक था, तब भी हमारी औषधि और चिकित्सा क्षमता की वैश्विक मांग थी। अगर हम उन मांगों को पूरा कर सके, तो यह कोविड-19 के संदर्भ में हमारी क्षमताओं को मजबूत बनाने के कारण हो सकी है। हमने कोविड-19 के खिलाफजिस तरह के टीकाकरण की कल्पना की थी, उसके लिए ऐसा ही दृष्टिकोण अपनाना भी जरूरी था।… हमारे उत्पादकों ने द्विपक्षीय रूप से या कोवैक्स पहल के माध्यम से अन्य देशों को वैक्सीन आपूर्ति के लिए अनुबंध भी किया है। अभी तक, हमने 72 देशों को ‘मेड इन इंडिया’ वैक्सीनों की आपूर्ति की है।’ उक्त वक्तव्य में विदेश मंत्री ने राष्ट्र की बात करते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्र की नीति एवं परंपरानुरागी रीति को भी अत्यंत सहज भाव में प्रस्तुत किया है।

परंतु जिन्हें इस देश में विश्वास नहीं, इसकी समृद्ध परंपरा एवं विशाल विरासत का ज्ञान नहीं, वे प्राय: संकीर्ण होकर सोचते हैं। ‘अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्’ – सच है कि जिनका हृदय (चित्त) संकुचित एवं स्वार्थांध होता है, वे अपना-पराया का भाव लेकर लाभ की राजनीति करते हैं। ऐसे ही छोटे चित्त एवं सोच वाले परिवारवादी दलों के नेता वैक्सीन पर भरपूर राजनीति कर रहे हैं। दूसरे देशों को वैक्सीन देने पर विरोध जनहितार्थ-देशहितार्थ नहीं अपितु मोदी विरोध के लिए है। उन्हें देश और लोक से कभी कोई लगाव रहा ही नहीं।

यह भी स्मरणीय है कि भूमंडलीय अर्थव्यवस्था में एक देश केवल अपने लिए ही नहीं सोच सकता। यही कारण रहा कि अमेरीका ने पहले तो नकारा परंतु उसे भारत को आवश्यक सामग्री देनी ही पड़ी। उल्लेखनीय है कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत की अहम भूमिका है। ऐसे में भारत यह नहीं कह सकता कि वह अन्य देशों से आवश्यक औषधीय सामग्री लेकर वैक्सीन तो बनायेगा परंतु अनुबंधानुसार निर्यात नहीं करेगा। ऐसा करने से भारत में वैक्सीन निर्माण में बाधा उत्पन्न होती और वैक्सीन की प्रचंड कमी होती। भविष्य में अन्य देशों से भारत को कोई सहायता भी नहीं मिल पाती सो अलग। यदि मोदी सरकार ऐसा कोई निर्णय करती, तब भी विपक्ष को एक मुद्दा मिल जाता कि मोदी की विदेश नीति देश हितानुकूल नहीं है। हमारे देश का वर्तमान विपक्ष ‘मुद्दों की राजनीति’ करता है। वह मुद्दे खोजता है, अवसर रचता है और अपना उल्लू सीधा करने की जुगत में भिड़ जाता है। ऐसी हरकतों से स्पष्ट हो जाता है कि वह बहुत देर तक सत्ता से दूर नहीं रह सकता। जिन्हें धांधलियां कर अपने लिए तथा पीढिय़ों के लिए संपत्ति-परिसंपत्ति जुटाने की आदत (लालसा) हो जाती है, वे प्राय: इसी तरह की ओछी राजनीति करते हैं। ऐसे नेता अपनी रोटियां सेंकने के लिए कोई-न-कोई मुद्दा रचते-गढ़ते हैं। वैक्सीन का राजनीतिकरण भी ऐसा ही मुद्दा है।

वैक्सीन निर्यात के राजनीतिकरण के आलोक में यह कहा जा सकता है कि जो देश का भला नहीं सोचते, उनसे भला विश्व के भले की सोचने की अपेक्षा करना नितांत अनुचित है। ऐसे लोगों के लिए उनका परिवार ही महत्वपूर्ण होता है। वे मानते हैं कि उनके दादा-परदादाओं ने ही ‘भारत की खोज’ की है। अत: वे उत्तराधिकार में भारत की सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं। साधारण परिवार के व्यक्ति का प्रधानमंत्री बनना उन्हें फूटी आंख नहीं सुहाता। ऐसे परिवारवादियों को सत्तासीन करने हेतु कुछ ‘एजेंट’ बुद्धिजीवी और उनके द्वारा पोषित बिकाऊ मीडिया निरंतर मोदी सरकार को पदच्युत करने के उद्देश्य से षडयंत्र रचते रहते हैं। वैक्सीन का राजनीतिकरण उसी दिशा में एक और पहल है।

स्मरणीय है कि लगभग छह-सात करोड़ वैक्सीन के निर्यात से भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो ख्याति मिली उसके परिणामवश कोरोना की दूसरी लहर के दौरान उत्पन्न हुई विकट स्थितियों में अन्य देशों ने भारत का भरपूर सहयोग किया है। किसी भी परिस्थिति में देशवासियों को परिवारवादी नेताओं के बहकावे में नहीं आना चाहिए। इस समय परीक्षा नरेंद्र मोदी सरकार की नहीं अपितु भारत के सच्चे प्रेमियों की है। अत: षडयंत्रकारी मीडिया और ‘एजेंट’ बुद्धिजीवियों के बहकावे में आने से बचने की नितांत आवश्यकता है। हम जानते ही हैं, ये ‘एजेंट’ अवसरों की खोज में ही नहीं रहते, अपितु अवसर (प्लॉट) रचते हैं। राष्ट्र-हितैषी सरकार के शासन संभालने के उपरांत इनके द्वारा रचे नानाविध प्लॉट देश ने देखे ही हैं। अत: वैक्सीन के नाम पर वर्तमान में चल रहे सरकार विरोधी नैरेटिव को जानने-समझने का प्रयास करने की आवश्यकता है। देश विभाजनकारी परिवारवादी दल तरह-तरह के गठबंधन कर मोदी को हटाने में जुटे हुए हैं। अत: देशहित में इनके और इनके पोषित ‘एजेंट’ बुद्धिजीवियों के बहकावे में आने से बचना अत्यंत आवश्यक है। इस विशाल जनसंख्या वाले तथा चरित्रहीन एवं राष्ट्रद्रोहियों से भरे देश को संभालना सहज संभव नहीं है। कोरोना महामारी में भी इनके नानाविध ‘प्लॉट’ चल ही रहे हैं। पहले वैक्सीन को नकार, फिर उसकी कमी तथानिर्यात पर हाहाकार! वे अपने दुष्चरित्र को चरितार्थ करने से कदापि नहीं चूकते। बहुजन समाज की बात कर, समाजवाद की बात कर, जनता की बात कर, छद्म राष्ट्रवाद की बात कर ठगने वाले पारिवारिक दलों को रोकना हो तो देश को मोदी सरकार के साथ खड़े रहना होगा। सच्चे भारत प्रेमियों का यह भी दायित्व है कि किन्हीं भी परिस्थितियों में परिवारवाद को जीतने ना दें। परिवारवादी गिरोह येन-केन-प्रकारेण इस देश तथा राज्यों का शासन उत्तराधिकार में पाना चाहता है। यह गिरोह सदैव वही करता आया है। देश को बचाना हो तो मोदी सरकार के साथ बने रहने में ही भलाई है। पीछे पछताने से कुछ नहीं मिलेगा। उल्लेखनीय है कि अटल सरकार को एक और अवधि मिल जाती तो देश का वर्तमान और बेहतर होता। परंतु, देश-हितैषियों को प्राय: ठगों ने मिलजुल कर परास्त किया और यत्र-तत्र-सर्वत्र जो ठगी तथा लूट होती रही, वह अविस्मरणीय है। आज जो खत लिख कर सुझाव दे रहे हैं, वे अपने समय में ठग गिरोह के मौन मोहक मुखिया रहे हैं।

देश का दुर्भाग्य कि विपक्ष मोदी की प्रत्येक पहल में राजनीति के अवसर तलाशता है। राजनीतिक गांधी परिवार अपनी प्रासंगिकता खोने के बावजूद मोदी सरकार पर तंज कसने से नहीं चूकता। कितना अच्छा होता, यदि वर्षों के शासन काल में देशहितार्थ, लोकहितार्थ योजनाएं बनतीं और लागू होतीं। कितना अच्छा होता, यदि करोड़ों के घोटालों से देश को बचाया जाता। परंतु देश जानता है कि नाकारा व्यक्ति में नकारात्मकता चरम पर है। क्षण चाहे दु:ख के हो अथवा आनंद के, वह उन क्षणों को किरकिरा करने में जुटा रहता है।

 

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   डॉ. आनंद पाटील


 

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