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कोरोना और हम

कोरोना और हम

कोरोना-संक्रमण से उत्पन्न रोग वर्तमान दशक की सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभरा हैं जिसके सामने वर्तमान विकसित वैज्ञानिक युग ने घुटने टेक दिये हैं। कोरोना-संक्रमण मानवता को विश्राम भी नहीं लेने दे रहा है कि कोरोना का नये रूप में विषाणु प्रकट हो जाता है जो पूर्ववत् रूप से अधिक खतरनाक होता है। यदि एक देश में कुछ अवधि के लिए इस विषाणु से निजात पाया जाता है तो उसी समय अन्य देश में कोरोना विषाणु अन्य रूप में प्रकट होकर प्रथम तो उस देश को अपने शक्तिशाली आगोश में दबोच लेता है, फिर शनै: शनै: यह दूसरे देशों में फैल जाता है क्योंकि आज हम एक वैश्विक गांव में रह रहे हैं।

भारत में प्रथम कोरोना की लहर सन् 2020 की फरवरी से शुरू हुई जो अक्टूबर-नवम्बर तक चलती रही। भारत ने शुरूआती दौर में पूरे देश में तालाबंदी कर दी जिससे कोरोना फैलने से रूक गया। फिर भी भारत में प्राय: एक करोड़ व्यक्ति कोरोना से संक्रमित हुए पर मृत्यु का आंकड़ा एक लाख के इर्द-गिर्द ही रहा। लोग इतनी लंबी अवधि में खाने में संयम करते, मास्क पहनते तथा एक मीटर की दूरी रखते थक चुके थे गरीब परिवारों की संचित आय समाप्त हो गई और कोरोना से अधिक भुखमरी की समस्या ने अपने खूनी पंजे पसारे। फलत: सरकारों ने विवश होकर तालाबंदी में शनै: शनै: छूट दी। पर जनता और अधिक स्वच्छंद हो गई। अर्थव्यवस्था पटरी पर आ गई पर दूसरी ओर इंग्लैंड में छिपकर कोरोना का नया विषाणु भारत पर घात लगाये बैठा था। उसे स्वच्छंद जनसंख्या भी मिल गई। बिना मास्क के घूमते लोग तथा बिना दूरी रखे चलते-फिरते, मौज-मस्ती करते लोगों पर विषाणु एक से चार सौ लोगों पर गया और बढ़ता ही गया कि इसके पूर्व कहीं टीकाकरण उसका रास्ता अवरुद्ध न कर दे। फलत: सम्पूर्ण विश्व में 15 करोड़ की जनसंख्या कोरोना से संक्रमित हुई तथा प्राय: 33 लाख लोगों की जाने गई। भाारत में प्राय: एक करोड़ 65 लाख लोग संक्रमित हुए और ढाई लाख लोगों की जानें गईं। अभी कोरोना की दूसरी लहर का कहर पूरे यौवन पर है।

जहां कोरोना महामारी के लिए जनता को अपनी लापरवाही एवं उपेक्षा का देाष स्वीकार करना होगा वहां प्रत्येक स्तर पर सरकारों एवं स्थानीय प्रशासन को भी अपनी प्रशासनिक अक्षमता की जवाबदेही देनी होगी।

अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन इस महामहारी के विषय में सटीक कारण, समस्या का आयाम तथा भविष्यवाणी करने में असफल सिद्ध हुआ है, वहां संयुक्त राष्ट्र संघ सेन्डाई अन्तरराष्ट्रीय प्रारूप के अनुसार एक ज्येष्ठ तकनीकी समूह तक न बना सका तथा अपना एक विशेष प्रतिनिधि नियुक्त न कर सका जो इस प्रकार के जोखिम कम करने में प्रभावशाली भूमिका अदा करके अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रवक्ता हो।

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भारत में केन्द्रीय सरकार एवं राज्य सरकारों ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम एवं संक्रमण महामहारी के अंतर्गत अपनी शक्तियां को तो बढ़ा लीं पर अपनी क्षमता का विकास नहीं किया और न ही महामारी नियंत्रण की कार्ययोजना को प्रभावी ढंग से कार्यान्वित किया। यही अप्रभावी कार्यशैली का जिला स्तर से लेकर नगरपालिका तथा ग्राम पंचायत स्तर पर अनुभव किया गया। कितने लोगों का देश में मास्क न पहनने पर चालान किया गया? क्या कोई व्यक्ति मास्क न पहनने पर जेल में डाला गया? यद्यपि इस प्रकार का दंड हास्यस्पद लगता है पर कोरोना जैसी अनियंत्रित तथा खौफनाक बीमारी से लडऩे के लिए उपाय भी अजीबोगरीब होने चाहिए। चीन में जब इस बीमारी का उद्भव हुआ तो उन्होंने वुहान प्रांत में लापरवाह उच्चतम डॉक्टर अधिकारी को ही शायद मृत्युदंड दे दिया। बीमारी के प्रति निषेधात्मक नियमों का उल्लंघन करने वाले सैकड़ों लोगों को जेलों में ठूस दिया गया। भारत में तो ऑक्सीजन की कमी के कारण सैकड़ों मौतों के लिए भी किसी को दोषी नहीं किया गया। भारत में तो राजनीतिक नेताओं ने सीमा पार कर दी। उन्होंने निर्वाचन के लिए प्रचार में कोविड-19 के नियमों एवं मार्गदर्शक सिद्धान्तों का खुलेआम उल्लंघन किया हैं जैसे भारत में चुनाव जीतना ही प्रथम एवं अंतिम ध्येय है। जनता जीये या मरे, इस पर किसी का ध्यान नहीं है। यही हाल कमोवेशी धार्मिक गुरुओं तथा महामंडलेश्वरों का है। वे आज भी कुंभ जैसे आयोजनों के बिना नहीं रह सकते। धार्मिक मठाधीशों को भी अपने वृहद् संगठनों का संचालन करने के लिए धन की आवश्यकता होती है, और वह तभी आ सकता, जब उनके शिष्य या अनुयायी उनके समीप आयें। जनता ने तो राजनीतिक आकाओं को अपना मत देकर उन्हें अपने ऊपर शासक बनाकर बैठाया है ताकि वे उसके कार्यकलापों को नियंत्रित ही न करें, जनता को रोगमुक्त, भयमुक्त करें तथा उसे विकास, उन्नति एवं समृद्धि के पथ पर आरूढ़ करें। अत: कोरोना महामारी में सरकार का उत्तरदायित्व अहम है तथा कोई भी सरकार अपने इस दायित्व को दरकिनार नहीं सकती। जब जनता जीवित रहेगी, तभी तो वह विकास और समृद्धि का उपभोग कर सकेगी। जहां सरकारों को चलाने के लिए स्वस्थ अर्थतंत्र की आवश्यकता है, वहां जनता का कोरोना के इलाज पर खर्च तथा उसकी क्षमता की क्षति का आकलन भी समान रूप से आवश्यक है।

अत: सरकारों को चाहिए कि वे सख्त से सख्त कदम उठायें। यदि कुछ महीने महामारी जैसे प्रकृति या मानव-निर्मित आपदा के कारण लोगों की जान बचाने के लिए अर्थतंत्र के चक्र को स्थिर करना पड़े, तो उसे रोकना होगा। बाद में जनता और अधिक परिश्रम तथा लगन से उस अभाव की पूर्ति कर लेगी पर स्वजन की हानि की पूर्ति दोबारा नहीं हो सकती। अत: पूर्ण पाबंदी या लॉकडाउन जैसे उपायों को कार्यान्वित करने में सरकारों को हिचकिचाना नहीं चाहिए। यदि भारत का संविधान ऐसी महामारी की दृष्टि में रखकर बनाया गया होता, तो ऐसी महामारी के आधार पर आपातकालीन घोषणा का अवश्य प्रावधान रखा जाता ताकि देश में भारत के संविधान के अनुच्छेद 360 के अंतर्गत देशव्यापी महामारी या प्राकृतिक आपदा के कारण वित्तीय आपात-स्थिति जैसी घोषणा हो सकती। साथ ही महामारी या प्राकृतिक आपदा के दौरान निर्वाचन आदि जैसी संवैधानिक अनिवार्यताएं भी इस अवधि में स्थगित हो जाती और उनकी क्षति पूर्ति महामारी या प्राकृतिक आपदा के शेष होते ही तीन मास या छ: मास के भीतर कर ली जाती।

आशा है कि जनता भी सरकारों के साथ सहयोग करेगी, अपने नागरिक कर्तव्यों का पालन करेगी ताकि जनता एवं सरकारें मिलकर कोरोना जैसी घातक महामारी का सफलतापूर्वक मुकाबला कर सकें एवं भारत फिर से अपनी सामान्य जीवन-शैली में लौट सके, सभी रोगमुक्त हों, स्वस्थ हों तथा सुखी एवं सम्पन्न हों।

 

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   डॉ. प्रमोद कुमार अग्रवाल


 

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