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लक्षद्वीप विकास के आड़े आता इस्लामिक कट्टरवाद

लक्षद्वीप विकास के आड़े आता इस्लामिक कट्टरवाद

लक्षद्वीप भारत का सबसे छोटा संघ शासित राज्य है जों अचानक से लोगों के मध्य चर्चा का विषय बन गया जब #save Lakshadweep ट्विटर पर ट्रेंड करने लगा। सोशल मीडिया के उबाल ने विपक्षी राजनीतिक दलों कों मुस्लिम तुष्टीकरण का खेल खेलने का एक और मौका दे दिया। परिणामस्वरूप राहुल गांधी, शिवसेना और केरल की वांमपथी सरकारो ने साथ मिलकर  लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। और तों और केरल सरकार ने तो बकायदा विधानसभा में बिल लाकर लक्षद्वीप के प्रशासक को हटाने की मांग की।

लेकिन ऐसा क्या कारण था कि एकाएक लक्षद्वीप राजनीतिक विमर्श में चर्चा का केंद्र बन गया। दरअसल प्रफुल्ल पटेल जो वर्तमान में
लक्षद्वीप के प्रशासक हैं के द्वारा लक्षद्वीप के सौंदर्यकरण, पर्यटन, पर्यावरण संरक्षण और द्वीपों में होने वाली अपराधिक गतिविधियों को रोकने के लिए कुछ नए कानून लाए गए हैं, ताकि लक्षद्वीप को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके। लेकिन तमाम कट्टरपंथी मुस्लिम समुदाय और विपक्षी दलों द्वारा लक्षद्वीप में मुस्लिम कार्ड की आड़ में कानूनों का विरोध किया जा रहा है। लक्षद्वीप में मुस्लिम कार्ड खेले जाने का मुख्य कारण लक्षद्वीप की लगभग 94 प्रतिशत जनसंख्या का मुस्लिम होना माना जा सकता है। मसलन कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल यहां यह प्रचार करके कि यह सभी कानून मुस्लिम विरोधी तो है ही, साथ ही लक्षद्वीप की संस्कृति के लिये भी घातक है जैसे कुप्रचारों और विकास विरोधी प्रपंचों के द्वारा आम जनता को विकास से दूर रखने का यह प्रयास कर रहें है। गौरतलब है कि कांग्रेस और वामंपथियों का यह बहुत पुराना पैतरा रहा है, जिसके कारण आज तक मुस्लिम बहुल क्षेत्रों और वनवासी बहुल क्षेत्रों को या तो विकास विरोधी आन्दोलनों में या फिर संस्कृति विरोधी आंदोलनों में उलझाकर सभी सुख सुविधाओं से वंचित रखा जाता रहा है! ऐसी धूर्त राजनीति के पणिामस्वरूप ऐसे क्षेत्रों और वहां के युवाओं को विकास से तो दूर रहते ही है साथ ही इन्हें धार्मिक आधार पर होने वाले दंगो और जल जंगल जमीन जैसे आन्दोलनों के नाम पर नक्सलवाद जैसी आतकंवादी गतिविधियों में धकेल दिया जाता है।

बहरहाल, लक्षद्वीप में विपक्षी दलों के मध्य बौखलाहट का मुख्य कारण विकास या  देश की संस्कृति और पर्यावरण की चिंता नहीं है, अपितु वर्तमान सरकार की योजना और नए भारत निर्माण की प्रक्रिया में उन सभी राज्यों का भी समान रूप से भागीदारी सुनिश्चित करने का निर्णय है जिन्हें विकास की मुख्यधारा से सदैव वंचित रखा जाता रहा है। इसी दृढ निर्णय में इस बार लक्षद्वीप जो केरल के वामपंथियों और मुजाहिदिन जैसे आतकंवादियों की गतिविधियों का गढ़ बनने जा रहा था उसे विकास से सीधे जोडऩे का वर्तमान सरकार का यह निर्णय इन अलगाववादियों के गले नही उतर रहा।

भौगोलिक दृष्टि से लक्षद्वीप भारत के 8 केंद्र शासित प्रदेशों में से सबसे छोटा केंद्र शासित प्रदेश है। 1956 में इस केंद्र शासित प्रदेश का गठन किया गया और 1973 में इसका नाम लक्ष्यद्वीप भी रखा गया, जिसका मलयालम और संस्कृत में अर्थ है ‘एक लाख द्वीप’। यह प्रदेश 32 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ एक द्वीप समूह है जिसमें कुल 36 द्वीप शामिल है। इसके अलावा लक्षद्वीप में लगभग 12 उपद्वीप समूह है जिनमें शामिल है अगत्ती, अमीनी, कवारत्ती, मिनिकॉय, किल्टन, आंड्रोट, बंगाराम, बित्रा, चेटलत, कदमत, और कल्पेनी। बित्रा इनमें सबसे छोटा उपद्वीप है। यह क्षेत्र आकर्षक समुद्र तटों और हरे-भरे परिदृश्य के लिए जाना जाता है। रेतीले समुद्र तट, वनस्पतियों और जीवो की प्रचुरता पर्यटन की दृष्टि से इस क्षेत्र को और उपयोगी बनाती है। कवारत्ती लक्षद्वीप समूह की राजधानी और लक्षद्वीप समूह का प्रमुख राज्य है। लक्षद्वीप के लोगों का मुख्य व्यवसाय मछली पकड़ऩा, नारियल की खेती करना और कॉयर ट्विस्टिंग हैं। लक्षद्वीप भौगोलिक दृष्टि से जितना धनी है आर्थिक दृष्टि से यहां के निवासियों का जीवन उतना ही कठिन है जिसका एक बड़ा कारण द्वीप पर किसी प्रकार का रोजगार ना होना और जीविका के लिए केवल मछली पकडऩे पर निर्भर रहना है। लक्षद्वीप की अर्थव्यवस्था ने अपने संसाधनों के लिए बहुत कम या कोई प्रबंधन कार्रवाई नहीं देखी है। रीफ पर प्रजातियों की उच्च विविधता के बावजूद, किसी एक प्रकार की बड़ी आबादी नहीं है। इसलिए मछली, मोलस्क और क्रस्टेशियंस की प्रजातियां, जो द्वीपवासियों द्वारा पसंद की जाती हैं, अधिक मछली पकडऩे की चपेट में हैं और कई प्रजातियों को अब सरकारी अधिसूचनाओं में लुप्तप्राय के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

लंबी लाइनों और प्रशीतन ने मछली पकडऩे के क्षेत्र के विस्तार में सहायता की है, लेकिन साथ ही साथ आय विभाजन भी तेज हुआ है। ये रुझान चुनौतियां पैदा करते हैं और अनुकूल प्रबंधन के लिए सामाजिक-आर्थिक निगरानी की आवश्यकता को दोहराते हैं। रोजगार के अवसर बढ़ाने, मत्स्य पालन प्रबंधन, स्वच्छता, अपशिष्ट निपटान और पेयजल के लिए नीतिया विकसित करने की भी सख्त जरूरत इस क्षेत्र में लगातार महसूस की जाती रही है। इसी तथ्य को ध्यान मे रखते हुए लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल ने ऐसे कई प्रगतिशिल कानूनों को लागू करने का ड्राफ्ट रखा हैं। इसके पीछे एक अन्य कारण लक्षद्वीप के लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाना तो है, साथ ही मालद्वीप की तरह लक्षद्वीप को भी एक वैश्विक पर्यटन केंद्र बनाना है। ताकि द्वीप की आर्थिक मजबूती को सुनिश्चित किया जा सके। लेकिन वर्तमान में भारत में किसी भी प्रकार के विकास और योजना को केवल हिंदू मुस्लिम के चश्मे से देखा जाने लगा है और यह समस्या और ज्यादा विकट तब हो जाती है जब यह विकास और बदलाव किसी मुस्लिम बहुल राज्य में किया जाना हो। इसलिये वर्तमान सरकार द्वारा किसी भी योजना या विकास नीति को विपक्षी दलों और कटटरपंथियों द्वारा मुस्लिम विरोधी बताकर न सिर्फ उसका विरोध किया जाता है बल्कि स्थानीय लोगों के भविष्य को भी राजनीतिक लालसा के लिए दरकिनार कर खूब बरगलाया जाता है। इस प्रकार यह कहने में कोई अतिशोक्ति नही होगी कि मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक विविधता के लिए भी घातक हैं।

यहां यह जानना बहुत आवश्यक है कि लक्षद्वीप में लागू किए गए ऐसे कौन से वह कानून हैं जिसके कारण आज लक्षद्वीप सभी वामपंथी और विपक्षी दलों के लिए एक आकर्षण का केंद्र बन गया है। लक्षद्वीप में विकास को आधार बनाकर बनाए गए कानून इस प्रकार है जैसे

लक्षद्वीप प्रीवेन्शन ऑफ एंटी-सोशल एक्टीविटीज रेगुलेशन 2021, सोशल मीडिया के द्वारा इस कानून को गुंडा अधिनियम के नाम से प्रसिद्धी मिली है जो अब जनसामान्य में भी इसी नाम से पहचाना जाता हैं। यह कानून मुख्य रूप से द्वीप पर होने वाली गैर कानूनी गतिविधियों पर रोक लगाने हेतु लाया गया है, ताकि द्वीप पर सुरक्षा कानूनों को तो मजबूती दी ही जा सकें साथ ही लक्षद्वीप के अपराध मुक्त भविष्य को भी सुनिश्चित किया जा सकें। ऐसे में कट्टरपंथियों #save Lakshadweep नाम का झंडा उठाकर चलने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों का कहना है कि क्योंकि द्वीप पर पहले से ही अपराध बहुत कम है ऐसे में यह कानून स्थानीय लोगों के विरुद्ध है यह तर्क कितना तर्कसंगत है और इसका विरोध करके लक्षद्वीप में चलने वाली अपराधिक गतिविधियों को बनाए रखने में किस का लाभ छुपा है इसे इन उदाहरणो से सहज ही समझा जा सकता है कि, वर्ष 2016, 18 अक्टूबर को द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में छपे लेख ‘लक्षद्वीप न्यू बेस ऑफ टेरेरिजम’ में यह बताया गया था कि स्थानीय मुस्लिम समुदाय वहाबवाद से प्रभावित हो रहे है। ऐसा इसलिये कहा गया क्योंकि वहां की जांच ऐजेसियों ने पाया कि स्थानीय लोग धार्मिक सभाओं की आड़ में आतकंवादियो को द्वीप में शरण दे रहे हैं।

इसी प्रकार प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया तिरूवंथपुरम की 26 मई 2019 की एक रिपोर्ट जिसका शीर्षक बोट केयरिंग 15 आईएस टेरेरिस्ट सेट ऑफ टू लक्षद्वीप था में नौसेना, तटरक्षक बल और तटीय पुलिस केरल और लक्षद्वीप के तटो पर निगरानी रखने वाले सुरक्षा बलों की खुफिया रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि 15 इस्लामिक स्टेट से आतंकवादियों को एक नाव श्रीलंका से लक्षद्वीप ले जा रही है। द्वीप में बढ़ती ऐसी गतिविधियों को रोकने के लिये प्रफुल्ल पटेल के द्वारा संदेहस्पद विदेशी जहाजों के द्वीप में आने पर रोक लगा दी है जिनको लेकर खुफिया ब्यूरों यह चेतावनी देता रहता है कि ऐसे जहाजों का द्वीप में आना देश की सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक हैं। अब किस प्रकार लक्षद्वीप प्रीवेन्शन ऑफ एंटी-सोशल एक्टीविटीज रेगुलेशन 2021 लक्षद्वीप के लिये घातक है या द्वीप व देश की सुरक्षा के लिये आवश्यक है यह स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। दरअसल वामपंथियों और विपक्षी दलों में शामिल लोगों की खीज का कारण यह कानून नही अपितु लक्षद्वीप में सीएए विरोध से संबंधित पोस्टरों को हटाकर द्वीप में फल-फूल रहे अलगाववादियों को द्वीप के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल के द्वारा चुनौती देना और कश्मीर की तरह द्वीप को कटट्रपंथियों का गढ़ न बनने देने के प्रयास से है।

एक और अन्य कानून जिसके विरोध की गूंज केरल विधानसभा से पूरे भारत में फैली वह है लक्षद्वीप एनीमल प्रीवेन्शन रेगुलेशन 2021 कट्टरपंथियों के द्वारा इस कानून का विरोध इस्लामिक धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध कहकर किया जा रहा है। परंतु वास्तव में इस कानून के अंतर्गत केवल मांस निर्यात नीति के तहत पशु मुख्य रूप से गाय जैसे दुधारू पशु के अवैध तस्करी पर रोक लगाने और द्वीप में सभी मांस व्यापार में संलग्न बूचडख़ानों को सर्टिफिकेशन के दायरे में लाने का प्रयास किया जा रहा हैं। ताकि व्यापार पारदर्शिता को सुनिश्चित किया जा सकें। लेकिन वामपंथियों, विपक्षी पार्टियों और कट्टरपंथियों का मानों एकमात्र लक्ष्य देश में चलने वाले विकासवादी कानूनों का एन-केन-प्रकारेण विरोध करना है। ताकि वर्तमान सरकार के प्रति समाज में भ्रम फैलाया जा सकें। इसी प्रकार ड्रॉफ्ट लक्षद्वीप पंचायत रेगुलेशन 2021 का भी पुरजोर विरोध किया जा रहा है। यह वह कानून है, जिसके द्वारा द्वीप में जनसंख्या नियंत्रण पर जोर दिया जा रहा है दरअसल द्वीप में बढ़ती जनसंख्या को उसकी भौगोलिक स्थिति के लिए हानिकारक माना गया हैं। इसी समस्या के निवारण के लिये और द्वीपों पर बढती जनसंख्या से होने वाले घातक प्रभावों से बचाने के लिये यह कानून लाया गया हैं। लेकिन कट्टरपंथियों के द्वारा इस कानून का यह कहकर विरोध किया जा रहा है कि यह कानून लक्षद्वीप की संस्कृति को हानि पहुंचायेगा।

यहां विचार करने का विषय यह है कि ज्यादा बच्चें पैदा करना किस समुदाय की संस्कृति हो सकती है और जनसंख्या कानून लाना किस प्रकार से किसी भी संस्कृति को हानि पहुंचा सकता हैं। बहरहाल ऐसा नहीं है कि टू चाइल्ड पॉलिसी सिर्फ लक्षद्वीप पंचायतों के लिये ही लाया गया पहला कानून हो। बल्कि आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, राजस्थान और तेलंगाना ऐसे राज्य हैं जहां पहले से ही टू चाइल्ड पॉलिसी को लाया जा चुका है मसलन ऐसे में किस तरह यह कानून लक्षद्वीप की संस्कृति को हानि पहुंचा सकता है यह ‘विरोध जीवी’ समुदायों और उन सभी तर्कसंगत लोगों से पूछने की आवश्यकता है जो विरोध का झंडा उठाकर चल रहे हैं।

लक्षद्वीप की स्वस्थ प्रवाल भित्ति आकर्षक प्राकृतिक सौंदर्य पर्यटन और लक्षद्वीप वासियों के लिए वह खजाना है जिससे ईकोटूरिज्म से जोड़कर ना सिर्फ वहां के युवाओं के लिए रोजगार और जीविका के नए द्वार खोले जा सकते है, अपितु वैश्विक पर्यटन को भी प्रोत्साहन दिया जा सकता हैं। इसी प्रयास में पर्यटन को बढावा देने और द्वीपों को विकसित करने के लिये लाये गये लक्षद्वीप डेवलपमेंट अथॉरिटी रेगुलेशन 2021 कानून का विरोध उसी आवाज में देश के कानों तक पहुंचा जिसके आधार पर वनवासी बहुल क्षेत्रों को माक्र्सवादी और नक्सलवादियों ने अपने आतंक का शिकार बनाया है।

मसलन बस्तर से उठी आवाजों का जल जंगल जमीन के अधिकारों के नाम पर लक्षद्वीप डेवलपमेंट अथॉरिटी रेगुलेशन 2021 का विरोध किस षडयंत्र की ओर इशारा करता है इसे समझना उतना मुश्किल नही होगा। संस्कृति बचाओं आन्दोलनों की आड़ में किस प्रकार भारत के लक्षद्वीप द्वीप समूह सहित अन्य प्रदेशों को विकास से दूर रखा जाता रहा है वर्तमान में इस कुचक्र को भेदा जा चुका है। वामपंथियों द्वारा यह कहकर द्वीप वासियों को विकास के विरूध लामबंध करना कि यह कानून द्वीप की मुस्लिम संस्कृति को जम्मू-कश्मीर की संस्कृति की ही तरह खत्म कर देगा उस घृणित राजनीति का परिचायक है जिसके तहत लम्बे समय तक घाटी में युवाओं के हाथों में रोजगार की जगह पत्थरबाजी की संस्कृति को दिया गया। यहा विचार करने का विषय यह भी है कि युवाओं के हाथों में पत्थर और आतंकवाद जैसे रोजगार देना किस माससिकता से उभरी संस्कृति हो सकती है। क्या युवाओं को जीविका के साधन देना, किसी क्षेत्र को विकसित करना संस्कृति को खत्म करना है यह प्रत्येक भारतवासी को समझना चाहिये।

 

 

डॉ. प्रीति

(लेखिका असिस्टेंट प्रोफेसर, शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, हैं)

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