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उत्तर प्रदेश में भाजपा का सरकता सिंहासन

उत्तर प्रदेश में  भाजपा का सरकता सिंहासन

भारतीय जनता पार्टी को 14 वर्ष के बनवास के बाद उत्तर प्रदेश में जब सत्ता का सिंघासन मिला था तब लोग कहते थे कि बीस वर्ष तक कोई उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का कोई भी राजनैतिक दल हिला नहीं सकेगा। आत्म मुगधता से लबरेज भाजपा को हाल में  ही जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में मिली करारी हार ने इस बात का संकेत दे दिये है की आगामी 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के हाथों से उत्तर प्रदेश का सिंहासन सरकता नजर आ रहा है। बनारस, अयोघ्या, मथुरा, गोरखपुर से लेकर प्रदेश अध्यक्ष के गृह नगर जालौन तक में भारतीय जनता पार्टी की लुटिया डूब गयी।  सरकार और संगठन की नीतियों के चलते भारतीय जनता पार्टी जन के मन से दूर होती दिख रही है। पार्टी को जनता को पास लाने के प्रयास समय रहते नहीं किया गया तो 2022 में पुन सत्ता में आने की आस मात्र प्रयास बन कर रह जायेगी।

उत्तर प्रदेश में जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है तब से ब्यूरोक्रेसी के ताकत इतनी अधिक हो जाने के कारण पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति नेतृत्व का संवेदन शून्यता हो जान के कारण कार्यकर्ता जिस तरह से घर बैठने को मजबूर हो रहे हैं उससे लगने लगा है कि सब कुछ ठीक-ठाक रहना बड़ा कठिन है। गोरखपुर, फूलपुर लोकसभा के उपचुनाव में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री द्वारा छोड़ी गई सीट पर भी जिस तरह भारतीय जनता पार्टी को प्रदेश में सत्ता रहने के बाद भी पराजय का मुंह देखना पड़ा था और बाद में अति आत्मविश्वास की बात कहकर इस पराजय को कार्यकर्ता के घर बैठने का कारण बताया गया था बैसा वास्तव में होता नजर आ रहा है।  जिस प्रकार गोरखपुर और फूलपुर में कार्यकर्ता निष्क्रिय हो गए थे उसी तरह पूरे प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता निराश और हताश है पार्टी के नेतृत्व द्वारा सरकार में उनकी ना चलना निराशा का कारण बना है । बहराइच जनपद के भारतीय जनता पार्टी जिला अध्यक्ष ने अपने कार्यालय के बाहर एक नोटिस लगाकर जता दिया है कि कोई भी कार्य प्रशासन से कराने के लिए कृपया विधायक और सांसद से संपर्क करें यह संकेत है कि जिला प्रशासन भारतीय जनता पार्टी के जिला अध्यक्ष की कोई बात नहीं सुनता है। यही हाल प्रदेश के कई मंत्रियों ने दबे मन से अनेक बार इस संवाददाता को बताया है कि अधिकारी हमारी बात नहीं सुनते हैं हम अपनी बात कहे तो किस से कहें!

राजधानी लखनऊ में कोरोना की भयावह स्थिति में प्रदेश के कानून मंत्री पत्र लिखने के लिए मजबूर होना पड़ा जबकि नेतृत्व ने विधायकों और जिला अध्यक्षों तथा पार्टी के कार्यकर्ताओं को मीडिया के सामने अपनी बात या अपना दर्द बयान ना करने का निर्देश दिया हो। कई विधायक कोरोना के शिकार हुए जिनमें बरेली के विधायक अपने लिए इलाज के लिए केन्द्रीय स्वास्थय मंत्री से गुहार लगाते इस दुनियां से अलविदा हो गये। उत्तर प्रदेश में भाजपा के बड़ी संख्या में निवर्तमान विधायक अपने भविष्य की राजनीति और उसके आने वाले परिणामों को लेकर अभी से भयभीत नजर आ रहे हैं। कुछ विधायक विभिन्न दलों में जाने के प्रबंधन में लग गए हैं। 2022 का आतंक इन विधायकों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। विजय पाने के लिए उन्हें उस दल की तलाश है जिस दल के दम पर 2022 की नैया पार कर ले। पलायन के पीछे का विश्लेषण करने के पूर्व भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश में आई सरकार के कार्यों पर नजर डाली जाए तो अभी तक कोई विशेष कार्य बताने लायक प्रदेश में नहीं दिख रहा है। आकडे के खेल की दम पर सरकारे नहीं चुनी जाती है। पेड पीआर एजेन्सी क्षणिक सुख ही देती है परिणाम तो जनता अपने अनुभव के आधार पर देती है। चुनाव में विकास की गौरव गाथा जोहकाकत में जन के मन तक पहुच सकी हो दिख नहीं रही है। कोविड की दूसरी लहर में बदहाल स्वास्थ्य सेवा का दंश हर घर का अनुभव अंश बन गया है। दूसरी ओर देखा जाए तो भारतीय जनता पार्टी की सत्ता में आने के साथ ही कुछ माह बाद हुए स्थानीय निकाय नगर पालिका नगर निगम के चुनाव का भी विश्लेषण किया जाए तो एक बात सामने आती है कि भले ही शहरी क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी नगर निगमों में सर्वाधिक कब्जा करने में कामयाब रही हो लेकिन नगरपालिका तथा नगर पंचायतों पर प्रतिपक्ष के लोगों को सफलता मिली थी।भाजपा ने नगर निगमों में मिली जीत का ढिढोरा पीट कर नगरपालिका तथा नगर पंचायतों  में हुई बरी पराजय पर पर्दाडाल दिया था पर स्थानीय लोगों तक सच का सबाका है।

सत्ता की शक्ति से जिला पंचायत अध्यक्ष बनाने में भारतीय जनता पार्टी कामयाब भी हो जाती है तब भी 2022 की चुनाव की वैतरणी पार करना इतना आसान नहीं रहेगा। लगातार विकास के कार्यों में फिस्सडी रही भाजपा सरकार होने के बाद भी पुलिस और प्रशासनिक उत्पीडऩ तथा कमजोर को न्याय दिलाने में असफल रहे कार्यकर्ता हर जिले चमक दमक बाले नये जिला कार्यालय बन जाने के बाद भी असमर्थ रहन पर चुनाव में किस मुंह से जनता से वोट मांगेंगे! जनता की सेवा में कोई कार्य न कर सके। स्थानीय थानों में भी जिला अध्यक्ष किसी भी व्यक्ति को भी न्याय दिलाने के लिए पत्र न लिख सका हो, किस मुंह से जनता के बीच ऐलान कर सकेगा कि भविष्य में बनने वाली सरकार में और जनता के जनसेवक बनके काम आएगा। भले ही हर बूथ तक यूथ की टीम और पन्ना प्रमुख तक  बना लिए हो बेकाबू कोरोना  काल में लुटती जनता असमर्थ कार्यकर्ताओं के बीच में सरकार के प्रति जो नकारात्मक भाव पैदा हुआ है उसको पाटना अब भारतीय जनता पार्टी के लिए आसान नहीं दिख रहा है भाजपा की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ तो दल के अन्दर भी विरोध के स्वर उठने लगे है।भाजपा की डबल इंजन सरकार में  न तो सरकार के  मंत्रियों को किसान की चिंता है और नहीं संगठन  को।

समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी से ज्यादा कांग्रेस के मुखर होने के कारण भारतीय जनता पार्टी मानकर चल रही है कि कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में आधार नहीं होने के कारण हमारे लिए सत्ता में लौटना एक बार फिर आसान हो जाएगा। राजनैतिक पंडितों का कहना है की चुनाव में जब चारों ओर वातावरण विरोध का बन जाता है तो जरूरी नहीं होता कि कौन सा दल जीत रहा है जिस दल के प्रत्याशी मजबूत जनता को नजर आते हैं जनता एक दल को हराने के लिए दूसरे दल को थोक में वोट कर देती है। उदाहरण के तौर पर पिछले 15 वर्षों में लगातार देखने को मिल रहा है। जब मुलायम सिंह यादव की उत्तर प्रदेश में सरकार थी तो जनता ने विरोध भाव के कारण एकमत से बहुजन समाज पार्टी को बड़ी ताकत के साथ सत्ता के सिंहासन पर बिठाया था। सत्ता में आते ही बहुजन समाज पार्टी ने जिस तरह ब्यूरोक्रेसी के हाथ में अपनी सत्ता के सूत्र सौंप दिए उसका परिणाम हुआ कि अगले चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया। अखिलेश यादव भारी बहुमत के साथ विजय हुये लेकिन अखिलेश यादव ने फिर यही गलती दोहराई जो गलती मायावती ने की थी। अखिलेश यादव ने अपनी सत्ता के सारे सूत्र ब्यूरोक्रेसी के इर्द गिर्द दे दिए जिसका परिणाम यह हुआ कि कागजों में, अखबारों में उनकी सरकार पुन: आने की बात होती रही लेकिन जब जनता के द्वारा परिणाम दिए गए तो समाजवादी पार्टी उस गति पहुंची थी जिस गति की कल्पना तो बहुत कम लोगों ने की थी। एक बार फिर उत्तर प्रदेश में इतिहास दोहराने की ओर अग्रसर हो रहा है। समाचारो में और सोशल मीडिया पर बार-बार एक बात कही जा  रही हैं कि भारतीय जनता पार्टी का कोई विकल्प नहीं है लेकिन वास्तव में जमीनी हकीकत देखा जाए तो भाजपा कार्यकर्ताओं की उदासी भाजपा के पदाधिकारियों के  हाथ बंधे होने के कारण पिछड़ा वर्ग एवं सवर्ण समाज के एक बडे बर्ग का भारतीय जनता पार्टी के प्रति हो रहा मोहभंग नए गुल खिला सकता है। भारतीय जनता पार्टी ने तत्काल अपने कार्यकर्ताओं को सुध नहीं ली तो उत्तर प्रदेश में 14 साल बाद मिला ताज हाथ से सरकता नजर आएगा!

 

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

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