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हमास-इजराइल संघर्ष विराम कब तक?

हमास-इजराइल संघर्ष विराम कब तक?

अरब देश मिस्र की मध्यस्थता के बाद २१ मई को इजराइल ने जब हमास के खिलाफ युद्ध विराम की घोषणा की तो गाजा पट्टी जैसे जश्न में डूब गई। हालांकि जिस फिलीस्तीन के इलाके में गाजा पट्टी है, वहां इजराइली हमले में कम से कम २४३ लोगों के मारे जाने की खबर है। इजराइली विमानों ने गाजा पट्टी के कई बड़ी बिल्डिगों के साथ ही मेट्रो की सुरंग को भी ध्वस्त कर दिया। इस लड़ाई में हमास और इस्लामिक जिहाद ने अपने २० लड़ाकों के मारे जाने की बात स्वीकार की है, जबकि इजराइल का कहना है कि उग्रवादी संगठनों के कम से कम १३० लड़ाके मारे गए हैं। युद्ध के चलते करीब ५८,००० फलस्तीनी अपने घरों को छोड़कर जा चुके हैं। हमास के हमलों में इजराइल में बारह लोगों की मौत हुई है, जिसमें पांच साल का एक लड़का, १६ साल की एक लड़की और एक सैनिक शामिल हैं। गौरतलब है कि इसी लड़ाई में केरल निवासी सौम्या संतोष की भी मौत हो गई। पेशे से नर्स सौम्या इजराइल में काम करती थीं। निधन के बाद इजराइल ने उन्हें अपनी नागरिकता देने की घोषणा की है। कोरोना की महामारी से जूझ रही दुनिया में जहां अस्पतालों की कमी महसूस हो रही है, वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इजराइली हमलों में फिलीस्तीन के कम से कम १८ अस्पताल और क्लिनिक जमींदोज हो चुके हैं।

इजराइल ने जब हमास के राकेट हमले के खिलाफ दस मई को उसके खिलाफ अभियान छेड़ा तो करीब ५७ इस्लामिक देशों ने इस हमले के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया जताई। इसकी अगुआई तुर्की कर रहा था। पाकिस्तान की एक बड़बोली महिला मंत्री ने यहां तक कह दिया कि अगर इजराइल नहीं रूकता तो हम उसे सिखा देते। वैसे सऊदी अरब ने इस लड़ाई में हस्तक्षेप करने की कोशिश की थी, लेकिन इजराइल ने उसे जब घुड़की दी तो उसने चुप रहने में ही भलाई समझी।

इजराइल-हमास युद्ध में भारत का बौद्धिक और राजनीतिक समाज भी बंटा नजर आया। वामपंथी और समाजवादी विचारधारा के लोग जहां फिलीस्तीन पर हो रहे हमले को लेकर इजराइल को दोषी ठहराते रहे, वहीं राष्ट्रवादी विचारधारा का तर्क रहा कि इजराइल को अपनी रक्षा करने और अपने खिलाफ होने वाले हर हमले का जवाब देने का हक है। दिलचस्प यह है कि चूंकि हमास के हमले में सौम्या संतोष मारी गई थीं, इसलिए केरल की वामपंथी सरकार ने ना तो उनके परिवार के लिए संवेदना के दो शब्द इस्तेमाल किये, ना ही उनके निधन के लिए हमास को जिम्मेदार ठहराया।

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इजराइल का रूख इस बार इतना कड़ा था कि उसने यहां तक कह दिया था कि वह इस बीमारी का इस बार इलाज करेगा, महज मरहम पट्टी नहीं। हालांकि अमेरिका की परोक्ष और मिस्र की प्रत्यक्ष मध्यस्थता कोशिश के बाद इजराइल ने ११ दिनों से जारी युद्ध रोकने का फैसला किया। लेकिन युद्ध विराम की घोषणा होने के तत्काल बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने जो कहा है, उससे इजराइल का ही पक्ष मजबूत होता है। बाइडेन ने कहा है कि इजराइल और फिलीस्तीन के बीच जारी विवाद का समाधान द्विराष्ट्र के सिद्धांत को लागू करके ही किया जा सकता है। बाइडेन का यह भी कहना है कि फिलीस्तीनियों के लिए अलग राष्ट्र बनाकर द्वि-राष्ट्र समाधान ही दोनों के बीच के विवाद को खत्म कर सकता है। फिलीस्तीन और ज्यादातर अरब देशों की समस्या यह है कि वे १९४८ में स्थापित इजराइल को अलग राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं देते नब्बे लाख की आबादी वाला यहूदी समुदाय का यह देश उनकी आंख की किरकिरी बना हुआ है। यह बात है कि समूचा अरब जगत मिलकर भी इजराइल को दबाव में नहीं ले पाता। बहरहाल बाइडेन ने यहां तक कहा है कि फिलीस्तीनियों को इजराइल को अलग राष्ट्र के तौर पर स्वीकार कर लेना चाहिए।

फिलीस्तीनी गाजा पट्टी इलाके में मुस्लिम समुदाय की ऐतिहासिक मस्जिद अल अक्सा है। हालिया विवाद की शुरूआत रमजान के महीने में इसी मस्जिद की ओर जुटने वाले फिलीस्तीनी लोगों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए इजराइली पुलिस ने कोशिश की। इसके बाद वहां हिंसा भड़क उठी थी। इसके बाद दस मई को हमास ने इजराइल पर सैकड़ों राकेट दाग दिए थे। चूंकि इजराइल सैनिक तकनीक और ताकत में बहुत आगे है, लिहाजा उसके राकेटों ने इनमें से ज्यादातर को रास्ते में ही मार गिराया। इसके बाद इजराइल ने गाजापट्टी पर हमला बोल दिया। उसने अलजजीरा चैनल समेत तमाम अंतरराष्ट्रीय मीडिया हाउसों के दफ्तर वाली बिल्डिंग को एक घंटे में खाली करने का अल्टीमेटम देकर गिरा दिया। इजराइल ने गाजा पट्टी में चुन-चुनकर बड़ी बिल्डिंगों और हमास के ठिकानों को निशाना बनाया। आबादी वाले इलाकों की बिल्डिंगों के गिराने के पहले उन्हें खाली करने के लिए वक्त दिया।

मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह सीसी और अमेरिका की कोशिशों के बाद इजराइल ने संघर्ष विराम लागू तो कर दिया है, लेकिन हमास जिस तरह से भड़काऊ बयानबाजी कर रहा है, उससे संदेह है कि यह युद्ध विराम लंबा खिंच पाएगा। २०१४ के गाजापट्टी पर हुए संघर्ष के बाद यह भीषण युद्ध रहा। बहरहाल हमास कह रहा है कि उसके पास इतने राकेट है कि वह इजराइल पर महीनों तक दागते रह सकता है। हमास की इसी बयानबाजी के चलते इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सुरक्षा बलों को तैयार रहने को कहा है।

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दोनों पक्षों के बीच १९४८ से ही विवाद है। १९४८ में इजराइल के जन्म के फौरन बाद से ही गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक तक फैले फिलीस्तीन का शासन जॉर्डन, मिस्र, सीरिया और अरब देशों ने चलाया। हालांकि दिल से वे इजराइल को स्वीकार नहीं कर पाए। इसका असर यह हुआ कि १९६४ में इजराइल के खिलाफ अरब देशों ने संघर्ष छेड़ दिया। इसी संघर्ष के दौरान स्वतंत्र फिलीस्तीन के गठन के लिए फिलीस्तीन लिब्रेशन ऑर्गेनाइजेशन यानी पीएलओ का गगठन हुआ। इसी संगठन के निर्विवाद नेता के तौर ९० के दशक में यासिर अराफात छाए रहे। १९९६ में हुए पहले चुनाव में अराफात की फतह पार्टी ने गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक दोनों ही इलाकों में जीत दर्ज की, जहां फिलिस्तीन नेशनल अथॉरिटी ने नागरिक प्रशासन का काम चलाया। १९९३ के ओस्लो शांति समझौते के तहत इस अथॉरिटी को संयुक्त राष्ट्र से भी मान्यता मिली। यह बात और है कि यह समझौता कभी लागू नहीं हो पाया।

२००४ में यासिर अराफात के निधन के बाद फिलीस्तीन अथॉरिटी और अराफात की फतह पार्टी, दोनों की कमान महमूद अब्बास के हाथ आ गई। इस बीच हमास अपनी सैनिक ताकत बढ़ाता रहा। माना जाता है कि उसे तुर्की और रूस का समर्थन हासिल है। इसके साथ ही हमास की खासकर पश्चिमी घाट पर लोकप्रियता बढ़ती रही। जब २००५ में गाजा पट्टी से इजराइल ने अपने सैनिकों को हटा लिया तो २००५ में फिलीस्तीन नेशनल अथॉरिटी के लिए दूसरा चुनाव हुआ। जिसमें फतह पार्टी ने जहां फिलिस्तीन के राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत लिया, वहीं गाजा सिटी में हमास को बहुत समर्थन मिला। इसके बाद २००६ में हमास ने गाजा में अपना शासन स्थापित करने के लिए फिलीस्तीनी अथॉरिटी के राष्ट्रपति महमूद अब्बास के खिलाफ विद्रोह कर दिया और उनके तख्ता पलट का ऐलान कर दिया। तब से लेकर अब तक फिलीस्तीन पर एक शासन नहीं है। लेकिन जब भी  किसी मुद्दे पर इजराइल और फिलीस्तीन में भिड़ंत होती है, यह संघर्ष इजराइली सेना और हमास के लड़ाकों के बीच ही होता है।

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अब थोड़ा हमास के बारे में जान लेते हैं। हमास फिलीस्तीन का कट्टर इस्लामिक आतंकवादी संगठन है। हमास का गठन १९८० के दशक में हुआ था। अरब के इस्लामिक-दार्शनिक संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से निकले इस संगठन ने अपनी ताकत का अहसास १९८७ में इजराइल के खिलाफ पहले फिलीस्तीनी इंतिफादा (विद्रोह) की अगुवाई की। हमास अरबी का शब्द है, जिसका मतलब जोश या उत्साह होता है। लेकिन इसे हरकत अल-मुकावामाह अल-इस्लामिया या इस्लामिक प्रतिरोध आंदोलन कहा जाता है। हमास का संस्थापक शेख अहमद यासीन था।  १२ साल की उम्र से ही व्हीलचेयर के सहारे चलने वाला यासीन बेहद महत्वाकांक्षी था। बाद में वह हमास का आध्यात्मिक गुरु बना। उसकी मौत २००४ में एक इजराइली हमले में हो गई। १९९० के दशक में हमास हथियारबंद आतंकी संगठन के तौर पर उभरा। अब तो वह फिलीस्तीन का सबसे ताकतवर राजनीतिक इकाई भी बनकर उभरा है। हमास को अमेरिका ने बाकायदा आतंकी संगठन घोषित कर रखा है।

भारत में इस विवाद को लेकर भले ही बौद्धिकों में दोफाड़ है। पी. वी. नरसिंह राव की सरकार के दौरान से इजराइल से दोस्ती बढ़ी है, जिसे मोदी सरकार ने आगे बढ़ाया है। इसके बावजूद भारत ने इस युद्ध पर किसी एक पक्ष को लेने की बजाय संतुलित रूख अख्तियार किया है। इजराइल-हमास युद्ध को रोकने को लेकर विचार करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा की बैठक भी बुलाई गई थी। उसमें भारत ने बेहद संतुलित बयान दिया। भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि इजराइल और फिलीस्तीन के बीच बातचीत बहाल करने के लिए सहयोगी माहौल बनाने की हर संभव कोशिश की जानी चाहिए। भारत का मानना रहा कि इस क्षेत्र में दीर्घकालिक शांति और स्थिरता बनाए रखने लिए गंभीर बातचीत दौर लंबा चल सकता है। भारत ने अपील की, कि तनाव को बढ़ाने वाले किसी भी कदम से बचा जाना चाहिए।

इस बीच फिलीस्तीनी इलाके में लोग जमींदोज हो चुके भवनों में कुछ काम की चीजें ढूंढ़ रहे हैं। इस बीच अमेरिका ने गाजा पट्टी में हुए नुकसान के पुनर्निर्माण के लिए आर्थिक मदद देने का ऐलान किया है। लेकिन हमास का जो रवैया है, उसकी वजह से यह देखना दिलचस्प रहेगा कि यह संघर्ष विराम कितने दिन तक जारी रह सकेगा।

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   उमेश चतुर्वेदी


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