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राजनीति में विचारधारा का विचलन

राजनीति में विचारधारा का विचलन

मुकुल राय 2017 में तृणमूल कांग्रेस से भाजपा में आए और 2021 के चुनावों में भाजपा की हार और टीएमसी की जीत के पश्चात् फिर से तृणमूल कांग्रेस में वापस हो गए। इस पूरे प्रसंग में दो मुद्दे विचारणीय हैं- पहला तो यह कि राजनीति में विचारधारा का प्रश्न समकालीन राजनीति में नेताओं और दलों के लिए कितना महत्त्वपूर्ण रह गया है। दूसरा प्रश्न यह है कि चुनाव में जीत के बाद अपने विरोधियों के सफाए का अभियान एक मध्यकालीन बर्बरता का उदाहरण है और ममता बनर्जी ने कम्युनिस्टों से सीखकर इस प्रतिशोध की राजनीति को बहुत खतरनाक बना दिया है। ये दोनों ही बिंदु लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक हैं।

विचारधारा का प्रश्न वैसे तो भारतीय परंपरा की दृष्टि से एक पश्चिमी अवधारणा है जिसको भारत में कम्युनिस्टों ने खूब प्रचारित किया। उनके लिए विचारधारा का प्रश्न जीवन-मरण का प्रश्न था। जिसे आम भाषा में वे ‘पार्टी लाइन’ कहते रहे। पार्टी लाइन की प्रतिबद्धता ही नेता और कार्यकर्ता के लिए अंतिम सत्य था। पार्टी लाइन अर्थात् अंतिम सत्य के विपरीत अथवा परे जाने का दुस्साहस भयानक अपराध था। स्टालिन व माओ जैसे तानाशाहों ने अपने राजनीतिक विरोधियों का इसी विचारधारात्मक लाइन से विचलन के आधार पर सफाया करवाया। बंगाल में ममता बनर्जी ने यह गुण कम्युनिस्टों से ही सीखा है और अब वे भाजपा पर आजमा रही हैं।

भाजपा में रहते हुए मुकुल राय का जीवन संकट में था और उनको सुरक्षा प्राप्त थी फिर भी सुरक्षित नहीं महसूस कर पा रहे थे और तृणमूल कांग्रेस में शामिल होते ही उनको सुरक्षा की आवश्यकता नहीं रह गई। लोकत्रंत एक-दूसरे में विश्वास और एक-दूसरे का सम्मान करने वाली राजनीतिक प्रणाली है उसमें विरोधियों का सफाया करने पर उतारू होने वाली राजनीति लोकतंत्र के लिए घातक है। जीवन को संकट में डालकर राजनीतिक कार्य करना सबके बस की बात नहीं होती। यह प्रेरणा गहरी प्रतिबद्धता और समर्पण से ही आती है। भाजपा एक राजनीतिक दल के रूप में सनातन भारत की भावधारा का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी रही है। लेकिन आज उसने अपने दरवाजे बिना शर्त खोल दिए हैं। इसमें कुछ भी बुरा नहीं है। जो राजनीतिक हालात आज हैं उसमें विपक्षी दलों पर प्राय: परिवारों का कब्जा है और वे परिवार हित को अपने दलगत हित से ऊपर रखते हैं, ऐसे में वे नेता जो ऐसी पार्टियों में घुटन महसूस कर रहे हैं उनके लिए कोई आश्रम स्थल अवश्य होना चाहिए। उनकी प्रतिभा और क्षमता का राष्ट्रहित में उपयोग तभी हो सकता है। हिमंता बिस्वा शर्मा और ज्योतिरादित्य सिंधिया अथवा जितिन प्रसाद ऐसे ही उदाहरण हैं। यह ध्यान रखना होगा कि राजनीतिक दलों में सत्तार्थ हित सर्वोच्च हित होता है। इसलिए कोई व्यक्ति अथवा दल अगर सत्ता प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील है तो उसमें तब तबतक कुछ भी गलत नहीं जबतक वे आगन्तुक दल के आदर्श और सिद्धांतों के प्रति निष्ठा रखते हैं। दल के आदर्श और सिद्धांत कोई किताबी वस्तु नहीं होती बल्कि वे मार्गदर्शक प्रकाश स्तम्भ होते हैं जिनसे कोई दल या उसके नेता और कार्यकर्ता अनुप्राणित होते  हैं।

मुकुल राय का भाजपा में आना और जाना सुरक्षा के प्रश्न से अधिक राजनीतिक अवसरवाद है। यह अवसरवाद अवश्य ही राजनीतिक दल और लोकतंत्र दोनों को प्रदूषित कर देता है।

राजनीति में विचारधारा से ज्यादा महत्वपूर्ण है वह राजनीतिक कार्यक्रम तथा लक्ष्य जिसके लिए सताधारी दल कार्य करते हैं। भाजपा ने जिस सुशासन और विकास तथा आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य देश के सामने रखा है वह बेहद महत्त्वपूर्ण है और इस नाते नई युवा पीढ़ी की रुचि भाजपा में बढ़ी है। हाल के दिनों में भाजपा का विस्तार असाधारण गति से हुआ है। भाजपा आज भी एक विकासशील पार्टी है जो अभी अपना विस्तार कर रही है तथा आगे भी विस्तृत होगी, इसके विपरीत उसके प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस लगातार सिकुड़ रही है। क्षेत्रीय दलों में परिवारवाद हावी है और वे अपने क्षेत्र तथा जाति के बाहर प्राय: महत्वहीन हैं। इसलिए भाजपा जैसी पार्टी के लिए यह एक धर्मसंकट वाली स्थिति है क्योंकि भाजपा के पास पारंपरिक रूप से समर्पित कर्यकर्ताओं का एक प्रबल समूह पहले से ही मौजूद है, ऐसे में बाहर से आनेवाले नेताओं और कर्यकर्ताओं की भूमिका क्या हो तथा पुराने नेताओं से उनका सहसंबंध कैसा हो? असम में हिमंता सरमा का उदाहरण इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

ऐसा नहीं है कि दल बदल की यह बीमारी हाल ही में शुरू हुई है इसकी शुरुआत तथा इसका संस्थानीकरण कांग्रेसी राज में ही हुआ। क्षेत्रीय दल तो प्राय: ऐसे ही प्रवासी नेताओं से मिलकर ही बनते हैं। बिहार में जेडीयू और आरजेडी तथा उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा तथा रालोद इसके उदाहरण हैं। यह समय भारत के राष्ट्रीय हितों के दृष्टि से महत्वपूर्ण है और भारत के राष्ट्रीय हित किसी भी वैचारिक प्रतिबद्धता से ऊपर की वस्तु है, इसलिए वैचरिक प्रतिबद्धता का ढोल जोर-जोर से पीटने वाली कम्युनिस्ट पार्टियों ने कांग्रेस और आरजेडी से गठबंधन में परहेज नहीं किया। अगर बड़ी संख्या में लोग अच्छे अवसर की तलाश में आएंगे तथा कुछ बाहर भी जाएंगे, इसमें विचारधारा नहीं अवसरवाद की बात है।

यहां यह उल्लेखनीय है कि बड़े कार्यों के लिए अपना हृदय विशाल करना पड़ता है और उसमें दूसरों को भी पर्याप्त सम्मान और स्थान देना पड़ता है। इसलिए आज यह समय की चुनौती है कि भाजपा वैचारिक प्रतिबद्धता के नाम पर चाहकर भी अपने दरवाजे बंद नहीं कर सकती और उसे ऐसा करना भी नहीं चाहिए। क्योंकि आज वही एक पार्टी है जिसमें परिवारवाद, जातिवाद और क्षेत्रवाद का जहर नहीं घुला है। तो परिवारवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद इत्यादि में जकड़े राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता जो घुटन महसूस कर रहे हैं, भाजपा ही उनकी एक मात्र आश्रय स्थली हो सकती है।

 

डॉ. विवेकानंद उपाध्याय

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