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इजराइल और फिलीस्तीन विवाद की जड़ें

इजराइल और फिलीस्तीन विवाद की जड़ें

इजराइल और फिलीस्तीन में एक बार फिर से संघर्ष छिड़ गया है और दोनों दिन-रात एक दूसरे पर रॉकेट दाग रहे हैं। पिछले दिनों शुरू हुए इस संघर्ष में अब तक 43 फिलिस्तीनियों और छह इजराइली नागरिकों की मौत हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों पक्षों से हमले रोकने की अपील कर रहा है। इजराइल और फिलीस्तीन के बीच शुरू हुआ विवाद अब जंग में तब्दील होता जा रहा है। इजराइल की ओर से किए गए हवाई हमले में चरमपंथी समूह हमास के कई शीर्ष कमांडर मारे गए हैं। वहीं, हमास के रॉकेट हमले में भी इजराइल के कई लोगों के मारे जाने की खबर है। इजराइल ने बताया कि हमास के चरमपंथियों ने अब तक गाजा से देश पर 1400  रॉकेट दागे हैं। इनमें से 850 इजराइल में गिरे हैं, जबकि करीब 550 को इजराइल की आयरन डोम एयर डिफेंस सिस्टम ने नाकाम कर दिया। वहीं इजराइल ने सैकड़ों हवाई हमले में गाजा में दो टावर को ध्वस्त कर दिया हैं। माना जा रहा है कि इन टावरों में ही हमास के शीर्ष कमांडर मौजूद थे। इजराइल ने पहले चेतावनी देते हुए गोलियां चलाईं ताकि नागरिक टावर छोड़कर जा सकें लेकिन बाकी संपत्ति को काफी नुकसान पहुंचा। गाजा पर फिलीस्तीनी चरमपंथी गुट हमास का नियंत्रण है। दूसरी ओर हमास का कहना है कि दुश्मनों ने आवासीय टॉवर्स को निशाना बनाकर हमें उकसाया है।

दोनों पक्षों की अपनी कहानियां हैं और अपने दर्द है लेकिन यहां यह जानना जरूरी होगा कि इजराइल और फिलीस्तीन के बीच विवाद को नया नहीं है, बल्कि इसकी जड़ 120 साल पुरानी है।

इजराइल और फिलीस्तीन के बीच टकराव की शुरुआत यहूदियों व अरब जगत के लोगों के लिए स्वतंत्र राष्ट्र की स्थापना के संघर्ष से हुई थी। 1947 में संयुक्त राष्ट्र के इजराइल के अस्तित्व को मान्यता देने के बाद से ही क्षेत्र में हिंसा और तनाव का दौर जारी है।

इजराइल दुनिया का इकलौता यहूदी देश है, जबकि फिलीस्तीन एक मुस्लिम देश है। पहले ये दोनों देश एक थे और इन पर अंग्रेजों की हुकूमत थी। 15 मई 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ के हस्तेक्षप के बाद ब्रिटेन ने इस इलाके से अपना कब्जा छोड़ दिया। इस विभाजन के बाद इजराइल और फिलीस्तीन दो अलग- अलग देश बन गये। अब जब भी इजराइल का नाम जेहन में आता है तो यही याद आता है कि किस तरह से, लगभग 70 साल से फिलीस्तीन और बाकी मुस्लिम-अरब देशों ने उसके खिलाफ जंग छेड़ रखी है।

इजराइल और फिलीस्तीन के विवाद की जड़ें ईसा पूर्व से पहले तक जाती हैं। चूंकि बाइबल में गॉड ने इजराइल के इलाके को यहूदियों के लिए चुना था, इसलिए वे इसे पूरी दुनिया के यहूदियों का घर मानते हैं। हालांकि उन्हें कई बार यहां से बेदखल होना पड़ा है और कई अत्याचारों का सामना करना पड़ा है। वहीं फिलीस्तीनी लोगों का कहना है कि चूंकि वे हमेशा से यहां के मुख्य निवासी हैं, इसलिए इस जगह पर उनका अधिकार है। लेकिन फिलीस्तीनी नेतृत्व विभाजित है। वेस्ट बैंक के फिलीस्तीनी नेतृत्व ने द्विराज्यीय समाधान का समर्थन किया है जबकि गाजा के नेताओं ने इजराइल को मान्यता तक प्रदान नहीं की है। यद्यपि इजराइल के प्रधानमंत्रियों यथा-एहुद बराक, एरियल शेरोन, एहुद ओल्मर्ट और बेंजामिन नेतान्याहू ने फिलीस्तीनी राज्य के विचार को स्वीकृति दी तथापि ये इन विचारों में भिन्न थे कि इसका सृजन वास्तव में किस प्रकार होना चाहिये।

इजराइल के प्रधानमंत्री की पिछली अमेरिकी यात्रा के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से यह वक्तव्य दिया कि वह फिलीस्तीन में द्विराज्यीय समाधान के माध्यम से इस विचलन का समर्थन कर सकते हैं। वह संभवत: ऐसे प्रथम अमेरिकी राष्ट्रपति रहें जिन्होंने लंबे समय से चली आ रही अमेरिकी नीति से पृथक रुख अपनाकर इजराइल और फिलिस्तीनियों के लिये द्विराज्यीय समाधान का समर्थन किया है। इस क्षेत्र का बाकि इतिहास दिए गए बॉक्स में देखा जा सकता है।

भारत और इजराइल

इजराइल और स्वतंत्र लोकतांत्रिक भारत का उदय एक ही वर्ष 1947 में हुआ था। हालांकि, आधिकारिक तौर पर इजराइल को स्वतंत्रता 1948 में मिली। दोनों देशों के शुरुआती संबंध अच्छे नहीं थे। 1947 में ही भारत ने इजराइल को एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता देने के विरोध में वोट किया। इसी तरह से 1949 में एक बार फिर भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इजराइल को सदस्य देश बनाने के विरोध में वोट किया था। इजराइल के उदय के साथ शुरुआती 2 साल में भारत का पक्ष इजराइल के खिलाफ रहा।

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1950 में पहली बार भारत ने बतौर स्वतंत्र राष्ट्र इजराइल को मान्यता दी। इसके साथ ही भारत ने इजराइल का काउंसल को मुंबई में एक स्थानीय यहूदी कॉलोनी में 1951 में नियुक्त किया। इसे 1953 में अपग्रेड कर काउंसलेट का दर्जा दिया। 1956 में स्वेज नहर के विवाद के बीच इजराइल के विदेश मंत्री मोशे शेरेट ने भारत का दौरा किया। जानकारों के अनुसार 1962 के चीन युद्ध के दौरान इजराइल ने पुरानी घटनाओं को एक सिरे से भुलाकर भारत की हथियारों और दूसरे युद्धक साधनों से मदद की।

आपको बता दें कि उस वक्त भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने इजराइली समकक्ष से पत्र लिखकर मदद मांगी थी। इजराइल के तत्कालीन प्रधानमंत्री बेन गुरियन ने हथियारों से भरे जहाज को भारत रवाना कर पत्र का उत्तर दिया। हालांकि, सार्वजनिक तौर पर दोनों देशों ने एक-दूसरे से दूरी ही बरती क्योंकि तेल अवीव की निकटता वॉशिंगटन से हमेशा रही।

दूसरी तरफ भारत गुट निरपेक्ष राष्ट्र था और 1961 में बनाए गुट निरपेक्ष राष्ट्रों का संगठन उसूलन सोवियत रूस की तरफ झुका था। हालांकि सभी प्रमुख युद्धों में इजराइल ने भारत की भरपूर मदद की। 1971 में पाकिस्तान युद्ध और 1999 में करगिल युद्ध में भी इजराइल ने भारत को अत्याधुनिक हथियारों से मदद की। इतना ही नहीं इंदिरा गांधी ने जब भारत की खुफिया एजेंसी रॉ का गठन किया था तब भी इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने भारत का व्यापक स्तर पर सहयोग किया।

पहली बार 1992 में भारत के प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव ने भारत-इजराइल के बीच कूटनीतिक संबंध स्थापित किए। यहां यह भी बता दें कि अगस्त 1977 में मोरारजी देसाई के वक्त में इजराइली विदेश मंत्री मोशे दायान का भारत में एक गोपनीय दौरा हुआ था। इसके बाद से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों में गर्माहट आनी प्रारंभ हो गयी थी। 1992 में राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद से 2000 में पहली बार लालकृष्ण आडवाणी एक वरिष्ठ मंत्री की हैसियत से इजराइल गए थे।

उसी साल आतंकवाद पर एक इंडो-इजराइली जॉइंट वर्किंग ग्रुप का गठन किया गया। 2003 में तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा ने अमरीकी यहूदी कमिटी में एक भाषण दिया और उन्होंने इस्लामिक अतिवाद से लडऩे के लिए भारत, इजराइल और अमरीका के साथ आने की वकालत की। हालांकि, इस फैसले के पीछे बहुत से वैश्विक कारण थे, लेकिन भारतीय विदेश नीति में इजराइल का महत्व बढऩा प्रारंभ हो गया था।

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भारत इस बात की समीक्षा कर रहा था जैसे ही सोवियत रूस का विघटन हुआ और इजराइल-फिलीस्तीन के बीच शांति प्रक्रिया के शुरू हुई भारत ने इजराइल में अपना हस्तक्षेप बढ़ा दिया। इजराइल के साथ भारत के बदलते संबंधों की एक वजह जॉर्डन, सीरिया और लेबनान जैसे अरब मुल्कों ने भी भारत को अपनी रूस और अरब की ओर झुकी विदेश नीति पर सोचने के लिए मजबूर किया। पीएलओ (फिलीस्तीन की आजादी के लिए संघर्ष करने वाली संस्था) के प्रमुख, यासिर अराफात के व्यक्तिगत तौर पर इंदिरा गांधी से अच्छे संबंध थे और कहा जाता है कि मुस्लिम वोटों के लिए वह इंदिरा के साथ रैली करने को भी तत्पर रहते थे लेकिन अराफात और लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी हर समय भारत की कश्मीर नीति का विरोध किया और इसके कारण दुनिया के मंचों पर भारत की फजीहत होती रही।

इजराइल और भारत के बीच बदले संबंधों की असली कहानी सार्वजनिक तौर पर 2015 से नजर आने लगी। संयुक्त राष्ट्र में इजराइल में मानवाधिकार अधिकारों के हनन संबंधी वोट प्रस्ताव के वक्त भारत गैर-मौजूद रहा और इसी के साथ सार्वजनिक रूप से भारत ने इजराइल का साथ देना प्रारंभ कर दिया। इसके बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला दौरा इजराइल में 2017 में हुआ और पीएम नरेंद्र मोदी ने 3 दिनों का इजराइल दौरा किया। 2018 में बेंजामिन नेतन्याहू ने 6 दिनों का भारत का विस्तृत दौरा किया। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र में भारत ने यरुशलम को इजराइल की राजधानी के तौर पर मान्यता संबंधी प्रस्ताव के विरोध में वोट डाले लेकिन अब जाहिर तौर पर इजराइल और भारत के बीच दोस्ती पक्की हो चुकी थी।

मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही इस बात का अंदाजा लगने लगा था कि अब भारत की विदेश नीति बड़े पैमाने पर परिवर्तित होगी। मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो 2006 में इजराइल जा चुके थे और जब वो प्रधानमंत्री के रूप में इजराइली पीएम नेतन्याहू से पहली बार मिले तो उन्हें बतौर राष्ट्र प्रमुख इजराइल आने का उन्होंने न्योता दिया। भारत में भी लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि मोदी काल में इजराइल और भारत के बीच रणनीतिक साझेदारी स्थापित मानदंडों से अलग होने जा रही है, लेकिन इसी महीने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप द्वारा यरूशलम को इजराइल की राजधानी के रूप में दी गई मान्यता को खारिज करने का प्रस्ताव आया तो भारत ने इजराइल के खिलाफ वोट किया।

भारत और इजराइल के संबंधों को लेकर कहा जाता है कि दोनों देशों के बीच गोपनीय प्रेम-संबंध बहुत पहले से रहे हैं। इस मामले में पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल कहते हैं कि यह बात अब पुरानी हो गई। उन्होंने मानना है कि दोनों देश में अब खुला प्रेम-संबंध हैं। भारतीय प्रधानमंत्री वहां जा रहे हैं, इजराइली प्रधानमंत्री यहां आ रहे हैं। मोदी और नेतन्याहू के बीच कई मुलाकातें हो चुकी हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा सौदों में बढ़ोतरी हुई है। सिब्बल कहते हैं कि अब इसमें क्या गोपनीयता है?

नेहरूयुगीन विदेश नीति जिसमें तीसरी दुनिया की एकता और अहिंसा के सिद्धांत अहम हैं, के आधार पर भारत फिलस्तीनियों का खुलकर समर्थन करता रहा है बावजूद इसके भारत ने 1950 में इजराइल को एक स्टेट के रूप में मान्यता दी थी। कई विशेषज्ञ इस बात को मानते हैं कि भारत जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत किरदार के रूप में उभरता गया वैसे-वैसे अपने हित आधारित नीतियों को अपनाता गया।

शीत युद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया ने नई करवट ली और भारत ने खुद को अंतरराष्ट्रीय परिधि के मध्य में लाया। मध्य-पूर्व में भी भारत ने अपने हितों के हिसाब से नीतियों को अपनाया। व्यवसाय, सुरक्षा, ऊर्जा और राजनयिक हितों के लिहाज से मध्य-पूर्व भारत के लिए काफी खास है। भारत के वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार 2016-17 में अरब देशों से भारत का व्यापार 121 अरब डॉलर का रहा। यह भारत के कुल विदेशी व्यापार का 18.25 फीसदी हिस्सा है। वहीं इजराइल के साथ भारत का व्यापार पांच अरब डॉलर का था जो कि कुल व्यापार का एक फीसदी भी हिस्सा नहीं है। भारत और इजराइल के सुरक्षा संबंध काफी गहरे हैं जबकि अरब के देश रोजगार, विदेशी मुद्रा और ऊर्जा के लिहाज से काफी अहम हैं। ऐसी परिस्थति में भारत के लिए इजराइल का महत्व तो है लेकिन अरब देशों की शर्तों पर यह संभव नहीं हो सकता है।

भारत को वहां संतुलन बनाकर रखना होगा। मोदी काल में भारत, इजराइल और अमरीका इतने करीब आए कि इजराइल के पक्ष में कई लोग वोट की उम्मीद कर रहे थे। भारत में दक्षिणपंथी विचारधारा का इजराइल के साथ शुरू से ही सहानुभूति रही है। इसका एक मात्र कारण यह है कि भारत का बहुसंख्यक समाज मुसलमानों से आक्रांत है और इजराइल का गठन भी मुस्लिम समाज के खिलाफ जाकर ही हुआ है। यहूदी मुसलमानों के कारण ही अपने कथित मूल भूमि से हजारों साल तक कटे रहे।

हालांकि कारण चाहे जो भी कांग्रेस के शासन काल में प्रत्यक्ष रूप से न सही लेकिन परोक्ष रूप से भारत इजराइल का पक्ष लेता रहा है। यही कारण है कि भारत ने गुटनिरपेक्ष देशों के बीच कभी भी इजराइल विरोधी प्रस्तावों को हावी नहीं होने दिया। भारत नरेन्द्र मोदी और भाजपा के शासन काल में भी फिलीस्तीन के प्रति गंभीर है। यही कारण है कि जब फिलीस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास भारत आए थे तो पीएम मोदी ने फिलीस्तीनी चिंताओं का समर्थन किया था। मोदी ने शांतिपूर्ण इजराइल के साथ संप्रभु, स्वतंत्र और एकजुट फिलीस्तीन की बात कही थी।

हालांकि मोदी ने अरब देशों के साथ भी राजनयिक संबंधों में गर्माहट भरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इजराइल जाने से पहले वो कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात का दौरा कर चुके थे। गणतंत्र दिवस पर अबु धाबी के क्राउन प्रिंस को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित भी किया है। इस प्रकार मोदी ने यह संदेश पहले ही दे दिया है कि वे चाहे इजराइल का जितना समर्थन कर लें लेकिन अरब देशों के प्रति वे उदार हैं और अपना संबंध उनके साथ बनाए रखेंगे। मोदी युग में भी भारत मूल रूप से फिलिस्तीनियों को लेकर द्वी-राष्ट्र सिद्धांत और उसी के आधार पर समाधान पर अडिग है। गहराई से देखें तो इजराइल पर नीतियों को लेकर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार और बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में कोई फर्क नहीं है।

एक साफ-साफ इजराइल का समर्थन करती दिख रही है तो दूसरा गहराई से समर्थन करती रही है। याद रहे विदेश, आर्थिक और कूटनीति में कोई भी देश अपना हित जरूर देखता है। सरकार चाहे जो भी रहे देश में विदेश नीति, आर्थिक नीति और कूटनीति में कोई फर्क नहीं आता है। कई विशेषज्ञ भारत की वर्तमान इजराइल नीति को बेहद सरल तरीके से देखते हैं। भारत के द्वारा इजराइल का खुले तौर पर समर्थन विदेश नीति की सहजता भी हो सकती है। सच पूछिए तो इजराइल के साथ मेलजोल बढ़ाने का मतलब, मुसलमान विरोधी होना नहीं है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत का रुख यथार्थवादी रहा है। जैसे-जैसे विश्व परिदृष्य में परिवर्तन आया है भारत अपनी नीतियों को और प्रगाढ बनाता चला गया है साथ ही अपने हितों के प्रति सक्रियता दिखाता चला गया है।

इसे हिन्दुत्व के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए। भारत की वर्तमान विदेश नीति को स्वतंत्र विदेश नीति के रूप में स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। भारत ने इजराइल का समर्थन कर खुले तौर पर यह संदेश देने की कोशिश की है कि वो विदेश नीति में किसी के मोहताज नहीं है और अपने हितों को ध्यान में रखकर वह अपनी नीतियां बना रहा है। मध्य-पूर्व में भारत एक खास स्थिति में है। भारत एक साथ इजराइल, ईरान और सऊदी तीनों के साथ संबंध रख रहा है और यही भारत के हित में भी है। यदि इसमें से एक भी देश नाराज होता है तो भारत का बहुत बड़ा नुकसान होगा।

भारत-इजराइल के बीच का संबंध पांच बातों पर आधारित है। पहला स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक, इजराइल के लिए भारत शीर्ष हथियार खरीददारों में से एक है। साल 2012 से 2016 के बीच इजराइल द्वारा किए गए कुल हथियार निर्यात में 41 फीसदी हिस्सा केवल भारत का था। इजराइल भारत के लिए तीसरा सबसे बड़ा हथियारों का श्रोत है, जिसके तहत 2012 से 2016 के बीच हुए आयात में अमेरिका (14 प्रतिशत), रूस (68 प्रतिशत) के बाद इजराइल की 7.2 प्रतिशत की हिस्सेदारी थी। वैसे इन दोनों देशों के बीच सहयोग के शुरुआती संकेत 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान देखने को मिले थे, जब इजराइल ने भारत को सैन्य सहायता प्रदान की थी। इजराइल ने पाकिस्तान के साथ दो युद्धों के दौरान भी भारत की सहायता की।

भारत के असैन्य हवाई वाहनों (यूएवी) का आयात भी अधिकांश इजराइल से होता है। इजराइल से खरीदे गए 176 यूएवी में से 108, खोजी यूएवी हैं और 68 हेरोन यूएवी हैं। अप्रैल 2017 में, भारत और इजराइल ने एक उन्नत मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली के लिए दो अरब डॉलर के सौदे पर हस्ताक्षर किए थे, जो भारतीय सेना को 70 किलोमीटर तक की सीमा के भीतर विमान, मिसाइल और ड्रोन को मार गिराने की क्षमता प्रदान करता है। भारत ने उस साल मई में इजराइल निर्मित स्पाइडर त्वरित प्रतिक्रिया युक्त सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल का सफलतापूर्वक परीक्षण किया था। भारतीय वायुसेना इस प्रणाली को अपनी पश्चिमी सीमा पर तैनात करने की योजना बना रही है। आतंकवाद के खिलाफ एक संयुक्त कार्यसमूह के माध्यम से भारत और इजराइल आतंकवाद के मुद्दों पर भी घनिष्ठ सहयोग करते हैं।

दूसरा कूटनीति, दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों के 25 साल के प्रतीक के रूप में तीन भारतीय नौसैन्य जहाजों, विध्वंसक आईएनएस मुंबई, युद्धपोत आईएनएस त्रिशूल और टैंकर आईएनएस आदित्य ने मई 2017 में हाइफा बंदरगाह पर एक सद्भावना यात्रा की थी। तीसरा कृषि, 2015 से 2018 तक के लिए भारत-इजराइल कृषि कार्य योजना संचालित हो रही है और भारतीय किसानों के समक्ष नवीनतम तकनीक का प्रदर्शन करने वाले प्रस्तावित 26 कृषि उत्कृष्टता केंद्रों में से 15 इजराइल की मदद से विकसित किए जा रहे हैं। हरियाणा में करनाल के घरुंड में स्थित कृषि उत्कृष्टता केंद्र पर हर साल 20,000 से अधिक किसान जाकर लाभ लेते हैं। चौथा जल प्रबंधन, 28 जून, 2017 को कैबिनेट ने भारत में जल संरक्षण के राष्ट्रीय अभियान के लिए इजराइल के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) को मंजूरी दी थी।

प्रौद्योगिकी निपुण इजराइल ने जल प्रबंधन प्रौद्योगिकियां विकसित की है, क्योंकि ताजा पेयजल के सीमित स्रोतों के साथ वह एक अर्ध-शुष्क क्षेत्र में स्थित देश है। इससे पहले भारत और इजराइल ने नवंबर 2016 में जल संसाधन प्रबंधन और विकास सहयोग पर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। पांचवा व्यापार, इजराइल 2016-17 में भारत का 38वां सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार रहा है, जिसके तहत 5.02 अरब डॉलर (33,634 करोड़ रुपये) का व्यापार हुआ, जो 2012-13 के मुकाबले 18 फीसदी कम था। भारत के पक्ष में व्यापार संतुलन 2016-17 में 1.10 अरब डॉलर (7,370 करोड़ रुपये) रहा था। भारत ने इजराइल को 2016-17 में 1.01 अरब डॉलर मूल्य के खनिज ईंधन और तेलों के निर्यात किए थे।

इजराइल-फिलीस्तीन विवाद या फिर भारत-इजराइल संबंधो की बात जो भी हो लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इस पूरे इलाके का संबंध ही खुराफात और ङ्क्षहसा से है। जैसे ही किसी ने कहा कि मैं ही सर्वश्रेष्ठ और मेरा रास्ता ही एकमात्र रास्ता, उसी पर सबको चलना है, वहीं से हिंसा की शुरू हो जाती है। ईसाई हों, मुहम्मदवादी या यहूदी, इनका एकेश्वरवाद इन्हें दूसरों पर येन-केन-प्रकारेण काबिज होने, उसे कनवर्ट करने और उस पर हरेक जायज-नाजायज तरीके की हिंसा करने की छूट देता है।

अब देखिए, येरूशलम तीनों मजहबों का केंद्र है और तीनों का एक-दूसरे को काटने-पीटने का पुराना इतिहास है। यहूदियों और मुहम्मदवादियों से पुराना झगड़ा तो ईसाइयों और यहूदियों का है, खुद ईसा भी यहूदी ही थे। ऊपर से तीनों ही की धार्मिक किताबें आप पढ़ेंगे तो पाएंगे कि सबके पैगंबर भी एक-दूसरे से लिए और दिए गए हैं।

वर्तमान समस्या बर्बर ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की देन है, जिसमें चर्चिल का सबसे अधिक योगदान है। ब्रिटेन और अमेरिका ने न केवल भारत को घाव दिए, बल्कि अफ्रीका के कई देशों और अरब समस्या को भी बनाने में इन गोरों का भरपूर योगदान रहा है। फिलीस्तीन की समस्या विशुद्ध तौर पर इन अंग्रेजों की देन है, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र के नाम पर पूरी दुनिया में गंध फैलायी और फैला रहे हैं। (थोड़े मनोरंजक तौर से जानकारी चाहिए तो डॉमिनिक लापियर और लैरी कॉलिंस की ओ, येरूशलम पढ़ लीजिए)।

दिक्कत ये है कि इजराइल को किसी ‘दुर्घटनावश हिंदू’ को पहले प्रधानमंत्री के रूप में नहीं झेलना पड़ा, न ही संदेहास्पद नेहरू -खानदान को छह दशकों तक देश को चूसने, चबाने और उगलने के लिए छोडऩा पड़ा। इजराइली अपनी पहचान, अपनी भूमि और जड़ों को लेकर आश्वस्त, गर्वीले और खूंखार भी हैं। उनका तो कैलेंडर भी 5 हजार साल पीछे जाता है। हिंदू तो विक्रम संवत तक ही रुक जाते हैं। तो इजराइल का कोई नेता अपने पहले प्रधानमंत्री की तरह जमीन तो गिफ्ट करेगा नहीं। वह तो मारेगा, घुस के मारेगा, बड़ी मार मारेगा।

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नीलाभ कृष्ण

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