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नक्सलवाद सोच और समस्या

नक्सलवाद सोच और समस्या

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बस्तर में लाल आतंक के गढ़ दंतेवाड़ा में पहुंच कर बहुत जोखिम भरे साहस का परिचय दिया। दंतेवाड़ा दक्षिण बस्तर का वह खतरनाक क्षेत्र है जहां पहुंचने की हिम्मत गत तीन दशकों में कोई भी प्रधानमंत्री नहीं जुटा पाया था। यहां तक कि इस अवधि में किसी भी प्रधानमंत्री ने उस बीहड़ क्षेत्र के ऊपर कोई हवाई उड़ान भरने का हौसला भी नहीं दिखाया था। मोदी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के साथ 9 मई को दंतेवाड़ा पहुंचे। प्रधानमंत्री ने छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद को समाप्त करने के संकल्प की घोषणा की। उसके लिए जो आवश्यक कदम उठाने की जरूरत है उन पर दृढ़ता से सकारात्मक रूख अपनाने का परिचय दिया। पहला कदम बस्तर की नैसर्गिक संपदा को कच्चे माल के रूप में कौडिय़ों के भाव बाहर भेजने की बजाय बस्तर में ही मूल्यवान उत्पाद के रूप में तैयार करने की महत्वाकांक्षी योजना का निर्धारण, दूसरा उसके माध्यम से स्थानीय जनशक्ति को बड़ी संख्या में रोजगार के स्रोत तैयार करना। तीसरा आदिवासी की वनोपज को खुले बाजार में अच्छे दाम पर बेचने के लिए उसके लिए सड़क और रेल परिवहन की व्यवस्था करना। चौथा नई पीढ़ी को हिंसक चरमपंथ से विरत रखने के लिए शिक्षा का विस्तार करना। पांचवां गुमराह युवकों से कंधों पर बंदूक की जगह हल रखने की अपील करना। इसके साथ ही चरमपंथियों में संवेदना जगाने के लिए उनसे आग्रह करना कि वे केवल पांच दिन हथियारों को बारूद उगलने से रोककर उन आदिवासी बच्चों के साथ जाकर रहें जिनके पालक चरमपंथी हिंसा में मारे गये। यह आग्रह चरमपंथियों से संवाद की खिड़की खुली रखने का भी संकेत देता है।

प्रधानमंत्री किसी राजनीतिक दल पर आक्षेप लगाने से बचते रहे, परंतु एक वाक्य में अपने मन की बात कह गये। उन्होंने कहा बस्तर में विपुल मात्रा में लौह-अयस्क उपलब्ध रहा है। उसको फौलाद में ढालने वाली युवाशक्ति भी यहां रही है, परंतु पांच-छ: दशकों में इनका रचनात्मक संगम बनाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव रहा। यदि समय रहते बस्तर की युवा शक्ति को रोजगार के अवसर मुहैया कराने के द्वार खोल दिये गये होते तो बंदूक उठाने के विकल्प को वे शायद न अपनाते। मोदी ने दंतेवाड़ा जैसे दूरस्थ क्षेत्र में पढ़ रहे बच्चों से सीधा संवाद किया। उनसे सारे हालात की हकीकत को जाना-समझा। उनमें विकास और समृद्धि से चमचमाते देश के अन्य हिस्सों के साथ जुडऩे की ललक को बूझा। बच्चों और आदिवासियों से संवाद तथा भौतिक विकास के ठोस साक्ष्यों को परखने के बाद प्रधानमंत्री ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की खुली प्रशंसा की। सदियों से नमक के एवज में चिरौंजी, इमली और अन्य मूल्यवान वनोपज को माटी के मोल बेचने के लिए अभिशप्त आदिवासी समाज को रमन सरकार द्वारा मुफ्त ‘अमृत नमक’ देने की योजना का सफलतापूर्वक दस-बारह वर्षों से लागू किया जा रहा है। उस पर प्रसन्न होते हुए मोदी ने कहा कि यह डॉ. रमन की संवेदनशीलता का प्रमाण है।

जिस तत्परता के साथ छत्तीसगढ़ के जनसंपर्क आयुक्त की टीम ने सरकारी योजनाओं को दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचाया उसके लिए भी प्रधानमंत्री ने विभाग की पीठ थपथपाई। परंतु यहां भी एक यक्ष प्रश्न सिर उठाए दिखा कि जितनी व्यापकता और प्रतिबद्धता के साथ वामचरमपंथी अपनी क्रांति के सुनहरे स्वप्न आदिवासियों में जगाते हैं, उसे निस्तेज करने के लिए सरकार क्या रणनीति बनाएगी। बेशक पहले से हालात बेहतर हुए हैं। नक्सली कमांडर लगातार पुलिस के सामने समर्पण भी करते जा रहे हैं, फिर भी बस्तर से सैकड़ों करोड़ की आय के जो स्रोत नक्सलियों के कब्जे में आ गये हैं, उन्हें सरकार कैसे और कब तक मुक्त करा पायेगी? चरमपंथी हिंसा के विस्तार का एक बड़ा कारण बस्तर की यह विपुल नैसर्गिक संपदा भी है जिस पर नक्सली काबिज हो चुके हैं। उसके लिए भी सरकार को कोई कार्ययोजना बनाकर उस पर दृढ़ता से अमल करना होगा।

गत बारह-तेरह वर्षों से बस्तर को हिंसा की अपसंस्कृति से बाहर निकाल लाने के गंभीरता से चल रहे प्रयास की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, अन्य राज्यों में भी इनका अनुसरण होना चाहिए। उन्हें अनुभव हुआ कि विकास, शिक्षा, संवाद और संचार के सभी माध्यमों को विस्तार देकर हिंसा के स्थायी समाधान की राह बन रही है। अंधी हिंसा से मुक्ति की इच्छा आदिवासी समाज में भी पनप रही है। संवेदनशील प्रशासकों की बस्तर में तैनाती से भी भ्रम और नियोजित दुष्प्रचार की धुंध छंटती मालूम हो रही है। जिस संकल्प और कार्ययोजना के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नक्सली हिंसा के गढ़ दंतेवाड़ा में 9 मई को पहुंचे, वह बस्तर की नियति में एक नया मोड़ लाने में निर्णायक हो सकती है। छत्तीसगढ़ सरकार पर बस्तर के आदिवासी का भरोसा जमाने की जो प्रक्रिया पिछले एक दशक से चल रही है, उससे निश्चय ही अब प्रधानमंत्री के ऐतिहासिक दौरे से नई गति मिलेगी। बस्तर में शिक्षा, कौशल उन्नयन, तकनीक और औद्योगिकरण की जो योजनाएं सामने रखी गई हैं वे बस्तर को शेष भारत के बराबर खड़ा करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाने का विश्वास जगाती हैं।

पहले बस्तर के विद्यार्थियों को राजधानी रायपुर और वहां से दिल्ली तक अध्ययन की सुविधा देने के लिए ‘प्रयास’ संस्था संचालित की गई थी। तब बस्तर में प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के अध्ययन-अध्यापन पर नक्सली आतंक का साया बहुत घना था। खत्म तो वह अब भी नहीं हुआ है, लेकिन शासन ने उस चुनौती को शक्तिहीन करने की व्यवस्था के साथ बस्तर में ही शिक्षा के सुरक्षित प्रसार की व्यवस्था कर ली है। नक्सली आतंक से ग्रस्त जिलों में शिक्षा के संकुल बनाये जा रहे हैं। गीदम के पास 100 एकड़ क्षेत्र में फैला एक एजुकेशन सिटी (शिक्षा के सुरक्षित परिवेश से परिपूर्ण शिक्षा-जिला) बनाया जा रहा है। पालनार, कुआकोंडा और कटेकल्याण सहित नक्सली हिंसा से थर्राते रहे कई क्षेत्रों में आवासीय विद्यालयों के संचालन की व्यवस्था कर दी गई है। इन शिक्षा-संकुलों से बस्तर के दूरस्थ क्षेत्रों तक शिक्षा का प्रसार संभव हो सकेगा। आदिवासी बच्चों के लिए आजीविका महाविद्यालयों (लाइवलीहुड कॉलेज) के संचालन का प्रबंध किया जा रहा है। जो दंतेवाड़ा नक्सली हिंसा के लिए कुख्यात रहा है वहां ‘आस्था गुरूकुल’ शिक्षा का नया अध्याय लिखा जा रहा है। नि:शक्त बच्चों के लिए ‘सक्षम’ विद्यालयों की श्रृंखला बन रही है। इसकी प्रत्येक इकाई में पांच सौ बच्चों के अध्ययन की व्यवस्था सुनिश्चित की जा रही है। नक्सलियों द्वारा स्कूल-भवन न बनने देने और बनते-बनते उनको तोड़ देने की फितरत को देखते हुए वहां पहले से बनाकर रखे गये (प्री-फेब्रीकेटेड) हिस्सों को जोडऩे की भवन निर्माण तकनीक के द्वारा मजबूत विद्यालय भवन खड़े करने की व्यवस्था को अंतिम रूप दे दिया गया।

बस्तर की बहुमूल्य वनोपज को आदिवासियों द्वारा खुले बाजार में ले जाने और सबके आवागमन को सुगम बनाने के लिए कांक्रीट की सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है। इनका निर्माण जवानों की निगहबानी में उनके सक्रिय सहयोग से करना शुरू हो गया है। कंक्रीट की सड़कों के निर्माण से नक्सलियों द्वारा अपनाए जाते रहे बारूदी सुरंगों से घातक विस्फोट करने के सबसे बड़े हथकंडे पर काफी हद तक रोक लग सकेगी। इनसे बस्तर में चार दशकों से भी अधिक समय तक पसरा ठहराव टूटेगा। बस्तर को प्रकृति ने बड़ी उदारता से जो सौगात दी है, उनका अधिकाधिक लाभ यहां के मूल निवासियों को मिल सके, इसके लिए ‘मेक इन इंडिया’ की तर्ज पर ‘मेक इन बस्तर’ की रणनीति की निर्णायक रूपरेखा तय हो गई है। बस्तर के उत्तम श्रेणी के लौह अयस्क (आयरन ओर) का उपयोग वहां पर भी हो सके इसके लिए नगरनार स्टील प्लांट के विकास के अगले चरण को पूरा करने का प्रबंधन निश्चित हो गया है। नगरनार के अलावा दंतेवाड़ा के डिलमिली में एक अल्ट्रा मेगा स्टील प्लांट बनना तय हुआ है। भारत के सिरमौर स्टील प्लांट भिलाई इस्पात संयंत्र को लंबे समय तक लौह अयस्क की निर्बाध आपूर्ति हेतु दिल्ली-राजहरा-रावघाट रेल लाइन परियोजना को विस्तार देकर रावघाट-जगदलपुर रेल लाइन बिछाने का निर्णय ले लिया गया है। विकास योजनाओं की सूची लम्बी है और उन्हें शब्दों में पिरोने का स्थान कम, इसलिए दो पंक्तियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक दिवसीय बस्तर तथा नया रायपुर प्रवास के महत्व को रेखांकित करने के लिए 24,000 करोड़ की सौगात के साथ उस संकल्पशक्ति का सम्मान करना उचित होगा, जो बस्तर को लेकर पनपे अवसाद को आशा और विश्वास का परिधान पहनाने जा रही है। अपने वजूद की आखिरी खंदक की लड़ाई लड़ रहे वाम चरमपंथी उसका खुला विरोध करने लगे हैं। विरोध का वातावरण बनाने के लिए जन-प्रदर्शन कर एलानिया कहा जा रहा है कि जैसे टाटा का स्टील कारखाना बस्तर में नहीं लगने दिया गया, वैसे ही डिलमिली में भी अल्ट्रा मेगास्टील प्लांट नहीं लगने दिया जायेगा। विरोध के वातावरण के निर्माण में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) चरमपंथियों के साथ खड़ी दिख रही है। बस्तर के लिए दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि विश्व की सर्वोत्तम श्रेणी के जिस लौह-अयस्क (आयरन ओर) का बड़ी मात्रा में जापान, चीन एवं अन्य देशों को लगभग पांच दशकों से निर्यात किया जा रहा है, उसे बस्तर में ही फौलाद में ढालने की योजना को आघात पहुंच सकता है। उसे स्टील में ढालने से बस्तर को जितना बड़ा राजस्व मिलता उससे वह वंचित रहता रहेगा। कारखाना बनने से 10,000 से अधिक आदिवासी युवकों को जो सीधा रोजगार मिलता, उससे भी वे वंचित रहेंगे। विकास के लिए राजनीतिक दलों में जो समझ बननी चाहिए उसकी राह में वोटों की राजनीति पलीते बिछा रही है। बस्तर की चरमपंथी हिंसा से मुक्ति के लिए राजनीति की नीयत का साफ होना जरूरी है।

प्रधानमंत्री ने पांच बटालियन अद्र्धसैनिक बलों और पुलिस के जवानों के मनोबल का सम्मान करते हुए उन्हें हर प्रकार से सबल बनाने का विश्वास दिलाया। इसका तत्काल असर यह हुआ कि छत्तीसगढ़ सरकार ने अस्पतालों में उपचार के लिए भर्ती घायल जवानों को ड्यूटी पर तैनात उनके साथियों के समान ही उपस्थित मानते हुए वेतन सहित सारी सुविधाएं देने का निर्णय ले लिया। जिन गंभीर स्थितियों से ये जवान जूझ रहे हैं, वे एक अलग विस्तृत आलेख का विषय है। मोदी ने माना कि ये जवान न्याय और सच के लिए लड़ रहे हैं। ”विजय सदैव न्याय और सच की होती है।’’

दंतेवाड़ा से रमेश नैयर

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