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समाज को खोखला करती स्त्री-विरोधी कुप्रथाएं

समाज को खोखला करती स्त्री-विरोधी कुप्रथाएं

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:  अर्थात जहां स्त्रियों की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं। लेकिन जहां एक ओर हम महिलाओं के लेकर सशक्तिकरण की बात करते हैं। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ की बात करते हैं। वहीं दूसरी ओर महिलाओं को अंधविश्वासों में जकड़े समाज डायन प्रथा में उसके साथ तरह-तरह की घिनौनी हरकत कर 74 फीसदी साक्षर होने का दंभ भरते है। ग्रामीण इलाकों में कथित रूप से डायनों की पहचान करने वाले अशिक्षित ओझाओं की भरमार है। इन क्षेत्रों में किसी को बीमारी होने या मृत्यु होने पर ये ओझा अपने झांसे में लेकर अपनी रोजी-रोटी को कायम रखने के लिए। गांव की हीं किसी महिला को डायन घोषित कर देता है। इसके बाद गांव वाले मिलकर महिला व उसके परिवार का सामाजिक वहिष्कार कर देते हैं। तथाकथित डायन के करतूत के हिसाब से सजा भी देते हैं। कई मामलों में तो यह सजा मानव मल पिलाने से लेकर हत्या तक में भी बदल जाती है। आज भी सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों में यह प्रथा बदस्तूर जारी है।

अब तो यह प्रथा शहरी क्षेत्रों में भी पांव पसारने लगा है। यह अलग बात है कि प्रशासन की नजरों तक पहुंचने से पहले हीं मामलों का  निपटारा कर दिया जाता है। तमाम मोर्चा पर प्रगति के बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों में अब भी अंधविश्वास जस की तस है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल डायन प्रथा है। जिसमें पुरूषों के साथ-साथ महिलाएं भी शामिल होकर महिलाओं के साथ अमानवीय कृत्य करते हैं। आज आजादी के 75वीं वर्ष हो रहा है। वहीं हमलोग काफी विकास किया लेकिन आज भी अंधविश्वास को गले लगाये हुए हैं।

एक ओर जहां नारी को पूजा करतें हैं वहीं दूसरी ओर डायन करार कर अमानवीयकृत करतें हैं। डायन के नाम पर जान से मारने, पीटने, सिर मुड़ाने से लेकर मल-मूत्र पिलाने साथ ही समाज से बहिष्कृत करने से बाज नहीं आ रहे हैं। हालांकि देश में डायन प्रथा राजस्थान से उत्पन्न होने को लेकर बतायी जाती है। लेकिन अभी सबसे ज्यादा झारखंड और बिहार में इस प्रथा से महिलाओं को भारी क्षति उठानी पड़ रही है। जबकि बिहार सरकार ने 1999 में ही एक एक्ट बनाकर समाज में जारी इस कुप्रथा के खिलाफ कानून बनाया है। जिसके तहत छ: माह के कारावास और दो हजार रुपये जुर्माना का प्रावधान है। वहीं झारखंड सरकार ने 2016 से इस अंधविश्वास के खिलाफ छठीं, सातवीं और आठवीं कक्षा के किताबों में शामिल कर इसे जड़ से समाप्त करने का अभियान चलाया। वहीं अविभाजित बिहार में 1999 वाले एक्ट को भी झारखंड सरकार ने अंगीकृत कर लिया है। लेकिन इसके बावजूद इस प्रथा पर पूर्ण रूप से लगाम नहीं लगा है। इस प्रथा से विधवा या नि:संतान महिलाओं को ज्यादा प्रताडि़त किया जाता है। वहीं जो खासकर गरीब या दबे-कुचले जो समाज में रहते हैं उन्हे ज्यादा निशाना बनाया जाता है।

इस प्रथा में ग्रामीण क्षेत्रों से ज्यादा मामले आते हैं। वहीं नब्बे प्रतिशत मामले पुलिस प्रशासन में नहीं जा पाते। जिसके कारण पीडि़त महिला समाज में घुटन भरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं। विडंबना है कि पुरुष सत्ता पोषित समाज या कथित सामाजिक कार्यकर्ताओं इस तरह के मुद्दे पर बहस नहीं करतें हैं। और न ही राजनेता इस मुद्दे को वोट के समय उठाते हैं। यह प्रथा बिहार, झारखंड, असम, पश्चिम बंगाल और राजस्थान के सैकड़ों जिलों में प्रचलित है।

जिससे महिला सशक्तिकरण, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ की स्लोगन बेमानी सिद्ध हो रहे हैं। सती-प्रथा, बाल-विवाह और विधवा-विवाह प्रथा जैसे एकजुट होकर डायन प्रथा को नष्ट करने की जरूरत है। इस संबंध में मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग की बहुत बड़ी हस्तक्षेप की जरूरत है। सिर्फ कानून बनाने से इस अंधविश्वास को रोकना संभंव नहीं दिखता है।


अनिल
मिश्र

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