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कोरोना-काल में विपक्ष का दायित्व

कोरोना-काल में विपक्ष का दायित्व

भारत इन दिनों कोरोना की दूसरी लहर का सामना कर रहा है।  अपने सीमित संसाधनों और विशाल जनसंख्या के बाद भी भारत बेहद मजबूती से इस आपदा के सामने टिककर खड़ा है एवं इस प्रयास में है कि महामारी की इस सुनामी से अपने नागरिकों को सुरक्षित निकाल लाए। यह जानते हुए भी कि आपदा कितनी बड़ी है, वह खड़ा है अविचल! परन्तु भारत की यह दृढ़ता जैसे कुछ लोगों को पसंद नहीं आ रही है, क्या वह भारत के शत्रु देश हैं या फिर और कोई?

या फिर वह ऐसे लोग हैं जिन्हें भारत से समस्या है या फिर वर्तमान केंद्र सरकार से कुछ समस्या है? यह कुछ प्रश्न है जो बार बार पाठकों के मस्तिष्क में आते हैं। भारत के विपक्षी दल जिस प्रकार से आचरण कर रहे हैं, वह स्वयं में संदिग्ध है। ऐसे समय में जब सत्ता पक्ष एवं विपक्ष दोनों को ही आपदा के प्रबंधन में लगना था, उस समय पर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की ओर से ऐसी टूलकिट सामने आई है, जिसमे यह लिखा है कि कैसे देश को बदनाम करना है? क्योंकि उनका लक्ष्य सत्ता प्राप्त करना है। क्या सत्ता प्राप्त करने के लिए आप अपने देशों को लाशों से पाट सकते है?

यह प्रश्न इस लिए उठते हैं क्योंकि उस टूलकिट में जिस प्रकार से कार्ययोजना बनाई गयी है, वह देश हित में न होकर देश के विरोध में जाकर खड़ी हो गयी है। भारत में जो अब तक विपक्ष रहा है, उसका आचरण इस कार्यकाल में जितना भ्रामक एवं देश विरोधी रहा है, उतना किसी और सरकार में नहीं रहा है। भाजपा इतने वर्षों से विपक्ष में रही थी। एवं जब भी आपदा आई तो वह सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खडी रही एवं कभी भी आपदा को अपनी सत्तापूर्ति के साधन के लिए प्रयोग नहीं किया।

प्रश्न किए, परन्तु जब भी बाहर मंच पर गई तो भारत सरकार का साथ दिया। मनरेगा पर भारतीय जनता के कितने भी विरोध क्यों न हो, परन्तु वह विरोध भारत में ही रहे थे।

वर्ष 2012 में जब भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी यूएन में गए थे तो उन्होंने भारत की यूपीए सरकार की मुख्य योजना मनरेगा अर्थात न्यूनतम रोजगार गारंटी की जमकर प्रशंसा की थी।

https://navbharattimes.indiatimes.com/world/america/advani-praises-mgnrega-at-the-united-nations/articleshow/v{|zww}~.cms

इतना ही नहीं जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने वर्ष 2013 में जब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘गंवार औरत’ की संज्ञा दी थी तब भी भारतीय जनता पार्टी की ओर से पाकिस्तान के नेता की आलोचना की गई थी। भारतीय जनता पार्टी ने अपनी नीतियों का प्रचार विदेशों के मंच से किया, परन्तु उन्होंने कभी भी भारत सरकार के आधिकारिक स्टैंड का आधिकारिक विरोध नहीं किया एवं न ही सरकार बदलने के लिए विदेशियों से सहायता मांगी।

जबकि कांग्रेस के नेता मणिशंकर अय्यर द्वारा पाकिस्तान से यह सहायता मांगना सभी को स्मरण होगा, इतना ही नहीं कांग्रेस के युवराज भी भारत में नेतृत्व परिवर्तन के लिए अमेरिका से गुहार लगा चुके हैं। क्या यह माना जाए कि भारतीय विपक्ष को अब स्वयं पर विश्वास नहीं है, या फिर भारतीय लोकतंत्र की प्रक्रिया पर विश्वास नहीं है?

हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में ऐसा नहीं है कि हर प्रदेश में भाजपा विजयी हुई हो। अलग अलग प्रदेशों की जनता ने अपने विवेक का प्रयोग करते हुए अपनी सरकार चुनी। असम एवं पुद्दुचेरी में भाजपा, केरल में वामदल, तमिलनाडु में डीएमके, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सरकार  नीत सरकार को चुना। यह भारत के लोकतंत्र की खूबसूरती है। भाजपा जनादेशों का सम्मान करती है। अपने को भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कहने वाली कांग्रेस में यह परिपक्वता नहीं दिखाई देती है। वह सत्ता की अपनी अनियंत्रित भूख और अपने लोकतंत्र विरोधी चरित्र का परिचय दे रही है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि  मोदी का विरोध करते करते कांग्रेस और उसके सहयोगी बार बार भारत विरोध पर उतर आ रहे हैं। कोंग्रेस की सत्ता पाने की भूख इस तरह अनियंत्रिं हो गयी है कि वह वैधानिक रूप से जनता द्वारा स्पष्ट बहुमत से चुनी गई के केंद्र सरकार के नियत कार्यकाल पूरा करने का धैर्य  भी नहीं रख पा रही है। वह बेचैनी में है कि इस सरकार को राजनीतिक रूप से अस्थिर किया जाए और सता प्राप्त की जाए।

परन्तु क्या सत्ता प्राप्ति के लिए अपने लोगों को ही बलिदान कर सकती है, जैसा इस टूलकिट में लिखा है कि कुछ अस्पतालों में बेड ब्लॉक कर लिए जाएं और तब ही बेड दिए जाएं जब कांग्रेस की ओर से आदेश आए।

अब इसमें सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या सत्ता पाने के लिए देश का विपक्षी दल अपनी सत्ता की आकांक्षा में आम लोगों की जान से खिलवाड़ कर सकता है और अपने अनुसार बेड ब्लाक कर सकता है? यह डराने वाला दृश्य है! यह आम दृश्य नहीं है! यह जीवन के साथ खिलवाड़ है और उन लोगों के साथ खिलवाड़ है, जो इस देश की आत्मा हैं।

इतना ही नहीं जिस सेन्ट्रल विस्ता परियोजना पर इन्होनें घटिया राजनीति करनी आरम्भ की है वह राजनीति का सबसे निकृष्ट पतन है। एक ऐसी निर्माण परियोजना जिसका उद्देश्य है भारत की छवि बदलना, उस पूरी की पूरी परियोजना को मात्र विलासिता कहना, क्या देश की जनता के साथ अन्याय नहीं है? भारत सरकार का अभी काफी धन उन सभी इमारतों के किराए पर जाता है, जहां पर भारत सरकार के कई कार्यालय हैं। भारत सरकार अब उन सभी को एक ही बड़ी इमारत में लाना चाहती है। एवं इस योजना को उच्चतम न्यायालय तमाम दलीलों के बाद अपनी अनुमति दे चुका है।

इस योजना के आर्थिक लाभ होते भी इस योजना के विरुद्ध एक दुष्प्रचार कांग्रेस द्वारा चलाया जा रहा है? यह प्रश्न तो उठता ही है कि आखिर कांग्रेस को देश के विकास एवं देश की सफल छवि से समस्या क्या है?  एक ऐसे समय में जब इस परियोजना के कारण ही न जाने कितने लोगों को रोजगार मिला हुआ है, एवं बार बार सरकार की ओर से यह कहा जा रहा है कि इसमें निर्माण पूरी तरह से कोरोना प्रोटोकॉल के अनुपालन में हो रहा है, एवं हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय में भी सरकार ने बताया कि जो लोग वहां पर निर्माण गतिविधि में लगे हुए हैं, वह वहीं पर निवास कर रहे हैं। फिर भी प्रश्न यह उठता है कि आखिर वह कौन विशेषज्ञ हैं, जो उन निर्माण परियोजनाओं को बंद करना चाहते हैं जो निर्धनों को रोजगार दे रही है और वह भी सुरक्षा के साथ?

इतना ही नहीं पीएम केयर पर शोर मचाना भी हास्यास्पद ही है क्योंकि पीएम केयर के विषय में सारी सूचनाएं पहले से ही सार्वजनिक पटल पर हैं। यह बार-बार कहा जाता रहा कि पीएम केयर की ओर से वेंटिलेटर राज्य सरकारों को दिए गए, परन्तु उनका प्रयोग कितनी सरकारों ने किया? यह वेंटिलेटर रखे रखे-खराब हो गए। परन्तु इस पर कोई बात नहीं करता है।

इस टूलकिट में यह साफ-साफ लिखा है कि कैसे ऑक्सीजन एवं बेड की कृत्रिम कमी उत्पन्न करनी है और दिल्ली में यह प्रवृत्ति अधिक देखी गयी। उच्च न्यायालय ने भी इस बात को संज्ञान में लिया कि कैसे ऑक्सीजन एवं अन्य आवश्यक दवाइयां नेताओं के पास तो उपलब्ध हैं, परन्तु अस्पतालों के पास नहीं है।

दिल्ली की आम आदमी पार्टी की भी भूमिका ऑक्सीजन के मामले में बहुत संदिग्ध रही, जिसके कारण एक बार नहीं कई बार दिल्ली उच्च न्यायालय ने उन्हें फटकार लगाई। आईनोक्स कंपनी ने भी दिल्ली सरकार की मंशा पर भी प्रश्न उठाए कि कैसे उनके ट्रक इधर उधर घुमते रहे, और किस अस्पताल में कितनी ऑक्सीजन भेजनी है, यह स्पष्ट निर्देश ही नहीं थे।

टैंकर वाला मुद्दा तो सर्वाधिक हास्यास्पद था। जब दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने टैंकर की कमी का रोना उच्च न्यायालय मे रोया तो अगले ही दिन विज्ञापन के रूप में टैंकर की मांग की थी। यह मीडिया को अपने पक्ष में करने की एक बेहद शातिर तकनीक है, जिसका प्रयोग दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार कर रही है, यहां तक कि उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय को भी इसी तरह मैनेज करने का प्रयास किया था जब अशोक होटल में न्यायिक स्टाफ के लिए कोरोना इलाज के लिए कमरों की व्यवस्था की थी।

तब उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए डांट लगाई थी कि क्या आप हमें रिश्वत देना चाहते हैं, एवं तत्काल ही यह आर्डर निरस्त कराया था। फिर भी, यह रवैया काफी प्रश्न उठाता है कि क्या केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकार के साथ तालमेल राजनीतिक नफे-नुकसान के आधार पर होगा या फिर जनता के हित ही मुख्य होंगे? परन्तु यह भी बात ध्यान देने योग्य है कि जैसे ही केंद्र सरकार द्वारा ऑक्सीजन की मांग के ऑडिट की मांग की वैसे ही दिल्ली में अचानक से ही ऑक्सीजन की कमी समाप्त हो गयी।

इसीके साथ कालाबाजारी में भी कई विपक्षी दलों के लोग पकड़े गए। सोशल मीडिया पर गैंग बनाकर इतना शोर मचाया गया कि नकली रेमेदेसिवर इंजेक्शन बनाने वालों की चांदी हो गयी और न जाने कितने नकली इंजेक्शन खप गए। और जिस प्रकार से सभी विपक्षी दलों ने वैक्सीन पर राजनीति की, वह विरोध का सबसे निकृष्ट उदाहरण हैं। समाजवादी पार्टी के युवराज ने तो इसे भाजपा की वैक्सीन कह दिया था और चुपके से खुद लगवा आए थे और अपने समर्थकों के मन में जहर भर दिया।

कांग्रेस का रवैया वैक्सीन के मामले में भी उतना ही निराशाजनक रहा। शशि थरूर ने कोवैक्सीन की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाए, और बार बार संदेह व्यक्त किया जाता रहा! खुद राहुल गांधी का ही रवैया अत्यंत निराशाजन रहा था। उन्होंने पहले वैक्सीन पर संदेह व्यक्त किया, कांग्रेस शासित प्रदेशों में भारतीय वैक्सीन पर संदेह व्यक्त किया गया एवं भारतीयों द्वारा निर्मित वैक्सीन को नीचा दिखाया गया, विदेशी वैक्सीन की तरफदारी की गयी थी। फिर भी भारतीयों के दिल में पहले तो कांग्रेस के नेताओं, कांग्रेस का पक्ष लेने वाले लेखकों एवं पत्रकारों ने वैक्सीन के प्रति संदेह व्यक्त किया, फिर बाद में यह रोना रोया कि ‘मोदी जी हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेशों में क्यों भेजी?’

जबकि यह सबसे बड़ा झूठ है क्योंकि बच्चों के लिए तो वैक्सीन अभी बनी ही नहीं है। परन्तु सरकार के विरोध में जनता को उपद्रव के लिए उकसाने में यह सबसे आगे हैं।

एक और मुद्दा है जिस पर विपक्षी दलों का रवैया अत्यंत निराशाजनक रहा है और वह है किसान आन्दोलन! किसान आन्दोलन में अब जिस प्रकार से आन्दोलन रत किसानों की ही मृत्यु कोरोना से हो रही है, वह सभी के लिए आंखें खोलने वाला है। यहां तक कि पंजाब में कांग्रेस सरकार के ही एक मंत्री यह कह चुके हैं कि किसान आन्दोलन के कारण कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं; परन्तु फिर भी इस मामले में वह सरकार के विरोध में ही बोल रहे हैं।

महीनों से दिल्ली के सारे बॉर्डर एक ऐसे अतिक्रमण का सामना कर रहे हैं, जिसके कारण उन्हें कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, परन्तु देश के विपक्षी दलों के लिए यह केवल और केवल मोदी सरकार को बदनाम करने का कारण हो सकता है, इसलिए वह समर्थन कर रहे हैं।

जनता भी इस समय विपक्ष से पूछ रही है कि आपके लिए क्या महत्वपूर्ण है ‘सत्ता पाने की आकांक्षा में लोगों की लाशों का ढेर लगना और उन पर राजनीति करना’ या फिर ‘जनता के हितैषी बनकर जनता का मत पाना?’

 

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   अरविन्द सिंह


 

(लेखक ‘मंथन’ पत्रिका के प्रबंध सम्पादक है। यह लेखक की अपनी निजी राय है।)

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