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प्रवासी पक्षियों पर भरोसा खतरनाक

प्रवासी पक्षियों पर भरोसा खतरनाक

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को अपेक्षित जीत न मिलने के बाद राजनीतिक बवंडर का उठना तय माना जा रहा था। लेकिन शायद ही किसी ने सोचा था कि जिस मुकुल रॉय को भारतीय जनता पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस से तोड़कर अपने सिर आंखों पर बैठाया था, उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तक बनाया था, वे पार्टी को जल्द ही ठेंगा दिखा देंगे। बात इतनी तक होती तो गनीमत थी। तृणमूल कांग्रेस में जाते ही उन्होंने दावा कर दिया है कि भाजपा के 77 में से 26 विधायक उनके संपर्क में हैं और जल्द ही वे भाजपा छोड़ देंगे। साफ है कि इनमें से ज्यादातर विधायक वे हैं, जो दूसरी पार्टियों से आए थे।

बहरहाल मुकुल रॉय की तृणमूल में वापसी के साथ ही राज्य में भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ जारी हिंसा के बाद भाजपा और संघ विचार परिवार में कुछ सवाल और कुछ चिंताएं होना उठ खड़ी हुई हैं। विचार परिवार में यह सवाल उठने लगा है कि केंद्र में सत्ता होने के बावजूद अगर भारतीय जनता पार्टी अपने आफत में अपने कार्यकर्ताओं के साथ खड़ा नहीं हो पा रही तो ऐसे में भविष्य में उसके साथ कार्यकर्ता क्यों जुडऩा चाहेंगे। इसके साथ ही अब यह भी सवाल उठने लगा है कि अपने निष्ठावान कार्यकर्ताओं की कीमत पर बाहर से आए कार्यकर्ताओं को दरी-जाजिम सजाकर स्वागत करना क्या अनुशासित कार्यकर्ताओं को आहत नहीं करता?

प्रधानमंत्री जैसी सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था के प्रोटोकाल को दरकिनार करने वाले पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्य सचिव अल्पन बंदोपाध्याय को इस्तीफा दिलाकर जब ममता बनर्जी ने अपना प्रधान सलाहकार नियुक्त किया तो विचार परिवार के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता अंबाशंकर वाजपेयी ने तो फेसबुक पर यहां तक लिख दिया कि कार्यकर्ताओं की रक्षा करनी है तो कांग्रेस और ममता बनर्जी से सीखना होगा।

केंद्र में सात साल से भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। मौजूदा राजनीतिक तंत्र में अपनी सरकारों से निष्ठावान कार्यकर्ता भी उम्मीद लगाए रहते हैं। लेकिन संघ विचार परिवार के कार्यकर्ताओं का सवाल यह है कि जब भी कुछ पारितोषिक पाने की बारी आती है, बाहर से आए लोगों पर ज्यादा भरोसा किया जाता है। जबकि निष्ठावान कार्यकर्ता सभा-कार्यक्रमों की व्यवस्था ही करता रह जाता है। यह भी सच है कि 2014 के बाद भारतीय जनता पार्टी के प्रति निष्ठा दिखाने वालों की भीड़ बढ़ आई है। भाजपा के कार्यकर्ता भी मानते हैं कि यह अच्छी बात है कि उनकी पार्टी के ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ता हों। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि बाहरी व्यक्ति पर इतना भरोसा किया जाए कि अपना निष्ठावान कार्यकर्ता उपेक्षित महसूस करने लगे।

मुकुल रॉय को संगठन में ऊंची कुर्सी देने भाजपा और संघ विचार परिवार के भी तमाम निष्ठावान कार्यकर्ता पचा नहीं पाए थे। पश्चिम बंगाल के एक वरिष्ठ पत्रकार ने विधानसभा चुनावों में भाजपा के टिकट बंटवारे के फौरन बाद ही इन पंक्तियों के लेखक से कह दिया था कि भाजपा चाहे जितना जोर लगा दे, अब वह सत्ता नहीं हासिल करने जा रही। वहां के प्रसिद्ध हिंदी अखबार के साथ ही उत्तर प्रदेश और बिहार के एक बड़े हिंदी अखबार के संपादक रहे उस पत्रकार का तर्क था कि बाहरी लोगों पर ज्यादा भरोसा की वजह से निष्ठावान कार्यकर्ता निराश हैं और वे चुनावों में शायद ही सक्रिय भूमिका निभा पाएं। नतीजे आने के बाद उन्होंने एक बार फिर यह बात दोहराई थी।

पश्चिम बंगाल हो या कहीं और, निष्ठावान कार्यकर्ता के सामने जब ऐन चुनाव से पहले तक विपक्ष में रहते हुए गालियां देने वाले व्यक्ति को ज्यादा तवज्जो दी जाती है तो उसे धक्का तो लगता ही है। मुकुल रॉय हों या कोई और, बाहरी व्यक्ति को पार्टी में तवज्जो मिलने को हर पार्टी में निष्ठावान कार्यकर्ता पचा नहीं पाते।

जब कांग्रेस की केंद्रीय मीडिया इकाई में दबंगई से कार्यरत रहे टॉम वडक्कन को जब कुछ साल पहले भारतीय जनता पार्टी में शामिल किया गया था तो संघ विचार परिवार के एक कार्यकर्ता को वह दिन याद आ गया था, जब उसकी गर्दन में हाथ डालकर टॉम वडक्कन ने कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड से निकाल दिया था। तब वह कार्यकर्ता विचार परिवार के एक प्रकाशन में वरिष्ठ पद पर थे। उनका कहना था कि जिसने उन्हें गालियां दी, जिसने उन्हें गर्दन में हाथ डालकर बेइज्जत करके अपने दफ्तर से निकाला, अब उसे आदर देना पड़ेगा।

भारतीय जनता पार्टी का करीब एक दशक पहले तक नारा था, पार्टी विथ डिफरेंस। यानी एक ऐसी पार्टी, जिसके लिए अपने उसूल और सिद्धांत मायने रखते हैं। उसूल और सिद्धांत के पक्के निष्ठावान कार्यकर्ता ही होते हैं। बाहरी व्यक्ति तो सत्ता, प्रसिद्धि और हैसियत बनाने के लिए अक्सर अपनी बुनियादी या मूल पार्टी को छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होता है। ऐसा कम ही उदाहरण मिलता है, जब बाहरी राजनेता शामिल होने वाली पार्टी की सैद्धांतिकी में दिल की गहराइयों से भरोसा कर पाता है। मुकुल रॉय का उदाहरण इसे ही साबित करता है।

2014 के पहले तक जो लोग प्रधानमंत्री मोदी को सीधे गालियां देते थे, चाहे वे पत्रकार रहे हों या संस्कृतिकर्मी या लेखक, उनमें से कई लोगों को मौजूदा संगठन में महत्वपूर्ण दायित्व मिला है। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं, जिन्होंने मोदी जी को लेकर अपने न्यूज रूम में खुलेआम अशोभन टिप्पणियां कीं, अब वे लोग ही कई मंत्रालयों या सांस्कृतिक संगठनों की कमेटियों के महत्वपूर्ण सदस्य हैं। जबकि निष्ठावान और योग्य कार्यकर्ता अब भी अपना घर चलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब तो हालत यह है कि वामपंथी सोच वाले कुछ लोग तो संघ विचार परिवार के लोगों को भी प्रमाणपत्र बांटने लगे हैं।

दिलचस्प यह है कि जब नैरेटिव की लड़ाई होती है तो मौसम विज्ञान की जानकारी वाले सत्तापेक्षी परवर्ती कार्यकर्ता तो किनारे हो जाते हैं, कई बार वे अपनी मूल पार्टी या संगठन को जानकारियां तक मुहैया कराते हैं। तब भाजपा हो या फिर संघ विचार परिवार, उन्हें नैरेटिव के मुकाबले के लिए अपने कार्यकर्ताओं की याद आती है। अनुशासन में बंधे कार्यकर्ता इस पर सवाल तो नहीं उठाते, लेकिन दबी-जुबान से यह कहने से नहीं हिचकते कि बाहरी पर भरोसा करने का नतीजा तो यही होना था।

मुकुल रॉय की वापसी ने यह साबित किया है कि बाहर से आए लोगों के जरिए अगर विपक्षी राजनीतिक ताकत को कमजोर किया जा सके तो ठीक है, अन्यथा उन पर भरोसा करने का मतलब एक तरह से अपने संगठन के निष्ठावान कार्यकर्ताओं की क्षमता और निष्ठा पर सवाल उठाना है।

संघ विचार परिवार पहले से ही अपने निष्ठावान कार्यकर्ताओं को अपनी पूंजी मानता रहा है। लेकिन विचार परिवार की एक कमी रही है कि वह इस पूंजी के बारे में यह भरोसा करता रहा है कि वह तो उसकी अपनी है ही, बाहरी पूंजी को अपना बनाओ। इसी प्रक्रिया में अपना आदमी या तो वंचित रह जाता रहा है या पिछड़ा। इसके बावजूद कांग्रेसी सत्ता तंत्र की अल्पसंख्यकवादी सोच और हिंदुत्व को किनारे रखने की चाल को चूंकि लोग समझने लगे, इसलिए संगठन लगातार बढ़ता रहा। हालांकि लोगों को इस दिशा में जागरूक बनाने में निष्ठावान कार्यकर्ताओं की ही बड़ी भूमिका रही। कार्यकर्ता भी सोचता रहा कि चलो देश और संगठनहित में अपना सर्वस्व समर्पित करते रहो। एक न एक दिन संगठन को कर्ता-धर्ता उसके बारे में भी सोचेंगे। लेकिन सात साल की सत्ता के बाद कार्यकर्ता का धैर्य चूकने लगा है। मुकुल रॉय सरीखे मौसमी प्रवासी पक्षियों की वापसी ने उनकी कुलबुलाहट को अभिव्यक्त करने का जैसे मौका दे दिया है। इसकी अनुगूंज अब पहले की तुलना ज्यादा सुनाई देने लगी है। इसलिए विचार परिवार अब सोचने लगा है कि कार्यकर्ताओं को कैसे संतुष्ट किया जाए।

विचार परिवार की एक और खामी मोटे तौर पर सामने आई है। वह अपने कार्यकर्ताओं में स्थित प्रतिभाओं पर कम भरोसा करता है। उसे भी गणेश परिक्रमा ही पसंद आती है। केंद्रीय सूचना आयुक्त उदय माहूरकर ने एक कार्यक्रम में संघ के वरिष्ठ अधिकारियों के सामने कहा था कि विचार परिवार को अपनी प्रतिभाओं को उचित मौका देने के लिए संतुलित नीति अपनानी चाहिए। उन्होंने प्रतिभा खोज तक का सुझाव दिया था।

संघ विचार परिवार और भाजपा में अब कार्यकर्ताओं की कुलबुलाहट को लेकर बढ़ती चिंता अगर सचमुच है तो उसका स्वागत होना चाहिए। बड़ा संगठन निष्ठावान लोगों को उचित भूमिका और जवाबदेही देकर ही बड़ा बना रह सकता है।

 

विशेष प्रतिनिधि

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