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मदरसा शिक्षा के उप-उत्पाद

मदरसा शिक्षा के उप-उत्पाद

पिछले दिनों की कुछ घटनाओं पर जरा पुनर्विचार कीजिए। फ्रांस में पैगंबर साहब के कार्टून के नाम पर क्रमबद्ध हिंसा, उस हिंसा के पक्ष में भारत सहित अनेक देशों में हुए बड़े आंदोलन, अफ्रीकी देश मोजांबिक में आईएस के कट्टरपंथी द्वारा ”अल्लाह हू अकबर’’ के नारे के साथ बर्बरता पूर्वक 50 से अधिक लोगों की हत्या, काबुल में सैकड़ों लोगों की हत्या आदि घटनाएं मीडिया व सोशल मीडिया पर चर्चित रही। इसी श्रृंखला में हाल ही में देश के संघ शासित लक्षद्वीप के प्रशासन द्वारा संविधान सम्मत किए जा रहे सुधारों का लक्षित विरोध दिखाई दे रहा है। सरसरी तौर पर इन सारी घटनाओं में कोई आपस में संबंध दिखाई नहीं दे रहा है लेकिन इन सब के मूल में एक ही मुख्य कारक कार्य कर रहा है।

विचारणीय यह है कि एक सभ्य मनुष्य किस तरह कलात्मक विचार अभिव्यक्ति की स्वीकार्य सार्वभौमिक स्वाधीनता को मानने की बजाए हिंसा पर उतारू हो जाता है, विधि सम्मत कार्यों का विरोध करने का साहस जुटा लेता है। ऐसी कट्टरता को खाद बीज-जल व जमीन मिलने की पृष्ठभूमि में हमें मदरसा शिक्षा के पाठ्यक्रम व स्वरूप पर विचार करने की आवश्यकता है।

बेशक इस्लामिक शिक्षा के प्रसार में मध्यकाल से ही मदरसों की महती भूमिका रही है। इनसे निकलकर अनेक प्रतिष्ठित मौलवी, इमाम, इस्लाम के व्याख्याकार व सिद्धांतकार हुए है लेकिन मूलत: मदरसा शिक्षा ने अपने आप को दिनी तालीम तक ही सीमित रखा। यह समय की नब्ज को पकडऩे में असफल रहा, इसने आधुनिक तर्क, विज्ञान, कला आदि से अपने को परे ही रखा। जिसका परिणाम शैक्षिक व आर्थिक पिछड़ेपन व धार्मिक कट्टरता के रूप में भी सामने आया। इस तरह की तत्वनिष्ठ एकमेव शिक्षा ने अखिल इस्लाम का एक वैश्विक राजनैतिक दर्शन तो विकसित कर लिया लेकिन सार्वभौमिक सह अस्तित्व के मूल्य तिरस्कृत हो गये। आखिर शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को अपने मत-पंथ की मान्यताओं से अभ्यस्त करना मात्र ही है अथवा उसका सर्वागीण विकास कर उसमें उदार मूल्यों का समावेश करना है? भारत के संदर्भ में यह बहस और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जहां दंगों का लम्बा इतिहास रहा है तथा धार्मिक संघर्ष की आशंका सदैव बनी रहती है।

जाहिर है यह मात्र कानून व्यवस्था का प्रश्न न होकर एक आधुनिक प्रगतिशील व उदारीकृत समाज निर्माण का सवाल है। जब देश में कुल 25 हजार के करीब मदरसे हो तो उसमें दी जाने वाली शिक्षा के प्रति आंख बंद नहीं की जा सकती। विशेषकर जब यह मदरसे राजकीय सहायता से संचालित हो रहे हो। क्या राजकीय व्यय से मजहबी शिक्षा राज्य के पंथनिरपेक्ष चरित्र के असंगत नहीं? हाल ही में असम सरकार ने सरकारी मदरसों को बंद करने का साहसिक निर्णय कर सच्ची पंथ निरपेक्षता का परिचय दिया है। इसके विपरीत राजस्थान सरकार मदरसा बोर्ड विधेयक के माध्यम से मदरसा शिक्षा को विस्तार देने का अधोगामी कार्य कर रही है। राज्य की करीब 9 प्रतिशत आबादी को शिक्षित करने का जिम्मा मदरसों पर छोडऩा दरअसल अपने नागरिकों को आधुनिक व वैज्ञानिक शिक्षा देने के संवैधानिक दायित्व से राज्य का मुंह मोडऩा ही है क्योंकि बिल साफ करता है कि मदरसा शिक्षा से ऐसी शिक्षा प्रणाली ही अभिप्रेत है जिसमें इस्लामी इतिहास, संस्कृति व धार्मिक विद्या सम्मिलित है। क्या यह तालीम मुस्लिम सनाज की बौद्धिक, आर्थिक व विकासमूलक आवश्यकताओं को पूर्ण करने हेतु पर्याप्त है। दुर्भाग्य से इस्लामिक अभिजन भी इसका विरोध नहीं कर रहे है क्योकि प्रगति को अनेक बार परम्परा विरोधी के रूप में स्थापित कर दिया जाता है जबकि इनमें कोई विरोधाभास नहीं है। फिर हमें इस पर भी विचार करना चाहिए कि मजहबी शिक्षा लैगिंक समानता से भी संगत नहीं है। फिर, यह कैसे संभव है कि राज्य वित्त पोषित मदरसों में कुरान पढ़ाई जाएगी लेकिन गीता और बाइबिल नहीं? अल्पसंख्यक हितों को उठाना ही पंथ निरपेक्षता नहीं है अपितु इनमें सुधार व कमियों को सामने लाना भी पंथ निरपेक्षता की बुनियाद है। दुर्भाग्य से देश का बौद्धिक अभिजन इस पर नियोजित चुप्पी साधे पॉलीटिकल करेक्टनेस का शिकार हो रहा है।

ऐसी ही मजहबी तालीम से प्रेरित होकर लक्षद्वीप में किए जा रहे सुधारों का नियोजित विरोध हो रहा है। इस रूढि़वादी, प्रतिगामी व कट्टर मदरसा शिक्षा से शिक्षित वर्ग लक्षदीप के प्रशासक को हटाने की भी मांग कर रहा हैं। जरा विचार कीजिए कि वहां के प्रशासक ने ऐसे कौन से कदम उठाए हैं। प्रशासक प्रफुल्ल खेड़ा भाई पटेल ने लक्षद्वीप में बीफ पर रोक लगाई है। क्या किसी क्षेत्र में मुस्लिम बहुसंख्या के आधार पर गाय को काटने दिया जाए? पशुओं के संरक्षण के स्पष्ट संवैधानिक निर्देशों को नजरअंदाज कर दिया जाए?  अन्य सभी स्वाधिनताओं के समान ही खानपान की स्वाधीनता भी निरपेक्ष नहीं हो सकती है। हमें समाज के अन्य लोगों की भावनाओं का ध्यान रखना ही होता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि भारत में अल्पसंख्यक बहुसंख्यक का निर्धारण राष्ट्रीय स्तर पर होता है ना कि राज्य स्तर पर। आत: किसी क्षेत्र विशेष में बहुसंख्यक होने पर उन्हें मनमाना व्यवहार करने का अधिकार नहीं प्राप्त हो जाता। यदि राज्यों के आधार पर इसका फैसला करना है तब तो जिन राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हैं क्या उन्हें वहां अल्पसंख्यक के अधिकार नहीं मिलने चाहिए? अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संदर्भ में गांधी का हवाला देने वाले बीफ के समय क्यों गांधी को भूल जाते हैं? इतना विरोधाभास क्यों?

दूसरा, जिस लक्ष्यद्वीप का आर्थिक आधार ही पर्यटन है वहां यदि ”टूरिस्ट फ्रेंडली’’ माहौल बनाने का प्रशासनिक प्रयास हो रहा है, तब उसका समर्थन करना चाहिए अथवा विरोध? क्या पर्यटन बढ़ोतरी का फायदा लक्षदीप के नागरिकों की बजाय किन्हीं और को मिलने वाला है? आखिर समुद्री तटों की स्वच्छता, सड़कों की चौड़ाई आदि बुनियादी सुविधाओं का विरोध क्यों? विशेषज्ञों के अनुसार लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण का बनना वहां के विकास हेतु एक क्रांतिकारी कदम होगा।

तीसरा, जनवरी 2021 में ”असामाजिक गतिविधि निरोधक कानून’’ का ड्राफ्ट तैयार किया गया है जो संगठित अपराध पर नियंत्रण स्थापित कर ”विधि के शासन’’ को सुनिश्चित करेगा। वास्तव में लक्षद्वीप निकटवर्ती केरल के अपराधियों व राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में संलग्न लोगों का ”सुरक्षित अड्डा’’ बनता जा रहा है जिस पर नियंत्रण आवश्यक है। यहां के समुद्री तट ड्रग्स व मादक पदार्थों की तस्करी के केन्द्र बनते जा रहे हैं। हिंद महासागर में लक्षदीप की अवस्थिति, अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा की स्थिति, पड़ोसी केरल में आईएस के स्लीपर सेल की मौजूदगी आदि कारणों से अपराधों पर नियंत्रण की पुख्ता व्यवस्था आवश्यक है। कोई निर्दोष व सभ्य नागरिक आखिर अपराधियों के विरुद्ध बनने वाले कानून का विरोध क्यों करेगा?

चौथा, पूरे देश में जनसंख्या को लेकर कुछ सामान्य प्रावधान लागू है अधिकांश राज्यों में यह प्रावधान कर रखे हैं कि दो से अधिक संतान होने की स्थिति में व्यक्ति स्थानीय स्वशासन का चुनाव नहीं लड़ सकेगा। अब यदि इस देशव्यापी प्रावधान का क्रियान्वयन लक्षद्वीप में हो रहा है तब इसका विरोध क्यों? यह विधि विरोधी है अथवा विधि सम्मत?  इसका विरोध एक तरह से राज्य की वैधानिक संप्रभुता को ही चुनौती है। आखिर लक्षद्वीप दूसरा कश्मीर क्यों बने? वास्तव में लक्षद्वीप में प्रस्तावित सुधारों का विरोध भी एक ऐसा समूह कर रहा है जिसके हित प्रभावित हो रहे हैं, ठीक उसी तरह जैसे कश्मीर में एक छोटा वर्ग अनुच्छेद 370 की समाप्ति का विरोध कर रहा था। फिर लक्षद्वीप के सुधारों का केरल की धरती से विरोध अनायास नहीं अपितु एक नियोजित प्रयास है, जिसे समझा जा सकता है। इसीलिए हमें लक्षद्वीप पर विचार करते समय उसके छोटे आकार व आबादी की बजाए बड़े संदर्भ में समझते हुए प्रस्तावित सुधारों का समर्थन करना चाहिए।

 

Deepak Kumar Rath

 

डॉ. बी. डी. बारहठ

(लेखक सहायक आचार्य, राजनीति विज्ञान विभाग, सुखाडिय़ा विश्वविद्यालय, उदयपुर, हैं)

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