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विचारधारा पर भारी महत्वाकांक्षी राजनीति

विचारधारा पर भारी महत्वाकांक्षी राजनीति

टीएमसी में मुकुल रॉय के वापस लौटने से भाजपा को पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद एक और तगड़ा झटका लगा है। मुकुल रॉय की रवानगी के साथ, बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं के ऊपर हो रही हिंसा ने भाजपा और संघ में प्रश्न खड़ा कर दिया है। भाजपा के प्रबुद्ध मंडल में भी अब यह प्रश्न खड़ा होने लगा है कि यदि भाजपा केंद्र में रहते हुए भी अपने कार्यकर्ताओं के साथ इस विपदा की घड़ी में नहीं खड़ी  हो सकती तो भविष्य में आखिर कोई क्यों भाजपा का समर्थन करेगा? हालांकि मुकुल रॉय, जिनका नाम शारदा चिट-फंड घोटाले में सामने आया था, 2017 में तृणमूल छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे।  वैसे ही उत्तर प्रदेश चुनाव से ठीक पहले जितिन प्रसाद भी भाजपा में शामिल हुए हैं। हालांकि ये नेता जब दूसरी पार्टियों में थे तो खुलकर भाजपा-विरोधी बयान दिया करते थे। ऐसे कई नेता हैं जो भाजपा-विरोधी बयान देते हुए भी भाजपा में शामिल हुए  हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि दलबदल की समस्या के कुछ पहलू ऐसे भी होते हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, क्योंकि हर स्थिति में दलबदल का मूल कारण अवसरवादिता, महत्वाकांक्षा या लालच होता है। आज की राजनीति की सबसे बड़ी समस्या राजनितिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का न होना है। आज की वर्तमान परिस्थिति में भारतीय जनता पार्टी और कम्मुनिस्ट पार्टी को छोड़कर लगभग सभी दल कुछ नेताओं और परिवारों की निजी सम्पति के रूप में बनकर रह गये हैं।

यह सही बात है कि भारत में दल-बदल की राजनीति कोई नयी नहीं है। राजनीतिक लाभ और हानि के लिए नेताओं का दल बदलना आम बात सी हो गयी है। हालांकि कानून की नजर में यह कोई अपराध नहीं है और न ही ये राजनेता अपराधी है, लेकिन नैतिकता के आधार पर देखें तो वे न केवल अपराधी हैं, बल्कि लोकतंत्र की कमजोर कड़ी भी हैं। आखिर वैचारिक पतन की वजह क्या है? आज के परिप्रेक्ष्य में राजनीति की परिभाषा बदल चुकी है।  राजनीति का मतलब अब जनहित नहीं, केवल स्वार्थ है। वे युवा जिन्होंने राजनीतिक परिवारों में जन्म लिया है, सत्ता की राजनीति के आदि हो चुके है। वे सत्ता के बिना नहीं रह सकते। इस परिस्थिति में जो परिवारवाद की राजनीति से आते हैं वे कार्यकर्ताओं की तरह किसी विचारधारा में विश्वास नहीं करते। लेकिन फिर भी उन्हें उनकी राजनीति चमकाने का पूरा मौका दिया जाता है। और इसके लिए जो लोग विचारधारा में विश्वास रखते है, उनका प्रयोग किया जाता है। और कुछ इस तरह  राजनीतिक परिवार शिखर पर पहुंच जाते हैं। उन्हें किसी विचारधारा से कोई मतलब नहीं होता। इसलिए सत्ता में रहते हुए भी वे सार्वजनिक हित से दूर रहते हैं।  इस पृष्ठभूमि में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि सत्ता के लोभ में विचारधारा और सिद्दांतों को छोड़ दिया जाता है और मतदाता, जिसके  हाथ में लोकतंत्र होता है, वह केवाल मूकदर्शक बनकर उलझा सा रहता है। हालांकि यह एक सच्चाई है कि सत्ता को हथियाना ही राजनीति का मकसद होता है, लेकिन सत्ता  को हासिल करने में सिद्धांत और नैतिकता होनी चाहिए।

 

Deepak Kumar Rath

दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

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