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उत्तर प्रदेश की कयासबाजी पर पटाक्षेप

उत्तर प्रदेश की कयासबाजी पर पटाक्षेप

जनसंख्या के लिहाज से देश के सबसे बड़े प्रांत को लेकर स्वतंत्र भारत की राजनीति में बड़ी मान्यता रही है। माना जाता रहा है कि दिल्ली के तख्त की राह उत्तर प्रदेश से होकर गुजरती है। 1991 में पामुलपति वेंकट नरसिंह राव और बाद के दिनों में मनमोहन सिंह की ताजपोशी इसके अपवाद रहे। अन्यथा हर बार दिल्ली की सर्वोच्च कुर्सी पर वही विराजमान हो पाया है, जिसको उत्तर प्रदेश ने समर्थन दिया है। दिल्ली की राह खोलने वाला उत्तर प्रदेश ही नहीं, उसके राजनीतिक मुखिया के भविष्य को लेकर कुछ दिनों तक संशय के बादल छाये रहे। लेकिन तीन दिनों तक उत्तर प्रदेश के विधायकों और संगठन का मन टटोलने के बाद भारतीय जनता पार्टी के संगठन महासचिव बीएल संतोष ने दिल्ली लौटकर तीन जून को जो ट्वीट किया, उसने साफ कर दिया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कुर्सी ना सिर्फ बची रहेगी, बल्कि उनकी ही अगुआई में अगले साल की शुरूआत में भारतीय जनता पार्टी विधानसभा का चुनाव लड़ेगी।

इसके पहले उत्तर प्रदेश को लेकर लखनऊ से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की कहानियां चलती रहीं। एक कहानी के मुताबिक, हाल ही में अफसरशाही की दुनिया छोड़ उत्तर प्रदेश के विधानपरिषद सदस्य बने अरविंद कुमार शर्मा को राज्य का उप-मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है। यह भी कहा गया कि केशव प्रसाद मौर्य को संगठन में भेजा जा रहा है। यह भी चर्चा रही कि कोरोना के प्रबंधन में कथित नाकामी के चलते अलोकप्रिय हुए योगी की भारतीय जनता पार्टी छुट्टी कर रही है। कहा यहां तक गया कि उनकी मर्जी से राज्य के अध्यक्ष बने स्वतंत्रदेव सिंह को भी बदला जा रहा है। इन चर्चाओं को बल दिल्ली से उत्तर प्रदेश पहुंचे पार्टी प्रभारी राधामोहन सिंह और बीएल संतोष के साथ प्रदेश के संगठन महासचिव सुनील बंसल की लंबी चर्चाओं से मिला।

2017 के विधानसभा चुनावों के बाद जिस तरह अचानक योगी आदित्यनाथ का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए उभरा और दौड़ में वे विजयी भी रहे, उसे भारतीय जनता पार्टी का एक बड़ा प्रभावी तबका पचा नहीं पाया है। उन दिनों पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य थे। उनकी ही अगुआई में पार्टी ने 404 विधानसभा सीटों में से 325 पर अपार बहुमत हासिल किया था। बेशक इस जीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का बड़ा असर रहा। लेकिन तकनीकी तौर से जीत के अगुआ केशव प्रसाद मौर्य रहे। भाजपा के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि भले ही उन्हें उपमुख्यमंत्री पद मिला, लेकिन उन्हें यह कसक है कि सत्ता के असली हकदार वही थे। इस कसक को वे भुला नहीं पाए हैं।

योगी जी गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर के महंत हैं। संभवत: हिंदू समाज की यह अकेली पीठ है, जो क्षत्रिय जाति से संबंध रखती है। हालांकि गोरखनाथ और उनकी परंपरा के प्रति श्रद्धा के बीच जाति और वर्ग कोई आधार नहीं है। लेकिन जब से आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने हैं, उसके कुछ दिनों बाद से ही वहां यह अभियान चलाया जा रहा है कि प्रशासन और ठेकेदारी में क्षत्रिय बिरादरी को ही तवज्जो दी जा रही है और उनके ही काम हो रहे हैं। यह बात और है कि योगी जी के नजदीक और ताकतवर जितने अधिकारी है, उनमें अवनीश अवस्थी समेत ज्यादातर ब्राह्मण ही हैं।

उत्तर प्रदेश भाजपा से जुड़े सूत्र बताते हैं कि क्षत्रियवाद को हवा देकर भाजपा से ब्राह्मणों की नाराजगी के नैरेटिव की शुरूआत भाजपा के अंदरूनी ताकतों ने ही दी। जिसे बाद में वामपंथी सलाहकारों से घिरे कांग्रेस नेतृत्व ने हथिया लिया। राजनीति के जानकार मानते हैं कि अतीत में ब्राह्मण, मुसलमान और दलित के सहारे उत्तर भारत की राजनीति की बादशाह रही कांग्रेस अरसे से ब्राह्मणों पर डोरे डाल रही है। यही वजह है कि जब अपराधी विकास दुबे के एनकाउंटर जैसे काम होते हैं तो उन्हें भी ब्राह्मणवाद को उकसाने और क्षत्रियवाद के नाम पर योगी के खिलाफ राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है।

उत्तर प्रदेश में एक तथ्य सत्य है कि वहां के विधायक अपनी ही सरकार से प्रसन्न नहीं हैं। नौकरशाही उन्हें कोई भाव नहीं देती। भारतीय राजनीति जिस ढर्रे पर पिछले छह दशक में बढ़ी है, उसमें ताकत, पैसा और हनक कमाना ही उसका उद्देश्य रहा है। लेकिन योगी राज में भाजपा के विधायकों के पास वह ताकत नहीं रही। सारा कार्य सीधे मुख्यमंत्री के नियंत्रण में करती है। इससे विधायक उपेक्षित महसूस करते हैं। यही वजह है कि जब भी योगी के खिलाफ अभियान चलता है, अपने आग्रहों के चलते माना जाता है कि विधायक भी इसे तवज्जो देते रहे हैं।

नौकरशाही और व्यस्था की स्थिति यह है कि घुन की तरह लगा रिश्वतखोरी पर निचले स्तर तक प्रभावी नियंत्रण नहीं लगाया जा सका है। बेशक उसमें कमी आई है। लेकिन अब भी लेखपाल, कानूनगो, थानेदार, सिपाही, ग्राम सेवक आदि बिना पैसे लिए काम करने के आदी नहीं हो पाए हैं। वैसे भी सदियों से जारी भ्रष्टाचार के घुन को कोई भी पांच साला सरकार चाह के भी प्रभावी रोक नहीं लगा सकती। लेकिन जब जनता पिसती है, तब वह तत्कालीन सरकार को ही कोसती है और मौके पर उसका गुस्सा उसी पर निकलता है।

उत्तर प्रदेश की इन जटिल राजनीतिक स्थिति को और जटिल बनाने में कोरोना की महामारी ने भी बड़ी भूमिका निभाई है। 23 करोड़ की आबादी और जर्जर स्वास्थ्य ढांचे और अनुशासनहीन लोगों के बीच कोरोना पर प्रभावी नियंत्रण पाना आसान भी नहीं है। उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश में खासकर देहाती इलाकों में सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा मौतें हुई हैं। राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तमिलनाडु में अब तक मौतों के आंकड़ों पर रोक नहीं लग पाई है। लेकिन इसे भी योगी विरोध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया।

इसी बीच हुए उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों ने भाजपा के पेशानी पर बल ला दिए। जिला पंचायत चुनावों में भाजपा की अपेक्षित सफलता ना मिलने के बाद माना जाने लगा कि योगी सरकार से जनता नाराज है। जाहिर है कि इसके बाद उनके खिलाफ अभियान चलाया गया। उसी का नतीजा रहा कि करीब एक पखवाड़े तक देश की राजनीतिक फिजाओं में योगी के भविष्य को लेकर अटकलों का बाजार तेज रहा।

कहा जा रहा है कि योगी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बचाया है। वैसे भी योगी जी जिस तरह की राजनीति कर रहे हैं, जैसे प्रशासनिक फैसले ले रहे हैं, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक राजनीतिक के करीब पड़ता है। यूं भी भारतीय जनता पार्टी के जितने भी मुख्यमंत्री हैं, उनमें सिर्फ योगी ही ऐसे हैं, जिनकी पूरे देश में पहचान है। यही वजह है कि उन्हें त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल से लेकर केरल तक में चुनाव प्रचार में भेजा जाता है और वहां भारी भीड़ जुटती है। उन्हें देश का एक बड़ा वर्ग भाजपा के भावी नेतृत्वकर्ता के रूप में भी देखता है। कुछ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उत्तर प्रदेश जैसे बेपटरी राज्य की व्यवस्था को चलाना अगर संभव हो पा रहा है तो उसकी बड़ी वजह योगी जी की अक्खड़ शैली भी है। यह भाजपा के कोर वोट बैंक को भी पसंद आता है। यही वजह है कि जब उनकी विदाई की अटकलबाजी तेज हुई थी तो सोशल मीडिया पर उनके पक्ष में जो लोग उतरे थे, उनमें से ज्यादातर गैरक्षत्रिय ही थे।

लोग चेतावनी तक देने लगे थे कि भाजपा ने अगर योगी को हटाया तो उसका नुकसान उसे उठाना पड़ सकता है।

अब उत्तर प्रदेश में भाजपा ने फैसला लिया है कि उसके नेता जिला स्तर और उससे नीचे भी जाएंगे और लोगों से सीधा संवाद करेंगे। इस संवाद का एक मात्र उद्देशय 2022 के विधानसभा चुनावों के लिए लोगों का भरोसा अर्जित करना है।

राजनीति संकेतों में बड़ी-बड़ी बातें करती है। बीएल संतोष ने तीन दिनों के विमर्श के बाद योगी सरकार की प्रशंसा करते हुए जो ट्वीट किया, उनमें उनके भविष्य को लेकर कोई बात नहीं कही है, बल्कि कोरोना के खतरे को देखते हुए बारह साल से कम उम्र वाले बच्चों के माता-पिता को टीका लगाने के फैसले को बेहतर बताया है। स्पष्ट है कि संतोष ने इस तरह उत्तर प्रदेश की भाजपा को स्पष्ट संकेत दे दिया कि राज्य में अगला चुनाव योगी जी की अगुआई में ही लड़ा जाएगा।

 

Deepak Kumar Rath


उमेश
चतुर्वेदी

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