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राजनीतिक विचारधारा और दल-बदल

राजनीतिक विचारधारा और दल-बदल

यह सच है कि पिछले कुछेक दशक में राजनीति सत्ता केंद्रित हो गई है और लोकतंत्र में विचार आधारित राजनीति का महत्व कम हुआ है पर यह भी सच है कि पिछले चार पांच वर्षों में भारतीय राजनीति में उन विचारों के प्रति लोकप्रियता बढ़ी है, जो राष्ट्र की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने के लिए  प्रयत्नशील है। हाल ही में कांग्रेस से बीजेपी में शामिल हुए जतिन प्रसाद ने पार्टी परिवर्तन की मुख्य वजह भी यही बताई।

राजनीति में शुरूआती दौर से ही विचारधारा का अकाल रहा है। बीते पांच सालों में 16 में से 10 सांसद दल बदलकर बीजेपी में शामिल हुए है। जितिन प्रसाद के पिता जितेंद्र प्रसाद ने भी साल 2000 में कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनाव में सोनिया गांधी से बगावत की और उनके खिलाफ मैदान में उतरे। अब उनके बेटे ने कांग्रेस से किनारा कर लिया है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद नितिन का कांग्रेस पार्टी से जाना यह बताता है कि कांग्रेस के भीतर सशक्त नेतृत्व और परिवारवाद को लेकर सवाल उठने लगे है। पार्टी में विचारधारा की कमी और सुनियोजित तरीके से कार्य व पद्भार की जिम्मेदारी न मिलना असंतुष्टता का भाव देता है। जतिन जैसे कई कार्यकर्ताओं ने खुले मंच से कहा कि कांग्रेस जैसी पार्टी को जन नेताओं की पहचान करनी चाहिए।

परिवर्तन सदैव सत्ता को देखकर ही नहीं होता बल्कि हर राजनेता चाहता है कि उसका भविष्य सुरक्षित हो ऐसे में देश की अखंड़ता और सहिष्णुता के उद्देश्य के साथ चलने वाली राजनीतिक पार्टियों से लोग जुड़ रहे है। मुकुल रॉय का 2017 में टीएमसी को छोड़कर बीजेपी में शामिल होना और फिर बंगाल विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद दोबारा टीएमसी में शामिल हो जाना अवसरवादी राजनीति का ज्वलंत प्रमाण है और ऐसे दल-बदल से राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों को सतर्क रहने की आवश्यकता है।

राजनीतिक दलों में गहराते नेतृत्व संकट और मुख्य चेहरों की वजह से बड़े राजनेताओं को भी दरकिनार किया जाना अब आम बात है। पार्टी के एजेंडे को स्वीकार कर पार्टी में शामिल होने वाले कार्यकर्ता रातोंरात दूसरी पार्टी के झंड़े को थाम लेते है। हालांकि अब तक के आंकड़ों को देखे तो नेताओं ने सियासी नफा नुकसान को ध्यान में रखकर ही दूसरी पार्टियों का दामन थामा है। चुनावों से पहले दल-बदल की यह परम्परा बहुत पुरानी है। हाल ही में राजनीतिक सुधारों से जुड़ी संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने एक रिपोर्ट जारी की है। एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक बीते 5 सालों में कांग्रेस, बीजेपी, टीएमसी समेत कई राष्ट्रीय और प्रांत स्तरीय पार्टियों के नेताओं ने पार्टी बदलकर चुनाव लड़ा है। रिपोर्ट में बताया गया कि मध्य प्रदेश, मणिपुर, गोवा, अरुणाचल प्रदेश और कर्नाटक में राज्य सरकारें विधायकों के दल बदलने की वजह से ही गिरी है। हालांकि कई बार इन दलबदलू उम्मीदवारों से पार्टी की नैय्या भी डूब जाती है, जिसका खामियाजा पार्टी को पांच साल तक भुगतना पड़ता है। ये भी देखा गया कि पार्टी में शामिल होने वाले अन्य दलों के नेताओं को पुराने नेताओं से अधिक महत्व दिए जाता है जिससे उनके भीतर असंतोष की भावना पनपती है। साल 2022 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनावों को लेकर अभी से हलचल शुरू हो गई है। हाल ही में कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ नेता जितिन प्रसाद ने पार्टी कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थामा है। ऐसे में अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए प्रसाद को एक बड़ी जिम्मेदारी मिलना लगभग तय है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिरकार कांग्रेस से नेताओं का पलायन किस और इशारा कर रहा है। एडीआर से प्राप्त आंकडों के अनुसार साल 2016 से 2020 के दौरान 405 में से 182 विधायकों ने अपनी पार्टी छोड़कर बीजेपी का दामन थामा है। अकेले कांग्रेस के 170 विधायको ने बीजेपी समेत कई अन्य दलों शामिल होकर काम करना शुरू कर दिया। बीते कुछ सालों में अपनी पार्टी को छोड़कर बीजेपी या दूसरी पार्टियों में शामिल होने का यह सिलसिला रूकने का नाम नहीं ले रहा है। हालांकि किसी राजनीतिक पार्टी से खुद को अलग कर दूसरी पार्टी में शामिल होना विचारधारा को तो इंगित करता है लेकिन इसके अलावा कई दलों में राजनेता सत्ता लोलुप होकर ही आते है। भारतीय जनता पार्टी से जुडऩे को लेकर देश भर में कांग्रेस के विधायकों, मंत्रियों और सांसदों के राजनीतिक समीकरणों से यह बात स्पष्ट है कि अब देश में एक आम विचारधारा बन रही है। पार्टी बदलकर चुनाव लडऩे वाले प्रत्याशी न सिर्फ जीत दर्ज कर रहे हैं बल्कि नई पार्टियों ने उन्हें सहर्ष स्वीकार भी किया है।

राजनीति के गलियारों में फिर से राष्ट्र निर्माण की मांग उठने लगी है। देश को एकसूत्री विचारधारा में पिरोकर राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य से लोगों का जुड़ाव बढऩे लगा है। देश भर से राष्ट्र निर्माण को लेकर आवाजे उठ रही है। बीजेपी से जुड़ाव की वजह ये भी है कि पार्टी ने आम विचारधारा को अपनाकर विकासात्मक मुद्दों को तरजीह दी है, नतीजतन बीते सालों में सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने बीजेपी का दामन थाम लिया है। यहीं वजह है कि साल 1984 के लोकसभा चुनावों में केवल 2 सीटे जीतने वाली पार्टी आज देश की सबसे लोकप्रिय पार्टी के रूप में उभरती हुई नजर आती है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि लोग सत्ता के वशीभूत होकर पार्टी में दाखिल होते है लेकिन राष्ट्रीय मूल्यों की सजीवटता को लेकर चलने में बीजेपी ने बेहतरीन काम किया है।

नेशनल इलेक्शन वॉच के विधायकों और सांसदों के शपथ पत्रों के विश्लेषण से यह जानकारी मिली की पार्टियों में सुधार के लिए बेहतर लीडऱशिप जरूरी है। कांग्रेस के शीर्ष पदासीन लोगों के द्वारा कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और उन्हें नजरअंदाज करना भारी पड़ गया है। वहीं बीजेपी में समान अवसरों की उपलब्धता नए दलों को आकर्षित करती है। राष्ट्र को सर्वोपरी रखकर विकासात्मक मुद्दों पर काम करने से न सिर्फ पार्टी का विस्तार हुआ है बल्कि लोगों की भावनाएं भी जुड़ी है। इसी तर्ज पर बाकी पार्टियों को भी काम करने की जरूरत है।

 

डॉ. सुभाष कुमार

(लेखक हेड जरनलिज्म एंड मास कम्यूनिकेशन, मणिपाल यूनिवर्सिटी, जयपुर, हैं)

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