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यूपी में भाजपा की चुनौतियां : दोबारा पांच साल की राह में खड़े हैं अगले छह साल!

यूपी में भाजपा की चुनौतियां  :  दोबारा पांच साल की राह में खड़े हैं अगले छह साल!

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने जब चार साल पूरे किए तो नारा दिया- दशकों में जो न हो पाया 4 वर्षों में कर दिखाया। यह इस साल मार्च की बात थी। उत्साह से लबरेज पार्टी 2022 में  चुनाव जीतकर फिर से सत्ता हासिल करने के सपने देख रही थी। महज दो महीनों में हालात ऐसे बदले हैं कि भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष को लखनऊ आकर यूपी सरकार के मंत्रियों से यह फीडबैक लेने की जरूरत पड़ गई कि यदि आज चुनाव हो गए तो पार्टी की सरकार बनेगी यह नहीं और उसके जवाब में कोई भी मंत्री आत्मविश्वास से यह न कह सका कि सरकार बन ही जाएगी!

सच्चाई यह है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने दोबारा सत्ता हासिल करने की राह में कई चुनौतियां हैं। अव्वल तो पार्टी के संदर्भ में एक अहम पहलू यह है कि वह करीब दो दशक बाद यूपी में सत्ता में रहते हुए चुनाव लड़ेगी। इसके पहले आखिरी बार साल 2002 में वह सरकार में रहते हुए चुनाव में उतरी थी। तब राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री थे। भाजपा तब जो सत्ता से हटी तो 2007, फिर 2012 के चुनावों का सफर तय करते हुए तीसरे नंबर की पार्टी से 2017 में पहले नंबर की पार्टी बनते हुए डेढ़ दशक के वनवास के बाद शानदार तरीके से यूपी की सत्ता हासिल की थी।

वह लंबे समय तक विपक्ष में रहने के बाद की चुनावी कामयाबी थी। जिसमें 2014 के लोकसभा चुनाव में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने व नरेन्द्र मोदी के रूप में पार्टी को एक करिश्माई नेता मिलने की अहम भूमिका थी। जो सिलसिला 2019 के लोकसभा चुनाव में भी कायम रहा, लेकिन यूपी में भाजपा के लिए 2022 की राह इतनी आसान नहीं। इसका अहसास खुद पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी और इसलिए इन दिनों ऑपरेशन यूपी जोरों पर है।

यूपी में चुनाव अगले साल फरवरी-मार्च में होने हैं। वैसे में तकनीकी रूप से आठ-नौ माह भले बचे हों लेकिन व्यावहारिक तौर पर भाजपा नेतृत्व के पास यूपी में फिर से सत्ता में वापसी के हालात बनाने के लिए इस साल के बचे तकरीबन छह माह का वक्त ही है। यानी इन छह महीनों में वह क्या और कैसे कदम उठाती है उसकी कामयाबी एवं उससे बना माहौल ही फिर से पांच साल के लिए सत्ता पाने की राह तय करेंगे।

इसमें कोई शक नहीं कि कोरोना की दूसरी लहर ने उत्तर प्रदेश में जो विभीषिका मचाई उससे निपटने में योगी सरकार की नाकामी ने प्रदेश की बड़ी आबादी को बुरी तरह प्रभावित किया। लोग अपनों की जान बचाने के लिए अस्पतालों के दरवाजे-दरवाजे भटके। यह सच्चाई सामने आ गई कि सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। ऑक्सीजन का घोर संकट रहा और श्मशान व कब्रिस्तान लाशों से पट गए। जाहिर तौर पर लोगों में सरकार के प्रति भारी असंतोष है। यहां तक कि खुद भाजपा के सांसदों व विधायकों ने सार्वजनिक बयान दिए कि लोगों को इलाज नहीं मिल पा रहा। यूपी के मंत्रियों ने बीएल संतोष से अलग-अलग बैठकों में यही बात कही भी है।

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या अगले छह महीने में भाजपा सरकार एवं संगठन कुछ ऐसा चमत्कारी काम कर पाएंगे जिससे लोगों का गुस्सा शांत हो? सेवा ही संगठन कार्यक्रम के तहत पार्टी ने तय किया है कि नेता, कार्यकर्ता, सांसद, विधायक सब से सब गांव-गांव जाकर लोगों से मिलेंगे ताकि उनका गुस्सा शांत हो। सरकार ने व्यापक स्तर पर वैक्सीन लगाने का अभियान भी छेड़ा है। कोरोना से निपटने में नाकामी से उपजे क्रोध को थामने में सरकार और पार्टी को कितनी कामयाबी मिलेगी यह वक्त ही बताएगा लेकिन इसमें संदेह नहीं कि चुनौती बहुत बड़ी है।

चुनौती महज कोरोना के मोर्चे पर ही नहीं है! ज्यादा बड़ी चुनौती सरकार और संगठन के मोर्चे पर जरूरी बदलाव कर उसकी छवि सुधारने की है। किसान आंदोलन के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहले ही भाजपा के खिलाफ माहौल है। जबकि यूपी का यह हिस्सा भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है। पश्चिम की इस चुनौती से पार्टी अभी निपट भी नहीं पाई थी कि यूपी में उसकी सरकार के चार साल पूरा होने के जश्न और दोबारा सत्ता हासिल करने के दावों के दो महीने के भीतर हुए पंचायत चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा।

समाजवादी पार्टी समर्थित प्रत्याशियों ने प्रदेश में तमाम जगहों पर भाजपा समर्थित उम्मीदवारों को हरा दिया। ऐसे नतीजे तब आए जबकि भाजपा गए छह माह से पंचायत चुनावों में जीत के लिए लगातार तैयारियां कर रही थी। मंत्रियों को प्रभारी तक बनाया गया था। विधानसभा चुनाव से महज कुछ महीने पहले यूपी की ग्रामीण आबादी द्वारा सत्तारूढ़ पार्टी को नकार दिया जाना भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। पंचायत चुनाव के परिणामों ने भाजपा के साथ ही संघ परिवार के रणनीतिकारों की भी नींद उड़ा दी है।

ऐसे में सरकार में मंत्रिमंडल विस्तार व संगठन के स्तर पर भी जरूरी बदलाव करने की कवायद तेज हैं। यह चर्चा है कि कुछ जातियां यूपी में भाजपा की सरकार के तौर-तरीके से नाराज हैं। मंत्रिमंडल विस्तार कर इन्हें सकारात्मक संदेश देना भाजपा के लिए जरूरी हो गया है। यह बात खास तौर पर ब्राह्मणों के संदर्भ में ज्यादा प्रासंगिक है। इसके अलावा पश्चिमी यूपी में पार्टी का माहौल सुधारने के लिए वहां के नए चेहरों को मंत्रिमंडल में जगह देना भी भाजपा की राजनीतिक जरूरत है। उल्लेखनीय है कि अभी योगी कैबिनेट में पूर्वांचल व अवध का दबदबा है। केन्द्रीय नेतृत्व यूपी में बदलाव का यह काम यथाशीघ्र करना चाहता है ताकि चुनावों के पहले बदले हुए चेहरों के जरिए जनता के बीच सकारात्मक संदेश जाने का पर्याप्त समय मिल सके लेकिन यह इतनी आसानी से हो पाएगा इसमें संदेह है।

मसलन पूर्व नौकरशाह अरविंद कुमार शर्मा, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बेहद विश्वस्त माना जाता है, को यूपी सरकार में उप मुख्यमंत्री बनाए जाने की चर्चाएं जोरों पर हैं लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसके लिए तैयार नहीं बताए जाते क्योंकि कोई भी राजनेता जानता है कि सीधे पीएमओ से जिसके तार जुड़े हैं उसे सरकार में शामिल करना एक नए सत्ता केंद्र की नींव डालना होगा। ऐसे ही उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं। खुद भाजपा के अंदरखाने लोग मानते हैं कि उनकी और योगी की बनती नहीं। ऐसे में मौर्य की महत्वाकांक्षाओं का कितना समायोजन हो पाएगा?

योगी सरकार पर यह आरोप लगते रहे हैं कि यह ब्यूरोक्रेसी पर अति निर्भर है और राजनीतिकों को तवज्जो नहीं मिलती। अफसरों की मनमानी के आरोप बीएल संतोष के साथ बैठक में कई मंत्रियों ने भी लगाए। ऐसे में भाजपा नेतृत्व ब्यूरोक्रेसी में भी जरूरी बदलाव चाहता है और इसमें कई वैसे चेहरों को भी बदले जाने का अनुमान है जिन्हें योगी का पसंदीदा माना जाता है। बड़ा सवाल यह है कि क्या इन बदलावों के लिए वे सहमति देंगे? क्या दिल्ली का नेतृत्व और संघ मंत्रिमंडल से लेकर संगठन व नौकरशाही तक में जरूरी बदलाव करवा पाएगा? क्या वह योगी को मना पाएगा? यदि वे न माने तो क्या भविष्य होगा?

साढ़े चार साल पुरानी सरकार के मुखिया संग किसी टकराव का संदेश जाना चुनावों से पहले नकारात्मक असर डालेगा यह भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी जानता है। लिहाजा समन्वय से रास्ता निकालने की कोशिशें हो रही हैं। समन्वय से यह कर पाना ही बड़ी चुनौती है। हाल में पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों के चुनावों में भाजपा अपनी ही कसौटी पर खरी नहीं उतरी। खास तौर पर बंगाल में मोदी और शाह के धुआंधार चुनाव अभियान के बावजूद पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा। इस पृष्ठभूमि में यूपी को भाजपा किसी हालत में गंवाना नहीं चाहेगी लेकिन यहां उसे सत्ता पाने के लिए नहीं बल्कि सत्ता बचाने के लिए लडऩा है। ऊपर से फिक्र की बात यह कि कोरोना के हालातों से जनता नाराज है तो सत्ता में तवज्जो न मिलने से अपनों का एक समूह भी खफा है। जनता को मनाने व अपनों की मनुहार कर उन्हें फिर से पाले में लाकर यूपी में दोबारा पांच साल हासिल करने के लिए भाजपा नेतृत्व के पास छह महीने हैं। चुनौती बड़ी है और वक्त कम!

रंजीव

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