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एस.एम.एस. में सिमटती दुनिया

एस.एम.एस. में सिमटती दुनिया

PAGE 48-49-1एक जमाने में अपनी बात एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए लोगों को चिट्ठी, टेलीग्राम का प्रयोग करना पड़ता था, लेकिन वक्त के साथ-साथ नई तकनीक विकसित होती गई और इस तरह के पुराने तरीके सिमटते चले गए। आज दुनिया तेजी से बदलती जा रही है। नई तकनीक, नई सोच, नई विधाएं जीवन को गढ़ रहीं हैं। आज इलेक्ट्रॉनिक तकनीक का बाहुल्य है। मोबाइल संस्कृति हर वर्ग की पहुंच में है। इस मोबाइल की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है एसएमएस। संदेशों के आदान-प्रदान के बदलते परिवेश में कुछ लोगों ने एसएमएस को अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा बना लिया है। सुबह होते ही अपनों को ‘गुड मॉनिग’ का संदेश, शाम होते ही ‘गुड इवनिंग’ का संदेश किसी भी अवसर पर लोग दूर बैठे अपनों तक पहुंच जाते हैं। इसी तरह की शुरूआत लेखन सी.आर.भंसाली ने अपने जीवन में की और प्रतिदिन एक सकारात्मक संदेश अपने परिजनों, मित्रों को भेजना शुरू किया। जिन लोगों के पास ये संदेश पहुंचे उन लोगों की जिंदगी में अभूतपूर्व परिवर्तन दिखाई दिए। लेखक के इन संदेशों का लोगों पर ऐसा प्रभाव देखने को मिला कि उन्होंने सुझाव दिया कि इन संदेशों को एक पुस्तक का रूप दिया जाना चाहिए। इन्हीं संदेशों के सृजन से ‘खुशियों का कल्पवृक्ष’ पुस्तक की रूपरेखा तैयार की गई। एक अमूल्य एवं जन-जन की उपयोगी पुस्तक के रूप में यह प्रस्तुति निश्चित ही एक नए व्यक्ति और नए समाज के निर्माण का आधार बनेगी। यह पुस्तक व्यक्ति में सकारात्मकता का संचार करती है।

इस पुस्तक के जरिए लोगों का ध्यान आध्यात्म की ओर मोडऩे की कोशिशि की गई है। पुस्तक मे दर्शाया गया है कि कैसे हर दिन खुशी देने वाले संदेशों ने एक वर्ष में जुड़-जुड़कर एक कल्पवृक्ष का रूप धारण कर लिया। पुस्तक में लोगों का ध्यान इस बात पर केन्द्रित करने की कोशिश की गई है कि मनुष्य अपना कल्पवृक्ष स्वयं है। वह खुद ही इच्छा करता है, खुद ही उसे पूरा होने का वरदान मांगता है और खुद ही उसे पूरा करने का सामथ्र्य भी रखता है। आदमी जिस भी वस्तु की इच्छा करता है उस वस्तु की पूर्ति वह खुद ही कर सकता है कोई और नहीं। बस इतना पहचानने की देर है कि इच्छाओं को पूरा करने का कल्पवृक्ष स्वयं उसके भीतर मौजूद है। वह कल्पवृक्ष जिसकी सहायता से वह अपनी सभी इच्छाओं, मनोकामनाओं और आकांक्षाओं को पूरा कर सकता है, वह कहीं और नहीं बल्कि खुद में ही स्थित है। प्रतिदिन आनंद और मंगलमय की कामना करना सुखद प्रतीत होता है, लेकिन हमें यह समझना होगा कि असली आनंद और मंगल कहीं बाहर नहीं, बल्कि अपनी चेतना में ही है।

इंसान को असली खुशी पाने के लिए व्यक्तित्व-विकास की आवश्यकता होती है। व्यक्तित्व-विकास हेतु व्यक्ति के भीतर चार जीवन-मूल्यों का सम्प्रेषण अवश्य होना चाहिए। वह है शक्ति, साहस, बुद्घि और सहानुभूति। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपने आपको विकसित करना, राह के हर रोड़े को अपनी सीढ़ी बनाकर आगे बढऩा। अगर आप गहराई से मनन करेंगे तो जानेंगे कि कोई और नहीं, बल्कि आप ही खुद को आगे धकेलते हैं और आप खुद ही खुद को पीछे खींचते हैं। पुस्तक में कहा गया है कि इंसान घर बदलता है, लिबास बदलता है, दोस्त बदलता है, फिर भी परेशान क्यों रहता है। पुस्तक बताती है कि इंसान चाहे कुछ भी करे, लेकिन उसकी सोच जब तक सकारात्मक नहीं होगी तब तक वह जिंदगी के वास्तविक मायने नहीं समझ सकता, और तब तक वह खुद को भी नहीं समझ सकता और न ही अपनी मंजिल तक पहुंच सकता है। लेखक ने इसे गालिब की एक पंक्ति से लोगों को समझाने की कोशिश की है कि ‘उम्र भर गालिब यही भूल करता रहा, धूल चेहरे पे थी और आईना साफ करता रहा।’ मतलब इंसान को इधर-उधर भटके की बजाए खुद की चेतना का अध्ययन करना चाहिए। समस्त इच्छापूर्ति का कल्पवृक्ष उसके खुद के ही भीतर मौजूद है।

प्रीति ठाकुर

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