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विपक्षी साजिश के खेल का खुलासा

विपक्षी साजिश के खेल का खुलासा

नरेन्द्र मोदी के दोबारा पहले से अधिक बहुमत से  पीएम बनने पर विपक्ष की कमर पूरी तरह टूट गई थी। कांग्रेस पर तो ऐसी गाज गिरी कि पार्टी लोकसभा में वांछित प्राप्त सीटे न पाकर विपक्ष बनने की पात्रता ही खो बैठी क्योंकि कांग्रेस को 10 प्रतिशत सीटें भी में नहीं मिल पाई। इसके बाद से विपक्ष भाजपा के मजबूत संगठन और मोदी की लोकप्रियता से बुरी तरह बौखला गया। जो गलतियां विपक्ष में रहकर कांग्रेस पार्टी ने पिछली बार की थी उनसे सबक न लेते हुए फिर दोहरा रही है। मोदी की 24म7 बुराई करना और उन्हें बदनाम करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाना जैसे कांग्रेश का घोषणा पत्र हो गया हो। 2019 के लोकसभा में भाजपा के सत्ता में आने के बाद कांग्रेश विपक्ष की भूमिका के बजाय एक खलनायक की भूमिका में आ गई। नतीजा नरेन्द्र मोदी का कद और बढ़ता चला गया।

शाहीन बाग में रचे गए षड्यंत्र में मुहकी खाने के बाद मोदी विरोधी नए मुद्दे तलाश ही रहे थे कि कृषि बिल पर आंदोलन पर उन्हें कूदने का मौका मिल गया। शाहीन बाग में जब व्हाट्सएप के सबूत सामने आए तो उसमे जे एन यू के पूर्व छात्र और जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के कई छात्र साजिश के हिस्से में शामिल पाए गए द्य गहराई से खंगालने पर पुलिस को इसके सारे तार पीएफआई से जुड़े मिले। खैर बहुत से आरोपी पकड़े गए, जेल गए, मामला अदालत में है। शाहीन बाग के धरने को उठाने में 3 माह से अधिक लग गए थे।

कृषि बिल

कृषि बिल के फायदे ही फायदे गिनाते भाजपा नहीं थकती और कथित किसान नेता बुराइयां बताते बताते। निश्चित रूप से भाजपा इसमें गरीब किसानों का हित समझती है। इसलिये झुकी नहीं, यहां तक कि उसने अपने एक सहयोगी अकाली दल को भी छोड़ दिया। हम इस बात पर चर्चा ना करके सीधी एक बात पर आएं। जब सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि कृषि बिल का डेढ़ साल तक के लिए क्रियात्वन रोक लिया जाये। सरकार ने भी फैसला कर लिया कि सरकार कृषि बिल अभी लागू करने नही जा रही और डेढ़ साल के लिये उसे रोक दिया। उसके बाद विचार करने को कह दिया। इसके बाद न धरने का न किसी अन्य कार्यक्रम का प्रश्न उठता है। कोरोना के संक्रमण के कारण अन्य प्रदर्शन और धरना का प्रश्न ही नही उठता है। इसके बाद राहुल गांधी एंड कंपनी ने खलनायक का काम किया, गुत्थी को सुलझाने के बजाय चिंगारी को और हवा देकर जलाने का प्रयास किया जो न जनहित में न किसानों के हित में न राष्ट्र के हित में था। यही नहीं इस धरने में सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का भी उल्लंघन हुआ जो कोर्ट ने शाहीन बाग में फैसला किया था कि सार्वजनिक स्थल पर अधिक समय तक कोई धरना नहीं रखा जा सकता। यहां मोदी सरकार की प्रशंसा करना होगी कि सरकार ने शाहीन बाग या कृषि प्रदर्शन धरना को सार्वजनिक स्थल से उठाने का कोई प्रयास नहीं किया न किसी तरह का हस्तक्षेप पुलिस ने किया। धरना को उठाने के लिए भी कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। दोनों घटनाओं में औरत बच्चों के कारण और भी सूझ बूझ दिखाते हुए सरकार ने किसी तरह की बाधाएं उत्पन्न नहीं की। दोनों जगह पूरी तरह फेल हो गए मोदी के राजनैतिक विरोधियों के पास जब कुछ नहीं बचा तो कोरोना पर खेल शुरू हो गया और इस हद तक चले गए कि सरकार के हर कदम का विरोध करने के लिए साजिश रचना शुरू कर दिया।

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कोरोना में विपक्ष की साजिश 24X7

2020 की शुरुआत में जैसे ही कोरोना आया और जिस समय चीन के बाद विश्व में कोरोना फैल रहा था तब मोदी जी ने तत्परता दिखाते हुए तुरंत विमान भेजकर चीन में फंसे भारतीयों को  हिंदुस्तान ले आए, उनकी जान बचा ली। पाकिस्तान में फंसे हुए लोग विशेषकर विद्यार्थी पाक सरकार को  भारत से यह सीख लेने की बात करने लगे। तुरंत उसके बाद हवाई जहाज से आने वाले लोगों पर प्रतिबंध लगाए गए। उनको कोरोना टेस्ट और 10 दिन के आइसोलेशन में रखने का काम किया। इस तरह सरकार के प्रभावी सफल कदम देखकर विपक्ष आश्चर्य में पढ़ गया और चौबीसों घंटे साजिश रचने में लग गया। कोरोना महामारी तेजी से फैली और पूरी दुनिया उसकी चपेट में आ गई। भारत में जैसे ही केरल में इसकी शुरुआत हुई केंद्र सरकार ने उससे बचाव के कदम तुरंत उठाएं। कोरोना की दवा किसी भी देश के पास नहीं थी। दुनिया के तमाम देशों में त्राहि-त्राहि मची हुई थी तब भारत को शुरू में ही कोरोना पर नियंत्रण पाने में काफी हद तक सफलता मिली। नतीजा यह हुआ कि कोरोना जिस तेजी से दूसरे देशों में फैला पर भारत में उसकी रफ्तार काफी कम रही।

लॉकडाउन का सच 

जब मोदी जी ने एक शाम मेडिकल स्टाफ के नाम पर उन्हें यह जताने के लिए कि पूरा देश आपके पीछे खड़ा है कहकर, उनका उत्साह बढ़ाने के लिए देश वासियों से अपील की। एक सुझाव दिया कि हम लोग शाम को घंटे थाली बजा कर उनका धन्यवाद करेंगे तो विपक्षी पार्टियों ने उसका मजाक बनाया। राहुल गांधी ने व्यंग किया घंटे बजाने से कोरोना भगाया जा रहा है। जब भी किसी देश ने हमला किया तो हम लोग तरह-तरह से आर्मी का मनोबल बढ़ाने के प्रयास करते हैं। प्रधानमंत्री के बॉर्डर पर जाने से उनका उत्साह बढ़ता है।

मोदी जी बॉर्डर पर गए तो उन्हें कोई बंदूक नहीं चलाना थी। उस दिन जब पूरे देश ने एक साथ शाम को ध्वनि करके एकता का परिचय दिया जिससे गांव गांव तक कोरोंना के बारे में खबर पहुंच गयी और लोग सचेत होने लगे। प्रधानमंत्री के आह्वान पर समस्त व्यवस्थाओं के साथ देश भर में लॉकडाउन किया गया। लॉकडाउन सबसे पहले 1 सप्ताह का फिर आवश्यकतानुसार उसे बढ़ाया गया। लॉकडाउन में लोगों को असुविधा ना हो इसके लिए उपाय किए गए। विपक्षी दलों को चिंता सताने लगी कि कोरोना नियंत्रण में भारत सफल हो रहा है। बस यहीं से उनकी चालबाजी शुरू हो गयी। राहुल गांधी ने लॉकडाउन की भी हंसी उड़ाई, उसका विरोध किया। बाद में अन्य विपक्षी दल भी लॉकडाउन के विरोध में उतर आए पर मोदी जी लॉकडाउन पर डटे रहे। लॉकडाउन से मरीजों की संख्या नियंत्रित रही।

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जहां-जहां गैर भाजपा सरकारे थी, सभी ने लॉकडाउन को गैरजरुरी बताना शुरू कर दिया। केंद्र सरकार के लॉकडाउन करने का फैसला विपक्ष की मांग और जिद के कारण केंद्र ने राज्य सरकारों पर छोड़ दिया। जब कोरोना दूसरी फेज में आया तो वही नेता जो जमकर लॉकडाउन का विरोध कर रहे थे, अब उसके समर्थन में उतर आए। कहने लगे लॉकडाउन जरूरी था क्यों नहीं लगाया। वही राहुल गांधी जो कल तक लॉक डाउन का मजाक बना रहे थे, अब  पलटी मार कर मोदी जी पर लॉकडाउन न लगाने के लिए उनके खिलाफ तमाशा बाजी करने लगे। कल तक यह विपक्ष मोदी जी के हर कदम का विरोध यह कहकर कर रहा था कि कोरोना तो है ही नहीं। लोगों का ध्यान महंगाई और बेरोजगारी से हटाने के लिए कोरोना का हउआ खड़ा किया जा रहा है। राहुल गांधी और उनकी पार्टी के मुख्यमंत्रियो ने अपने नेता की हां में हां मिलाकर कोरोना को गंभीरता से नहीं लिया। जब दूसरी फेज में लॉकडाउन लगाने का काम प्रदेश सरकारों पर था। जिसका वे इंतजाम नहीं कर पायीं और अधिकांशत: फेल भी हुई।

सेनीटाइजर, मास्क, वेंटिलेटर का सच

बीमारी के विकराल रूप लेने से पहले देश में मास्क और सैनिटाइजर की व्यवस्था जरूरी थी। कंपनियों को सैनिटाइजर बनाने के लिए प्रेरित किया गया, सुविधाएं दी गई। हर दफ्तर में सैनिटाइजर का इस्तेमाल जरूरी कर दिया गया। लोगों को साबुन से बराबर हाथ धोने को कहा गया। सैनिटाइजर और मास्क की कमी को लेकर विपक्ष ने फिर सरकार के खिलाफ चिल्लाना शुरू किया। उसकी कमी को लेकर रोजाना प्रेस बाजी शुरू कर दी लेकिन कुछ ही दिनों में ये कमी भी पूरी हो गई। यहां ये बताना आवश्यक है कि सैनिटाइजर की कमी सभी देशों मे थी। अमेरिका में 2 माह तक यह कमी बनी रही थी, सैनिटाइजर लोगों को महीनो नहीं मिल सका। मास्क भी लाइन लगाकर मिलते रहे। वेंटिलेटर की कमी भी दुनिया के सभी देशो में थी। भारत में वेंटिलेटर नहीं बनते थे, प्रधानमंत्री ने पहल की और आज देश में वेंटिलेटर बन रहे हैं।

फिर भी वेंटिलेटर को लेकर विपक्ष ने लोगों में डर फैलाना चालू किया। जबकि सच यह है कि पंजाब सरकार को दिए गए 200 वेंटीलेटर इस्तेमाल ही नहीं हुए केंद्र द्वारा दिए गए यह वेंटिलेटर बिना उपयोग के वार्ड में बंद ही पड़े रहे।

पलायन का सच

बीमारी फैली और लॉकडाउन लगा तो सबसे पहले बड़े-बड़े मेट्रोपॉलिटन शहर और गांव गांव से आए हुए लोग मजदूर और वर्कर आदि वापस गांव की ओर जाने लगे क्योंकि उन्हें शहर में काम नहीं मिल रहा था। केंद्र सरकार ने उनके जाने के उचित प्रबंध किए। सभी बड़े शहरों से ट्रेन की व्यवस्थाएं की गांव पहुंचकर उन मजदूरों को गांव के बाहर स्कूलों आदि में 10 दिन तक अलग रहने की व्यवस्था की गई। उसका नतीजा यह हुआ गांव मैं बीमारी बिल्कुल जोर नहीं पकड़ सकी। उस समय सबसे अधिक जिम्मेदारी का काम उत्तर प्रदेश सरकार ने किया। सैकड़ों बसों का इंतजाम किया गया जो अलग-अलग शहरों से प्रवासियों को अपने गांव वापस लेकर आए। तब भी कांग्रेस पार्टी ने झूठी मदद प्रदर्शित की। प्रियंका गांधी ने तो झूठे बस के नंबर तक दिखाएं और वाहवाही लूटना चाही। सबसे बदतर हालात महाराष्ट्र में हुए जहां सरकार का चेहरा सामने आ गया। सैकड़ों रेलगाडिय़ां मुंबई स्टेशन पर पहुंच गई। वहां खड़ी रही पर घरों से स्टेशन पहुंचाने की व्यवस्था नहीं की गई। उन लोगों को स्टेशन जाने के लिए बसें भी नहीं दी। मीलो मील परिवार और बच्चों को लेकर सर पर सामान की गठरिया बांधकर ले जाते हुए हजारों लोगों को हम सब ने मीडिया में देखा था। अब दूसरी फेज में पलायन की व्यवस्था का काम प्रदेश सरकारों पर था जो आवश्यक इंतजाम नहीं कर पाई। मजदूरों के घर गांव वापसी पर उन्हें 10 दिन तक आइसोलेशन या अलग एकांत निवास के लिए भी कदम नहीं उठाए गए और उसका नतीजा यह हुआ कि अब ग्रामीण क्षेत्र में भी कोरोना फैल गया।

वैक्सीन का सच

एक समय यह लग रहा था कि कोरोना की वैक्सीन बनाने में लगभग 3 साल लग जाएंगे पर नरेन्द्र मोदी जी ने हिम्मत नहीं हारी और हमारे वैज्ञानिकों डॉक्टरों को इस काम पर तेजी से लगाने के लिए प्रेरित किया। सभी तरह की सुविधाएं दी यहां तक कि प्रधानमंत्री स्वयं वैक्सीन पर काम करने वाली कंपनियों और फैक्ट्रियों में गए। शीघ्र ही हम लोग विश्व के उन चुने चार पांच  देशों में आ गए जिन्हें वैक्सीन बनाने में सबसे पहले सफलता मिली। भारत का पूरी दुनिया में इस सफलता के कारण नाम रोशन हो गया, दूसरे देश भारत की तरफ आशा लगाकर देखने लगे। विपक्ष ने फिर खलनायक का काम शुरू कर दिया। विशेष तौर से कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने वैक्सीन के खिलाफ भारी प्रोपेगंडा किया। राहुल जी ने वैक्सीन को जल्दी-जल्दी में बनाई गई वैक्सीन बताया गया, कहा कि इसकी पूरी तरह जांच नहीं हुई, पूरे ट्रायल नहीं हुए हैं इसलिए कारगर नहीं हो सकती। मोदी जी वैक्सीन के नाम पर लोकप्रियता लेना चाहते हैं। जब सरकार ने बताया कि यह वैक्सीन वैज्ञानिकों ने बनाई है और डॉक्टर ने इसे क्लीन चिट दी है तो राहुल गांधी कहने लगे कि डॉक्टर वैज्ञानिक तो सरकार की भाषा बोल रहे हैं। अखिलेश यादव ने कहा यह तो भाजपा की वैक्सीन है और मैं इसे कभी नहीं लगाऊंगा। विपक्ष ने मिलकर वैक्सीन के असर पर भारी शक जताया यहां तक कि उसके लगाने से रिएक्शन और मौत तक की बातें फैलाई। सपा के एक नेता ने तो यहां तक कहा कि इस वैक्सीन से लोग नपुंसक हो सकते हैं।

वैक्सीन तो सफल हो गई पर लगवाने वाले आगे नहीं आए। केंद्र ने डॉक्टरों नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ को लगाने की ट्रेनिंग दी और पूरे देश में वैक्सीन लगाने की व्यवस्था, की गई जो बेहद सफल रही।  धीरे-धीरे लोग वैक्सीन लगवाने लगे। वैक्सीन की विदेशों में मांग हुई। हमारे पास सर प्लस वैक्सीन थी क्योंकि उस समय डिमांड कम थी और सप्लाई ज्यादा थी। हमने फार्मूला दूसरे देशों से मिलकर बनाया था तथा अंतरराष्ट्रीय सूझबूझ के आधार पर कई देशों को हमने वैक्सीन दी। यूनाइटेड नेशंस में भारत के 6000 के लगभग सिपाही काम करते हैं। उनको वैक्सीन पहुंचाना भी देश का कर्तव्य था। जब वैक्सीन डॉक्टरो पैरामेडिकल स्टाफ को लगाई गई और अन्य लोगों को भी लगाई गई, तो भारी सफलता मिली। विपक्ष ने यह देखा तो इस पर भी प्रश्न चिन्ह लगाया कि भारत की वैक्सीन विदेशों में क्यों दी गई जबकि उस समय देश के पास सप्लाई अधिक थी और लोग लगवाने से हिचक रहे थे क्योंकि विपक्ष ने पूरे देश में डर का माहौल पैदा कर दिया था और वेक्सीन के खिलाफ प्रायोजित एजेंडा चला रखा था ।

ऑक्सीजन का सच

ऑक्सीजन की व्यवस्था बराबर ठीक चल रही थी, उसका प्रोडक्शन भी बढ़ाया गया थ। फिर एकायक वायरस ने वैरीअंट बदला, पहले जहां ऑक्सीजन की जरूरत मरीज को आठ 10 दिन की बीमारी के बाद पढ़ती थी, अब तीन चार दिनों में ही पडऩे लगी और मरीजो कि संख्या एकायक बढ़ गई।

इसमें प्रदेश सरकारों की लापरवाही सामने आयी। ऑक्सीजन की कमी हुई, दिल्ली में सबसे अधिक परेशानी आयी, अक्टूबर 2020 में दिल्ली को पांच, महाराष्ट्र को 8 ऑक्सीजन प्लांट दिए लेकिन दोनों सरकारों ने 6 माह तक एक भी प्लांट शुरू नहीं किया न ही उसका इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया यहां तक की कोई स्थान भी निर्धारित नहीं किया।

दिल्ली में ऑक्सीजन कि किल्लत का सच

पूरे देश को ऑक्सीजन पहुंचाना इन हालातों में कठिन काम हो गया, आवश्यकता निरंतर बढ़ती गई और ऑक्सीजन की शॉर्टेज हुई जिसे केंद्र ने हर तरह से पूरा करने का प्रयास किया। डॉक्टरों और अस्पतालों ने बार-बार ऑक्सीजन की कमी दिल्ली के मुख्यमंत्री को बताई  और पर उस भी कोई एक्शन मुख्यमंत्री जी ने नहीं लिया। केजरीवाल जी 15 अप्रैल को टेलीविजन पर कह रहे थे कि ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है और केंद्र से कोई डिमांड भी समय रहते नहीं की। वहीं केजरीवाल 17 अप्रैल को कहते हैं कि हमें ऑक्सीजन चाहिए, लोग मर रहे हैं, ऑक्सीजन नहीं मिल रही है। ऐसा भी इसलिए कहा क्योंकि जयपुर गोल्डन अस्पताल ने हाथ खड़े कर दिए और कहा कि हम 2 दिन से ऑक्सीजन मांग रहे हैं लेकिन नहीं दी जा रही है। केजरीवाल ने एकायक ऑक्सीजन की कमी दिखाई और डिमांड की जबकि वह अच्छी तरह जानते थे कि डिमांड करने के बाद सप्लाई में लगभग 7 य 8 दिन लग जाते हैं। टैंकर के आने जाने में समय लगता है और पूरे देश की सप्लाई का एक एजेंडा और स्कीम बनाई जाती है। दिल्ली हाईकोर्ट में अस्पताल के डायरेक्टर और ऑक्सीजन सप्लायर नॉक्स कंपनी ने यह बात कही है। यही नहीं जब फरीदाबाद और नोएडा से ऑक्सीजन दिल्ली के लिए दी गई तो दिल्ली सरकार ने कंपनी से लगभग आधी ऑक्सीजन ही उठाई और कहा कि उनके पास स्टोरेज की व्यवस्था नहीं है अत: आप आधी ही भेजिएगा। 1 साल में दिल्ली सरकार ने ऑक्सीजन का प्लांट नहीं लगाया और ऑक्सीजन स्टोरेज करने की भी कोई व्यवस्था नहीं की जिसके कारण ऑक्सीजन स्टोर नहीं कर सके और जब मरीज मरने लगे तो सारा ठीकरा सफेद झूठ बोलकर केंद्र पर फोडऩे का प्रयास किया।

चुनाव का सच

बंगाल में विधानसभा के चुनाव आदेश, चुनाव आयोग ने दिए क्योंकि यह संवैधानिक जिम्मेदारी थी। यदि चुनाव नहीं कराते तो मुख्यमंत्री भी काम चलाउ होता और राजपाल के पास समस्त अधिकार होते, ऐसे में विपक्ष चुनाव आयोग की जान खा लेता। दूसरी बात कोविड के हालात भी सुधर चुके थे और फिर बंगाल में कोविड ने पांव नहीं पसारे थे। अमेरिका में इससे बहुत बदतर हालात होने पर भी चुनाव हुए थे। बात बात में कांग्रेस पार्टी सुप्रीम कोर्ट चली जाती है, उसके पास बड़े -बड़े वकीलों की पूरी टीम है। कपिल सिब्बल मनु सांघ्वी विवेक तन्खा, सलमान खुर्शीद जैसे बड़े वकीलों के पूरी जमात है जो मंदिर के मामले में तक कोर्ट जाते हैं। इस मसले पर राहुल जी ने कोर्ट में जाने की कोई जरूरत नहीं समझी क्योंकि वह बंगाल के चुनाव में टिकट बांट रहे थे और उन्होंने प्रचार में जाने के लिए स्टार प्रचारक की टीम भी बनाई थी। उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव भी हाईकोर्ट के आदेश पर हुए। सरकार ने तो चुनाव बाद में कराने का फैसला लिया था। पर कोर्ट नहीं मानी। सभी विपक्षी दलों ने खुशियां मनाते हुए चुनाव में हिस्सा लिया, किसी ने विरोध नहीं किया ना ही कोई पार्टी हाई कोर्ट में पुनर्विचार हेतु गई  न ही कोई पार्टी सुप्रीम कोर्ट गई। अब यही लोग यू टर्न ले रहे हैं और चुनाव आयोग पर उंगली उठा रहे हैं, उसके निर्णय का विरोध कर रहे हैं जिसका उन्हें अब कोई अधिकार नहीं है। सारे विपक्षी दलों ने कोरोना जैसी महामारी में जमकर राजनीति का गंदा खेल खेला है। मोदी को केंद्रित करके सरकार को बदनाम करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए। दुनिया के अधिकांश देशों में लोग मरते रहे, दफनाने की जगह नहीं मिली इलाज के साधन भी नही जुट पाये पर विपक्षी दलों ने ऐसा घिनौना घटियापन कही नहीं दिखाया जैसा हिंदुस्तान के विपक्षी दलों ने दिखाया। कांग्रेस तो और भी घटियापन पर उतर आई। कोविड को मोबिड कह दिया। वायरस को इंडियन वैरीअंट कहकर भारत की बदनामी पूरे विश्व में की जैसे कि यह बीमारी फैलाने वाला देश भारत ही हो। इन लोगो ने मोदी जी को नीचा दिखाने के चक्कर में देश को बदनाम किया। कोरोना के बहाने नरेन्द्र मोदी पर लगाये गये तीर निशाने पर न पहुंचकर कांग्रेस के खुद के बदन में ही चुभ गए।

 

 

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   डॉ. विजय खैरा


 

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