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दल-बदल का इतिहास

दल-बदल का इतिहास

देश की आजादी को आज 74 वर्ष होने को हैं। स्वतन्त्र भारत दुनिया के अन्य विकासशील देशों की तुलना में तेजी से आगे बढ़ता हुआ विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा होने की तैयारी कर रहा है। यह सत्य है कि देश के विकास सम्बन्धी इस महान उपलिबध में निश्चित रूप से हमारे ही देश के कुशल नेतृत्व का पूरा योगदान है।

राज करने अथवा राज चलाने सम्बन्धी नीति को ही राजनीति कहा जाता है। लिहाजा स्पष्ट है कि राज करने या चलाने जैसी अति संवेदनशील एवं गम्भीर जिम्मेदारी को अंजाम देने के लिए इस पेशे में शामिल व्यक्ति को अत्याधिक योग्य, दक्ष, ईमानदार तथा कुशल नेतृत्व प्रदान कर पाने की क्षमता रखने वाला व्यक्ति होना चाहिए। अशोक सम्राट, चन्द्रगुप्त, चाणक्य जैसे राजनीति में सिद्ध पुरूषों से लेकर सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, सरदार पटेल, लालबहादुर शास्त्री तथा इंदिरा गांधी सरीखे देश के सुप्रसिद्ध राजनैतिक महापंडितों तक भारतीय राजनीति का इतिहास ऐसे तमाम राजनैतिक दिग्गजों के नामों से भरा पड़ा है जिन पर न सिर्फ भारत की जनता बल्कि स्वयं देश की राजनीतिक व्यवस्था भी गर्व करती है।

परन्तु यदि इसी सिक्के के दूसरे पहलू पर नजर डालें तो हमें कुछ ऐसे तथ्य भी नजर आते हैं जिन्हें देखकर हमारी नजरें शर्म से झुक जाती हैं। जितिन प्रसाद के भाजपा में जाने और मुकुल राय के तृणमूल कांग्रेस में लौट जाने से भारतीय राजनीति का आयाराम-गयाराम चरित्र फिर से उजागर हुआ है। इससे यह भी पता चलता है कि नेताओं के लिए विचारधारा का कोई महत्व नहीं रह गया है। भारतीय राजनीति को लेकर एक चलताऊ टिप्पणी की जाती है कि लोकतंत्र में दही के लिए जामन की तरह थोड़ी-सी बेईमानी जरूरी है।

दल-बदलू हमें कोई मीठे हास-परिहास में कह दे, तो इतना बुरा नहीं लगता है। समाज और परिवार में दोस्त, सखियां, पति-पत्नी और परिजन तक बातों-बातों में दल-बदलू होते रहते हैं। लेकिन राजनीति में किसी का दल-बदलू होना बुरा लगता है। दल-बदल करने वालों को भी दल-बदलू कहलाना अच्छा नहीं लगता होगा। और आज राजनेता तो क्या, बेचारे बुद्धिजीवियों, कलाकारों और पत्रकारों तक पर दल-बदलू होने की तोहमत लग रही है।

दल बदल कोई आज की बात तो नहीं है, इसका भी एक ‘गौरवशाली’ इतिहास रहा है। स्क्रॉल डॉट इन की एक रपट के अनुसार संसद के बाहर व्यक्तिगत रूप से पार्टी बदलने से अलग, ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में किसी खास मुद्दे पर सांसदों द्वारा दल-परिवर्तन की परंपरा को एक प्रकार की मान्यता हासिल है। इसे ‘फ्लोर क्रॉसिंग’ कहा जाता है क्योंकि किसी खास मुद्दे पर ध्रुवीकरण की स्थिति में सदस्य अपने स्थान से उठकर ‘फ्लोर’ पार कर दूसरे खेमे में आकर बैठ जाते थे। इसी तरह की परंपरा अलग-अलग नामों से अलग-अलग देशों में प्रचलित हुई, जैसे- कार्पेट क्रॉसिंग (दरी-बदल), टर्न-कोटिज्म (कोट-बदल), वाका-जंपिंग और ‘म्यूजिकल चेयर्स’ की राजनीति। ‘डिफेक्शन’ शब्द तो वास्तव में सैन्य शब्दावली से आया जिसका प्रयोग किसी सैनिक के सेना छोड़कर भाग जाने या दूसरे पक्ष में जा मिलने के लिए किया जाता है। लेकिन इसमें अनैतिकता का सवाल जुडऩे पर इसे अवसरवादिता की राजनीति भी कहा गया। इसी का दूसरा पहलू इसे नैतिक ठहराने की कोशिश भी करता है जैसे ‘अंतरात्मा की आवाज’ पर सदन में मतदान करने-कराने वाली राजनीति। इसके लिए अंग्रेजी में ‘कॉन्साइंस वोट’ शब्द भी प्रचलित है। इसके लिए पार्टी व्हिप (दल के सचेतक द्वारा जारी लिखित आदेश) का उल्लंघन करना होता है।

भारत में दल-बदल की शुरुआत उस घटना से ही मान सकते हैं जब मोतीलाल नेहरू के भतीजे शामलाल नेहरू ने 1920 के दशक में ही केंद्रीय विधानसभा के लिए कांग्रेस के टिकट से चुनाव जीता, लेकिन बाद में ब्रिटिश पक्ष में शामिल हो गए। कांग्रेस विधायक दल के नेता मोतीलाल नेहरू ने इस कृत्य के लिए उन्हें कांग्रेस से निकाल बाहर किया था। इसी तरह 1937 में तत्कालीन संयुक्त प्रांत में मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत को पूर्ण बहुमत मिला, लेकन फिर भी उन्होंने मुस्लिम लीग के कुछ सदस्यों को दल-बदलकर कांग्रेस में शामिल होने का प्रलोभन दिया। इनमें से एक हाफिज मुहम्मद इब्राहिम को मंत्री भी बनाया। हाफिज को छोड़कर किसी भी अन्य सदस्य ने अपनी विधायकी से त्यागपत्र देकर फिर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लडऩे की जरूरत नहीं समझी। आजादी के तुरंत बाद 1948 में जब कांग्रेस समाजवादी दल ने कांग्रेस संगठन छोडऩे का फैसला किया तो इसने अपने सभी विधायकों (केवल उत्तर प्रदेश में ही 50 के आस-पास) से कहा कि वे इस्तीफा देकर फिर से चुनाव लड़ें। इस्तीफा देने वालों में आचार्य नरेंद्र देव जैसे दिग्गज नेता भी थे। इन्होंने एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया था, लेकिन बाद में खासकर कांग्रेस पार्टी ने ऐसे आदर्शों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया।

भारत के पहले आम चुनावों के बाद 1952 में तत्कालीन मद्रास राज्य में किसी भी पार्टी को बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। कांग्रेस को 152 और बाकी पार्टियों को कुल मिलाकर 223 सीटें मिली थीं। टी. प्रकाशम् के नेतृत्व में चुनाव बाद गठबंधन कर किसान मजदूर प्रजा पार्टी और भारतीय साम्यवादी दल के विधायकों ने सरकार बनाने का दावा किया, लेकिन राज्यपाल ने सेवानिवृत्ति का जीवन बिता रहे भारत के पूर्व गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर दिया, जो उस समय विधान सभा के सदस्य तक नहीं थे। इसके बाद हुई जोड़-तोड़ में 16 विधायक विपक्षी खेमे से कांग्रेस में आ मिले और राजाजी की सरकार बन गई। एक साल बाद इन्हीं टी प्रकाशम् को आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का प्रलोभन देकर कांग्रेस ने पार्टी में शामिल होने का प्रस्ताव दिया। प्रकाशम् अपनी पार्टी से इस्तीफा देकर मुख्यमंत्री बन भी गए।

1967 और फरवरी 1969 के चुनावों (राज्य विधानसभा) के बीच भारत के राज्यों और संघ-शासित प्रदेशों के करीब 3500 सदस्यों में से 550 सदस्यों ने अपना दल बदला था। केवल एक साल के भीतर ही 438 विधायकों ने दल-बदल किया। विधायकों की संख्या न लेकर यदि केवल प्रमुख दल-बदल की घटनाओं की संख्या ली जाए तो इस डेढ़ साल की अवधि में एक हजार से अधिक दल-बदल हुए। औसतन हर रोज एक से अधिक विधायकों ने दल-बदल किया। खुद कांग्रेस के 175 विधायक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टियों में चले गए।

विधायकों का सबसे संपर्क काटकर सुरक्षित स्थान पर ले जाने की परंपरा आंध्र प्रदेश में एनटीआर और उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू द्वारा शुरू की गई कही जा सकती है। लेकिन यह इंदिरा गांधी के सहयोगी अरुण नेहरू द्वारा वहां तेलुगुदेशम पार्टी में कराई गई थोड़-फोड़ के परिणामस्वरूप ही हुआ था। हुआ यूं था कि 1983 के चुनाव में आंध्र में कांग्रेस हार गई और एनटी रामाराव मुख्यमंत्री बने। अगस्त 1984 में एनटीआर अपना इलाज कराने अमरीका गए। मौका पाकर केंद्र में बैठी कांग्रेस सरकार ने एनटीआर के निकट के सहयोगी और उनके वित्त मंत्री भास्कर राव को दल-बदल के लिए तैयार कर लिया। आंध्र में बैठे कांग्रेसी राज्यपाल ने तुरंत ही भास्कर राव को मुख्यमंत्री पद की शपथ भी दिला दी। यह सब कुछ बहुत ही बेशर्मी के साथ किया गया। और जब इंदिरा जी की किरकिरी होने लगी तो उन्होंने संसद में कहा कि एनटीआर सरकार को गिराकर भास्कर राव को मुख्यमंत्री बनाने वाली बात उन्हें भी न्यूज एजेंसियों के माध्यम से पता चली!

लेकिन एनटीआर हार नहीं मानने वाले थे। एक समय में यूथ कांग्रेस के नेता और संजय गांधी के करीबी रहे चंद्रबाबू नायडू एनटीआर के दामाद थे और उनके राजनीतिक प्रबंधक भी। उन्होंने टीडीपी के 163 विधायकों को एनटीआर के बेटे के फिल्म स्टूडियो ‘रामकृष्ण स्टूडियोज’ में बंद कर दिया और उनका संपर्क बाहरी दुनिया से काट दिया। भास्कर राव अपने ही विधायकों से संपर्क नहीं कर पाए। इसके बाद इन सभी विधायकों को दिल्ली ले जाया गया और राष्ट्रपति ज्ञानी जैल के सामने उनकी परेड कराई गई। देशभर के सभी विपक्षी दलों ने एकजुट होकर केंद्र सरकार के इस कृत्य के खिलाफ आंदोलन किया। आखिरकार भास्कर राव की सरकार को हटाकर वापस एनटीआर की सरकार को बहाल करना पड़ा और राज्यपाल की छुट्टी करनी पड़ी

1967 में दल-बदल के जरिए राज्यों में शुरू हुआ सरकारें गिराने-बनाने-बचाने का खेल बाद के वर्षों में लगातार विकसित होता गया। इस खेल को समाप्त करने के लिए पहली बार उस समय गंभीरतापूर्वक सोचा गया, जब आठवें आम चुनाव में कांग्रेस ने राजीव गांधी की अगुवाई में तीन चौथाई से अधिक बहुमत हासिल कर सरकार बनाई। राजीव गांधी की सरकार ने दल-बदल पर रोक लगाने के लिए 52वें संविधान संशोधन के जरिए दल-बदल विरोधी कानून संसद में पारित कराया। हालांकि इस कानून को पारित कराने को लेकर राजीव गांधी की नीयत पर सवाल भी उठे। कई लोगों ने इसे उनके 450 से अधिक सांसदों के भारी-भरकम बहुमत की सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम माना।।

इसमें कोई शक नहीं की जब तक दलों का दलदल रहेगा, दल-बदल का ‘कमल’ खिलता रहेगा या ऐसे दल-बदलुओं को सहारा देने वाला ‘हाथ’ भी मौजूद रहेगा।

दल-बदल की समस्या के कुछ ऐसे पहलू भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि हर स्थिति में दल-बदल अवसरवाद या महत्वाकांक्षा या लोभ के कारण ही होता हो, ऐसा भी नहीं है। इसके मूल में कहीं न कहीं भारतीय लोकतंत्र में स्वीकृत पार्टी प्रणाली भी है और साथ ही राजनीतिक पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव भी। मौजूदा दौर में भारतीय जनता पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा लगभग सभी राजनीतिक दल एक नेता और उसके परिवार की निजी जागीर बन गए हैं।

ऐसे दलों में संगठनात्मक चुनाव केवल निर्वाचन आयोग के निर्देश की औपचारिक तौर पर खानापूर्ति के लिए होते हैं ताकि दल की मान्यता बची रह सके, लेकिन ये वास्तविक चुनाव नहीं होते जिनमें उम्मीदवार बिना झिझक के किसी के भी खिलाफ खड़ा हो सके और गुप्त मतदान के जरिए चुनाव हो। ऐसी पार्टियों में नेता केवल एक सीमा तक ही अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं। वे कभी भी किसी मुद्दे पर अपने दल के सर्वोच्च नेता की राय से असहमति नहीं जता सकते। नतीजतन उनके भीतर असंतोष और आक्रोश बढ़ता जाता है और वे ऐसे समय उग्र होकर बाहर निकलता है जब उनके अपने राजनीतिक हितों पर चोट होती है।

मौजूदा राजनीतिक परिवेश में दल बदलने या दल छोडऩे की एक नयी वजह भी सामने आयी है जिसके दो कारण और हैं, पहला चुनावों में अब विधायकों की जमीनी समझ और उनके मतदाताओं से रिश्तों को दरकिनार करके ज्यादा महत्व रणनीतिकारों और डेटा को दिया जाता है। दूसरा आजकल पार्टियों में बहुत केंद्रीकरण है और राजनीति आजकल कुछ नेताओं के व्यक्तित्व के आधार पर होती है, जैसे भाजपा में मोदी जी और कांग्रेस में राहुल गांधी के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द सारा प्रचार-प्रसार होता है। इस वजह से विधायकों और सांसदों के प्रयासों को निर्थरक मान लिया जाता है। इसी कारणवश उन्हें काफी असंतोष का भी सामना करना पड़ता है। डेटा और रणनीतिकारों के प्रभाव को यूं भी समझा जा सकता है जैसे कि, कोरपोरेट में ऑटमेशन की वजह से कुछ नौकरियां निर्थरक हो गयी हैं। पर इस सबकी वजह से लगातार सरकारों पर दबाव रहता है अपनी सत्ता बचाने की कोशिशों में लगी रहे, जो एक लोकतंत्र और सुशासन के लिए बहुत हानिकारक है।

उपाय क्या?

डाटा विश्लेषक और लेखिका सौम्या गुप्ता मीडिया विजिल पर सुझातीं हैं की बहुत सारे देशों में दल बदलने के खिलाफ या पार्टी से वैचारिक मतभेद के खिलाफ कोई कानून नहीं हैं, तब भी वहां आय राम गया राम जैसी मानिसकता को इतना बढ़ावा नहीं मिलता। पिछले 6 सालों में लगातार विधायकों के दल बदलने की वजह से कई राज्य सरकारें गिरायी गयी हैं। और पिछले कुछ सालों में ही राजनीति में रणनीतिकारों को बहुत महत्व मिलने लगा है। इस सबको ध्यान में रख कर कुछ समाधान सोचे जा सकते हैं – पहला हमें नेताओं के काम को हीन भावना से देखना बंद करना होगा ताकि जब वो अपने प्रयासों के लिए पद और टिकट जैसे मुआवजे की डिमांड करें तो हम उसे सिर्फ अवसरवाद नहीं माने। इसका एक पहलू ये भी है कि वो अपने प्रयासों के अनुकूल कॉम्पन्सेशन मांग रहे हैं। दूसरा, हर पार्टी को अपनी आंतरिक लोकतांत्रिक व्यव्यस्था पर ध्यान देना होगा। ताकि हर सदस्य को पूरा मौका मिलें कि वो अपने मतभेद और विचार बिना रोक-टोक प्रस्तुत कर सके। तीसरा, पार्टियां जो लगातार सदस्यों की खरीद फरोख्त में लगी रहती है, जनता में ऐसी पार्टियों के प्रति जवाबदेही तय करने की निष्ठा और उन पर सवाल उठाने की तत्परता भी होनी चाहिए। चौथा, इस कानून में पार्टी और सदस्य के दायरे से बाहर अल्पमत सरकारों और राज्य सरकारों के लिए भी प्रावधान होने चाहिए।

 

नीलाभ कृष्ण

 

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