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न्यायपालिका ने लक्ष्मण रेखा लांघी?

न्यायपालिका ने लक्ष्मण रेखा लांघी?

यह साफ है कि संविधान सुप्रीम कोर्ट और हाइकोर्टों को संसद, विधानसभाओं या किसी अन्य निकाय से पारित कानूनों की समीक्षा का अधिकार देता है, न कि कानून बनाने या उन पर अमल करने का। इसके अलावा न्यायपालिका का कर्तव्य देश के लोगों के मौलिक कर्तव्यों की अनदेखी किए बिना उनके मौलिक/कानूनी अधिकारों की रक्षा करना है।

इन संवैधानिक अधिकारों के तहत न्यायपालिका देश का शासन नहीं चला सकती या चलाती हुई नहीं दिख सकती, क्योंकि संविधान के तहत यह अधिकार कार्यपालिका/निर्वाचित सरकार का है, जो जनता के प्रति जवाबदेह है।

आम धारणा यह है कि न्यायपालिका संविधान में लोकेच्छा से स्थापित सीमा लांघ गई है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट कानून से ऊपर नहीं है और जब भी न्यायपालिका अपने निर्देशों, फैसलों या अदालत में मौखिक टिप्पणियों के जरिए सीमा का उल्लंघन करती है तो उसे संवैधानिक नहीं माना जाना चाहिए। आम लोगों का मानना है कि न्यायपालिका लोकलुभावन भावनाओं को तरजीह दे रही है, जो समूची संवैधानिक न्याय व्यवस्था को ही नुकसान पहुंचा सकती है।

न्यायपालिका दूसरे संवैधानिक निकाय के कामकाज को खत्म नहीं कर सकती या ऐसा करते हुए नहीं दिख सकती। देश ने बड़ी हैरानी के साथ महामारी के मौजूदा दौर में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाइकोर्टों की सुनवाइयों को देखा कि अनिर्वाचित न्यायपालिका सुपर सरकार की तरह पेश आ रही है और सीधे-सीधे प्रशासनिक कामकाज में हस्तक्षेप कर रही है। इस तरह निर्वाचित सरकारों की लोगों के प्रति जवाबदेही की व्यवस्था का उल्लंघन हुआ। न्यायपालिका कानून की व्याख्या और नागरिक अधिकारों की रक्षा की सर्वोच्च संस्था है, वह सार्वजनिक स्वास्थ्य और दवा के क्षेत्र की विशेषज्ञ नहीं है।

कहने का मतलब यह है कि हम ऐसे महामारी के दौर से गुजर रहे हैं, जैसा कुछ माननीय जजों समेत मौजूदा पीढ़ी नहीं देखा है, न ही कोई इसके व्यावहारिक पहलुओं से परिचित है। चीन के वुहान वायरस के संक्रमण से आई यह बीमारी दुनिया भर में बेहतरीन स्वास्थ्य ढांचा और सुविधाओं के बावजूद बड़े पैमाने पर लोग जान से हाथ धो बैठे। लेकिन भारत में अनेक दुर्भाग्यपूर्ण मौतों के बावजूद घातक दर, ठीक होने की दर और मृत्यु के मामले में स्थिति बेहतर रही है।

भारत में दूसरी लहर का प्रकोप अचानक फैला और वायरस के चीनी वैरिएंट ने अप्रत्याशित रूप से नए आयु वर्ग के लोगों को शिकार बनाया। यह अधिक घातक था और मरीजों को अस्पताल में लंबे समय तक रहना पड़ा और उन्हें ऑक्सीजन की भी ज्यादा जरूरत पड़ी। सरकार उपलब्ध साधनों में महामारी से पार पाने की कोशिश कर रही है और संसाधनों में इजाफे की भी कोशिश में जुटी है। केंद्र सरकार विशेषज्ञों की सलाह और अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देशों के मुताबिक बेहद सक्रिय योजना तैयार की और उस पर अमल किया।

हालांकि हर मौत दुर्भाग्यपूर्ण है, आंकड़ों से साफ है कि भारत ने कमतर मृत्यु दर और ठीक होने की ऊंची दर के साथ विसित दुनिया के मुकाबले बेहतर किया है। महामारी की खास प्रकृति से दुनिया भर में व्यवस्था चरमरा उठी। भारत समेत सभी देशों में स्वास्थ्य सेवा का हर क्षेत्र सामान्य दिनों की तुलना में काफी अधिक कामकाज और आपूर्ति मुहैया करा रहा था, इसके बावजूद स्वास्थ्य ढांचे में लगातार सुधार किया जाता रहा।

इन सबके बीच, न्यायपालिका अपना संवैधानिक दायित्व भूल गई और उसने जानते-बूझते देश की प्रशासनिक व्यवस्था में दखलंदाजी की। सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणियां कार्यपालिका का मनोबल गिराने के लिए काफी थीं और उन्हें मीडिया के एक खास गिद्ध तबके ने लपक कर देश में आतंक और नकारात्मकता फैला रहा है। ऐसे न्यायिक ढिंढोरा पीटे जाने के लिए क्या न्यायपालिका को जवाबदेह नहीं माना जाना चाहिए? न्यायिक सक्रियता जैसा कुछ नहीं होता। न्यायपालिका को संवैधानिक दायित्व के हिसाब से व्यवहार करना चाहिए।

गौरतलब है कि महामारी के दौरान, असल में, केंद्र सरकार ही कई राज्य सरकारों का काम कर रही है। इस तरह यह धारणा पैदा हुई कि न्यायपालिका ने गड़बड़ करने वाली राज्य सरकारों को छुट्टा छोड़ दिया और ऐसा लगा कि पूरी तरह केंद्र सरकार पर ही महामारी से निपटने की जिम्मेदारी है, हालांकि स्वास्थ्य राज्य का विषय है।

आपदा प्रबंधन कानून राज्य सरकारों को अपने दायित्व, जिम्मेदारियों और जवाबदेही से मुक्त कर देता है। इसका ज्वलंत उदाहरण यह है कि कोविड संक्रमण के लगभग एक जैसे मामलों के बावजूद महाराष्ट्र एक-तिहाई ऑक्सीजन आपूर्ति के साथ महामारी से निपटने में कामयाब रहा, जबकि दिल्ली को तीन गुना अधिक ऑक्सीजन मिला, लेकिन राज्य सरकार स्थिति संभाल नहीं सकी। ऑक्सीजन ऑडिट की बात होने पर अदालत में दिल्ली सरकार की सारी दलीलें बुरी तरह धराशायी हो गई।

यह जरूर याद रखना होगा कि केंद्र सरकार महामारी और उसके तेजी से बदलती प्रकृति को लेकर योजना बनाई है। यह योजना विशेषज्ञों और राज्य सरकारों की सलाह से बनाई गई है। इस विशेषज्ञता से न्यायपालिका वंचित है। देश के लोगों के बीच यह संदेश गया है कि अनिर्वाचित और लोगों के प्रति गैर-जवाबदेह न्यायपालिका सुपर सरकार बन गई है।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सकारात्मक जवाब दिया और अधिकारों के बंटवारे को लेकर संवैधानिक स्थिति की ओर साफ-साफ इशारा किया। केंद्र सरकार ने वैश्विक महामारी के संदर्भ में जवाब दाखिल किया कि देश की रणनीतियां पूरी तरह से मेडिकल विशेषज्ञों की सलाह और वैज्ञानिक सोच-विचार के तहत बनाई गई हैं। इसलिए न्यायिक हस्तक्षेप की गुंजाइश बहुत कम है। अच्छी नीयत से भी कोई अतिरेकी न्यायिक हस्तक्षेप विशेषज्ञ सलाह और प्रशासनिक अनुभव के बिना ऐसे अवांछित परिस्थितियां  पैदा कर सकता है, जिससे डॉक्टरों, वैज्ञानिकों और कार्यपालिका के लिए नए समाधान पेश करने की गुंजाइश थोड़ी रह जाएगी।

केंद्र ने शीर्ष अदालत के मांगने पर राष्ट्रीय कार्य दल गठन के ब्यौरे न जाहिर करके सही ही किया। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के समांतर कार्य दल की कोई जरूरत नहीं थी क्योंकि केंद्र सरकार का कार्य दल पहले से मौजूद था। सुप्रीम कोर्ट का कार्य दल और राष्ट्रीय कार्य दल की गतिविधियों में घालमेल हो, यह अच्छे प्रशासन के लिहाज से ठीक नहीं है। टीकाकरण और दवा की आपूर्ति में न्यायिक हस्तक्षेप सरकारी कामकाज और नीतिगत फैसलों में साफ-साफ दखलंदाजी है। क्या न्यायपालिका को अपने लिए ऐसे हस्तक्षेप की इजाजत देनी चाहिए और क्या संसद को मौन दर्शक बने रहना चाहिए? ऐसे अभूतपूर्व संकट के दौर में सरकार को सक्रिय रणनीति बनाने के अधिकार की जरूरत है क्योंकि देश और राज्यों के पैमाने बदलते रहते हैं।

सरकार की नीति अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देशों के मुताबिक और भारत के संदर्भं के मद्देनजर खासकर बनाई गई हैं। यह नीति समान, भेदभाव रहित और बौद्धिक पैमानों पर आधारित है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के मुताबिक है और ऐसी नीति सभी संबंधित पक्षों से सलाह-मशविरा के बाद बनाई गई है। क्या सुप्रीम कोर्ट और हाइकोर्ट नीति निर्माण की सरल प्रक्रिया से भी अपरिचित हैं? न्यायपालिका को महामारी की चुनौतियों के मद्देनजर रणनीति के स्तर पर भी जरूरी विशेषज्ञता की जरूरत है। न्यायपालिका की मौखिक टिप्पणियों को देश और विदेश में मीडिया के एक खास तबके ने विशेष तवज्जों दी, जिसे गिद्ध पत्रकारिता कहा गया है। क्या न्यायपालिका ने अनजाने में गिद्ध पत्रकारिता को बढ़ाव दे दिया?

ठोस इरादों वाली सरकारें खासकर संकट के दौर में अपने काम की वजह से जानी जाती हैं और उन्हें देश में आगे आने वाले चुनावों में लोगों का सामना करना होगा। मौजूदा संकट ने न्यायपालिका के कार्यकलाप और उच्चतर न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के तरीके पर भी रोशनी डाला है।

लोग आज भी सुप्रीम कोर्ट और हाइकोर्टों में जजों की नियुक्ति में देश के प्रधान न्यायाधीश की विचार-विमर्श की प्रक्रिया की न्यायपालिका की व्याख्या को नहीं समझ पाते हैं। देश के लोगों की न्यायपालिका पर गहरी नजर है, जो खुद को लोकेच्छा के मुताबिक पेश करती है और लोकतंत्र में सब कुछ लोकेच्छा के मातहत होता है। संवैधानिक संस्थाओं द्वारा सीमा उल्लंघन को लोकतंत्र के लिए खतरा मानकर उस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। सीमा उल्लंघन और न्यायिक दखलंदाजी से निपटने के संवैधानिक प्रावधान मौजूद हैं। वक्त की जरूरत है कि जजों की नियुक्ति की मौलिक संवैधानिक स्थिति को कार्यपालिका बहाल करे, ताकि संवैधानिक दायित्व का पूरी तरह पालन हो सके।

 

देश रतन निगम

(लेखक अधिवक्ता एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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