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डिप्रेशन : व्यर्थ की निराशाओं से बचें, परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना सीखें

डिप्रेशन : व्यर्थ की निराशाओं से बचें, परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना सीखें

विगत लगभग डेढ़ वर्षों में ग्लोबल पेन्डेमिक कोविड-19 के कारण जहां पूरी दुनिया में लाखों लोगों ने अपने जान गंवाएं हैं वहीं अपनों के जीवन और भविष्य की अनिश्चितता ने चिंता और डिप्रेशन सरीखी घटनाओं में भी भयंकर इजाफा किया है। लोग मानसिक रूप से बीमार हो रहे हैं, मनोरोगियों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है, डिप्रेशन के चपेट में आनेवाले लोगों के तायदाद में निरंतर वृद्धि हो रही है, सुसाइड की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं और इतना ही नहीं सामूहिक रूप से संपूर्ण परिवार के द्वारा जीवन-लीला खत्म कर लेने की घटनाओं ने मानव के सोच और दर्शन पर एक प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक सर्वे के अनुसार वर्तमान में दुनिया में करीब 27 करोड़ लोग अवसाद से ग्रसित हैं जो एक खतरनाक हेल्थ प्रॉब्लम का इंडिकेटर है। मनोविश्लेषकों का मानना है कि डिप्रेशन चिंता से शुरू होता है जो तनाव को जन्म देता है। इसके सबसे बदतर परिणाम के रूप में आत्महत्या की घटनाएं भी बड़ी तेजी से बढ़ रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार 15-29 वर्ष के लोगों में डिप्रेशन मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक लेटेस्ट रिपोर्ट की मानें तो भारत की आबादी का लगभग 5 प्रतिशत हिस्सा अवसाद के शिकार हैं डिप्रेशन, चिंता, एकाकीपन और अन्य मानसिक व्याधियों से लगभग देश की आबादी का 7.5 प्रतिशत हिस्सा ग्रसित है। जाहिर है यदि हम अवसाद सरीखे गंभीर मानसिक बीमारियों से निजात पाना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले तनाव से मुक्ति पाने की जरूरत है।

मन को भटकने नहीं दें, वर्तमान में जीयें, चिंताओं से बचें और समस्याओं का समाधान ढूंढें

हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है कि चिंता एवं चिता एक समान होती हैं। जीवन में चाहे कितनी ही कठिन परिस्थितियां क्यों न आये, हमेंuuu चिंता नहीं करनी चाहिए, हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। धैर्य से उसका सामना करना चाहिए। एक बार मुसीबतों से लड़कर जब आप बाहर आयेंगे तो फिर आप खुद को पहले से अधिक मजबूत एवं धैर्यवान पाएंगे।

सच पूछिए तो मानव जीवन में चिंताओं की भी विचित्र दुनिया होती है। हमें यह कभी नहीं भूलनी चाहिए कि चिंता करने से न तो भविष्य की घटनाओं को मनचाहा मोड़ दिया जा सकता है और न हीं अफसोस करने से गुजरे हुए कल को सुधारा जा सकता है।

प्रसिद्ध ब्रिटिश राजनीतिज्ञ और लेखक विंस्टन चर्चिल का चिंताओं के बारे में दर्शन काफी प्रेरणादायी है। उन्होंने एक बार कहा था, ”जब भी कभी मैं अपने जीवन की चिंताओं के बारे में पीछे लौट कर देखता हूं तो सहसा मुझे उस बूढ़े व्यक्ति की कहानी याद आ जाती है जिसने अपनी मृत्यु शैय्या पर कहा था कि वह अपने ताउम्र बेशुमार चिंताओं और भय से परेशान रहा, लेकिन उनमें अधिकांश चिंताएं कभी भी घटित नहीं हुईं।’’ अर्थात चिंताओं की एक मिथ्या दुनिया होती है जिसमें जीवन रूपी नाटक के सभी पात्र, दृश्य और घटनाएं हमारे दिमाग में कल्पनाओं के आधार पर ही गढ़ी जाती हैं, उनका दिमाग में ही मंचन भी होता है। किन्तु वास्तविक संसार से इनका कोई ताल्लुक नहीं होता है।

इस सन्दर्भ में प्रसिद्ध अमेरिकी दार्शनिक विलियम जेम्स का भी दर्शन काफी प्रेरक है। वे मानते थे कि यदि आप यह सोचते हैं कि आपके चिंता करने से जीवन में गुजरे कल और आनेवाले कल की घटनाएं बदल जाएंगी तो आप पृथ्वी से इतर किसी अन्य ग्रह पर फंतासी की दुनिया में रह रहे होते हैं। इसलिए हमें अपने जीवन की बीती हुई घटनाओं के बारे में बिलकुल नहीं सोचना चाहिए क्योंकि भूत पूर्ण रूप से बीत चुका कल होता है और आनेवाले कल का स्वप्न अनिश्चित और अनदेखा है। केवल वर्तमान ही सच है और इसलिए यह अनिवार्य है कि हम वर्तमान में जीयेें। किन्तु हमारी समस्या तब बढ़ जाती है जब हम आनेवाले कल की समस्यायों को भी आज ही सुलझा लेना चाहते हैं।

प्रसिद्ध ब्रिटिश अभिनेता मैट लुकास ने एक बार कहा था, ‘यदि आप अवसाद से खुद को बचाना चाहते हैं तो खुद को व्यस्त रखें। मेरे लिए कुछ नहीं करना ही मेरा दुश्मन है।’ मन का खालीपन मन में अनंत जहरीले चिंताओं के बवंडर को जन्म देता है जिससे मन अशांत होता है। मनोविश्लेषकों के अनुसार मन ही स्वास्थ्य का मूल होता है। मन में उठनेवाले विचार मन की दशा और दिशा को प्रभावित करते हैं। खुद को व्यस्त नहीं रखने पर मन में भटकाव होता है और यही हमारी बेकार की चिंताओं का कारण बन जाता है। कहते हैं कि जीवन में खुशी इस पर निर्भर नहीं करती कि आप कौन हैं या आपके पास क्या है। ये सिर्फ इस बात पर निर्भर करती है कि आप क्या सोचते हैं। लिहाजा मन को भटकने देने से रोकें और खुद को किसी-न-किसी रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रखें।

परिवार से जुड़े रहें और अपनी समस्याओं को उनसे साझा करते रहें

समस्याओं को अपनों से छुपा लेने पर वे और भी गंभीर हो जाती हैं। ऐसी परिस्थिति में संकोच नहीं करें, अपनों से खुल कर बातें अवश्य करें। विपत्ति में परिवार एक कुशन के रूप में कार्य करता है और वह हमें दर्द और चिंता से महफूज रखता है। प्राकृतिक आपदाओं के रूप में बाढ़, भूकंप, मृत्यु, सुनामी एवं अन्य दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से शिकार व्यक्ति भी अवसाद से पीडि़त हो जाते हैं। ऐसे क्रिटिकल मनोदशा में विशेषज्ञों तथा डॉक्टरों से सलाह मन को शुकून पहुंचाने में काफी मदद कर सकते हैं।

बीती घटनाओं को भूलना जरूरी 

क्या आपने कभी किसी नदी पर बने पुल के नीचे बहते पानी को गौर से देखा है? इस पानी के बहाव में भी जीवन को चिंता एवं अंतत: अवसाद से दूर रखने का एक अहम दर्शन छुपा होता है। कहते हैं कि इस पुल के नीचे से जो पानी एक बार बहकर निकल जाता है तो दुबारा वह कभी अपनी जगह लौट कर नहीं आता है। पुल के नीचे से बहनेवाला पानी हर बार नया होता है। आशय यह है कि हमें अपने जीवन में घटी घटनाओं की दुखद स्मृति को पुल के नीचे बहते पानी की तरह सदा के लिए भूल जाना चाहिए।

परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना सीखें

महान अंग्रेजी साहित्यकर, दार्शनिक एवं नाटककार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने अपनी पुस्तक ‘मैन एंड सुपरमैन’ में लिखा है कि चिंतारहित जीवन के लिए व्यक्ति को हमेशा जीवन की परिस्थतियों के अनुसार खुद को ढाल लेना चाहिए। जब इस संसार का कोई शख्स जीवन को अपने मन के अनुकूल ढालने की कोशिश करता है तो असफल रहता है और उसकी यही असफल कोशिश कई गंभीर समस्याओं को जन्म देती हैं। इसीलिए हमें खुद को परिस्थितियों के हिसाब से ढालने की कोशिश करनी चाहिए।

कामयाबियों की सीमा तय करें

अलेक्जेंडर दि ग्रेट के बारे में कहा जाता है कि जब वे विश्व विजय पर निकले थे तो उनके गुरू ने उनसे पूछा, ”मान लो तुम इस दुनिया को जीत जाते हो तो फिर आगे क्या करोगे? क्योंकि दुनिया तो केवल एक ही है, तो फिर जीतने के लिए दूसरी दुनिया कहां से लाओगे?’’ अपने गुरू के इस प्रश्न को सुनकर सिकंदर की आंखें खुल गयीं तथा उन्हें इस दुनिया की भौतिक सुख एवं सुविधाओं से वितृष्णा हो। गयी सच पूछें तो वक्त का तकाजा भी यही है कि हमारे पास जो भी है, हमें उसमें ही जीवन की असीमित खुशियां ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए ऐसी दशा में हम जीवन की कई अवांछित चिंताओं एवं जानलेवा तनावों से सुरक्षित रह जाते हैं।

दु:ख बेकार नहीं जाता, यह हमें बहुत कुछ सिखा जाता है

संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रसिद्ध कवि हेनरी वड्सवर्थ लॉन्गफेलो ने अवसाद से ग्रसित व्यक्ति के बारे में एक बार कहा था, ”प्रत्येक व्यक्ति का अपना निजी और गुप्त दर्द होता है जिसे दुनिया नहीं जानती है। दु:ख तब होता है जब उदासी से घिरे ऐसे व्यक्ति के दर्द को समझने की बजाय हम उसे नजरअंदाज कर देते हैं।’’ जब कभी जीवन समस्याओं में घिर जाए तो इससे परेशान होने की बजाय हमें इनके समाधान ढूंढऩे चाहिए, अपनों से बातें करनी चाहिए। दर्द को खुद तक बटोर कर रखने से इसकी टीस जानलेवा होती जाती है। दु:ख का सामना करके जब हम संकट से बाहर आते हैं तो जीवन के एक नये स्वप्न से हमारा साक्षात्कार होता है, जीवन का कड़वा सच हमें कई बेशकीमती बातें सीखा जाता है जो हमारे लिए विकट परिस्थितियों में मार्गदर्शन का कार्य करते हैं।

दूसरों के दु:ख से भी सीखें और सबक लें

इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसे कोई परेशानी नहीं हो, कोई चिंता या दु:ख नहीं हो। फर्क केवल प्रॉब्लम की प्रकृति का होता है। किसी के पावों में जूते नहीं होते हैं तो किसी के पांव ही नहीं होते हैं। ऐसी स्थिति में हमें दूसरों के दुखों से सबक लेनी चाहिए और खुद के हौसले को मजबूत करना चाहिए।

आशय यह है कि जब कभी डिप्रेशन के संकट में घिर जाएं तो मन को कमजोर नहीं होने दें। घबराएं नहीं, न ही भयभीत होएं – बल्कि धैर्य से उसका मुकाबला करें। यह कभी भी मत भूलें कि सुरंग चाहे कितनी ही लंबी क्यों न हो, इसके मुहाने पर नई उम्मीदों और हौसलों की रौशनी से लबरेज दुनिया हमारा इंतजार कर रही होती हैं।

 

umesh

 

   श्रीप्रकाश शर्मा


 

 (लेखक प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, मामित, मिजोरम, हैं)

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